किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 40
अथ राजा समृद्धार्थः सुग्रीवः प्लवगेश्वरः । उवाच नरशार्दूलं रामं परबलार्दनम् ॥ १ ॥
भावार्थ
तदनन्तर बल-वैभवसे सम्पन्न वानरराज राजा सुग्रीव शत्रुसेनाका संहार करनेवाले पुरुषसिंह श्रीरामसे बोले—॥१॥
आगता विनिविष्टाश्च बलिनः कामरूपिणः । वानरेन्द्रा महेन्द्राभा ये मद्विषयवासिनः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! जो मेरे राज्यमें निवास करते हैं, वे महेन्द्रके समान तेजस्वी, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और बलवान् वानर-यूथपति यहाँ आकर पड़ाव डाले बैठे हैं ॥२॥
त इमे बहुविक्रान्तैर्बलिभिर्भीमविक्रमैः । आगता वानरा घोरा दैत्यदानवसंनिभाः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘ये अपने साथ ऐसे बलवान् वानर योद्धाओंको ले आये हैं, जो बहुत-से युद्धस्थलोंमें अपना पराक्रम प्रकट कर चुके हैं और भयंकर पुरुषार्थ कर दिखानेवाले हैं । यहाँ ऐसे-ऐसे वानर उपस्थित हुए हैं, जो दैत्यों और दानवोंके समान भयानक हैं ॥ ३ ॥
ख्यातकर्मापदानाश्च बलवन्तो जितक्रमाः । पराक्रमेषु विख्याता व्यवसायेषु चोत्तमाः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘अनेक युद्धोंमें इन वानर वीरोंकी शूर-वीरताका परिचय मिल चुका है । ये बलके भण्डार हैं, युद्धसे थकते नहीं हैं—इन्होंने थकावटको जीत लिया है । ये अपने पराक्रमके लिये प्रसिद्ध और उद्योग करनेमें श्रेष्ठ हैं ॥ ४ ॥
पृथिव्यम्बुचरा राम नानानगनिवासिनः । कोट्योघाश्च इमे प्राप्ता वानरास्तव किंकराः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! यहाँ आये हुए ये वानरोंके करोड़ों यूथ विभिन्न पर्वतोंपर निवास करनेवाले हैं । जल और थल— दोनोंमें समानरूपसे चलनेकी शक्ति रखते हैं । ये सब-के-सब आपके किंकर ( आज्ञापालक ) हैं ॥ ५ ॥
निदेशवर्तिनः सर्वे सर्वे गुरुहिते स्थिताः । अभिप्रेतमनुष्ठातुं तव शक्ष्यन्त्यरिंदम ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘शत्रुदमन ! ये सभी आपकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले हैं । आप इनके गुरु—स्वामी हैं । ये आपके हित-साधनमें तत्पर रहकर आपके अभीष्ट मनोरथको सिद्ध कर सकेंगे ॥ ६ ॥
त इमे बहुसाहस्रैरनीकैर्भीमविक्रमैः । आगता वानरा घोरा दैत्यदानवसंनिभाः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘दैत्यों और दानवोंके समान घोर रूपधारी ये सभी वानर-यूथपति अपने साथ भयंकर पराक्रम करनेवाली कई सहस्र सेनाएँ लेकर आये हैं ॥ ७ ॥
यन्मन्यसे नरव्याघ्र प्रातःकालं तदुच्यताम् । त्वत्सैन्यं त्वद्वशे युक्तमाज्ञापयितुमर्हसि ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! अब इस समय आप जो कर्तव्य उचित समझते हैं, उसे बताइये । आपकी यह सेना आपके वशमें है । आप इसे यथोचित कार्यके लिये आज्ञा प्रदान करें ॥८॥
काममेषामिदं कार्यं विदितं मम तत्त्वतः । तथापि तु यथायुक्तमाज्ञापयितुमर्हसि ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘यद्यपि सीताजीके अन्वेषणका यह कार्य इन सबको तथा मुझे भी अच्छी तरह ज्ञात है, तथापि आप जैसा उचित हो, वैसे कार्यके लिये हमें आज्ञा दें’ ॥ ९ ॥
तथा ब्रुवाणं सुग्रीवं रामो दशरथात्मजः । बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य इदं वचनमब्रवीत् ॥ १० ॥
भावार्थ
जब सुग्रीवने ऐसी बात कही, तब दशरथनन्दन श्रीरामने दोनों भुजाओंसे पकड़कर उन्हें हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार कहा—॥ १० ॥
ज्ञायतां सौम्य वैदेही यदि जीवति वा न वा । स च देशो महाप्राज्ञ यस्मिन् वसति रावणः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! महाप्राज्ञ ! पहले यह तो पता लगाओ कि विदेहकुमारी सीता जीवित है या नहीं तथा वह देश, जिसमें रावण निवास करता है, कहाँ है ? ॥ ११ ॥
अधिगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च । प्राप्तकालं विधास्यामि तस्मिन् काले सह त्वया ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘जब सीताके जीवित होनेका और रावणके निवासस्थानका निश्चित पता मिल जायगा, तब जो समयोचित कर्तव्य होगा, उसका मैं तुम्हारे साथ मिलकर निश्चय करूँगा ॥ १२ ॥
नाहमस्मिन् प्रभुः कार्ये वानरेन्द्र न लक्ष्मणः । त्वमस्य हेतुः कार्यस्य प्रभुश्च प्लवगेश्वर ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘वानरराज ! इस कार्यको सिद्ध करनेमें न तो मैं समर्थ हूँ और न लक्ष्मण ही । कपीश्वर ! इस कार्यकी सिद्धि तुम्हारे ही हाथ है । तुम्हीं इसे पूर्ण करनेमें समर्थ हो ॥१३॥
त्वमेवाज्ञापय विभो मम कार्यविनिश्चयम् । त्वं हि जानासि मे कार्यं मम वीर न संशयः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! मेरे कार्यका भलीभाँति निश्चय करके तुम्हीं वानरोंको उचित आज्ञा दो । वीर ! मेरा कार्य क्या है ? इसे तुम्हीं ठीक-ठीक जानते हो, इसमें संशय नहीं है ॥ १४ ॥
सुहृद्द्वितीयो विक्रान्तः प्राज्ञः कालविशेषवित् । भवानस्मद्धिते युक्तः सुहृदात्तोऽर्थवित्तमः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मणके बाद तुम्हीं मेरे दूसरे सुहृद् हो । तुम पराक्रमी, बुद्धिमान्, समयोचित कर्तव्यके ज्ञाता, हितमें संलग्न रहनेवाले, हितैषी बन्धु, विश्वासपात्र तथा मेरे प्रयोजनको अच्छी तरह समझनेवाले हो’ ॥ १५ ॥
एवमुक्तस्तु सुग्रीवो विनतं नाम यूथपम् । अब्रवीद् रामसांनिध्ये लक्ष्मणस्य च धीमतः ॥ १६ ॥ शैलाभं मेघनिर्घोषमूर्जितं प्लवगेश्वरम् । सोमसूर्यनिभैः सार्धं वानरैर्वानरोत्तम ॥ १७ ॥ देशकालनयैर्युक्तो विज्ञः कार्यविनिश्चये । वृतः शतसहस्रेण वानराणां तरस्विनाम् ॥ १८ ॥ अधिगच्छ दिशं पूर्वां सशैलवनकाननाम् । तत्र सीतां च वैदेहीं निलयं रावणस्य च ॥ १९ ॥ मार्गध्वं गिरिदुर्गेषु वनेषु च नदीषु च ।
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर सुग्रीवने उनके और बुद्धिमान् लक्ष्मणके समीप ही विनत नामक यूथपतिसे, जो पर्वतके समान विशालकाय, मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाले, बलवान् तथा वानरोंके शासक थे और चन्द्रमा एवं सूर्यके समान कान्तिवाले वानरोंके साथ उपस्थित हुए थे, कहा— ‘वानरशिरोमणे ! तुम देश और कालके अनुसार नीतिका प्रयोग करनेवाले तथा कार्यका निश्चय करनेमें चतुर हो । तुम एक लाख वेगवान् वानरोंके साथ पर्वत, वन और काननोंसहित पूर्व दिशाकी ओर जाओ और वहाँ पहाड़ोंके दुर्गम प्रदेशों, वनों तथा सरिताओंमें विदेहकुमारी सीता एवं रावणके निवास-स्थानकी खोज करो ॥ १६—१९½ ॥
नदीं भागीरथीं रम्यां सरयूं कौशिकीं तथा ॥ २० ॥ कालिन्दीं यमुनां रम्यां यामुनं च महागिरिम् । सरस्वतीं च सिन्धुं च शोणं मणिनिभोदकम् ॥ २१ ॥ महीं कालमहीं चापि शैलकाननशोभिताम् ।
भावार्थ
‘भागीरथी गङ्गा, रमणीय सरयू, कौशिकी, सुरम्य कलिन्द-नन्दिनी यमुना, महापर्वत यामुन, सरस्वती नदी, सिंधु, मणिके समान निर्मल जलवाले शोणभद्र, मही तथा पर्वतों और वनोंसे सुशोभित कालमही आदि नदियोंके किनारे ढूँढ़ो ॥ २०-२१½ ॥
ब्रह्ममालान् विदेहांश्च मालवान् काशिकोसलान् ॥ २२ ॥ मागधांश्च महाग्रामान् पुण्ड्रांस्वङ्गांस्तथैव च ।
भावार्थ
‘ब्रह्ममाल, विदेह, मालव, काशी, कोसल, मगध देशके बड़े-बड़े ग्राम, पुण्ड्रदेश तथा अङ्ग आदि जनपदोंमें छानबीन करो ॥ २२½ ॥
भूमिं च कोशकाराणां भूमिं च रजताकराम् ॥ २३ ॥ सर्वं च तद् विचेतव्यं मार्गयद्भिस्ततस्ततः । रामस्य दयितां भार्यां सीतां दशरथस्नुषाम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘रेशमके कीड़ोंकी उत्पत्तिके स्थानों और चाँदीकी खानों-में भी खोज करनी चाहिये । इधर-उधर ढूँढ़ते हुए तुम सब लोगोंको इन सभी स्थानोंमें राजा दशरथकी पुत्रवधू तथा श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पत्नी सीताका अन्वेषण करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥
समुद्रमवगाढांश्च पर्वतान् पत्तनानि च । मन्दरस्य च ये कोटिं संश्रिताः केचिदालयाः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘समुद्रके भीतर प्रविष्ट हुए पर्वतोंपर, उसके अन्तर्वर्ती द्वीपोंके विभिन्न नगरोंमें तथा मन्दराचलकी चोटीपर जो कोई गाँव बसे हैं, उन सबमें सीताका अनुसंधान करो ॥२५॥
कर्णप्रावरणाश्चैव तथा चाप्योष्ठकर्णकाः । घोरलोहमुखाश्चैव जवनाश्चैकपादकाः ॥ २६ ॥ अक्षया बलवन्तश्च तथैव पुरुषादकाः । किरातास्तीक्ष्णचूडाश्च हेमाभाः प्रियदर्शनाः ॥ २७ ॥ आममीनाशनाश्चापि किराता द्वीपवासिनः । अन्तर्जलचरा घोरा नरव्याघ्रा इति स्मृताः ॥ २८ ॥ एतेषामाश्रयाः सर्वे विचेयाः काननौकसः ।
भावार्थ
‘जो कर्णप्रावरण ( वस्त्रकी भाँति पैरतक लटके हुए कानवाले ), ओष्ठकर्णक ( ओठतक फैले हुए कानवाले ) तथा घोरलोहमुख ( लोहेके समान काले एवं भयंकर मुखवाले ) हैं, जो एक ही पैरके होते हुए भी वेगपूर्वक चलनेवाले हैं, जिनकी संतानपरम्परा कभी क्षीण नहीं होती, वे पुरुष तथा जो बलवान् नरभक्षी राक्षस हैं, जो सूचीके अग्रभागकी भाँति तीखी चोटीवाले, सुवर्णके समान कान्तिमान्, प्रियदर्शन ( सुन्दर ), कच्ची मछली खानेवाले, द्वीपवासी तथा जलके भीतर विचरनेवाले किरात हैं, जिनके नीचेका आकार मनुष्य-जैसा और ऊपरकी आकृति व्याघ्रके समान है, ऐसे जो भयंकर प्राणी बताये गये हैं; वानरो ! इन सबके निवासस्थानोंमें जाकर तुम्हें सीता तथा रावणकी खोज करनी चाहिये ॥ २६—२८½ ॥
गिरिभिर्ये च गम्यन्ते प्लवनेन प्लवेन च ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘जिन द्वीपोंमें पर्वतोंपर होकर जाना पड़ता है, जहाँ समुद्रको तैरकर या नाव आदिके द्वारा पहुँचा जाता है, उन सब स्थानोंमें सीताको ढूँढ़ना चाहिये ॥ २९ ॥
यत्नवन्तो यवद्वीपं सप्तराज्योपशोभितम् । सुवर्णरूप्यकद्वीपं सुवर्णाकरमण्डितम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘इसके सिवा तुमलोग यत्नशील होकर सात राज्योंसे सुशोभित यवद्वीप ( जावा ), सुवर्णद्वीप ( सुमात्रा ) तथा रूप्यकद्वीपमें भी जो सुवर्णकी खानोंसे सुशोभित हैं, ढूँढ़नेका प्रयत्न करो ॥ ३० ॥
यवद्वीपमतिक्रम्य शिशिरो नाम पर्वतः । दिवं स्पृशति शृङ्गेण देवदानवसेवितः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘यवद्वीपको लाँघकर आगे जानेपर एक शिशिरनामक पर्वत मिलता है, जिसके ऊपर देवता और दानव निवास करते हैं । वह पर्वत अपने उच्च शिखरसे स्वर्गलोकका स्पर्श करता-सा जान पड़ता है ॥ ३१ ॥
एतेषां गिरिदुर्गेषु प्रपातेषु वनेषु च । मार्गध्वं सहिताः सर्वे रामपत्नीं यशस्विनीम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘इन सब द्वीपोंके पर्वतों तथा शिशिर पर्वतके दुर्गम प्रदेशोंमें, झरनोंके आसपास और जंगलोंमें तुम सब लोग एक साथ होकर श्रीरामचन्द्रजीकी यशस्विनी पत्नी सीताका अन्वेषण करो ॥ ३२ ॥
ततो रक्तजलं प्राप्य शोणाख्यं शीघ्रवाहिनम् । गत्वा पारं समुद्रस्य सिद्धचारणसेवितम् ॥ ३३ ॥ तस्य तीर्थेषु रम्येषु विचित्रेषु वनेषु च । रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘तदनन्तर समुद्रके उस पार जहाँ सिद्ध और चारण निवास करते हैं, जाकर लाल जलसे भरे हुए शीघ्र प्रवाहित होनेवाले शोण नामक नदके तटपर पहुँच जाओगे । उसके तटवर्ती रमणीय तीर्थों और विचित्र वनोंमें जहाँ-तहाँ विदेहकुमारी सीताके साथ रावणकी खोज करना ॥ ३३-३४ ॥
पर्वतप्रभवा नद्यः सुभीमबहुनिष्कुटाः । मार्गितव्या दरीमन्तः पर्वताश्च वनानि च ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘पर्वतोंसे निकली हुई बहुत-सी ऐसी नदियाँ मिलेंगी, जिनके तटोंपर बड़े भयंकर अनेकानेक उपवन प्राप्त होंगे । साथ ही वहाँ बहुत-सी गुफाओंवाले पर्वत उपलब्ध होंगे और अनेक वन भी दृष्टिगोचर होंगे । उन सबमें सीताका पता लगाना चाहिये ॥ ३५ ॥
ततः समुद्रद्वीपांश्च सुभीमान् द्रष्टुमर्हथ । ऊर्मिमन्तं महारौद्रं क्रोशन्तमनिलोद्धतम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘तत्पश्चात् पूर्वोक्त देशोंसे परे जाकर तुम इक्षुरससे परिपूर्ण समुद्र तथा उसके द्वीपोंको देखोगे, जो बड़े ही भयंकर प्रतीत होते हैं । इक्षुरसका वह समुद्र महाभयंकर है । उसमें हवाके वेगसे उत्ताल तरंगें उठती रहती हैं तथा वह गर्जना करता हुआ-सा जान पड़ता है ॥ ३६ ॥
तत्रासुरा महाकायाश्छायां गृह्णन्ति नित्यशः । ब्रह्मणा समनुज्ञाता दीर्घकालं बुभुक्षिताः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘उस समुद्रमें बहुत-से विशालकाय असुर निवास करते हैं । वे बहुत दिनोंके भूखे होते हैं और छाया पकड़कर ही प्राणियोंको अपने पास खींच लेते हैं । यही उनका नित्यका आहार है । इसके लिये उन्हें ब्रह्माजीसे अनुमति मिल चुकी है ॥ ३७ ॥
तं कालमेघप्रतिमं महोरगनिषेवितम् । अभिगम्य महानादं तीर्थेनैव महोदधिम् ॥ ३८ ॥ ततो रक्तजलं भीमं लोहितं नाम सागरम् । गत्वा प्रेक्ष्यथ तां चैव बृहतीं कूटशाल्मलीम् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘इक्षुरसका वह समुद्र काले मेघके समान श्याम दिखायी देता है । बड़े-बड़े नाग उसके भीतर निवास करते हैं । उससे बड़ी भारी गर्जना होती रहती है । विशेष उपायोंसे उस महासागरके पार जाकर तुम लाल रंगके जलसे भरे हुए लोहित नामक भयंकर समुद्रके तटपर पहुँच जाओगे और वहाँ शाल्मलीद्वीपके चिह्नभूत कूटशाल्मलीनामक विशाल वृक्षका दर्शन करोगे ॥ ३८-३९ ॥
गृहं च वैनतेयस्य नानारत्नविभूषितम् । तत्र कैलाससंकाशं विहितं विश्वकर्मणा ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘उसके पास ही विश्वकर्माका बनाया हुआ विनतानन्दन गरुड़का एक सुन्दर भवन है, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित तथा कैलास पर्वतके समान उज्ज्वल एवं विशाल है ॥ ४० ॥
तत्र शैलनिभा भीमा मन्देहा नाम राक्षसाः । शैलशृङ्गेषु लम्बन्ते नानारूपा भयावहाः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘उस द्वीपमें पर्वतके समान शरीरवाले भयंकर मंदेहनामक राक्षस निवास करते हैं, जो सुरा समुद्रके मध्यवर्ती शैल-शिखरोंपर लटकते रहते हैं । वे अनेक प्रकारके रूप धारण करनेवाले तथा भयदायक हैं ॥ ४१ ॥
ते पतन्ति जले नित्यं सूर्यस्योदयनं प्रति । अभितप्ताःसः सूर्येण लम्बन्ते स्म पुनः पुनः ॥ ४२ ॥ निहता ब्रह्मतेजोभिरहन्यहनि राक्षसाः ।
भावार्थ
‘प्रतिदिन सूर्योदयके समय वे राक्षस ऊर्ध्वमुख होकर सूर्यसे जूझने लगते हैं, परंतु सूर्यमण्डलके तापसे संतप्त तथा ब्रह्मतेजसे निहत हो सुरा-समुद्रके जलमें गिर पड़ते हैं । वहाँसे फिर जीवित हो उन्हीं शैल-शिखरोंपर लटक जाते हैं । उनका बारंबार ऐसा ही क्रम चला करता है ॥ ४२½ ॥
ततः पाण्डुरमेघाभं क्षीरोदं नाम सागरम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘शाल्मलिद्वीप एवं सुरा-समुद्रसे आगे बढ़नेपर ( क्रमशः घृत और दधिके समुद्र प्राप्त होंगे । वहाँ सीताकी खोज करनेके पश्चात् जब आगे बढ़ोगे, तब ) सफेद बादलोंकी-सी आभावाले क्षीरसमुद्रका दर्शन करोगे ॥ ४३ ॥
गत्वा द्रक्ष्यथ दुर्धर्षा मुक्ताहारमिवोर्मिभिः । तस्य मध्ये महाश्वेतो ऋषभो नाम पर्वतः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘दुर्धर्ष वानरो ! वहाँ पहुँचकर उठती हुई लहरोंसे युक्त क्षीरसागरको इस प्रकार देखोगे, मानो उसने मोतियोंके हार पहन रक्खे हों । उस सागरके बीचमें ऋषभ नामसे प्रसिद्ध एक बहुत ऊँचा पर्वत है, जो श्वेत वर्णका है ॥ ४४ ॥
दिव्यगन्धैः कुसुमितैराचितैश्च नगैर्वृतः । सरश्च राजतैः पद्मैर्ज्वलितैर्हेमकेसरैः ॥ ४५ ॥ नाम्ना सुदर्शनं नाम राजहंसैः समाकुलम् ।
भावार्थ
‘उस पर्वतपर सब ओर बहुत-से वृक्ष भरे हुए हैं, जो फूलोंसे सुशोभित तथा दिव्य गन्धसे सुवासित हैं । उसके ऊपर सुदर्शन नामका एक सरोवर है, जिसमें चाँदीके समान श्वेत रंगवाले कमल खिले हुए हैं । उन कमलोंके केसर सुवर्णमय होते हैं और सदा दिव्य दीप्तिसे दमकते रहते हैं । वह सरोवर राजहंसोंसे भरा रहता है ॥ ४५½ ॥
विबुधाश्चारणा यक्षाः किंनराश्चाप्सरोगणाः ॥ ४६ ॥ हृष्टाः समधिगच्छन्ति नलिनीं तां रिरंसवः ।
भावार्थ
‘देवता, चारण, यक्ष, किन्नर और अप्सराएँ बड़ी प्रसन्नताके साथ जल-विहार करनेके लिये वहाँ आया करती हैं ॥ ४६½ ॥
क्षीरोदं समतिक्रम्य तदा द्रक्ष्यथ वानराः ॥ ४७ ॥ जलोदं सागरं शीघ्रं सर्वभूतभयावहम् । तत्र तत्कोपजं तेजः कृतं हयमुखं महत् ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘वानरो ! क्षीरसागर लाँघकर जब तुमलोग आगे बढ़ोगे, तब शीघ्र ही सुस्वादु जलसे भरे हुए समुद्रको देखोगे । वह महासागर समस्त प्राणियोंको भय देनेवाला है । उसमें ब्रह्मर्षि और्वके कोपसे प्रकट हुआ वडवामुख नामक महान् तेज विद्यमान है ॥ ४७-४८ ॥
अस्याहुस्तन्महावेगमोदनं सचराचरम् । तत्र विक्रोशतां नादो भूतानां सागरौकसाम् । श्रूयते चासमर्थानां दृष्ट्वाभूद् वडवामुखम् ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘उस समुद्रमें जो चराचर प्राणियोंसहित महान् वेगशाली जल है, वही उस वडवामुख नामक अग्निका आहार बताया जाता है । वहाँ जो वडवानल प्रकट हुआ है, उसे देखकर उसमें पतनके भयसे चीखते-चिल्लाते हुए समुद्रनिवासी असमर्थ प्राणियोंका आर्तनाद निरन्तर सुनायी देता है ॥४९॥
स्वादूदस्योत्तरे तीरे योजनानि त्रयोदश । जातरूपशिलो नाम सुमहान् कनकप्रभः ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘स्वादिष्ट जलसे भरे हुए उस समुद्रके उत्तर तेरह योजनकी दूरीपर सुवर्णमयी शिलाओंसे सुशोभित, कनककी कमनीय कान्ति धारण करनेवाला एक बहुत ऊँचा पर्वत है ॥ ५० ॥
तत्र चन्द्रप्रतीकाशं पन्नगं धरणीधरम् । पद्मपत्रविशालाक्षं ततो द्रक्ष्यथ वानराः ॥ ५१ ॥ आसीनं पर्वतस्याग्रे सर्वदेवनमस्कृतम् । सहस्रशिरसं देवमनन्तं नीलवाससम् ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘वानरो ! उसके शिखरपर इस पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् अनन्त बैठे दिखायी देंगे । उनका श्रीविग्रह चन्द्रमाके समान गौरवर्णका है । वे सर्प जातिके हैं; परंतु उनका स्वरूप देवताओंके तुल्य है । उनके नेत्र प्रफुल्ल कमलदलके समान हैं और शरीर नील वस्त्रसे आच्छादित है । उन अनन्तदेवके सहस्र मस्तक हैं ॥ ५१-५२ ॥
त्रिशिराः काञ्चनः केतुस्तालस्तस्य महात्मनः । स्थापितः पर्वतस्याग्रे विराजति सवेदिकः ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘पर्वतके ऊपर उन महात्माकी ताड़के चिह्नसे युक्त सुवर्णमयी ध्वजा फहराती रहती है । उस ध्वजाकी तीन शिखाएँ हैं और उसके नीचे आधारभूमिपर वेदी बनी हुई है । इस तरह उस ध्वजकी बड़ी शोभा होती है ॥ ५३ ॥
पूर्वस्यां दिशि निर्माणं कृतं तत् त्रिदशेश्वरैः । ततः परं हेममयः श्रीमानुदयपर्वतः ॥ ५४ ॥
भावार्थ
‘यही तालध्वज पूर्व दिशाकी सीमाके सूचकचिह्नके रूपमें देवताओंद्वारा स्थापित किया गया है । उसके बाद सुवर्णमय उदयपर्वत है, जो दिव्य शोभासे सम्पन्न है ॥ ५४ ॥
तस्य कोटिर्दिवं स्पृष्ट्वा शतयोजनमायता । जातरूपमयी दिव्या विराजति सवेदिका ॥ ५५ ॥
भावार्थ
‘उसका गगनचुम्बी शिखर सौ योजन लंबा है । उसका आधारभूत पर्वत भी वैसा ही है । उसके साथ वह दिव्य सुवर्णशिखर अद्भुत शोभा पाता है ॥ ५५ ॥
सालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः । जातरूपमयैर्दिव्यैः शोभते सूर्यसंनिभैः ॥ ५६ ॥
भावार्थ
‘वहाँके साल, ताल, तमाल और फूलोंसे लदे कनेर आदि वृक्ष भी सुवर्णमय ही हैं । उन सूर्यतुल्य तेजस्वी दिव्य वृक्षोंसे उदयगिरिकी बड़ी शोभा होती है ॥ ५६ ॥
तत्र योजनविस्तारमुच्छ्रितं दशयोजनम् । शृङ्गं सौमनसं नाम जातरूपमयं ध्रुवम् ॥ ५७ ॥
भावार्थ
‘उस सौ योजन लंबे उदयगिरिके शिखरपर एक सौमनस नामक सुवर्णमय शिखर है, जिसकी चौड़ाई एक योजन और ऊँचाई दस योजन है ॥ ५७ ॥
तत्र पूर्वं पदं कृत्वा पुरा विष्णुस्त्रिविक्रमे । द्वितीयं शिखरे मेरोश्चकार पुरुषोत्तमः ॥ ५८ ॥
भावार्थ
‘पूर्वकालमें वामन अवतारके समय पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुने अपना पहला पैर उस सौमनस नामक शिखरपर रखकर दूसरा पैर मेरु पर्वतके शिखरपर रक्खा था ॥ ५८ ॥
उत्तरेण परिक्रम्य जम्बूद्वीपं दिवाकरः । दृश्यो भवति भूयिष्ठं शिखरं तन्महोच्छ्रयम् ॥ ५९ ॥
भावार्थ
‘सूर्यदेव उत्तरसे घूमकर जम्बूद्वीपकी परिक्रमा करते हुए जब अत्यन्त ऊँचे ‘सौमनस’ नामक शिखरपर आकर स्थित होते हैं, तब जम्बूद्वीपनिवासियोंको उनका अधिक स्पष्टताके साथ दर्शन होता है ॥ ५९ ॥
तत्र वैखानसा नाम वालखिल्या महर्षयः । प्रकाशमाना दृश्यन्ते सूर्यवर्णास्तपस्विनः ॥ ६० ॥
भावार्थ
‘उस सौमनस नामक शिखरपर वैखानस महात्मा महर्षि बालखिल्यगण प्रकाशित होते देखे जाते हैं, जो सूर्यके समान कान्तिमान् और तपस्वी हैं ॥ ६० ॥
अयं सुदर्शनो द्वीपः पुरो यस्य प्रकाशते । तस्मिंस्तेजश्च चक्षुश्च सर्वप्राणभृतामपि ॥ ६१ ॥
भावार्थ
‘यह उदयगिरिके सौमनस शिखरके सामनेका द्वीप सुदर्शन नामसे प्रसिद्ध है; क्योंकि उक्त शिखरपर जब भगवान् सूर्य उदित होते हैं, तभी इस द्वीपके समस्त प्राणियोंका तेजसे सम्बन्ध होता है और सबके नेत्रोंको प्रकाश प्राप्त होता है ( यही इस द्वीपके ‘सुदर्शन’ नाम होनेका कारण है ) ॥ ६१ ॥
शैलस्य तस्य पृष्ठेषु कन्दरेषु वनेषु च । रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ ६२ ॥
भावार्थ
‘उदयाचलके पृष्ठभागोंमें, कन्दराओंमें तथा वनोंमें भी तुम्हें जहाँ-तहाँ विदेहकुमारी सीतासहित रावणका पता लगाना चाहिये ॥ ६२ ॥
काञ्चनस्य च शैलस्य सूर्यस्य च महात्मनः । आविष्टा तेजसा सन्ध्या पूर्वा रक्ता प्रकाशते ॥ ६३ ॥
भावार्थ
‘उस सुवर्णमय उदयाचल तथा महात्मा सूर्यदेवके तेजसे व्याप्त हुई उदयकालिक पूर्व संध्या रक्तवर्णकी प्रभासे प्रकाशित होती है ॥ ६३ ॥
पूर्वमेतत् कृतं द्वारं पृथिव्या भुवनस्य च । सूर्यस्योदयनं चैव पूर्वा ह्येषा दिगुच्यते ॥ ६४ ॥
भावार्थ
‘सूर्यके उदयका यह स्थान सबसे पहले ब्रह्माजीने बनाया है; अतः यही पृथ्वी एवं ब्रह्मलोकका द्वार है ( ऊपरके लोकोंमें रहनेवाले प्राणी इसी द्वारसे भूलोकमें प्रवेश करते हैं तथा भूलोकके प्राणी इसी द्वारसे ब्रह्मलोकमें जाते हैं )। पहले इसी दिशामें इस द्वारका निर्माण हुआ, इसलिये इसे पूर्व दिशा कहते हैं ॥ ६४ ॥
तस्य शैलस्य पृष्ठेषु निर्झरेषु गुहासु च । रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ ६५ ॥
भावार्थ
‘उदयाचलकी घाटियों, झरनों और गुफाओंमें यत्र-तत्र घूमकर तुम्हें विदेहकुमारी सीतासहित रावणका अन्वेषण करना चाहिये ॥ ६५ ॥
ततः परमगम्या स्याद् दिक्पूर्वा त्रिदशावृता । रहिता चन्द्रसूर्याभ्यामदृश्या तमसावृता ॥ ६६ ॥
भावार्थ
‘इससे आगे पूर्व दिशा अगम्य है । उधर देवता रहते हैं । उस ओर चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश न होनेसे वहाँकी भूमि अन्धकारसे आच्छन्न एवं अदृश्य है ॥ ६६ ॥
शैलेषु तेषु सर्वेषु कन्दरेषु नदीषु च । ये च नोक्ता मयोद्देशा विचेया तेषु जानकी ॥ ६७ ॥
भावार्थ
‘उदयाचलके आस-पासके जो समस्त पर्वत, कन्दराएँ तथा नदियाँ हैं, उनमें तथा जिन स्थानोंका मैंने निर्देश नहीं किया है, उनमें भी तुम्हें जानकीकी खोज करनी चाहिये ॥६७॥
एतावद् वानरैः शक्यं गन्तुं वानरपुङ्गवाः । अभास्करममर्यादं न जानीमस्ततः परम् ॥ ६८ ॥
भावार्थ
‘वानरशिरोमणियो ! केवल उदयगिरितक ही वानरोंकी पहुँच हो सकती है । इससे आगे न तो सूर्यका प्रकाश है और न देश आदिकी कोई सीमा ही है । अतः आगेकी भूमिके बारेमें मुझे कुछ भी मालूम नहीं है ॥ ६८ ॥
अभिगम्य तु वैदेहीं निलयं रावणस्य च । मासे पूर्णे निवर्तध्वमुदयं प्राप्य पर्वतम् ॥ ६९ ॥
भावार्थ
‘तुमलोग उदयाचलतक जाकर सीता और रावणके स्थानका पता लगाना और एक मास पूरा होते-होतेतक लौट आना ॥ ६९ ॥
ऊर्ध्वं मासान्न वस्तव्यं वसन् वध्यो भवेन्मम । सिद्धार्थाः संनिवर्तध्वमधिगम्य च मैथिलीम् ॥ ७० ॥
भावार्थ
‘एक महीनेसे अधिक न ठहरना । जो अधिक कालतक वहाँ रह जायगा, वह मेरे द्वारा मारा जायगा । मिथिलेशकुमारीका पता लगाकर अन्वेषणका प्रयोजन सिद्ध हो जानेपर अवश्य लौट आना ॥ ७० ॥
महेन्द्रकान्तां वनषण्डमण्डितां दिशं चरित्वा निपुणेन वानराः । अवाप्य सीतां रघुवंशजप्रियां ततो निवृत्ताः सुखिनो भविष्यथ ॥ ७१ ॥
भावार्थ
‘वानरो ! वनसमूहसे अलंकृत पूर्वदिशामें अच्छी तरह भ्रमण करके श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी पत्नी सीताका समाचार जानकर तुम वहाँसे लौट आओ । इससे तुम सुखी होओगे’ ॥ ७१ ॥
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