किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 38
प्रतिगृह्य च तत् सर्वमुपायनमुपाहृतम् । वानरान् सान्त्वयित्वा च सर्वानेव व्यसर्जयत्॥ १ ॥
भावार्थ
उनके लाये हुए उन समस्त उपहारोंको ग्रहण करके सुग्रीवने सम्पूर्ण वानरोंको मधुर वचनोंद्वारा सान्त्वना दी । फिर सबको विदा कर दिया ॥ १ ॥
विसर्जयित्वा स हरीन् सहस्रान् कृतकर्मणः । मेने कृतार्थमात्मानं राघवं च महाबलम् ॥ २ ॥
भावार्थ
कार्य पूरा करके लौटे हुए उन सहस्रों वानरोंको विदा करके सुग्रीवने अपने आपको कृतार्थ माना और महाबली श्रीरघुनाथजीका भी कार्य सिद्ध हुआ ही समझा ॥ २ ॥
स लक्ष्मणो भीमबलं सर्ववानरसत्तमम् । अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीवं सम्प्रहर्षयन् ॥ ३ ॥ किष्किन्धाया विनिष्क्राम यदि ते सौम्य रोचते । तस्य तद् वचनं श्रुत्वा लक्ष्मणस्य सुभाषितम्॥ ४ ॥ सुग्रीवः परमप्रीतो वाक्यमेतदुवाच ह ।
भावार्थ
तत्पश्चात् लक्ष्मण समस्त वानरोंमें श्रेष्ठ भयंकर बलशाली सुग्रीवका हर्ष बढ़ाते हुए उनसे यह विनीत वचन बोले—॥ ‘सौम्य ! यदि तुम्हारी रुचि हो तो अब किष्किन्धासे बाहर निकलो ।’ लक्ष्मणकी यह सुन्दर बात सुनकर सुग्रीव अत्यन्त प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—॥ ४½ ॥
एवं भवतु गच्छाम स्थेयं त्वच्छासने मया ॥ ५ ॥ तमेवमुक्त्वा सुग्रीवो लक्ष्मणं शुभलक्षणम् । विसर्जयामास तदा ताराद्याश्चैव योषितः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘अच्छा, ऐसा ही हो । चलिये, चलें । मुझे तो आपकी आज्ञाका पालन करना है।’ शुभ लक्षणोंसे युक्त लक्ष्मणसे ऐसा कहकर सुग्रीवने तारा आदि सब स्त्रियोंको तत्काल विदा कर दिया ॥ ५-६ ॥
पहीत्युच्चैर्हरिवरान् सुग्रीवः समुदाहरत् । तस्य तद् वचनं श्रुत्वा हरयः शीघ्रमाययुः ॥ ७ ॥ बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे ये स्युः स्त्रीदर्शनक्षमाः ।
भावार्थ
इसके बाद सुग्रीवने शेष वानरोंको ‘आओ, आओ’ कहकर उच्चस्वरसे पुकारा । उनकी वह पुकार सुनकर सब वानर, जो अन्तःपुरकी स्त्रियोंको देखनेके अधिकारी थे, दोनों हाथ जोड़े शीघ्रतापूर्वक उनके पास आये ॥ ७½ ॥
तानुवाच ततः प्राप्तान् राजार्कसदृशप्रभः ॥ ८ ॥ उपस्थापयत क्षिप्रं शिबिकां मम वानराः ।
भावार्थ
पास आये हुए उन वानरोंसे सूर्यतुल्य तेजस्वी राजा सुग्रीवने कहा—‘वानरो ! तुमलोग शीघ्र मेरी शिबिकाको यहाँ ले आओ’ ॥ ८½ ॥
श्रुत्वा तु वचनं तस्य हरयः शीघ्रविक्रमाः ॥ ९ ॥ समुपस्थापयामासुः शिबिकां प्रियदर्शनाम् ।
भावार्थ
उनकी बात सुनकर शीघ्रगामी वानरोंने एक सुन्दर शिबिका ( पालकी ) वहाँ उपस्थित कर दी ॥ ९½ ॥
तामुपस्थापितां दृष्ट्वा शिबिकां वानराधिपः ॥ १० ॥ लक्ष्मणारुह्यतां शीघ्रमिति सौमित्रिमब्रवीत् ।
भावार्थ
पालकीको वहाँ उपस्थित देख वानरराज सुग्रीवने सुमित्राकुमारसे कहा—‘कुमार लक्ष्मण ! आप शीघ्र इसपर आरूढ़ हो जायँ’ ॥ १०½ ॥
इत्युक्त्वा काञ्चनं यानं सुग्रीवः सूर्यसंनिभम् ॥ ११ ॥ बहुभिर्हरिभिर्युक्तमारुरोह सलक्ष्मणः ।
भावार्थ
ऐसा कहकर लक्ष्मणसहित सुग्रीव उस सूर्यकी-सी प्रभा-वाली सुवर्णमयी पालकीपर, जिसे ढोनेके लिये बहुतसे वानर लगे थे, आरूढ़ हुए ॥ ११½ ॥
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ॥ १२ ॥ शुक्लैश्च वालव्यजनैर्धूयमानैः समन्ततः । शङ्खभेरीनिनादैश्च बन्दिभिश्चाभिनन्दितः ॥ १३ ॥ निर्ययौ प्राप्य सुग्रीवो राज्यश्रियमनुत्तमाम् ।
भावार्थ
उस समय सुग्रीवके ऊपर श्वेत छत्र लगाया गया और सब ओरसे सफेद चँवर डुलाये जाने लगे । शङ्ख और भेरीकी ध्वनिके साथ वन्दीजनोंका अभिनन्दन सुनते हुए राजा सुग्रीव परम उत्तम राजलक्ष्मीको पाकर किष्किन्धापुरीसे बाहर निकले ॥ १२-१३½ ॥
स वानरशतैस्तीक्ष्णैर्बहुभिः शस्त्रपाणिभिः ॥ १४ ॥ परिकीर्णो ययौ तत्र यत्र रामो व्यवस्थितः ।
भावार्थ
हाथमें शस्त्र लिये तीक्ष्ण स्वभाववाले कई सौ वानरोंसे घिरे हुए राजा सुग्रीव उस स्थानपर गये, जहाँ भगवान् श्रीराम निवास करते थे ॥ १४½ ॥
स तं देशमनुप्राप्य श्रेष्ठं रामनिषेवितम् ॥ १५ ॥ अवातरन्महातेजाः शिबिकायाः सलक्ष्मणः । आसाद्य च ततो रामं कृताञ्जलिपुटोऽभवत् ॥ १६ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीसे सेवित उस श्रेष्ठ स्थानमें पहुँचकर लक्ष्मणसहित महातेजस्वी सुग्रीव पालकीसे उतरे और श्रीरामके पास जा हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ १५-१६ ॥
कृताञ्जलौ स्थिते तस्मिन् वानराश्चाभवंस्तथा । तद्राकमिव तं दृष्ट्वा रामः कुड्मलपङ्कजम् ॥ १७ ॥ वानराणां महत् सैन्यं सुग्रीवे प्रीतिमानभूत् ।
भावार्थ
वानरराजके हाथ जोड़कर खड़े होनेपर उनके अनुयायी वानर भी उन्हींकी भाँति अञ्जलि बाँधे खड़े हो गये । मुकुलित कमलोंसे भरे हुए विशाल सरोवरकी भाँति वानरोंकी उस बड़ी भारी सेनाको देखकर श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीवपर बहुत प्रसन्न हुए ॥ १७½ ॥
पादयोः पतितं मूर्ध्ना तमुत्थाप्य हरीश्वरम् ॥ १८ ॥ प्रेम्णा च बहुमानाच्च राघवः परिषस्वजे ।
भावार्थ
वानरराजको चरणोंमें मस्तक रखकर पड़ा हुआ देख श्रीरघुनाथजीने हाथसे पकड़कर उठाया और बड़े आदर तथा प्रेमके साथ उन्हें हृदयसे लगाया ॥ १८½ ॥
परिष्वज्य च धर्मात्मा निर्षीदेति ततोऽब्रवीत्॥ १९ ॥ निषण्णं तं ततो दृष्ट्वा क्षितौ रामोऽब्रवीत् ततः ।
भावार्थ
हृदयसे लगाकर धर्मात्मा श्रीरामने उनसे कहा—‘बैठो’ । उन्हें पृथ्वीपर बैठा देख श्रीराम बोले—॥ १९½ ॥
धर्ममर्थं च कामं च काले यस्तु निषेवते ॥ २० ॥ विभज्य सततं वीर स राजा हरिसत्तम । हित्वा धर्मं तथार्थं च कामं यस्तु निषेवते ॥ २१ ॥ स वृक्षाग्रे यथा सुप्तः पतितः प्रतिबुध्यते ।
भावार्थ
‘वीर ! वानरशिरोमणे ! जो धर्म, अर्थ और कामके लिये समयका विभाग करके सदा उचित समयपर उनका ( न्याययुक्त ) सेवन करता है, वही श्रेष्ठ राजा है । किंतु जो धर्म-अर्थका त्याग करके केवल कामका ही सेवन करता है, वह वृक्षकी अगली शाखापर सोये हुए मनुष्यके समान है । गिरनेपर ही उसकी आँख खुलती है ॥ २०-२१½ ॥
अमित्राणां वधे युक्तो मित्राणां संग्रहे रतः ॥ २२ ॥ त्रिवर्गफलभोक्ता च राजा धर्मेण युज्यते ।
भावार्थ
‘जो राजा शत्रुओंके वध और मित्रोंके संग्रहमें संलग्न रहकर योग्य समयपर धर्म, अर्थ और कामका ( न्याययुक्त ) सेवन करता है, वह धर्मके फलका भागी होता है ॥२२½॥
उद्योगसमयस्त्वेष प्राप्तः शत्रुनिषूदन ॥ २३ ॥ संचिन्त्यतां हि पिङ्गेश हरिभिः सह मन्त्रिभिः ।
भावार्थ
‘शत्रुसूदन ! यह हमलोगोंके लिये उद्योगका समय आया है । वानरराज ! तुम इस विषयमें इन वानरों और मन्त्रियोंके साथ विचार करो’ ॥ २३½ ॥
पवनमुक्तस्तु सुग्रीवो रामं वचनमब्रवीत् ॥ २४ ॥ प्रणष्टा श्रीश्च कीर्तिश्च कपिराज्यं च शाश्वतम् । त्वत्प्रसादान्महाबाहो पुनः प्राप्तमिदं मया ॥ २५ ॥
भावार्थ
श्रीरामके ऐसा कहनेपर सुग्रीवने उनसे कहा—‘महाबाहो ! मेरी श्री, कीर्ति तथा सदासे चला आनेवाला वानरोंका राज्य—ये सब नष्ट हो चुके थे । आपकी कृपासे ही मुझे पुनः इन सबकी प्राप्ति हुई है ॥ २४-२५ ॥
तव देव प्रसादाच्च भ्रातुश्च जयतां वर । कृतं न प्रतिकुर्याद् यः पुरुषाणां हि दूषकः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ देव ! आप और आपके भाईकी कृपासे ही मैं वानर-राज्यपर पुनः प्रतिष्ठित हुआ हूँ । जो किये हुए उपकारका बदला नहीं चुकाता है, वह पुरुषोंमें धर्मको कलङ्कित करनेवाला माना गया है ॥ २६ ॥
एते वानरमुख्याश्च शतशः शत्रुसूदन । प्राप्ताश्चादाय बलिनः पृथिव्यां सर्ववानरान् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘शत्रुसूदन ! ये सैकड़ों बलवान् और मुख्य वानर भूमण्डलके सभी बलशाली वानरोंको साथ लेकर यहाँ आये हैं ॥ २७ ॥
ऋक्षाश्च वानराः शूरा गोलाङ्गूलाश्च राघव । कान्तारवनदुर्गाणामभिज्ञा घोरदर्शनाः ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! इनमें रीछ हैं, वानर हैं और शौर्यसम्पन्न गोलाङ्गूल ( लङ्गूर ) हैं । ये सब-के-सब देखनेमें बड़े भयंकर हैं और बीहड़ वनों तथा दुर्गम स्थानोंके जानकार हैं ॥२८॥
देवगन्धर्वपुत्राश्च वानराः कामरूपिणः । स्वैः स्वैः परिवृताः सैन्यैर्वर्तन्ते पथि राघव ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘रघुनाथजी ! जो देवताओं और गन्धर्वोंके पुत्र हैं और इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ हैं, वे श्रेष्ठ वानर अपनी-अपनी सेनाओंके साथ चल पड़े हैं और इस समय मार्गमें हैं ॥ २९ ॥
शतैः शतसहस्रैश्च वर्तन्ते कोटिभिस्तथा । अयुतैश्चावृता वीर शङ्कुभिश्च परंतप ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर ! इनमेंसे किसीके साथ सौ, किसीके साथ लाख, किसीके साथ करोड़, किसीके साथ अयुत ( दस हजार ) और किसीके साथ एक शङ्कु वानर हैं ॥ ३० ॥
अर्बुदैरर्बुदशतैर्मध्यैश्चान्त्यैश्च वानराः । समुद्राश्च परार्धाश्च हरयो हरियूथपाः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘कितने ही वानर अर्बुद ( दस करोड़ ), सौ अर्बुद ( दस अरब ), मध्य ( दस पद्म ) तथा अन्त्य ( एक पद्म ) वानर-सैनिकोंके साथ आ रहे हैं । कितने ही वानरों तथा वानर-यूथपतियोंकी संख्या समुद्र ( दस नील ) तथा परार्ध ( शंख ) तक पहुँच गयी है* ॥ ३१ ॥
आगमिष्यन्ति ते राजन् महेन्द्रसमविक्रमाः । मेघपर्वतसंकाशा मेरुविन्ध्यकृतालयाः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी तथा मेघों और पर्वतोंके समान विशालकाय वानर, जो मेरु और विन्ध्याचलमें निवास करते हैं, यहाँ शीघ्र ही उपस्थित होंगे ॥ ३२ ॥
ते त्वामभिगमिष्यन्ति राक्षसं योद्धुमाहवे । निहत्य रावणं युद्धे ह्यानयिष्यन्ति मैथिलीम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘जो युद्धमें रावणका वध करके मिथिलेशकुमारी सीताको लङ्कासे ला देंगे, वे महान् शक्तिशाली वानर संग्राममें उस राक्षससे युद्ध करनेके लिये अवश्य आपके पास आयेंगे’॥३३॥
ततः समुद्योगमवेक्ष्य वीर्यवान् हरिप्रवीरस्य निदेशवर्तिनः । बभूव हर्षाद् वसुधाधिपात्मजः प्रबुद्धनीलोत्पलतुल्यदर्शनः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
यह सुनकर परम पराक्रमी राजकुमार श्रीराम अपनी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले वानरोंके प्रमुख वीर सुग्रीवका यह सैन्य-विषयक उद्योग देखकर बड़े प्रसन्न हुए । उनके नेत्र हर्षसे खिल उठे और प्रफुल्ल नील कमलके समान दिखायी देने लगे ॥ ३४ ॥
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