किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 36
इत्युक्तस्तारया वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम् । मृदुस्वभावः सौमित्रिः प्रतिजग्राह तद्वचः ॥ १ ॥
भावार्थ
ताराने जब इस प्रकार धर्मके अनुकूल विनययुक्त बात कही, तब कोमल स्वभाववाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणने उसे मान लिया ( क्रोधको त्याग दिया ) ॥ १ ॥
तस्मिन् प्रतिगृहीते तु वाक्ये हरिगणेश्वरः । लक्ष्मणात् सुमहत्त्रासं वस्त्रं क्लिन्नमिवात्यजत्॥ २ ॥
भावार्थ
उनके द्वारा ताराकी बात मान ली जानेपर वानरयूथपति सुग्रीवने लक्ष्मणसे प्राप्त होनेवाले महान् भयको भीगे हुए वस्त्रकी भाँति त्याग दिया ॥ २ ॥
ततः कण्ठगतं माल्यं चित्रं बहुगुणं महत् । चिच्छेद विमदश्चासीत् सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥ ३ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वानरराज सुग्रीवने अपने कण्ठमें पड़ी हुई फूलोंकी विचित्र, विशाल एवं बहुगुणसम्पन्न माला तोड़ डाली और वे मदसे रहित हो गये ॥ ३ ॥
स लक्ष्मणं भीमबलं सर्ववानरसत्तमः । अब्रवीत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीवः सम्प्रहर्षयन् ॥ ४ ॥
भावार्थ
फिर समस्त वानरोंमें शिरोमणि सुग्रीवने भयंकर बलशाली लक्ष्मणका हर्ष बढ़ाते हुए उनसे यह विनययुक्त बात कही—॥ ४ ॥
प्रणष्टा श्रीश्च कीर्तिश्च कपिराज्यं च शाश्वतम् । रामप्रसादात् सौमित्रे पुनश्चात्तमिदं मया ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘सुमित्राकुमार ! मेरी श्री, कीर्ति तथा सदासे चला आता हुआ वानरोंका राज्य—ये सब नष्ट हो चुके थे । भगवान् श्रीरामकी कृपासे ही मुझे पुनः इन सबकी प्राप्ति हुई है ॥ ५ ॥
कः शक्तस्तस्य देवस्य ख्यातस्य स्वेन कर्मणा । तादृशं प्रतिकुर्वीत अंशेनापि नृपात्मज ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘राजकुमार ! वे भगवान् श्रीराम अपने कर्मोंसे ही सर्वत्र विख्यात हैं । उनके उपकारका वैसा ही बदला अंशमात्रसे भी कौन चुका सकता है ? ॥ ६ ॥
सीतां प्राप्स्यति धर्मात्मा वधिष्यति च रावणम् । सहायमात्रेण मया राघवः स्वेन तेजसा ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘धर्मात्मा श्रीराम अपने ही तेजसे रावणका वध करेंगे और सीताको प्राप्त कर लेंगे । मैं तो उनका एक तुच्छ सहायकमात्र रहूँगा ॥ ७ ॥
सहायकृत्यं किं तस्य येन सप्त महाद्रुमाः । गिरिश्च वसुधा चैव बाणेनैकेन दारिताः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘जिन्होंने एक ही बाणसे सात बड़े-बड़े ताल वृक्ष, पर्वत, पृथ्वी, पाताल और वहाँ रहनेवाले दैत्योंको भी विदीर्ण कर दिया था, उनको दूसरे किसी सहायककी आवश्यकता भी क्या है ? ॥ ८ ॥
धनुर्विस्फारमाणस्य यस्य शब्देन लक्ष्मण । सशैला कम्पिता भूमिः सहायैः किं नु तस्य वै ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! जिनके धनुष खींचते समय उसकी टंकारसे पर्वतोंसहित पृथ्वी काँप उठी थी, उन्हें सहायकोंसे क्या लेना है ? ॥ ९ ॥
अनुयात्रां नरेन्द्रस्य करिष्येऽहं नरर्षभ । गच्छतो रावणं हन्तुं वैरिणं सपुरस्सरम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! मैं तो वैरी रावणका वध करनेके लिये अग्रगामी सैनिकोंसहित यात्रा करनेवाले महाराज श्रीरामके पीछे-पीछे चलूँगा ॥ १० ॥
यदि किंचिदतिक्रान्तं विश्वासात् प्रणयेन वा। प्रेष्यस्य क्षमितव्यं मे न कश्चिन्नापराध्यति ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘विश्वास अथवा प्रेमके कारण यदि कोई अपराध बन गया हो तो मुझ दासके उस अपराधको क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि ऐसा कोई सेवक नहीं है, जिससे कभी कोई अपराध होता ही न हो’ ॥ ११ ॥
इति तस्य ब्रुवाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः। अभवल्लक्ष्मणः प्रीतः प्रेम्णा चेदमुवाच ह ॥ १२ ॥
भावार्थ
महात्मा सुग्रीवके ऐसा कहनेपर लक्ष्मण प्रसन्न हो गये और बड़े प्रेमसे इस प्रकार बोले—॥ १२ ॥
सर्वथा हि मम भ्राता सनाथो वानरेश्वर। त्वया नाथेन सुग्रीव प्रश्रितेन विशेषतः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘वानरराज सुग्रीव ! विशेषतः तुम-जैसे विनयशील सहायकको पाकर मेरे भाई श्रीराम सर्वथा सनाथ हैं ॥१३॥
यस्ते प्रभावः सुग्रीव यच्च ते शौचमीदृशम्। अर्हस्त्वं कपिराज्यस्य श्रियं भोक्तुमनुत्तमाम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘सुग्रीव ! तुम्हारा जो प्रभाव है और तुम्हारे हृदयमें जो इतना शुद्ध भाव है, इससे तुम वानरराज्यकी परम उत्तम लक्ष्मीका सदा ही उपभोग करनेके अधिकारी हो ॥ १४ ॥
सहायेन च सुग्रीव त्वया रामः प्रतापवान्। वधिष्यति रणे शत्रूनचिरान्नात्र संशयः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘सुग्रीव ! तुम्हें सहायकके रूपमें पाकर प्रतापी श्रीराम रणभूमिमें अपने शत्रुओंका शीघ्र ही वध कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १५ ॥
धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य संग्रामेष्वनिवर्तिनः। उपपन्नं च युक्तं च सुग्रीव तव भाषितम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘सुग्रीव ! तुम धर्मज्ञ, कृतज्ञ तथा युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले हो। तुम्हारा यह भाषण सर्वथा युक्तिसंगत और उचित है ॥ १६ ॥
दोषज्ञः सति सामर्थ्ये कोऽन्यो भाषितुमर्हति। वर्जयित्वा मम ज्येष्ठं त्वां च वानरसत्तम ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘वानरशिरोमणे ! तुमको और मेरे बड़े भाईको छोड़कर दूसरा कौन ऐसा विद्वान् है, जो अपनेमें सामर्थ्य होते हुए भी ऐसा नम्रतापूर्ण वचन कह सके ॥ १७ ॥
सदृशश्चासि रामेण विक्रमेण बलेन च। सहायो दैवतैर्दत्तश्चिराय हरिपुंगव ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘कपिराज ! तुम बल और पराक्रममें भगवान् श्रीरामके बराबर हो। देवताओंने ही हमें दीर्घकालके लिये तुम-जैसा सहायक प्रदान किया है ॥ १८ ॥
किं तु शीघ्रमितो वीर निष्क्रम त्वं मया सह। सान्त्वयस्व वयस्यं च भार्याहरणदुःखितम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘किंतु वीर ! अब तुम शीघ्र ही मेरे साथ इस पुरीसे बाहर निकलो। तुम्हारे मित्र अपनी पत्नीके अपहरणसे बहुत दुखी हैं। उन्हें चलकर सान्त्वना दो ॥ १९ ॥
यच्च शोकाभिभूतस्य श्रुत्वा रामस्य भाषितम्। मया त्वं परुषाण्युक्तस्तत् क्षमस्व सखे मम ॥ २० ॥
भावार्थ
‘सखे ! शोकमग्न श्रीरामके वचनोंको सुनकर जो मैंने तुम्हारे प्रति कठोर बातें कह दी हैं, उनके लिये मुझे क्षमा करो’॥२०॥
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