किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 56
उपविष्टास्तु ते सर्वे यस्मिन् प्रायं गिरिस्थले । हरयो गृध्रराजश्च तं देशमुपचक्रमे ॥ १ ॥ सम्पातिर्नाम नाम्ना तु चिरजीवी विहंगमः । भ्राता जटायुषः श्रीमान् विख्यातबलपौरुषः ॥ २ ॥
भावार्थ
पर्वतके जिस स्थानपर वे सब वानर आमरण उपवासके लिये बैठे थे, उस प्रदेशमें चिरंजीवी पक्षी श्रीमान् गृध्रराज सम्पाति आये । वे जटायुके भाई थे और अपने बल तथा पुरुषार्थके लिये सर्वत्र प्रसिद्ध थे ॥ १-२ ॥
कन्दरादभिनिष्क्रम्य स विन्ध्यस्य महागिरेः । उपविष्टान् हरीन् दृष्ट्वा हृष्टात्मा गिरमब्रवीत् ॥ ३ ॥
भावार्थ
महागिरि विन्ध्यकी कन्दरासे निकलकर सम्पातिने जब वहाँ बैठे हुए वानरोंको देखा, तब उनका हृदय हर्षसे खिल उठा और वे इस प्रकार बोले—॥ ३ ॥
विधिः किल नरं लोके विधानेनानुवर्तते । यथायं विहितो भक्ष्यश्चिरान्मह्यमुपागतः ॥ ४ ॥ परम्पराणां भक्षिष्ये वानराणां मृतं मृतम् । उवाचैतद् वचः पक्षी तान् निरीक्ष्य प्लवंगमान् ॥५॥
भावार्थ
‘जैसे लोकमें पूर्वजन्मके कर्मानुसार मनुष्यको उसके कियेका फल स्वतः प्राप्त होता है, उसी प्रकार आज दीर्घकालके पश्चात् यह भोजन स्वतः मेरे लिये प्राप्त हो गया । अवश्य ही यह मेरे किसी कर्मका फल है । इन वानरोंमेंसे जो-जो मरता जायगा, उसको मैं क्रमशः भक्षण करता जाऊँगा’ यह बात उस पक्षीने उन सब वानरोंको देखकर कहा ॥४-५॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा भक्ष्यलुब्धस्य पक्षिणः । अङ्गदः परमायस्तो हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
भोजनपर लुभाये हुए उस पक्षीका यह वचन सुनकर अङ्गदको बड़ा दुःख हुआ और वे हनुमान्जीसे बोले-॥६॥
पश्य सीतापदेशेन साक्षाद् वैवस्वतो यमः । इमं देशमनुप्राप्तो वानराणां विपत्तये ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘देखिये, सीताके निमित्तसे वानरोंको विपत्तिमें डालनेके लिये साक्षात् सूर्यपुत्र यम इस देशमें आ पहुँचे ॥ ७ ॥
रामस्य न कृतं कार्यं न कृतं राजशासनम् । हरीणामियमज्ञाता विपत्तिः सहसाऽऽगता ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘हमलोगोंने न तो श्रीरामचन्द्रजीका कार्य किया और न राजाकी आज्ञाका पालन ही । इसी बीच वानरोंपर यह सहसा अज्ञात विपत्ति आ पड़ी ॥ ८ ॥
वैदेह्याः प्रियकामेन कृतं कर्म जटायुषा । गृध्रराजेन यत् तत्र श्रुतं वस्तदशेषतः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘विदेहकुमारी सीताका प्रिय करनेकी इच्छासे गृध्रराज जटायुने जो साहसपूर्ण कार्य किया था, वह सब आपलोगोंने सुना ही होगा ॥ ९ ॥
तथा सर्वाणि भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि । प्रियं कुर्वन्ति रामस्य त्यक्त्वा प्राणान् यथा वयम् ॥
भावार्थ
‘समस्त प्राणी, वे पशु-पक्षियोंकी योनिमें ही क्यों न उत्पन्न हुए हों, हमारी तरह प्राण देकर भी श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय कार्य करते हैं ॥ १० ॥
अन्योन्यमुपकुर्वन्ति स्नेहकारुण्ययन्त्रिताः । ततस्तस्योपकारार्थं त्यजतात्मानमात्मना ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘शिष्ट पुरुष स्नेह और करुणाके वशीभूत हो एक दूसरेका उपकार करते हैं, अतः आपलोग भी श्रीरामके उपकारके लिये स्वयं ही अपने शरीरका परित्याग करें ॥ ११ ॥
प्रियं कृतं हि रामस्य धर्मज्ञेन जटायुषा । राघवार्थे परिश्रान्ता वयं संत्यक्तजीविताः ॥ १२ ॥ कान्ताराणि प्रपन्नाः स्म न च पश्याम मैथिलीम् ।
भावार्थ
‘धर्मज्ञ जटायुने ही श्रीरामका प्रिय किया है । हमलोग श्रीरघुनाथजीके लिये अपने जीवनका मोह छोड़कर परिश्रम करते हुए इस दुर्गम वनमें आये, किंतु मिथिलेशकुमारीका दर्शन न कर सके ॥ १२½ ॥
स सुखी गृध्रराजस्तु रावणेन हतो रणे । मुक्तश्च सुग्रीवभयाद् गतश्च परमां गतिम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘गृध्रराज जटायु ही सुखी हैं, जो युद्धमें रावणके हाथसे मारे गये और परमगतिको प्राप्त हुए। वे सुग्रीवके भयसे मुक्त हैं ॥ १३ ॥
जटायुषो विनाशेन राज्ञो दशरथस्य च। हरणेन च वैदेह्याः संशयं हरयो गताः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘राजा दशरथकी मृत्यु, जटायुका विनाश और विदेहकुमारी सीताका अपहरण—इन घटनाओंसे इस समय वानरोंका जीवन संशयमें पड़ गया है ॥ १४ ॥
रामलक्ष्मणयोर्वासमरण्ये सह सीतया। राघवस्य च बाणेन वालिनश्च तथा वधः ॥ १५ ॥ रामकोपादशेषाणां रक्षसां च तथा वधम्। कैकेय्या वरदानेन इदं च विकृतं कृतम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम और लक्ष्मणको सीताके साथ वनमें निवास करना पड़ा, श्रीरघुनाथजीके बाणसे वालीका वध हुआ और अब श्रीरामके कोपसे समस्त राक्षसोंका संहार होगा—ये सारी बुराइयाँ कैकेयीको दिये गये वरदानसे ही पैदा हुई हैं’ ॥ १५-१६ ॥
तद्सुखमनुकीर्तितं वचो भुवि पतितांश्च निरीक्ष्य वानरान्। भृशचकितमतिर्महामतिः कृपणमुदाहृतवान् स गृध्रराजः॥ १७ ॥
भावार्थ
वानरोंके द्वारा बारंबार कहे गये इन दुःखमय वचनोंको सुनकर और उन सबको पृथ्वीपर पड़ा हुआ देखकर परम बुद्धिमान् सम्पातिका हृदय अत्यन्त क्षुब्ध हो उठा और वे दीन वाणीमें बोलनेको उद्यत हुए ॥ १७ ॥
तत् तु श्रुत्वा तथा वाक्यमङ्गदस्य मुखोद्गतम्। अब्रवीद् वचनं गृध्रस्तीक्ष्णतुण्डो महास्वनः ॥ १८ ॥
भावार्थ
अङ्गदके मुखसे निकले हुए उस वचनको सुनकर तीखी चोंचवाले उस गीधने उच्चस्वरसे इस प्रकार पूछा—॥ १८ ॥
कोऽयं गिरा घोषयति प्राणैः प्रियतरस्य मे। जटायुषो वधं भ्रातुः कम्पयन्निव मे मनः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘यह कौन है, जो मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय भाई जटायुके वधकी बात कह रहा है। इसे सुनकर मेरा हृदय कम्पित-सा होने लगा है ॥ १९ ॥
कथमासीज्जनस्थाने युद्धं राक्षसगृध्रयोः। नामधेयमिदं भ्रातुश्चिरस्याद्य मया श्रुतम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘जनस्थानमें राक्षसका गृध्रके साथ किस प्रकार युद्ध हुआ था ? अपने भाईका प्यारा नाम आज बहुत दिनोंके बाद मेरे कानमें पड़ा है ॥ २० ॥
इच्छेयं गिरिदुर्गाच्च भवद्भिरवतारितुम्। यवीयसो गुणज्ञस्य श्लाघनीयस्य विक्रमैः ॥ २१ ॥ अतिदीर्घस्य कालस्य परितुष्टोऽस्मि कीर्तनात्। तदिच्छेयमहं श्रोतुं विनाशं वानरर्षभाः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘जटायु मुझसे छोटा, गुणज्ञ और पराक्रमके कारण अत्यन्त प्रशंसाके योग्य था। दीर्घकालके पश्चात् आज उसका नाम सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं चाहता हूँ कि पर्वतके इस दुर्गम स्थानसे आपलोग मुझे नीचे उतार दें। श्रेष्ठ वानरो ! मुझे अपने भाईके विनाशका वृत्तान्त सुननेकी इच्छा है ॥ २१-२२ ॥
भ्रातुर्जटायुषस्तस्य जनस्थाननिवासिनः। तस्यैव च मम भ्रातुः सखा दशरथः कथम् ॥ २३ ॥ यस्य रामः प्रियः पुत्रो ज्येष्ठो गुरुजनप्रियः।
भावार्थ
‘मेरा भाई जटायु तो जनस्थानमें रहता था। गुरुजनोंके प्रेमी श्रीरामचन्द्रजी जिनके ज्येष्ठ एवं प्रिय पुत्र हैं, वे महाराज दशरथ मेरे भाईके मित्र कैसे हुए ? ॥ २३½ ॥
सूर्यांशुदग्धपक्षत्वान्न शक्नोमि विसर्पितुम्। इच्छेयं पर्वतादस्मादवतर्तुमरिंदमाः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘शत्रुदमन वीरो !मेरे पंख सूर्यकी किरणोंसे जल गये हैं, इसलिये मैं उड़ नहीं सकता; किंतु इस पर्वतसे नीचे उतरना चाहता हूँ’ ॥ २४ ॥
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