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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 41

ततः प्रस्थाप्य सुग्रीवस्तन्महद्वानरं बलम् । दक्षिणां प्रेषयामास वानरानभिलक्षितान् ॥ १ ॥

भावार्थ

इस प्रकार वानरोंकी बहुत बड़ी सेनाको पूर्व दिशामें प्रस्थापित करके सुग्रीवने दक्षिण दिशाकी ओर चुने हुए वानरोंको, जो भलीभाँति परख लिये गये थे, भेजा ॥ १ ॥

नीलमग्निसुतं चैव हनूमन्तं च वानरम् । पितामहसुतं चैव जाम्बवन्तं महौजसम् ॥ २ ॥ सुहोत्रं च शरारिं च शरगुल्मं तथैव च । गजं गवाक्षं गवयं सुषेणं वृषभं तथा ॥ ३ ॥ मैन्दं च द्विविदं चैव सुषेणं गन्धमादनम् । उल्कामुखमनङ्गं च हुताशनसुतावुभौ ॥ ४ ॥ अङ्गदप्रमुखान् वीरान् वीरः कपिगणेश्वरः । वेगविक्रमसम्पन्नान् संदिदेश विशेषवित् ॥ ५ ॥

भावार्थ

अग्निपुत्र नील, कपिवर हनुमान्जी, ब्रह्माजीके महावली पुत्र जाम्बवान्, सुहोत्र, शरारि, शरगुल्म, गज,गवाक्ष, गवय, सुषेण ( प्रथम ), वृषभ, मैन्द, द्विविद, सुषेण ( द्वितीय ), गन्धमादन, हुताशनके दो पुत्र उल्कामुख और अनङ्ग ( असङ्ग ) तथा अङ्गद आदि प्रधान-प्रधान वीरोंको, जो महान् वेग और पराक्रमसे सम्पन्न थे, विशेषज्ञ वानरराज सुग्रीवने दक्षिणकी ओर जानेकी आज्ञा दी ॥२–५॥

तेषामग्रेसरं चैव बृहद्बलमथाङ्गदम् । विधाय हरिवीराणामादिशद् दक्षिणां दिशम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

महान् बलशाली अङ्गदको उन समस्त वानर वीरोंका अगुआ बनाकर उन्हें दक्षिण दिशामें सीताकी खोजका भार सौंपा ॥ ६ ॥

ये केचन समुद्देशास्तस्यां दिशि सुदुर्गमाः । कपीशः कपिमुख्यानां स तेषां समुदाहरत् ॥ ७ ॥

भावार्थ

उस दिशामें जो कोई भी स्थान अत्यन्त दुर्गम थे, उनका भी कपिराज सुग्रीवने उन श्रेष्ठ वानरोंको परिचय दिया॰ ॥ ७ ॥

सहस्रशिरसं विन्ध्यं नानाद्रुमलतायुतम् । नर्मदां च नदीं रम्यां महोरगनिषेविताम् ॥ ८ ॥ ततो गोदावरीं रम्यां कृष्णवेणीं महानदीम् । वरदां च महाभागां महोरगनिषेविताम् । मेखलानुत्कलांश्चैव दशार्णनगराण्यपि ॥ ९ ॥ आब्रवन्तीमवन्तीं च सर्वमेवानुपश्यत ।

भावार्थ

वे बोले—‘वानरो ! तुमलोग भाँति-भाँतिके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित सहस्रों शिखरोंवाले विन्ध्यपर्वत, बड़े-बड़े नागोंसे सेवित रमणीय नर्मदा नदी, सुरम्य गोदावरी, महानदी, कृष्णवेणी तथा बड़े-बड़े नागोंसे सेवित महाभागा वरदा आदि नदियोंके तटोंपर और मेखल (मेकल), उत्कल एवं दशार्ण देशके नगरोंमें तथा आब्रवन्ती और अवन्तीपुरीमें भी सब जगह सीताकी खोज करो ॥ ८-९½ ॥

विदर्भान्नृष्टिकांश्चैव रम्यान् माहिषकानपि ॥ १० ॥ तथा वङ्गान् कलिङ्गांश्च कौशिकांश्च समन्ततः । अन्वीक्ष्य दण्डकारण्यं सपर्वतनदीगुहम् ॥ ११ ॥ नदीं गोदावरीं चैव सर्वमेवानुपश्यत । तथैवान्ध्रांश्च पुण्ड्रांश्च चोलान् पाण्ड्यांश्च केरलान् ॥ १२

भावार्थ

‘इसी प्रकार विदर्भ, ऋष्टिक, रम्य माहिषक देश, वङ्ग, कलिङ्ग तथा कौशिक आदि देशोंमें सब ओर देखभाल करके पर्वत, नदी और गुफाओंसहित समूचे दण्डकारण्यमें छानबीन करना । वहाँ जो गोदावरी नदी है, उसमें सब ओर बारंबार देखना । इसी प्रकार आन्ध्र, पुण्ड्र, चोल, पाण्ड्य तथा केरल आदि देशोंमें भी ढूँढ़ना ॥ १०–१२ ॥

अयोमुखश्च गन्तव्यः पर्वतो धातुमण्डितः । विचित्रशिखरः श्रीमांश्चित्रपुष्पितकाननः ॥ १३ ॥ सुचन्दनवनोद्देशो मार्गितव्यो महागिरिः ।

भावार्थ

‘तदनन्तर अनेक धातुओंसे अलंकृत अयोमुख (मलय) पर्वतपर भी जाना, उसके शिखर बड़े विचित्र हैं । वह शोभाशाली पर्वत फूले हुए विचित्र काननोंसे युक्त है । उसके सभी स्थानोंमें सुन्दर चन्दनके वन हैं । उस महापर्वत मलयपर सीताकी अच्छी तरह खोज करना ॥ १३½ ॥

ततस्तामापगां दिव्यां प्रसन्नसलिलाशयाम् ॥ १४ ॥ तत्र द्रक्ष्यथ कावेरीं विहृतामप्सरोगणैः ।

भावार्थ

‘तत्पश्चात् स्वच्छ जलवाली दिव्य नदी कावेरीको देखना, जहाँ अप्सराएँ विहार करती हैं ॥ १४½ ॥

तस्यासीनं नगस्याग्रे मलयस्य महौजसम् ॥ १५ ॥ द्रक्ष्यथादित्यसंकाशमगस्त्यमृषिसत्तमम् ।

भावार्थ

‘उस प्रसिद्ध मलयपर्वतके शिखरपर बैठे हुए सूर्यके समान महान् तेजसे सम्पन्न मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यका दर्शन करना ॥ १५½ ॥

ततस्तेनाभ्यनुज्ञाताः प्रसन्नेन महात्मना ॥ १६ ॥ ताम्रपर्णीं ग्राहजुष्टां तरिष्यथ महानदीम् ।

भावार्थ

‘इसके बाद उन प्रसन्नचित्त महात्मासे आज्ञा लेकर ग्राहोंसे सेवित महानदी ताम्रपर्णीको पार करना ॥ १६½ ॥

सा चन्दनवनैश्चित्रैः प्रच्छन्नद्वीपवारिणी ॥ १७ ॥ कान्तेव युवती कान्तं समुद्रमवगाहते ।

भावार्थ

‘उसके द्वीप और जल विचित्र चन्दनवनोंसे आच्छादित हैं; अतः वह सुन्दर साड़ीसे विभूषित युवती प्रेयसीकी भाँति अपने प्रियतम समुद्रसे मिलती है ॥ १७½ ॥

ततो हेममयं दिव्यं मुक्तामणिविभूषितम् ॥ १८ ॥ युक्तं कवाटं पाण्ड्यानां गता द्रक्ष्यथ वानराः ।

भावार्थ

‘वानरो ! वहाँसे आगे बढ़नेपर तुमलोग पाण्ड्यवंशी राजाओंके नगरद्वारपर लगे हुए सुवर्णमय कपाटका दर्शन करोगे, जो मुक्तामणियोंसे विभूषित एवं दिव्य है ॥ १८½ ॥

ततः समुद्रमासाद्य सम्प्रधार्यार्थनिश्चयम् ॥ १९ ॥ अगस्त्येनान्तरे तत्र सागरे विनिवेशितः । चित्रसानुनगः श्रीमान् महेन्द्रः पर्वतोत्तमः ॥ २० ॥ जातरूपमयः श्रीमानवगाढो महार्णवम् ।

भावार्थ

‘तत्पश्चात् समुद्रके तटपर जाकर उसे पार करनेके सम्बन्धमें अपने कर्तव्यका भलीभाँति निश्चय करके उसका पालन करना । महर्षि अगस्त्यने समुद्रके भीतर एक सुन्दर सुवर्णमय पर्वतको स्थापित किया है, जो महेन्द्रगिरिके नामसे विख्यात है । उसके शिखर तथा वहाँके वृक्ष विचित्र शोभासे सम्पन्न हैं । वह शोभाशाली पर्वत श्रेष्ठ समुद्रके भीतर गहराईतक घुसा हुआ है ॥ १९-२०½ ॥

नानाविधैर्नगैः फुल्लैर्लताभिश्चोपशोभितम् ॥ २१ ॥ देवर्षियक्षप्रवरैरप्सरोभिश्च शोभितम् । सिद्धचारणसङ्घैश्च प्रकीर्णं सुमनोरमम् ॥ २२ ॥ तमुपैति सहस्राक्षः सदा पर्वसु पर्वसु ।

भावार्थ

‘नाना प्रकारके खिले हुए वृक्ष और लताएँ उस पर्वतकी शोभा बढ़ाती हैं । देवता, ऋषि, श्रेष्ठ यक्ष और अप्सराओंकी उपस्थितिसे उसकी शोभा और भी बढ़ जाती है । सिद्धों और चारणोंके समुदाय वहाँ सब ओर फैले रहते हैं । इन सबके कारण महेन्द्रपर्वत अत्यन्त मनोरम जान पड़ता है । सहस्र नेत्रधारी इन्द्र प्रत्येक पर्वके दिन उस पर्वतपर पदार्पण करते हैं ॥ २१-२२½ ॥

द्वीपस्तस्यापरे पारे शतयोजनविस्तृतः ॥ २३ ॥ अगम्यो मानुषैर्दीप्तस्तं मार्गध्वं समन्ततः । तत्र सर्वात्मना सीता मार्गितव्या विशेषतः ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘उस समुद्रके उस पार एक द्वीप है, जिसका विस्तार सौ योजन है । वहाँ मनुष्योंकी पहुँच नहीं है । वह जो दीप्तिशाली द्वीप है, उसमें चारों ओर पूरा प्रयत्न करके तुम्हें सीताकी विशेषरूपसे खोज करनी चाहिये ॥ २३-२४ ॥

स हि देशस्तु वध्यस्य रावणस्य दुरात्मनः । राक्षसाधिपतेर्वासः सहस्राक्षसमद्युतेः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘वही देश इन्द्रके समान तेजस्वी दुरात्मा राक्षसराज रावणका, जो हमारा वध्य है, निवासस्थान है ॥ २५ ॥

दक्षिणस्य समुद्रस्य मध्ये तस्य तु राक्षसी । अङ्गारकेति विख्याता छायामाक्षिप्य भोजिनी ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘उस दक्षिण समुद्रके बीचमें अङ्गारका नामसे प्रसिद्ध एक राक्षसी रहती है, जो छाया पकड़कर ही प्राणियोंको खींच लेती और उन्हें खा जाती है ॥ २६ ॥

एवं निःसंशयान् कृत्वा संशयान्नष्टसंशयाः । मृगयध्वं नरेन्द्रस्य पत्नीममिततेजसः ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘उस लङ्काद्वीपमें जो संदिग्ध स्थान हैं, उन सबमें इस तरह खोज करके जब तुम उन्हें संदेहरहित समझ लो और तुम्हारे मनका संशय निकल जाय, तब तुम लङ्काद्वीपको भी लाँघकर आगे बढ़ जाना और अमिततेजस्वी महाराज श्रीरामकी पत्नीका अन्वेषण करना ॥ २७ ॥

तमतिक्रम्य लक्ष्मीवान् समुद्रे शतयोजने । गिरिः पुष्पितको नाम सिद्धचारणसेवितः ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘लङ्काको लाँघकर आगे बढ़नेपर सौ योजन विस्तृत समुद्रमें एक पुष्पितक नामका पर्वत है, जो परम शोभासे सम्पन्न तथा सिद्धों और चारणोंसे सेवित है ॥ २८ ॥

चन्द्रसूर्यांशुसंकाशः सागराम्बुसमाश्रयः । भ्राजते विपुलैः शृङ्गैरम्बरं विलिखन्निव ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘वह चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशमान है तथा समुद्रके जलमें गहराईतक घुसा हुआ है । वह अपने विस्तृत शिखरोंसे आकाशमें रेखा खींचता हुआ-सा सुशोभित होता है ॥ २९ ॥

तस्यैकं काञ्चनं शृङ्गं सेवते यं दिवाकरः । श्वेतं राजतमेकं च सेवते यन्निशाकरः । न तं कृतघ्नाः पश्यन्ति न नृशंसा न नास्तिकाः ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘उस पर्वतका एक सुवर्णमय शिखर है, जिसका प्रतिदिन सूर्यदेव सेवन करते हैं । उसी प्रकार इसका एक रजतमय श्वेत-शिखर है, जिसका चन्द्रमा सेवन करते हैं। कृतघ्न, नृशंस और नास्तिक पुरुष उस पर्वत-शिखरको नहीं देख पाते हैं ॥ ३० ॥

प्रणम्य शिरसा शैलं तं विमार्गथ वानराः । तमतिक्रम्य दुर्धर्षं सूर्यवान्नाम पर्वतः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘वानरो ! तुमलोग मस्तक झुकाकर उस पर्वतको प्रणाम करना और वहाँ सब ओर सीताको ढूँढ़ना । उस दुर्धर्ष पर्वतको लाँघकर आगे बढ़नेपर सूर्यवान् नामक पर्वत मिलेगा॥३१॥

अध्वना दुर्विगाहेन योजनानि चतुर्दश । ततस्तमप्यतिक्रम्य वैद्युतो नाम पर्वतः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘वहाँ जानेका मार्ग बड़ा दुर्गम है और वह पुष्पितकसे चौदह योजन दूर है । सूर्यवान्को लाँघकर जब तुमलोग आगे जाओगे, तब तुम्हें ‘वैद्युत’ नामक पर्वत मिलेगा॥३२॥

सर्वकामफलैर्वृक्षैः सर्वकालमनोहरैः । तत्र भुक्त्वा वरार्हाणि मूलानि च फलानि च ॥ ३३ ॥ मधूनि पीत्वा जुष्टानि परं गच्छत वानराः ।

भावार्थ

‘वहाँके वृक्ष सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंसे युक्त और सभी ऋतुओंमें मनोहर शोभासे सम्पन्न हैं । वानरो ! उनसे सुशोभित वैद्युत पर्वतपर उत्तम फल-मूल खाकर और सेवन करने योग्य मधु पीकर तुमलोग आगे जाना ॥ ३३½ ॥

तत्र नेत्रमनःकान्तः कुञ्जरो नाम पर्वतः ॥ ३४ ॥ अगस्त्यभवनं यत्र निर्मितं विश्वकर्मणा ।

भावार्थ

‘फिर कुञ्जर नामक पर्वत दिखायी देगा, जो नेत्रों और मनको भी अत्यन्त प्रिय लगनेवाला है । उसके ऊपर विश्वकर्माका बनाया हुआ महर्षि अगस्त्यका एक सुन्दर भवन है ॥ ३४½ ॥

तत्र योजनविस्तारमुच्छ्रितं दशयोजनम् ॥ ३५ ॥ शरणं काञ्चनं दिव्यं नानारत्नविभूषितम् ।

भावार्थ

‘कुञ्जर पर्वतपर बना हुआ अगस्त्यका वह दिव्य भवन सुवर्णमय तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित है । उसका विस्तार एक योजनका और ऊँचाई दस योजनकी है ॥३५½॥

तत्र भोगवती नाम सर्पाणामालयः पुरी ॥ ३६ ॥ विशालरथ्या दुर्धर्षा सर्वतः परिरक्षिता । रक्षिता पन्नगैर्घोरैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैर्महाविषैः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘उसी पर्वतपर सर्पोंकी निवासभूता एक नगरी है, जिसका नाम भोगवती है ( यह पातालकी भोगवती पुरीसे भिन्न है ) । यह पुरी दुर्जय है । उसकी सड़कें बहुत बड़ी और विस्तृत हैं । वह सब ओरसे सुरक्षित है । तीखी दाढ़वाले महाविषैले भयंकर सर्प उसकी रक्षा करते हैं ॥३६-३७॥

सर्पराजो महाघोरो यस्यां वसति वासुकिः । निर्याय मार्गितव्या च सा च भोगवती पुरी ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘उस भोगवतीपुरीमें महाभयंकर सर्पराज वासुकि निवास करते हैं ( ये योगशक्तिसे अनेक रूप धारण करके दोनों भोगवती पुरियोंमें एक साथ रह सकते हैं ) । तुम्हें विशेषरूपसे उस भोगवतीपुरीमें प्रवेश करके वहाँ सीताकी खोज करनी चाहिये ॥ ३८ ॥

तत्र चानन्तरोद्देशा ये केचन समावृताः । तं च देशमतिक्रम्य महानृषभसंस्थितिः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘उस पुरीमें जो गुप्त एवं व्यवधानरहित स्थान हों, उन सबमें सीताका अन्वेषण करना चाहिये । उस प्रदेशको लाँघकर आगे बढ़नेपर तुम्हें ऋषभ नामक महान् पर्वत मिलेगा ॥ ३९ ॥

सर्वरत्नमयः श्रीमानृषभो नाम पर्वतः । गोशीर्षकं पद्मकं च हरिश्यामं च चन्दनम् ॥ ४० ॥ दिव्यमुत्पद्यते यत्र तच्चैवाग्निसमप्रभम् । न तु तच्चन्दनं दृष्ट्वा स्प्रष्टव्यं तु कदाचन ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘वह शोभाशाली ऋषभ पर्वत सम्पूर्ण रत्नोंसे भरा हुआ है । वहाँ गोशीर्षक, पद्मक, हरिश्याम आदि नामों-वाला दिव्य चन्दन उत्पन्न होता है । वह चन्दनवृक्ष अग्निके समान प्रज्वलित होता रहता है । उस चन्दनको देखकर कदापि तुम्हें उसका स्पर्श नहीं करना चाहिये ॥ ४०-४१ ॥

रोहिता नाम गन्धर्वा घोरं रक्षन्ति तद्वनम् । तत्र गन्धर्वपतयः पञ्च सूर्यसमप्रभाः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘क्योंकि ‘रोहित’ नामवाले गन्धर्व उस घोर वनकी रक्षा करते हैं । वहाँ सूर्यके समान कान्तिमान् पाँच गन्धर्वराज रहते हैं ॥ ४२ ॥

शैलूषो ग्रामणीः शिक्षः शुको बभ्रुस्तथैव च । रविसोमाग्निवपुषां निवासः पुण्यकर्मणाम् ॥ ४३ ॥ अन्ते पृथिव्या दुर्धर्षास्ततः स्वर्गजितः स्थिताः ।

भावार्थ

‘उनके नाम ये हैं—शैलूष, ग्रामणी, शिक्ष ( शिग्रु ), शुक और बभ्रु । उस ऋषभसे आगे पृथिवीकी अन्तिम सीमापर सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निके तुल्य तेजस्वी पुण्यकर्मा पुरुषोंका निवास-स्थान है । अतः वहाँ दुर्धर्ष स्वर्ग-विजयी (स्वर्गके अधिकारी) पुरुष ही वास करते हैं ॥४३½॥

ततः परं न वः सेव्यः पितृलोकः सुदारुणः ॥ ४४ ॥ राजधानी यमस्यैषा कष्टेन तमसाऽऽवृता ।

भावार्थ

‘उससे आगे अत्यन्त भयानक पितृलोक है; वहाँ तुम लोगोंको नहीं जाना चाहिये । यह भूमि यमराजकी राजधानी है, जो कष्टप्रद अन्धकारसे आच्छादित है ॥४४½॥

एतावदेव युष्माभिर्वीरा वानरपुंगवाः । शक्यं विचेतुं गन्तुं वा नातो गतिमतां गतिः ॥ ४५ ॥

भावार्थ

‘वीर वानरपुङ्गवो ! बस, दक्षिण दिशामें इतनी ही दूरतक तुम्हें जाना और खोजना है । उससे आगे पहुँचना असम्भव है; क्योंकि उधर जंगम प्राणियोंकी गति नहीं है ॥ ४५ ॥

सर्वमेतत् समालोक्य यच्चान्यदपि दृश्यते । गतिं विदित्वा वैदेह्याः संनिवर्तितुमर्हथ ॥ ४६ ॥

भावार्थ

‘इन सब स्थानोंमें अच्छी तरह देख-भाल करके और भी जो स्थान अन्वेषणके योग्य दिखायी दे, वहाँ भी विदेहकुमारीका पता लगाना; तदनन्तर तुम सबको लौट आना चाहिये ॥ ४६ ॥

यश्च मासान्निवृत्तोऽग्रे दृष्ट्वा सीतेति वक्ष्यति । मत्तुल्यविभवो भोगैः सुखं स विहरिष्यति ॥ ४७ ॥

भावार्थ

‘जो एक मास पूर्ण होनेपर सबसे पहले यहाँ आकर यह कहेगा कि ‘मैंने सीताजीका दर्शन किया है’ वह मेरे समान वैभवसे सम्पन्न हो भोग्य-पदार्थोंका अनुभव करता हुआ सुखपूर्वक विहार करेगा ॥ ४७ ॥

ततः प्रियतरो नास्ति मम प्राणाद् विशेषतः । कृतापराधो बहुशो मम बन्धुर्भविष्यति ॥ ४८ ॥

भावार्थ

‘उससे बढ़कर प्रिय मेरे लिये दूसरा कोई नहीं होगा । वह मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्यारा होगा तथा अनेक बार अपराध किया हो तो भी वह मेरा बन्धु होकर रहेगा ॥ ४८ ॥

अमितबलपराक्रमा भवन्तो विपुलगुणेषु कुलेषु च प्रसूताः । मनुजपतिसुतां यथा लभध्वं तदधिगुणं पुरुषार्थमारभध्वम् ॥ ४९ ॥

भावार्थ

‘तुम सबके बल और पराक्रम असीम हैं । तुम विशेष गुणशाली उत्तम कुलोंमें उत्पन्न हुए हो । राजकुमारी सीताका जिस प्रकार भी पता मिल सके, उसके अनुरूप उच्च कोटिका पुरुषार्थ आरम्भ करो’ ॥ ४९ ॥

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