किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 43
ततः संदिश्य सुग्रीवः श्वशुरं पश्चिमां दिशम् । वीरं शतबलिं नाम वानरं वानरेश्वरः ॥ १ ॥ उवाच राजा सर्वज्ञः सर्ववानरसत्तमः । वाक्यमात्महितं चैव रामस्य च हितं तदा ॥ २ ॥
भावार्थ
इस प्रकार अपने श्वशुरको पश्चिम दिशाकी ओर जानेका संदेश दे, सर्वज्ञ, सर्व-वानर-शिरोमणि वानरेश्वर राजा सुग्रीव अपने हितैषी शतबलि नामक वीर वानरसे श्रीरामचन्द्रजीके हितकी बात बोले—— ॥ १-२ ॥
वृतः शतसहस्रेण त्वद्विधानां वनौकसाम् । वैवस्वतसुतैः सार्धं प्रविष्टः सर्वमन्त्रिभिः ॥ ३ ॥ दिशं ह्युदीचीं विक्रान्त हिमशैलावतंसिकाम् । सर्वतः परिमार्गध्वं रामपत्नीं यशस्विनीम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘पराक्रमी वीर ! तुम अपने ही समान एक लाख वनवासी वानरोंको जो यमराजके बेटे हैं, साथ लेकर अपने समस्त मन्त्रियोंसहित उस उत्तर दिशामें प्रवेश करो, जो हिमालयरूपी आभूषणसे विभूषित है और वहाँ सब ओर यशस्विनी श्रीरामपत्नी सीताका अन्वेषण करो ॥ ३-४ ॥
अस्मिन् कार्ये विनिर्वृत्ते कृते दाशरथेः प्रिये । ऋणान्मुक्ता भविष्यामः कृतार्थार्थविदां वराः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘अपने मुख्य प्रयोजनको समझनेवाले वीरोंमें श्रेष्ठ वानरो ! यदि हमलोगोंके द्वारा दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामका यह प्रिय कार्य सम्पन्न हो जाय तो हम उनके उपकारके ऋणसे मुक्त और कृतार्थ हो जायँगे ॥ ५ ॥
कृतं हि प्रियमस्माकं राघवेण महात्मना । तस्य चेत्प्रतिकारोऽस्ति सफलं जीवितं भवेत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘महात्मा श्रीरघुनाथजीने हमलोगोंका प्रिय कार्य किया है । उसका यदि कुछ बदला दिया जा सके तो हमारा जीवन सफल हो जाय ॥ ६ ॥
अर्थिनः कार्यनिर्वृत्तिमकर्तुरपि यश्चरेत् । तस्य स्यात् सफलं जन्म किं पुनः पूर्वकारिणः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘जिसने कोई उपकार न किया हो, वह भी यदि किसी कार्यके लिये प्रार्थी होकर आया हो तो जो पुरुष उसके कार्यको सिद्ध कर देता है, उसका जन्म भी सफल हो जाता है । फिर जिसने पहलेके उपकारीके कार्यको सिद्ध किया हो, उसके जीवनकी सफलताके विषयमें तो कहना ही क्या है ॥ ७ ॥
एतां बुद्धि समास्थाय दृश्यते जानकी यथा । तथा भवद्भिः कर्तव्यमस्मत्प्रियहितैषिभिः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘इसी विचारका आश्रय लेकर मेरा प्रिय और हित चाहनेवाले तुम सब वानरोंको ऐसा प्रयत्न करना चाहिये, जिससे जनकनन्दिनी सीताका पता लग जाय ॥ ८ ॥
अयं हि सर्वभूतानां मान्यस्तु नरसत्तमः । अस्मासु च गतः प्रीतिं रामः परपुरंजयः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले ये नरश्रेष्ठ श्रीराम समस्त प्राणियोंके लिये माननीय हैं। हमलोगोंपर भी इनका बहुत प्रेम है ॥ ९ ॥
इमानि बहुदुर्गाणि नद्यः शैलान्तराणि च। भवन्तः परिमार्गन्तु बुद्धिविक्रमसम्पदा ॥ १० ॥
भावार्थ
‘तुम सब लोग बुद्धि और पराक्रमके द्वारा इन अत्यन्त दुर्गम प्रदेशों, पर्वतों और नदियोंके तटोंपर जा-जाकर सीताकी खोज करो ॥ १० ॥
तत्र म्लेच्छान् पुलिन्दांश्च शूरसेनांस्तथैव च। प्रस्थलान् भरतांश्चैव कुरूंश्च सह मद्रकैः ॥ ११ ॥ काम्बोजयवनांश्चैव शकानां पत्तनानि च। अन्वीक्ष्य दरदांश्चैव हिमवन्तं विचिन्वथ ॥ १२ ॥ लोध्रपद्मकखण्डेषु देवदारुवनेषु च। रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘उत्तरमें म्लेच्छ, पुलिन्द, शूरसेन, प्रस्थल, भरत ( इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुरके आसपासके प्रान्त ), कुरु ( दक्षिण कुरु—कुरुक्षेत्रके आस-पासकी भूमि ), मद्र, काम्बोज, यवन, शकोंके देशों एवं नगरोंमें भलीभाँति अनुसंधान करके दरद देशमें और हिमालय पर्वतपर ढूँढ़ो ॥ ‘वहाँ लोध्र और पद्मककी झाड़ियोंमें तथा देवदारुके जंगलोंमें वैदेहीसहित रावणकी खोज करनी चाहिये ॥१३॥
ततः सोमाश्रमं गत्वा देवगन्धर्वसेवितम्। कालं नाम महासानुं पर्वतं तं गमिष्यथ ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘फिर देवताओं और गन्धर्वोंसे सेवित सोमाश्रममें होते हुए ऊँचे शिखरवाले काल नामक पर्वतपर जाओ ॥ १४ ॥
महत्सु तस्य शैलेषु पर्वतेषु गुहासु च। विचिन्वत महाभागां रामपत्नीमनिन्दिताम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘उस पर्वतकी शाखाभूत अन्य छोटे-बड़े पर्वतों और उन सबकी गुफाओंमें सती-साध्वी श्रीरामपत्नी महाभागा सीताका अन्वेषण करो ॥ १५ ॥
तमतिक्रम्य शैलेन्द्रं हेमगर्भं महागिरिम्। ततः सुदर्शनं नाम पर्वतं गन्तुमर्हथ ॥ १६ ॥ ततो देवसखो नाम पर्वतः पतगालयः। नानापक्षिसमाकीर्णो विविधद्रुमभूषितः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘जिसके भीतर सुवर्णकी खान हैं, उस गिरिराज कालको लाँघकर तुम्हें सुदर्शन नामक महान् पर्वतपर जाना चाहिये ॥ ‘उससे आगे बढ़नेपर देवसख नामवाला पहाड़ मिलेगा, जो पक्षियोंका निवासस्थान है। वह भाँति-भाँतिके विहंगमोंसे व्याप्त तथा नाना प्रकारके वृक्षोंसे विभूषित है ॥ १७ ॥
तस्य काननखण्डेषु निर्झरेषु गुहासु च। रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘उसके वनसमूहों, निर्झरों और गुफाओंमें तुम्हें विदेहकुमारी सीतासहित रावणकी खोज करनी चाहिये ॥१८॥
तमतिक्रम्य चाकाशं सर्वतः शतयोजनम्। अपर्वतनदीवृक्षं सर्वसत्त्वविवर्जितम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘वहाँसे आगे बढ़नेपर एक सुनसान मैदान मिलेगा, जो सब ओरसे सौ योजन विस्तृत है। वहाँ नदी, पर्वत, वृक्ष और सब प्रकारके जीव-जन्तुओंका अभाव है ॥ १९ ॥
तत्तु शीघ्रमतिक्रम्य कान्तारं रोमहर्षणम्। कैलासं पाण्डुरं प्राप्य हृष्टा यूयं भविष्यथ ॥ २० ॥
भावार्थ
‘रोंगटे खड़े कर देनेवाले उस दुर्गम प्रान्तको शीघ्रतापूर्वक लाँघ जानेपर तुम्हें श्वेतवर्णका कैलास पर्वत मिलेगा। वहाँ पहुँचनेपर तुम सब लोग हर्षसे खिल उठोगे ॥ २० ॥
तत्र पाण्डुरमेघाभं जाम्बूनदपरिष्कृतम्। कुबेरभवनं रम्यं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘वहीं विश्वकर्माका बनाया हुआ कुबेरका रमणीय भवन है, जो श्वेत बादलोंके समान प्रतीत होता है। उस भवनको जाम्बूनद नामक सुवर्णसे विभूषित किया गया है॥२१॥
विशाला नलिनी यत्र प्रभूतकमलोत्पला। हंसकारण्डवाकीर्णा अप्सरोगणसेविता ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘उसके पास ही एक बहुत बड़ा सरोवर है, जिसमें कमल और उत्पल प्रचुर मात्रामें पाये जाते हैं। उसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी भरे रहते हैं तथा अप्सराएँ उसमें जल-क्रीडा करती हैं ॥ २२ ॥
तत्र वैश्रवणो राजा सर्वलोकनमस्कृतः। धनदो रमते श्रीमान् गुह्यकैः सह यक्षराट् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘वहाँ यक्षोंके स्वामी विश्रवाकुमार श्रीमान् राजा कुबेर जो समस्त विश्वके लिये वन्दनीय और धन देनेवाले हैं, गुह्यकोंके साथ विहार करते हैं ॥ २३ ॥
तस्य चन्द्रनिकाशेषु पर्वतेषु गुहासु च। रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘उस कैलासके चन्द्रमाकी भाँति उज्ज्वल शाखा-पर्वतोंपर तथा उनकी गुफाओंमें सब ओर घूम-फिरकर तुम्हें सीतासहित रावणका अनुसंधान करना चाहिये ॥ २४ ॥
क्रौञ्चं तु गिरिमासाद्य बिलं तस्य सुदुर्गमम्। अप्रमत्तैः प्रवेष्टव्यं दुष्प्रवेशं हि तत् स्मृतम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘इसके बाद क्रौञ्चगिरिपर जाकर वहाँकी अत्यन्त दुर्गम विवररूप गुफामें ( जो स्कन्दकी शक्तिसे पर्वतके विदीर्ण होनेके कारण बन गयी है ) तुम्हें सावधानीके साथ प्रवेश करना चाहिये; क्योंकि उसके भीतर प्रवेश करना अत्यन्त कठिन माना गया है ॥ २५ ॥
वसन्ति हि महात्मानस्तत्र सूर्यसमप्रभाः। देवैरभ्यर्थिताः सम्यग् देवरूपा महर्षयः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘उस गुफामें सूर्यके समान तेजस्वी महात्मा निवास करते हैं । उन देवस्वरूप महर्षियोंकी देवतालोग भी अभ्यर्थना करते हैं ॥ २६ ॥
क्रौञ्चस्य तु गुहाश्चान्याः सानूनि शिखराणि च । निर्दराश्च नितम्बाश्च विचेतव्यास्ततस्ततः ॥ २७ ॥
भावार्थ
क्रौञ्च पर्वतकी और भी बहुत-सी गुफाएँ, अनेकानेक चोटियाँ, शिखर, कन्दराएँ तथा नितम्ब ( ढालू प्रदेश ) हैं; उन सबमें सब ओर घूम-फिरकर तुम्हें सीता और रावणका पता लगाना चाहिये ॥ २७ ॥
अवृक्षं कामशैलं च मानसं विहगालयम् । न गतिस्तत्र भूतानां देवानां न च रक्षसाम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘वहाँसे आगे वृक्षोंसे रहित मानस नामक शिखर है, जहाँ शून्य होनेके कारण कभी पक्षीतक नहीं जाते हैं । कामदेवकी तपस्याका स्थान होनेके कारण वह क्रौञ्चशिखर कामशैलके नामसे विख्यात है । वहाँ भूतों, देवताओं तथा राक्षसोंका भी कभी जाना नहीं होता है ॥ २८ ॥
स च सर्वैर्विचेतव्यः ससानुप्रस्थभूधरः । क्रौञ्चं गिरिमतिक्रम्य मैनाको नाम पर्वतः ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘शिखरों, घाटियों और शाखापर्वतोंसहित समूचे क्रौञ्च-पर्वतकी तुमलोग छानबीन करना । क्रौञ्चगिरिको लाँघकर आगे बढ़नेपर मैनाक पर्वत मिलेगा ॥ २९ ॥
मयस्य भवनं तत्र दानवस्य स्वयंकृतम् । मैनाकस्तु विचेतव्यः ससानुप्रस्थकन्दरः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘वहाँ मयदानवका घर है, जिसे उसने स्वयं ही अपने लिये बनाया है । तुमलोगोंको शिखरों, चौरस मैदानों और कन्दराओंसहित मैनाक पर्वतपर भलीभाँति सीताजीकी खोज करनी चाहिये ॥ ३० ॥
स्त्रीणामश्वमुखीनां तु निकेतस्तत्र तत्र तु । तं देशं समतिक्रम्य आश्रमं सिद्धसेवितम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘वहाँ यत्र-तत्र घोड़ेके-से मुँहवाली किन्नरियोंके निवासस्थान हैं । उस प्रदेशको लाँघ जानेपर सिद्धसेवित आश्रम मिलेगा ॥ ३१ ॥
सिद्धा वैखानसा यत्र वालखिल्याश्च तापसाः । वन्दितव्यास्ततः सिद्धास्तपसा वीतकल्मषाः ॥ ३२ ॥ प्रष्टव्या चापि सीतायाः प्रवृत्तिर्विनयान्वितैः ।
भावार्थ
‘उसमें सिद्ध, वैखानस तथा वालखिल्य नामक तपस्वी निवास करते हैं । तपस्यासे उनके पाप धुल गये हैं । उन सिद्धोंको तुमलोग प्रणाम करना और विनीतभावसे सीताका समाचार पूछना ॥ ३२½ ॥
हेमपुष्करसंछन्नं तत्र वैखानसं सरः ॥ ३३ ॥ तरुणादित्यसंकाशैर्हंसैर्विचरितं शुभैः ।
भावार्थ
‘उस आश्रमके पास ‘वैखानस सर’ के नामसे प्रसिद्ध एक सरोवर है, जिसका जल सुवर्णमय कमलोंसे आच्छादित रहता है । उसमें प्रातःकालिक सूर्यके समान सुनहरे एवं अरुण-वर्णवाले सुन्दर हंस विचरते रहते हैं ॥ ३३½ ॥
औपवाह्यः कुबेरस्य सार्वभौम इति स्मृतः ॥ ३४ ॥ गजः पर्येति तं देशं सदा सह करेणुभिः ।
भावार्थ
‘कुबेरकी सवारीमें काम आनेवाला सार्वभौमनामक गजराज अपनी हथिनियोंके साथ उस देशमें सदा घूमता रहता है ॥ ३४½ ॥
तत् सरः समतिक्रम्य नष्टचन्द्रदिवाकरम् । अनक्षत्रगणं व्योम निष्पयोदमनादितम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘उस सरोवरको लाँघकर आगे जानेपर सूना आकाश दिखायी देगा । उसमें सूर्य, चन्द्रमा तथा तारोंके दर्शन नहीं होंगे । वहाँ न तो मेघोंकी घटा दिखायी देगी और न उनकी गर्जना ही सुनायी पड़ेगी ॥ ३५ ॥
गभस्तिभिरिवार्कस्य स तु देशः प्रकाश्यते । विश्राम्यद्भिस्तपःसिद्धैर्देवकल्पैः स्वयंप्रभैः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘तथापि उस देशमें ऐसा प्रकाश छाया होगा, मानो सूर्यकी किरणोंसे ही वह प्रकाशित हो रहा हो । वहाँ अपनी ही प्रभासे प्रकाशित तपःसिद्ध देवोपम महर्षि विश्राम करते हैं । उन्हींकी अङ्गप्रभासे उस देशमें उजाला छाया रहता है ॥ ३६ ॥
तं तु देशमतिक्रम्य शैलोदा नाम निम्नगा । उभयोस्तीरयोस्तस्याः कीचका नाम वेणवः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘उस प्रदेशको लाँघकर आगे बढ़नेपर ‘शैलोदा’ नामवाली नदीका दर्शन होगा । उसके दोनों तटोंपर कीचक ( वंशीकी-सी ध्वनि करनेवाले ) बाँस हैं; यह बात प्रसिद्ध है ॥ ३७ ॥
ते नयन्ति परं तीरं सिद्धान् प्रत्यानयन्ति च । उत्तराः कुरवस्तत्र कृतपुण्यप्रतिश्रयाः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘वे बाँस ही ( साधन बनकर ) सिद्ध पुरुषोंको शैलोदाके उस पार ले जाते और वहाँसे इस पार ले आते हैं । जहाँ केवल पुण्यात्मा पुरुषोंका वास है, वह उत्तर कुरुदेश शैलोदाके तटपर ही है ॥ ३८ ॥
ततः काञ्चनपद्माभिः पद्मिनीभिः कृतोदकाः । नीलवैदूर्यपत्राढ्या नद्यस्तत्र सहस्रशः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘उत्तर कुरुदेशमें नील वैदूर्यमणिके समान हरे-हरे कमलोंके पत्तोंसे सुशोभित सहस्रों नदियाँ बहती हैं, जिनके जल सुवर्णमय पद्मोंसे अलंकृत अनेकानेक पुष्करिणियोंसे मिले हुए हैं ॥ ३९ ॥
रक्तोत्पलवनैश्चात्र मण्डिताश्च हिरण्मयैः । तरुणादित्यसंकाशा भान्ति तत्र जलाशयाः ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘वहाँके जलाशय लाल और सुनहरे कमलसमूहोंसे मण्डित होकर प्रातःकाल उदित हुए सूर्यके समान शोभा पाते हैं ॥ ४० ॥
महार्हमणिपत्रैश्च काञ्चनप्रभकेसरैः । नीलोत्पलवनैश्चित्रैः स देशः सर्वतो वृतः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘बहुमूल्य मणियोंके समान पत्तों और सुवर्णके समान कान्तिमान् केसरोंवाले विचित्र-विचित्र नील कमलोंके द्वारा वहाँका प्रदेश सब ओरसे सुशोभित होता है ॥ ४१ ॥
निस्तुलाभिश्च मुक्ताभिर्मणिभिश्च महाधनैः । उद्धूतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्च निम्नगाः ॥ ४२ ॥ सर्वरत्नमयैश्चित्रैरवगाढा नगोत्तमैः । जातरूपमयैश्चापि हुताशनसमप्रभैः ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘वहाँकी नदियोंके तट गोल-गोल मोतियों, बहुमूल्य मणियों और सुवर्णोंसे सम्पन्न हैं । इतना ही नहीं, उन नदियोंके किनारे सम्पूर्ण रत्नोंसे युक्त विचित्र-विचित्र पर्वत भी विद्यमान हैं, जो उनके जलके भीतरतक घुसे हुए हैं । उन पर्वतोंमेंसे कितने ही सुवर्णमय हैं, जिनसे अग्निके समान प्रकाश फैलता रहता है ॥ ४२-४३ ॥
नित्यपुष्पफलास्तत्र नगाः पत्ररथाकुलाः । दिव्यगन्धरसस्पर्शाः सर्वकामान् स्रवन्ति च ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फल-फूल लगे रहते हैं और उनपर पक्षी चहकते रहते हैं । वे वृक्ष दिव्य गन्ध, दिव्य रस और दिव्य स्पर्श प्रदान करते हैं तथा प्राणियोंकी सारी मनचाही वस्तुओंकी वर्षा करते रहते हैं ॥ ४४ ॥
नानाकाराणि वासांसि फलन्त्यन्ये नगोत्तमाः । मुक्तावैदूर्यचित्राणि भूषणानि तथैव च । स्त्रीणां यान्यनुरूपाणि पुरुषाणां तथैव च ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘इनके सिवा दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ वृक्ष फलोंके रूपमें नाना प्रकारके वस्त्र, मोती और वैदूर्यमणिसे जटित आभूषण देते हैं, जो स्त्रियों तथा पुरुषोंके भी उपयोगमें आने योग्य होते हैं ॥ ४५ ॥
सर्वर्तुसुखसेव्यानि फलन्त्यन्ये नगोत्तमाः । महार्हमणिचित्राणि फलन्त्यन्ये नगोत्तमाः ॥ ४६ ॥ शयनानि प्रसूयन्ते चित्रास्तरणवन्ति च । मनःकान्तानि माल्यानि फलन्त्यत्रापरे द्रुमाः ॥ ४७ ॥ पानानि च महार्हाणि भक्ष्याणि विविधानि च । स्त्रियश्च गुणसम्पन्ना रूपयौवनलक्षिताः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘दूसरे उत्तम वृक्ष सभी ऋतुओंमें सुखपूर्वक सेवन करने योग्य अच्छे-अच्छे फल देते हैं । अन्यान्य सुन्दर वृक्ष बहुमूल्य मणियोंके समान विचित्र फल उत्पन्न करते हैं ।४६। ‘कितने ही अन्य वृक्ष विचित्र बिछौनोंसे युक्त शय्याओं-को ही फलोंके रूपमें प्रकट करते हैं, मनको प्रिय लगनेवाली सुन्दर मालाएँ भी प्रस्तुत करते हैं, बहुमूल्य पेय पदार्थ और भाँति-भाँतिके भोजन भी देते हैं तथा रूप और यौवनसे प्रकाशित होनेवाली सद्गुणवती युवतियोंको भी जन्म देते हैं ॥ ४७-४८ ॥
गन्धर्वाः किन्नराः सिद्धा नागा विद्याधरास्तथा । रमन्ते सततं तत्र नारीभिर्भास्वरप्रभाः ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘वहाँ सूर्यके समान कान्तिमान् गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग और विद्याधर सदा नारियोंके साथ क्रीडा-विहार करते हैं ॥ ४९ ॥
सर्वे सुकृतकर्माणः सर्वे रतिपरायणाः । सर्वे कामार्थसहिता वसन्ति सह योषितः ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘वहाँके सब लोग पुण्यकर्मा हैं, सभी अर्थ और कामसे सम्पन्न हैं तथा सब लोग काम-क्रीडापरायण होकर युवती स्त्रियोंके साथ निवास करते हैं ॥ ५० ॥
गीतवादित्रनिर्घोषः सोत्कृष्टहसितस्वनः । श्रूयते सततं तत्र सर्वभूतमनोरमः ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘वहाँ निरन्तर उत्कृष्ट हास-परिहासकी ध्वनिसे युक्त गीत-वाद्यका मधुर घोष सुनायी देता है, जो समस्त प्राणियोंके मनको आनन्द प्रदान करनेवाला है ॥ ५१ ॥
तत्र नामुदितः कश्चिन्नात्र कश्चिदसत्प्रियः । अहन्यहनि वर्धन्ते गुणास्तत्र मनोरमाः ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘वहाँ कोई भी अप्रसन्न नहीं रहता । किसीकी भी बुरे कार्मोंमें प्रीति नहीं होती । वहाँ रहनेसे प्रतिदिन मनोरम गुणोंकी वृद्धि होती है ॥ ५२ ॥
समतिक्रम्य तं देशमुत्तरः पयसां निधिः । तत्र सोमगिरिर्नाम मध्ये हेममयो महान् ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘उस देशको लाँघकर आगे जानेपर उत्तरदिग्वर्ती समुद्र उपलब्ध होगा । उस समुद्रके मध्यभागमें सोमगिरि नामक एक बहुत ऊँचा सुवर्णमय पर्वत है ॥ ५३ ॥
इन्द्रलोकगता ये च ब्रह्मलोकगताश्च ये । देवास्तं समवेक्षन्ते गिरिराजं दिवं गताः ॥ ५४ ॥
भावार्थ
‘जो लोग स्वर्गलोकमें गये हैं, वे तथा इन्द्रलोक और ब्रह्मलोकमें रहनेवाले देवता उस गिरिराज सोमगिरिका दर्शन करते हैं ॥ ५४ ॥
स तु देशो विसूर्योऽपि तस्य भासा प्रकाशते । सूर्यलक्ष्म्याभिविज्ञेयस्तपतेव विवस्वता ॥ ५५ ॥
भावार्थ
‘वह देश सूर्यसे रहित है तो भी सोमगिरिकी प्रभासे सदा प्रकाशित होता रहता है । तपते हुए सूर्यकी प्रभासे जो देश प्रकाशित होते हैं, उन्हींकी भाँति उसे सूर्यदेवकी शोभासे सम्पन्न-सा जानना चाहिये ॥ ५५ ॥
भगवांस्तत्र विश्वात्मा शम्भुरेकादशात्मकः । ब्रह्मा वसति देवेशो ब्रह्मर्षिपरिवारितः ॥ ५६ ॥
भावार्थ
‘वहाँ विश्वात्मा भगवान् विष्णु, एकादश रुद्रोंके रूपमें प्रकट होनेवाले भगवान् शंकर तथा ब्रह्मर्षियोंसे घिरे हुए देवेश्वर ब्रह्माजी निवास करते हैं ॥ ५६ ॥
न कथंचन गन्तव्यं कुरूणामुत्तरेण वः। अन्येषामपि भूतानां नानुक्रामति वै गतिः ॥ ५७ ॥
भावार्थ
‘तुमलोग उत्तर कुरुके मार्गसे सोमगिरितक जाकर उसकी सीमासे आगे किसी तरह बढ़ना । तुम्हारी तरह दूसरे प्राणियोंकी भी वहाँ गति नहीं है ॥ ५७ ॥
स हि सोमगिरिर्नाम देवानामपि दुर्गमः। तमालोक्य ततः क्षिप्रमुपावर्तितुमर्हथ ॥ ५८ ॥
भावार्थ
‘वह सोमगिरि देवताओंके लिये भी दुर्गम है । अतः उसका दर्शनमात्र करके तुमलोग शीघ्र लौट आना ॥ ५८ ॥
एतावद् वानरैः शक्यं गन्तुं वानरपुंगवाः। अभास्करमर्यादं न जानीमस्ततः परम् ॥ ५९ ॥
भावार्थ
‘श्रेष्ठ वानरो ! बस, उत्तर दिशामें इतनी ही दूरतक तुम सब वानर जा सकते हो । उसके आगे न तो सूर्यका प्रकाश है और न किसी देश आदिकी सीमा ही । अतः आगेकी भूमिके सम्बन्धमें मैं कुछ नहीं जानता ॥ ५९ ॥
सर्वमेतद् विचेतव्यं यन्मया परिकीर्तितम्। यदन्यदपि नोक्तं च तत्रापि क्रियतां मतिः ॥ ६० ॥
भावार्थ
‘मैंने जो-जो स्थान बताये हैं, उन सबमें सीताकी खोज करना और जिन स्थानोंका नाम नहीं लिया है, वहाँ भी ढूँढ़नेका ही निश्चित विचार रखना ॥ ६० ॥
ततः कृतं दाशरथेर्महत्प्रियं महत्प्रियं चापि ततो मम प्रियम्। कृतं भविष्यत्यनिलानलोपमा विदेहजादर्शनजेन कर्मणा ॥ ६१ ॥
भावार्थ
‘अग्नि और वायुके समान तेजस्वी तथा बलशाली वानरो ! विदेहनन्दिनी सीताके दर्शनके लिये तुम जो-जो कार्य या प्रयास करोगे, उन सबके द्वारा दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामका महान् प्रिय कार्य सम्पन्न होगा तथा उसीसे मेरा भी प्रिय कार्य पूर्ण हो जायगा ॥ ६१ ॥
ततः कृतार्थाः सहिताः सबान्धवा मयार्चिताः सर्वगुणैर्मनोरमैः। चरिष्यथोर्वीं प्रति शान्तशत्रवः सहप्रिया भूतधराः प्लवंगमाः ॥ ६२ ॥
भावार्थ
‘वानरो ! श्रीरामचन्द्रजीका प्रिय कार्य करके जब तुम लौटोगे, तब मैं सर्वगुणसम्पन्न एवं मनोऽनुकूल पदार्थोंके द्वारा तुम सब लोगोंका सत्कार करूँगा । तत्पश्चात् तुमलोग शत्रुहीन होकर अपने हितैषियों और बन्धु-बान्धवोंसहित कृतार्थ एवं समस्त प्राणियोंके आश्रयदाता होकर अपनी प्रियतमाओंके साथ सारी पृथ्वीपर सानन्द विचरण करोगे’ ॥ ६२ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें