किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 37
एवमुक्तस्तु सुग्रीवो लक्ष्मणेन महात्मना। हनूमन्तं स्थितं पार्श्वे वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
महात्मा लक्ष्मणने जब ऐसा कहा, तब सुग्रीव अपने पास ही खड़े हुए हनुमान्जीसे यों बोले—॥ १ ॥
महेन्द्रहिमवद्विन्ध्यकैलासशिखरेषु च। मन्दरे पाण्डुशिखरे पञ्चशैलेषु ये स्थिताः ॥ २ ॥ तरुणादित्यवर्णेषु भ्राजमानेषु नित्यशः। पर्वतेषु समुद्रान्ते पश्चिमस्यां तु ये दिशि ॥ ३ ॥ आदित्यभवने चैव गिरौ संध्याभ्रसंनिभे। पद्माचलवनं भीमाः संश्रिता हरिपुंगवाः ॥ ४ ॥ अञ्जनाम्बुदसंकाशाः कुञ्जरेन्द्रमहौजसः। अञ्जने पर्वते चैव ये वसन्ति प्लवंगमाः ॥ ५ ॥ महाशैलगुहावासा वानराः कनकप्रभाः। मेरुपार्श्वगताश्चैव ये च धूम्रगिरिं श्रिताः ॥ ६ ॥ तरुणादित्यवर्णाश्च पर्वते ये महारुणे। पिबन्तो मधु मैरेयं भीमवेगाः प्लवंगमाः ॥ ७ ॥ वनेषु च सुरम्येषु सुगन्धिषु महत्सु च । तापसाश्रमरम्येषु वनान्तेषु समन्ततः ॥ ८ ॥ तांस्तांस्त्वमानय क्षिप्रं पृथिव्यां सर्ववानरान् । सामदानादिभिः कल्पैर्वानरैर्वेगवत्तरैः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘महेन्द्र, हिमवान्, विन्ध्य, कैलास तथा श्वेत शिखरवाले मन्दराचल—इन पाँच पर्वतोंके शिखरोंपर जो श्रेष्ठ वानर रहते हैं, पश्चिम दिशामें समुद्रके परवर्ती तटपर प्रातःकालिक सूर्यके समान कान्तिमान् और नित्य प्रकाशमान पर्वतोंपर जिन वानरोंका निवास है, भगवान् सूर्यके निवासस्थान तथा संध्याकालिक मेघसमूहके समान अरुण वर्णवाले उदयाचल एवं अस्ताचलपर जो वानर वास करते हैं, पद्माचलवर्ती वनका आश्रय लेकर जो भयानक पराक्रमी वानर-शिरोमणि निवास करते हैं, अञ्जनपर्वतपर जो काजल और मेघके समान काले तथा गजराजके समान महाबली वानर रहते हैं, बड़े-बड़े पर्वतोंकी गुफाओंमें निवास करनेवाले तथा मेरुपर्वतके आसपास रहनेवाले जो सुवर्णकी-सी कान्तिवाले वानर हैं, जो धूम्रगिरिका आश्रय लेकर रहते हैं, मैरेय मधुका पान करते हुए जो महारुण पर्वतपर प्रातःकालके सूर्यकी भाँति लाल रंगके भयानक वेगशाली वानर निवास करते हैं तथा सुगन्धसे परिपूर्ण एवं तपस्वियोंके आश्रमोंसे सुशोभित बड़े-बड़े रमणीय वनों और वनान्तोंमें चारों ओर जो वानर रहते हैं, भूमण्डलके उन सभी वानरोंको तुम शीघ्र यहाँ ले आओ । शक्तिशाली तथा अत्यन्त वेगवान् वानरोंको भेजकर उनके द्वारा साम, दान आदि उपायोंका प्रयोग करके उन सबको यहाँ बुलवाओ ॥ २—९ ॥
प्रेषिताः प्रथमं ये च मयाऽऽज्ञाता महाजवाः । त्वरणार्थं तु भूयस्त्वं सम्प्रेषय हरीश्वरान् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘मेरी आज्ञासे पहले जो महान् वेगशाली वानर भेजे गये हैं, उनको जल्दी करनेके लिये प्रेरणा देनेके निमित्त तुम पुनः दूसरे श्रेष्ठ वानरोंको भेजो ॥ १० ॥
ये प्रसक्ताश्च कामेषु दीर्घसूत्राश्च वानराः । इहानयस्व ताञ्शीघ्रं सर्वानेव कपीश्वरान् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘जो वानर कामभोगमें फँसे हुए हों तथा जो दीर्घसूत्री ( प्रत्येक कार्यको विलम्बसे करनेवाले ) हों, उन सभी कपीश्वरोंको शीघ्र यहाँ ले आओ ॥ ११ ॥
अहोभिर्दशभिर्ये च नागच्छन्ति ममाज्ञया । हन्तव्यास्ते दुरात्मानो राजशासनदूषकाः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘जो मेरी आज्ञासे दस दिनके भीतर यहाँ न आ जायँ, राजाज्ञाको कलङ्कित करनेवाले उन दुरात्मा वानरोंको मार डालना चाहिये ॥ १२ ॥
शतान्यथ सहस्राणि कोट्यश्च मम शासनात् । प्रयान्तु कपिसिंहानां निदेशे मम ये स्थिताः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘जो मेरी आज्ञाके अधीन रहते हों, ऐसे सैकड़ों, हजारों तथा करोड़ों वानरसिंह मेरे आदेशसे जायँ ॥१३॥
मेघपर्वतसंकाशाश्छादयन्त इवाम्बरम् । घोररूपाः कपिश्रेष्ठा यान्तु मच्छासनादितः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘जो मेघ और पर्वतके समान अपने विशाल शरीरसे आकाशको आच्छादित-सा कर लेते हैं, वे घोर रूपधारी श्रेष्ठ वानर मेरा आदेश मानकर यहाँसे यात्रा करें ॥ १४ ॥
ते गतिज्ञा गतिं गत्वा पृथिव्यां सर्ववानराः । आनयन्तु हरीन् सर्वांस्त्वरिताः शासनान्मम ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘वानरोंके निवासस्थानोंको जाननेवाले सभी वानर तीव्र गतिसे भूमण्डलमें चारों ओर जाकर मेरे आदेशसे उन-उन स्थानोंके सम्पूर्ण वानरगणोंको तुरंत यहाँ ले आवें’ ॥१५॥
तस्य वानरराजस्य श्रुत्वा वायुसुतो वचः । दिक्षु सर्वासु विक्रान्तान् प्रेषयामास वानरान् ॥ १६ ॥
भावार्थ
वानरराज सुग्रीवकी बात सुनकर वायुपुत्र हनुमान्जीने सम्पूर्ण दिशाओंमें बहुत-से पराक्रमी वानरोंको भेजा ॥१६॥
ते पदं विष्णुविक्रान्तं पतत्रिज्योतिरध्वगाः । प्रयाताः प्रहिता राज्ञा हरयस्तु क्षणेन वै ॥ १७ ॥
भावार्थ
राजाकी आज्ञा पाकर वे सब वानर तत्काल आकाशमें पक्षियों और नक्षत्रोंके मार्गसे चल दिये ॥ १७ ॥
ते समुद्रेषु गिरिषु वनेषु च सरस्सु च । वानरा वानरान् सर्वान् रामहेतोरचोदयन् ॥ १८ ॥
भावार्थ
उन वानरोंने समुद्रोंके किनारे, पर्वतोंपर, वनोंमें और सरोवरोंके तटोंपर रहनेवाले समस्त वानरोंको श्रीरामचन्द्रजीका कार्य करनेके लिये चलनेको कहा ॥ १८ ॥
मृत्युकालोपमस्याज्ञां राजराजस्य वानराः । सुग्रीवस्याययुः श्रुत्वा सुग्रीवभयशङ्किताः ॥ १९ ॥
भावार्थ
अपने सम्राट् सुग्रीवका, जो मृत्यु एवं कालके समान भयानक दण्ड देनेवाले थे, आदेश सुनकर वे सभी वानर उनके भयसे थर्रा उठे और तुरंत ही किष्किन्धाकी ओर प्रस्थित हुए ॥ १९ ॥
ततस्तेऽञ्जनसंकाशा गिरेस्तस्मान्महाबलाः । तिस्रः कोट्यः प्लवंगानां निर्ययुर्यत्र राघवः ॥ २० ॥
भावार्थ
तदनन्तर कज्जल गिरिसे काजलके ही समान काले और महान् बलवान् तीन करोड़ वानर उस स्थानपर जानेके लिये निकले, जहाँ श्रीरघुनाथजी विराजमान थे ॥ २० ॥
अस्तं गच्छति यत्रार्कस्तस्मिन् गिरिवरे रताः । संतप्तहेमवर्णाभास्तस्मात् कोट्यो दश च्युताः ॥२१॥
भावार्थ
जहाँ सूर्यदेव अस्त होते हैं, उस श्रेष्ठ पर्वतपर रहनेवाले दस करोड़ वानर, जिनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी, वहाँसे किष्किन्धाके लिये चले ॥ २१ ॥
कैलासशिखरेभ्यश्च सिंहकेसरवर्चसाम् । ततः कोटिसहस्राणि वानराणां समागमन् ॥ २२ ॥
भावार्थ
कैलासके शिखरोंसे सिंहके अयालकी-सी श्वेत कान्तिवाले दस अरब वानर आये ॥ २२ ॥
फलमूलेन जीवन्तो हिमवन्तमुपाश्रिताः । तेषां कोटिसहस्राणां सहस्रं समवर्तत ॥ २३ ॥
भावार्थ
जो हिमालयपर रहकर फल-मूलसे जीवन-निर्वाह करते थे, वे वानर एक नीलकी संख्यामें वहाँ आये ॥ २३ ॥
अङ्गारकसमानानां भीमानां भीमकर्मणाम् । विन्ध्याद् वानरकोटीनां सहस्राण्यपतन् द्रुतम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
विन्ध्याचल पर्वतसे मङ्गलके समान लाल रंगवाले भयानक पराक्रमी भयंकर रूपधारी वानरोंकी दस अरब सेना बड़े वेगसे किष्किन्धामें आयी ॥ २४ ॥
क्षीरोद्वेलानिलयास्तमालवनवासिनः । नारिकेलाशनाश्चैव तेषां संख्या न विद्यते ॥ २५ ॥
भावार्थ
क्षीरसमुद्रके :किनारे और तमालवनमें नारियल खाकर रहनेवाले वानर इतनी अधिक संख्यामें आये कि उनकी गणना नहीं हो सकती थी ॥ २५ ॥
वनेभ्यो गह्वरेभ्यश्च सरिद्भ्यश्च महाबलाः । आगच्छद् वानरी सेना पिबन्तीव दिवाकरम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
वनोंसे, गुफाओंसे और नदियोंके किनारोंसे असंख्य महाबली वानर एकत्र हुए । वानरोंकी वह सारी सेना सूर्यदेवको पीती ( आच्छादित करती ) हुई-सी आयी ॥२६॥
ये तु त्वारयितुं याता वानराः सर्ववानरान् । ते वीरा हिमवच्छैले दद्दशुस्तं महाद्रुमम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
जो वानर समस्त वानरोंको शीघ्र आनेके लिये प्रेरित करनेके निमित्त किष्किन्धासे दुबारा भेजे गये थे, उन वीरोंने हिमालय पर्वतपर उस प्रसिद्ध विशाल वृक्षको देखा ( जो भगवान् शंकरकी यज्ञशालामें स्थित था ) ॥ २७ ॥
तस्मिन् गिरिवरे पुण्ये यज्ञो माहेश्वरः पुरा । सर्वदेवमनस्तोषो बभूव सुमनोरमः ॥ २८ ॥
भावार्थ
उस पवित्र एवं श्रेष्ठ पर्वतपर पूर्वकालमें भगवान् शंकरका यज्ञ हुआ था, जो सम्पूर्ण देवताओंके मनको संतोष देनेवाला और अत्यन्त मनोरम था ॥ २८ ॥
अन्ननिस्यन्दजातानि मूलानि च फलानि च । अमृतस्वादुकल्पानि दद्दशुस्तत्र वानराः ॥ २९ ॥
भावार्थ
उस पर्वतपर खीर आदि अन्न ( होमद्रव्य ) से घृत आदिका स्राव हुआ था, उससे वहाँ अमृतके समान स्वादिष्ट फल और मूल उत्पन्न हुए थे । उन फलोंको उन वानरोंने देखा ॥ २९ ॥
तदन्नसम्भवं दिव्यं फलमूलं मनोहरम् । यः कश्चित् सकृदश्नाति मासं भवति तर्पितः ॥ ३० ॥
भावार्थ
उक्त अन्नसे उत्पन्न हुए उस दिव्य एवं मनोहर फल-मूलको जो कोई एक बार खा लेता था, वह एक मासतक उससे तृप्त बना रहता था ॥ ३० ॥
तानि मूलानि दिव्यानि फलानि च फलाशनाः । औषधानि च दिव्यानि जगृहुर्हरिपुंगवाः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
फलाहार करनेवाले उन वानरशिरोमणियोंने उन दिव्य मूल-फलों और दिव्य औषधोंको अपने साथ ले लिया ॥३१॥
तस्माच्च यज्ञायतनात् पुष्पाणि सुरभीणि च । आनिन्युर्वानरा गत्वा सुग्रीवप्रियकारणात् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
वहाँ जाकर उस यज्ञ-मण्डपसे वे सब वानर सुग्रीवका प्रिय करनेके लिये सुगन्धित पुष्प भी लेते आये ॥ ३२ ॥
ते तु सर्वे हरिवराः पृथिव्यां सर्ववानरान् । संचोदयित्वा त्वरितं यूथानां जग्मुरग्रतः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
वे समस्त श्रेष्ठ वानर भूमण्डलके सम्पूर्ण वानरोंको तुरंत चलनेका आदेश देकर उनके यूथोंके पहुँचनेके पहले ही सुग्रीवके पास आ गये ॥ ३३ ॥
ते तु तेन मुहूर्तेन कपयः शीघ्रचारिणः । किष्किन्धां त्वरया प्राप्ताः सुग्रीवो यत्र वानरः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
वे शीघ्रगामी वानर उसी मुहूर्तमें चलकर बड़ी उतावलीके साथ किष्किन्धापुरीमें जहाँ वानरराज सुग्रीव थे, जा पहुँचे ॥ ३४ ॥
ते गृहीत्वौषधीः सर्वाः फलमूलं च वानराः । तं प्रतिग्राहयामासुर्वचनं चेदमब्रुवन् ॥ ३५ ॥ सर्वे परिसृताः शैलाः सरितश्च वनानि च । पृथिव्यां वानराः सर्वे शासनादुपयान्ति ते ॥ ३६ ॥
भावार्थ
उन सम्पूर्ण ओषधियों और फल-मूलोंको लेकर उन वानरोंने सुग्रीवकी सेवामें अर्पित कर दिया और इस प्रकार कहा—॥ ‘महाराज ! हमलोग सभी पर्वतों, नदियों और वनोंमें घूम आये । भूमण्डलके समस्त वानर आपकी आज्ञासे यहाँ आ रहे हैं’ ॥ ३६ ॥
एवं श्रुत्वा ततो हृष्टः सुग्रीवः प्लवगाधिपः । प्रतिजग्राह च प्रीतस्तेषां सर्वमुपायनम् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
यह सुनकर वानरराज सुग्रीवको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने उनकी दी हुई सारी भेंट-सामग्री सानन्द ग्रहण की ॥३७॥
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