किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 42
अथ प्रस्थाप्य स हरीन् सुग्रीवो दक्षिणां दिशम् । अब्रवीन्मेघसंकाशं सुषेणं नाम वानरम् ॥ १ ॥ तारायाः पितरं राजा श्वशुरं भीमविक्रमम् । अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यमभिगम्य प्रणम्य च ॥ २ ॥ महर्षिपुत्रं मारीचमर्चिष्मन्तं महाकपिम् । वृतं कपिवरैः शूरैर्महेन्द्रसदृशद्युतिम् ॥ ३ ॥ बुद्धिविक्रमसम्पन्नं वैनतेयसमद्युतिम् । मरीचिपुत्रान् मारीचानर्चिर्माल्यान्महाबलान् ॥ ४ ॥ ऋषिपुत्रांश्च तान् सर्वान् प्रतीचीमादिशद् दिशम् । द्वाभ्यां शतसहस्राभ्यां कपीनां कपिसत्तमाः ॥ ५ ॥ सुषेणप्रमुखा यूयं वैदेहीं परिमार्गथ ।
भावार्थ
दक्षिण दिशाकी ओर वानरोंको भेजनेके पश्चात् राजा सुग्रीवने ताराके पिता और अपने श्वशुर ‘सुषेण’ नामक वानरके पास जाकर उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कुछ कहना आरम्भ किया । सुषेण मेघके समान काले और भयंकर पराक्रमी थे । उनके सिवा, महर्षि मरीचिके पुत्र महाकपि अर्चिष्मान् भी वहाँ उपस्थित थे, जो देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी तथा शूरवीर श्रेष्ठ वानरोंसे घिरे हुए थे । उनकी कान्ति विनतानन्दन गरुड़के समान थी । वे बुद्धि और पराक्रमसे सम्पन्न थे । उनके अतिरिक्त मरीचिके पुत्र मारीच नामवाले वानर भी थे, जो महाबली और ‘अर्चिर्माल्य’ नामसे प्रसिद्ध थे । इनके सिवा और भी बहुत-से ऋषिकुमार थे, जो वानररूपमें वहाँ विराजमान थे । सुषेणके साथ उन सबको सुग्रीवने पश्चिम दिशाकी ओर जानेकी आज्ञा दी और कहा—‘कपिवरो ! आप सब लोग दो लाख वानरोंको साथ ले सुषेणजीकी प्रधानतामें पश्चिमको जाइये और विदेहनन्दिनी सीताकी खोज कीजिये ॥ १—५½ ॥
सौराष्ट्रान् सहबाह्लीकांश्चन्द्रचित्रांस्तथैव च ॥ ६ ॥ स्फीताञ्जनपदान् रम्यान् विपुलानि पुराणि च । पुंनागगहनं कुक्षिं बकुलोद्दालकाकुलम् ॥ ७ ॥ तथा केतकखण्डांश्च मार्गध्वं हरिपुङ्गवाः ।
भावार्थ
‘श्रेष्ठ वानरो ! सौराष्ट्र, बाह्लीक और चन्द्रचित्र आदि देशों, अन्यान्य समृद्धिशाली एवं रमणीय जनपदों, बड़े-बड़े नगरों तथा पुंनाग; बकुल और उद्दालक आदि वृक्षोंसे भरे हुए कुक्षिदेशमें एवं केवड़ेके वनोंमें सीताकी खोज करो ॥ ६-७½ ॥
प्रत्यक्स्रोतोवहाश्चैव नद्यः शीतजलाः शिवाः ॥ ८ ॥ तापसानामरण्यानि कान्तारगिरयश्च ये ।
भावार्थ
‘पश्चिमकी ओर बहनेवाली शीतल जलसे सुशोभित कल्याणमयी नदियों, तपस्वी जनोंके वनों तथा दुर्गम पर्वतोंमें भी विदेहकुमारीका पता लगाओ ॥ ८½ ॥
तत्र स्थलीर्मरुप्राया अत्युच्चशिशिराः शिलाः ॥ ९ ॥ गिरिजालावृतां दुर्गां मार्गित्वा पश्चिमां दिशम् । ततः पश्चिममागम्य समुद्रं द्रष्टुमर्हथ ॥ १० ॥ तिमिनक्राकुलजलं गत्वा द्रक्ष्यथ वानराः ।
भावार्थ
‘पश्चिम दिशामें प्रायः मरुभूमि है । अत्यन्त ऊँची और ठंडी शिलाएँ हैं तथा पर्वतमालाओंसे घिरे हुए बहुतसे दुर्गम प्रदेश हैं । उन सभी स्थानोंमें सीताकी खोज करते हुए क्रमशः आगे बढ़कर पश्चिम समुद्रतक जाना और वहाँके प्रत्येक स्थानका निरीक्षण करना । वानरो ! समुद्रका जल तिमि नामक मत्स्यों तथा बड़े-बड़े ग्राहोंसे भरा हुआ है । वहाँ सब ओर देख-भाल करना ॥ ९-१०½ ॥
ततः केतकखण्डेषु तमालगहनेषु च ॥ ११ ॥ कपयो विहरिष्यन्ति नारिकेलवनेषु च । तत्र सीतां च मार्गध्वं निलयं रावणस्य च ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘समुद्रके तटपर केवड़ोंके कुञ्जोंमें, तमालके काननोंमें तथा नारियलके वनोंमें तुम्हारे सैनिक वानर भलीभाँति विचरण करेंगे । वहाँ तुमलोग सीताको खोजना और रावणके निवास-स्थानका पता लगाना ॥ ११-१२ ॥
वेलातलनिविष्टेषु पर्वतेषु वनेषु च । मुरवीपत्तनं चैव रम्यं चैव जटापुरम् ॥ १३ ॥ अवन्तीमङ्गलेपां च तथा चालक्षितं वनम् । राष्ट्राणि च विशालानि पत्तनानि ततस्ततः ॥ १४ ॥
भावार्थ
समुद्रतटवर्ती पर्वतों और वनोंमें भी उन्हें ढूँढ़ना चाहिये । मुरवीपत्तन (मोरवी) तथा रमणीय जटापुरमें, अवन्ती तथा अङ्गलेपापुरीमें, अलक्षित वनमें और बड़े-बड़े राष्ट्रों एवं नगरोंमें जहाँ-तहाँ घूमकर पता लगाना ॥ १३-१४ ॥
सिन्धुसागरयोश्चैव संगमे तत्र पर्वतः । महान् सोमगिरिर्नाम शतशृङ्गो महाद्रुमः ॥ १५ ॥ तत्र प्रस्थेषु रम्येषु सिंहाः पक्षगमाः स्थिताः । तिमिमत्स्यगजांश्चैव नीडान्यारोपयन्ति ते ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘सिंधु-नद और समुद्रके संगमपर सोमगिरिनामक एक महान् पर्वत है, जिसके सौ शिखर हैं । वह पर्वत ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंसे भरा है । उसकी रमणीय चोटियोंपर सिंह नामक पक्षी रहते हैं, जो तिमि नामवाले विशालकाय मत्स्यों और हाथियोंको भी अपने घोंसलोंमें उठा लाते हैं ॥ १५-१६ ॥
तानि नीडानि सिंहानां गिरिशृङ्गगताश्च ये । हस्तिनस्तृप्ताश्च मातङ्गास्तोयदस्वननिःस्वनाः ॥ १७ ॥ विचरन्ति विशालेऽस्मिंस्तोयपूर्णे समन्ततः ।
भावार्थ
‘सिंह नामक पक्षियोंके उन घोंसलोंमें पहुँचकर उस पर्वत-शिखरपर उपस्थित हुए जो हाथी हैं, वे उस पंखधारी सिंहसे सम्मानित होनेके कारण गर्वका अनुभव करते और मन-ही-मन संतुष्ट होते हैं । इसीलिये मेघोंकी गर्जनाके समान शब्द करते हुए उस पर्वतके जलपूर्ण विशाल शिखरपर चारों ओर विचरते रहते हैं ॥ १७½ ॥
तस्य शृङ्गं दिवस्पर्शं काञ्चनं चित्रपादपम् ॥ १८ ॥ सर्वमाशु विचेतव्यं कपिभिः कामरूपिभिः ।
भावार्थ
‘सोमगिरिका गगनचुम्बी शिखर सुवर्णमय है । उसके ऊपर विचित्र वृक्ष शोभा पाते हैं । इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वानरोंको चाहिये कि वहाँके सब स्थानोंको शीघ्रतापूर्वक अच्छी तरह देख लें ॥ १८½ ॥
कोटिं तत्र समुद्रस्य काञ्चनीं शतयोजनाम् ॥ १९ ॥ दुर्दर्शां पारियात्रस्य गत्वा द्रक्ष्यथ वानराः ।
भावार्थ
‘वहाँसे आगे समुद्रके बीचमें ‘पारियात्र पर्वतका सुवर्णमय शिखर दिखायी देगा, जो सौ योजन विस्तृत है । वानरो ! उसका दर्शन दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है । वहाँ जाकर तुम्हें सीताकी खोज करनी चाहिये ॥ १९३ ॥
कोट्यस्तत्र चतुर्विंशद् गन्धर्वाणां तरस्विनाम् ॥२०॥ वसन्त्यग्निनिकाशानां घोराणां कामरूपिणाम् । पावकार्चिःप्रतीकाशाः समवेताः समन्ततः ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘पारियात्र पर्वतके शिखरपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, भयंकर, अग्नितुल्य तेजस्वी तथा वेगशाली चौबीस करोड़ गन्धर्व निवास करते हैं । वे सब-के-सब अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान हैं और सब ओरसे आकर उस पर्वतपर एकत्र हुए हैं ॥२०-२१॥
नात्यासादयितव्यास्ते वानरैर्भीमविक्रमैः । नादेयं च फलं तस्माद् देशात् किंचित् प्लवङ्गमैः॥२२॥
भावार्थ
‘भयंकर पराक्रमी वानरोंको चाहिये कि वे उन गन्धर्वोंके अधिक निकट न जायँ—उनका कोई अपराध न करें और उस पर्वतशिखरसे कोई फल न लें ॥ २२ ॥
दुरासदा हि ते वीराः सत्त्ववन्तो महाबलाः । फलमूलानि ते तत्र रक्षन्ते भीमविक्रमाः ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘क्योंकि वे भयंकर बल-विक्रमसे सम्पन्न धैर्यवान् महाबली वीर गन्धर्व वहाँके फल-मूलोंकी रक्षा करते हैं । उनपर विजय पाना बहुत ही कठिन है ॥ २३ ॥
तत्र यत्नश्च कर्तव्यो मार्गितव्या च जानकी । नहि तेभ्यो भयं किंचित् कपित्वमनुवर्तताम् ॥२४॥
भावार्थ
‘वहाँ भी जानकीकी खोज करनी चाहिये और उनका पता लगानेके लिये पूरा प्रयत्न करना चाहिये । प्राकृत वानरके स्वभावका अनुसरण करनेवाले तुम्हारी सेनाके वीरोंको उन गन्धर्वोंसे कोई भय नहीं है ॥ २४ ॥
तत्र वैदूर्यवर्णाभो वज्रसंस्थानसंस्थितः । नानाद्रुमलताकीर्णो वज्रो नाम महागिरिः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘पारियात्र पर्वतके पास ही समुद्रमें वज्रनामसे प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे व्याप्त दिखायी देता है । वह वज्रगिरि वैदूर्यमणिके समान नील वर्णका है । वह कठोरतामें वज्रमणि ( हीरे ) के समान है ॥ २५ ॥
श्रीमान् समुदितस्तत्र योजनानां शतं समम् । गुहास्तत्र विचेतव्याः प्रयत्नेन प्लवङ्गमाः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘वह सुन्दर पर्वत वहाँ सौ योजनके घेरेमें प्रतिष्ठित है । उसकी लंबाई और चौड़ाई दोनों बराबर हैं । वानरो ! उस पर्वतपर बहुत-सी गुफाएँ हैं । उन सबमें प्रयत्नपूर्वक सीताका अनुसंधान करना चाहिये ॥ २६ ॥
चतुर्भागे समुद्रस्य चक्रवान् नाम पर्वतः । तत्र चक्रं सहस्रारं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘समुद्रके चतुर्थ भागमें चक्रवान् नामक पर्वत है । वहीं विश्वकर्माने सहस्रार चक्रका निर्माण किया था ॥ २७ ॥
तत्र पञ्चजनं हत्वा हयग्रीवं च दानवम् । आजहार ततश्चक्रं शङ्खं च पुरुषोत्तमः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘वहींसे पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु पञ्चजन और हयग्रीव नामक दानवोंका वध करके पाञ्चजन्य शङ्ख तथा वह सहस्रार सुदर्शन चक्र लाये थे ॥ २८ ॥
तस्य सानुषु रम्येषु विशालासु गुहासु च । रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ २९ ॥ योजनानि चतुःषष्टिर्वराहो नाम पर्वतः । सुवर्णशृङ्गः सुमहानगाधे वरुणालये ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘चक्रवान् पर्वतके रमणीय शिखरों और विशाल गुफाओंमें भी इधर-उधर वैदेहीसहित रावणका पता लगाना चाहिये ॥ ‘उससे आगे समुद्रकी अगाध जलराशिमें सुवर्णमय शिखरोंवाला वराह नामक पर्वत है, जिसका विस्तार चौंसठ योजनकी दूरीमें है ॥ ३० ॥
तत्र प्राग्ज्योतिषं नाम जातरूपमयं पुरम् । यस्मिन् वसति दुष्टात्मा नरको नाम दानवः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘वहीं प्राग्ज्योतिषनामक सुवर्णमय नगर है, जिसमें दुष्टात्मा नरक नामक दानव निवास करता है ॥ ३१ ॥
तत्र सानुषु रम्येषु विशालासु गुहासु च । रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘उस पर्वतके रमणीय शिखरोंपर तथा वहाँकी विशाल गुफाओंमें सीतासहित रावणकी तलाश करनी चाहिये ॥३२॥
तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं काञ्चनान्तरदर्शनम् । पर्वतः सर्वसौवर्णो धाराप्रस्रवणायुतः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘जिसका भीतरी भाग सुवर्णमय दिखायी देता है, उस पर्वतराज वराहको लाँघकर आगे बढ़नेपर एक ऐसा पर्वत मिलेगा, जिसका सब कुछ सुवर्णमय है तथा जिसमें लगभग दस सहस्र झरने हैं ॥ ३३ ॥
तं गजाश्च वराहाश्च सिंहा व्याघ्राश्च सर्वतः । अभिगर्जन्ति सततं तेन शब्देन दर्पिताः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘उसके चारों ओर हाथी, सूअर, सिंह और व्याघ्र सदा गर्जना करते हैं और अपनी ही गर्जनाकी प्रतिध्वनिके शब्दसे दर्पमें भरकर पुनः दहाड़ने लगते हैं ॥ ३४ ॥
यस्मिन् हरिहयः श्रीमान् महेन्द्रः पाकशासनः । अभिषिक्तः सुरै राजा मेघो नाम स पर्वतः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘उस पर्वतका नाम है मेघगिरि । जिसपर देवताओंने हरित रंगके अश्ववाले श्रीमान् पाकशासन इन्द्रको राजाके पदपर अभिषिक्त किया था ॥ ३५ ॥
तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं महेन्द्रपरिपालितम् । षष्टिं गिरिसहस्राणि काञ्चनानि गमिष्यथ ॥ ३६ ॥ तरुणादित्यवर्णानि भ्राजमानानि सर्वतः । जातरूपमयैर्वृक्षैः शोभितानि सुपुष्पितैः ॥ ३७ ॥ तेषां मध्ये स्थितो राजा मेरुरुत्तमपर्वतः । आदित्येन प्रसन्नेन शैलो दत्तवरः पुरा ॥ ३८ ॥ तेनैवमुक्तः शैलेन्द्रः सर्व एव त्वदाश्रयाः । मत्प्रसादाद् भविष्यन्ति दिवा रात्रौ च काञ्चनाः॥३९॥ त्वयि ये चापि वत्स्यन्ति देवगन्धर्वदानवाः । ते भविष्यन्ति भक्ताश्च प्रभया काञ्चनप्रभाः ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘देवराज इन्द्रद्वारा सुरक्षित गिरिराज मेघको लाँघकर जब तुम आगे बढ़ोगे, तब तुम्हें सोनेके साठ हजार पर्वत मिलेंगे, जो सब ओरसे सूर्यके समान कान्तिसे देदीप्यमान हो रहे हैं और सुन्दर फूलोंसे भरे हुए सुबर्णमय वृक्षोंसे सुशोभित हैं ॥ ‘उनके मध्यभागमें पर्वतोंका राजा गिरिश्रेष्ठ मेरु विराजमान है, जिसे पूर्वकालमें सूर्यदेवने प्रसन्न होकर वर दिया था । उन्होंने उस शैलराजसे कहा था कि ‘जो दिन-रात तुम्हारे आश्रवमें रहेंगे, वे मेरी कृपासे सुवर्णमय हो जायँगे तथा देवता, दानव, गन्धर्व जो भी तुम्हारे ऊपर निवास करेंगे, वे सुवर्णके समान कान्तिमान् और मेरे भक्त हो जायँगे’ ॥ ३८—४० ॥
विश्वेदेवाश्च वसवो मरुतश्च दिवौकसः । आगत्य पश्चिमां संध्यां मेरुमुत्तमपर्वतम् ॥ ४१ ॥ आदित्यमुपतिष्ठन्ति तैश्च सूर्योऽभिपूजितः । अदृश्यः सर्वभूतानामस्तं गच्छति पर्वतम् ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘विश्वेदेव, वसु, मरुद्गण तथा अन्य देवता सायंकालमें उत्तम पर्वत मेरुपर आकर सूर्यदेवका उपस्थान करते हैं । उनके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर भगवान् सूर्य सब प्राणियोंकी आँखोंसे ओझल होकर अस्ताचलको चले जाते हैं ॥४१-४२॥
योजनानां सहस्राणि दश तानि दिवाकरः । मुहूर्तार्धेन तं शीघ्रमभियाति शिलोच्चयम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘मेरुसे अस्ताचल दस हजार योजनकी दूरीपर है, किंतु सूर्यदेव आधे मुहूर्तमें ही वहाँ पहुँच जाते हैं ॥ ४३ ॥
शृङ्गे तस्य महद्दिव्यं भवनं सूर्यसंनिभम् । प्रासादगणसम्बाधं विहितं विश्वकर्मणा ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘उसके शिखरपर विश्वकर्माका बनाया हुआ एक बहुत बड़ा दिव्य भवन है, जो सूर्यके समान दीप्तिमान् दिखायी देता है । वह अनेक प्रासादोंसे भरा हुआ है ॥ ४४ ॥
शोभितं तरुभिश्चित्रैर्नानापक्षिसमाकुलैः । निकेतं पाशहस्तस्य वरुणस्य महात्मनः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘नाना प्रकारके पक्षियोंसे व्याप्त विचित्र-विचित्र वृक्ष उसकी शोभा बढ़ाते हैं । वह पाशधारी महात्मा वरुणका निवास-स्थान है ॥ ४५ ॥
अन्तरा मेरुमस्तं च तालो दशशिरा महान् । जातरूपमयः श्रीमान् भ्राजते चित्रवेदिकः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘मेरु और अस्ताचलके बीच एक स्वर्णमय ताड़का वृक्ष है, जो बड़ा ही सुन्दर और बहुत ही ऊँचा है । उसके दस स्कन्ध ( बड़ी शाखाएँ) हैं । उसके नीचेकी वेदी बड़ी विचित्र है । इस तरह वह वृक्ष बड़ी शोभा पाता है ॥ ४६ ॥
तेषु सर्वेषु दुर्गेषु सरस्सु च सरित्सु च । रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ ४७ ॥ यत्र तिष्ठति धर्मज्ञस्तपसा स्वेन भावितः । मेरुसावर्णिरित्येष ख्यातो वै ब्रह्मणा समः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘वहाँके उन सभी दुर्गम स्थानों, सरोवरों और सरिताओंमें इधर-उधर सीतासहित रावणका अनुसंधान करना चाहिये ॥ ‘मेरुगिरिपर धर्मके ज्ञाता महर्षि मेरुसावर्णि रहते हैं, जो अपनी तपस्यासे ऊँची स्थितिको प्राप्त हुए हैं । वे प्रजापतिके समान शक्तिशाली एवं विख्यात ऋषि हैं ॥४८॥
प्रष्टव्यो मेरुसावर्णिर्महर्षिः सूर्यसंनिभः । प्रणम्य शिरसा भूमौ प्रवृत्तिं मैथिलीं प्रति ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘सूर्यतुल्य तेजस्वी महर्षि मेरुसावर्णिके चरणोंमें पृथ्वीपर मस्तक टेककर प्रणाम करनेके अनन्तर तुमलोग उनसे मिथिलेशकुमारीका समाचार पूछना ॥ ४९ ॥
एतावज्जीवलोकस्य भास्करो रजनीक्षये । कृत्वा वितिमिरं सर्वमस्तं गच्छति पर्वतम् ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘रात्रिके अन्तमें ( प्रातःकाल ) उदित हुए भगवान् सूर्य जीव-जगत्के इन सभी स्थानोंको अन्धकाररहित ( एवं प्रकाशपूर्ण ) करके अन्तमें अस्ताचलको चले जाते हैं ॥५०॥
एतावद् वानरैः शक्यं गन्तुं वानरपुङ्गवाः । अभास्करममर्यादं न जानीमस्ततः परम् ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘वानरशिरोमणियो ! पश्चिम दिशामें इतनी ही दूरतक वानर जा सकते हैं । उसके आगे न तो सूर्यका प्रकाश है और न किसी देश आदिकी सीमा ही । अतः वहाँसे आगेकी भूमिके विषयमें मुझे कोई जानकारी नहीं है ॥५१॥
अवगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च । अस्तं पर्वतमासाद्य पूर्णे मासे निवर्तत ॥ ५२ ॥ ऊर्ध्वं मासान्न वस्तव्यं वसन् वध्यो भवेन्मम । सहैव शूरो युष्माभिः श्वशुरो मे गमिष्यति ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘अस्ताचलतक जाकर रावणके स्थान और सीताका पता लगाओ तथा एक मास पूर्ण होते ही यहाँ लौट आओ ॥ ‘एक महीनेसे अधिक न ठहरना । जो ठहरेगा, उसे मेरे हाथसे प्राणदण्ड मिलेगा । तुमलोगोंके साथ मेरे पूजनीय श्वशुरजी भी जायँगे ॥ ५३ ॥
श्रोतव्यं सर्वमेतस्य भवद्भिर्दिष्टकारिभिः । गुरुरेष महाबाहुः श्वशुरो मे महाबलः ॥ ५४ ॥
भावार्थ
‘तुम सब लोग इनकी आज्ञाके अधीन रहकर इनकी सभी बातें ध्यानसे सुनना; क्योंकि ये महाबाहु महाबली सुषेणजी मेरे श्वशुर एवं गुरुजन हैं ( अतः तुम्हारे लिये भी गुरुकी भाँति ही आदरणीय हैं )॥ ५४ ॥
भवन्तश्चापि विक्रान्ताः प्रमाणं सर्व एव हि । प्रमाणमेनं संस्थाप्य पश्यध्वं पश्चिमां दिशम् ॥ ५५ ॥ दृष्टायां तु नरेन्द्रस्य पत्न्याममिततेजसः । कृतकृत्या भविष्यामः कृतस्य प्रतिकर्मणा ॥ ५६ ॥
भावार्थ
‘तुम सब लोग भी बड़े पराक्रमी तथा कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयमें प्रमाणभूत ( विश्वसनीय ) हो, तथापि इन्हें अपना प्रधान बनाकर तुम पश्चिम दिशाकी देखभाल आरम्भ करो ॥ ‘अमित तेजस्वी महाराज श्रीरामकी पत्नीका पता लग जानेपर हम कृतकृत्य हो जायँगे; क्योंकि उन्होंने जो उपकार किया है, उसका बदला इसी तरह चुका सकेगा ॥ ५६ ॥
अतोऽन्यदपि यत्कार्यं कार्यस्यास्य प्रियं भवेत् । सम्प्रधार्य भवद्भिश्च देशकालार्थसंहितम् ॥ ५७ ॥
भावार्थ
‘अतः इस कार्यके अनुकूल और भी जो कर्तव्य देश, काल और प्रयोजनसे सम्बन्ध रखता हो, उसका विचार करके आपलोग उसे भी करें’ ॥ ५७ ॥
ततः सुषेणप्रमुखाः प्लवङ्गाः सुग्रीववाक्यं निपुणं निशम्य । आमन्त्र्य सर्वे प्लवगाधिपं ते जग्मुर्दिशं तां वरुणाभिगुप्ताम् ॥ ५८ ॥
भावार्थ
सुग्रीवकी बातें अच्छी तरह सुनकर सुषेण आदि सब वानर उन वानरराजकी अनुमति ले वरुणद्वारा सुरक्षित पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये ॥ ५८ ॥
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