किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 33
अथ प्रतिसमादिष्टो लक्ष्मणः परवीरहा । प्रविवेश गुहां रम्यां किष्किन्धां रामशासनात् ॥ १ ॥
भावार्थ
‘इधर गुफामें प्रवेश करनेके लिये अङ्गदके प्रार्थना करनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने श्रीरामकी आज्ञाके अनुसार किष्किन्धानामक रमणीय गुफामें प्रवेश किया ॥१॥
द्वारस्था हरयस्तत्र महाकाया महाबलाः । बभूवुर्लक्ष्मणं दृष्ट्वा सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः ॥ २ ॥
भावार्थ
किष्किन्धाके द्वारपर जो विशाल शरीरवाले महाबली वानर थे, वे सब लक्ष्मणको देख हाथ जोड़कर खड़े हो गये ॥ २ ॥
निःश्वसन्तं तु तं दृष्ट्वा क्रुद्धं दशरथात्मजम् । बभूवुर्हरयस्त्रस्ता न चैनं पर्यवारयन् ॥ ३ ॥
भावार्थ
दशरथनन्दन लक्ष्मणको क्रोधपूर्वक लंबी साँस खींचते देख वे सब वानर अत्यन्त भयभीत हो गये थे । इसलिये वे उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनके साथ-साथ नहीं चल सके॥३॥
स तां रत्नमयीं दिव्यां श्रीमान् पुष्पितकाननाम् । रम्यां रत्नसमाकीर्णां ददर्श महतीं गुहाम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
श्रीमान् लक्ष्मणने द्वारके भीतर प्रवेश करके देखा, किष्किन्धापुरी एक बहुत बड़ी रमणीय गुफाके रूपमें बसी हुई है । वह रत्नमयी पुरी नाना प्रकारके रत्नोंसे भरी-पूरी होनेके कारण दिव्य शोभासे सम्पन्न है । वहाँके वन-उपवन फूलोंसे सुशोभित दिखायी दिये ॥ ४ ॥
हर्म्यप्रासादसम्बाधां नानारत्नोपशोभिताम् । सर्वकामफलैर्वृक्षैः पुष्पितैरुपशोभिताम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
हर्म्यों ( धनियोंकी अट्टालिकाओं ) तथा प्रासादों ( देवमन्दिरों और राजभवनों ) से वह पुरी अत्यन्त घनी दिखायी देती थी । नाना प्रकारके रत्न उसकी शोभा बढ़ाते थे । सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले फलोंसे युक्त खिले हुए वृक्षोंसे वह पुरी सुशोभित थी ॥ ५ ॥
देवगन्धर्वपुत्रैश्च वानरैः कामरूपिभिः । दिव्यमाल्याम्बरधरैः शोभितां प्रियदर्शनैः ॥ ६ ॥
भावार्थ
वहाँ दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करनेवाले परम सुन्दर वानर, जो देवताओं और गन्धर्वोंके पुत्र तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले थे, निवास करते हुए उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ६ ॥
चन्दनागुरुपद्मानां गन्धैः सुरभिगन्धिताम् । मैरेयाणां मधूनां च सम्मोदितमहापथाम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
वहाँ चन्दन, अगर और कमलोंकी मनोहर सुगन्ध छा रही थी । उस पुरीकी लंबी-चौड़ी सड़कें भी मैरेय तथा मधुके आमोदसे महक रही थीं ॥ ७ ॥
विन्ध्यमेरुगिरिप्रख्यैः प्रासादैर्नैकभूमिभिः । ददर्श गिरिनद्यश्च विमलास्तत्र राघवः ॥ ८ ॥
भावार्थ
उस पुरीमें विन्ध्याचल तथा मेरुके समान ऊँचे-ऊँचे महल बने थे, जो कई मंजिलके थे । लक्ष्मणने उस गुफाके निकट ही निर्मल जलसे भरी हुई पहाड़ी नदियाँ देखीं ॥ ८ ॥
अङ्गदस्य गृहं रम्यं मैन्दस्य द्विविदस्य च । गवयस्य गवाक्षस्य गजस्य शरभस्य च ॥ ९ ॥ विद्युन्मालेश्च सम्पातेः सूर्याक्षस्य हनूमतः । वीरबाहोः सुबाहोश्च नलस्य च महात्मनः ॥ १० ॥ कुमुदस्य सुषेणस्य तारजाम्बवतोस्तथा । दधिवक्त्रस्य नीलस्य सुपाटलसुनेत्रयोः ॥ ११ ॥ एतेषां कपिमुख्यानां राजमार्गे महात्मनाम् । ददर्श गृहमुख्यानि महासाराणि लक्ष्मणः ॥ १२ ॥
भावार्थ
उन्होंने राजमार्गपर अङ्गदका रमणीय भवन देखा । साथ ही वहाँ मैन्द, द्विविद, गवय, गवाक्ष, गज, शरभ, विद्युन्माली, सम्पाति, सूर्याक्ष, हनुमान्, वीरबाहु, सुबाहु, महात्मा नल, कुमुद, सुषेण, तार, जाम्बवान्, दधिमुख, नील, सुपाटल और सुनेत्र—इन महामनस्वी वानरशिरोमणियोंके भी अत्यन्त सुदृढ़ श्रेष्ठ भवन लक्ष्मणको दृष्टिगोचर हुए । वे सबके-सब राजमार्गपर ही बने हुए थे ॥ ९-१२ ॥
पाण्डुराभ्रप्रकाशानि गन्धमाल्ययुतानि च । प्रभूतधनधान्यानि स्त्रीरत्नैः शोभितानि च ॥ १३ ॥
भावार्थ
वे सभी भवन श्वेत बादलोंके समान प्रकाशित हो रहे थे । उन्हें सुगन्धित पुष्पमालाओंसे सजाया गया था । वे प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न तथा रत्नस्वरूपा रमणियोंसे सुशोभित थे ॥ १३ ॥
पाण्डुरेण तु शैलेन परिक्षिप्तं दुरासदम् । वानरेन्द्रगृहं रम्यं महेन्द्रसदनोपमम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
वानरराज सुग्रीवका सुन्दर भवन इन्द्रसदनके समान रमणीय दिखायी देता था । उसमें प्रवेश करना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था । वह श्वेत पर्वतकी चहारदीवारीसे घिरा हुआ था ॥ १४ ॥
शुक्लैः प्रासादशिखरैः कैलासशिखरोपमैः । सर्वकामफलैर्वृक्षैः पुष्पितैरुपशोभितम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
कैलास-शिखरके समान श्वेत प्रासाद-शिखर तथा समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले फलोंसे युक्त पुष्पित दिव्य वृक्ष उस राजभवनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ १५ ॥
महेन्द्रदत्तैः श्रीमद्भिर्नीलजीमूतसंनिभैः । दिव्यपुष्पफलैर्वृक्षैः शीतच्छायैर्मनोरमैः ॥ १६ ॥
भावार्थ
वहाँ इन्द्रके दिये हुए दिव्य फल-फूलोंसे सम्पन्न मनोरम वृक्ष लगाये गये थे, जो परम सुन्दर, नीले मेघके समान श्याम तथा शीतल छायासे युक्त थे ॥ १६ ॥
हरिभिः संवृतद्वारं बलिभिः शस्त्रपाणिभिः । दिव्यमाल्यावृतं शुभ्रं तप्तकाञ्चनतोरणम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
अनेक बलवान् वानर हाथोंमें हथियार लिये उसकी ड्योढ़ीपर पहरा दे रहे थे । वह सुन्दर महल दिव्य मालाओंसे अलंकृत था और उसका बाहरी फाटक पक्के सोनेका बना हुआ था ॥ १७ ॥
सुग्रीवस्य गृहं रम्यं प्रविवेश महाबलः । अवार्यमाणः सौमित्रिर्महाभ्रमिव भास्करः ॥ १८ ॥
भावार्थ
महाबली सुमित्राकुमार लक्ष्मणने सुग्रीवके उस रमणीय भवनमें प्रवेश किया । मानो सूर्यदेव महान् मेघके भीतर प्रविष्ट हुए हों । उस समय किसीने रोक-टोक नहीं की ॥१८॥
स सप्त कक्ष्या धर्मात्मा यानासनसमावृताः । ददर्श सुमहद्गुप्तं ददर्शान्तःपुरं महत् ॥ १९ ॥
भावार्थ
धर्मात्मा लक्ष्मणने सवारियों तथा विविध आसनोंसे सुशोभित उस भवनकी सात ड्योढ़ियोंको पार करके बहुत ही गुप्त और विशाल अन्तःपुरको देखा ॥ १९ ॥
हैमराजतपर्यङ्कैर्बहुभिश्च वरासनैः । महार्हास्तरणोपेतैस्तत्र तत्र समावृतम् ॥ २० ॥
भावार्थ
उसमें जहाँ-तहाँ चाँदी और सोनेके बहुत-से पलंग तथा अनेकानेक श्रेष्ठ आसन रक्खे हुए थे और उन सबपर बहुमूल्य बिछौने बिछे थे । उन सबसे वह अन्तःपुर सुसज्जित दिखायी देता था ॥ २० ॥
प्रविशन्नेव सततं श्रुश्राव मधुरस्वनम् । तन्त्रीगीतसमाकीर्णं समतालपदाक्षरम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
उसमें प्रवेश करते ही लक्ष्मणके कानोंमें संगीतकी मीठी तान सुनायी पड़ी, जो वहाँ निरन्तर गूँज रही थी । वीणाके लयपर कोई कोमल कण्ठसे गा रहा था । प्रत्येक पद और अक्षरका उच्चारण सम तालका प्रदर्शन करते हुए हो रहा था ॥ २१ ॥
बह्वीश्च विविधाकारा रूपयौवनगर्विताः । स्त्रियः सुग्रीवभवने ददर्श स महाबलः ॥ २२ ॥
भावार्थ
महाबली लक्ष्मणने सुग्रीवके उस अन्तःपुरमें अनेक रूप-रंगकी बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियाँ देखीं, जो रूप और यौवनके गर्वसे भरी हुई थीं ॥ २२ ॥
दृष्ट्वाभिजनसम्पन्नास्तत्र माल्यकृतस्रजः । वरमाल्यकृतव्यग्रा भूषणोत्तमभूषिताः ॥ २३ ॥ नातृप्तान् नातिचाव्यग्रान् नानुदात्तपरिच्छदान् । सुग्रीवानुचरांश्चापि लक्षयामास लक्ष्मणः ॥ २४ ॥
भावार्थ
वे सब-की-सब उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई थीं, फूलोंके गजरोंसे अलंकृत थीं, उत्तम पुष्पहारोंके निर्माणमें लगी हुई थीं और सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित थीं । उन सबको देखकर लक्ष्मणने सुग्रीवके सेवकोंपर भी दृष्टिपात किया, जो अतृप्त या असंतुष्ट नहीं थे । स्वामीके कार्य सिद्ध करनेके लिये अत्यन्त फुर्तीकी भी उनमें कमी नहीं थी तथा उनके वस्त्र और आभूषण भी निम्न श्रेणीके नहीं थे ॥ २३-२४ ॥
कूजितं नूपुराणां च काञ्चीनां निःस्वनं तथा । स निशम्य ततः श्रीमान् सौमित्रिर्लज्जितोऽभवत् ॥ २५ ॥
भावार्थ
नूपुरोंकी झनकार और करधनीकी खनखनाहट सुनकर श्रीमान् सुमित्राकुमार लज्जित हो गये ( परायी स्त्रियोंपर दृष्टि पड़नेके कारण उन्हें स्वभावतः संकोच हुआ ) ॥ २५ ॥
रोषवेगप्रकुपितः श्रुत्वा चाभरणस्वनम् । चकार ज्यास्वनं वीरो दिशः शब्देन पूरयन् ॥ २६ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् पुनः आभूषणोंकी झनकार सुनकर वीर लक्ष्मण रोषके आवेगसे और भी कुपित हो उठे और उन्होंने अपने धनुषपर टंकार दी, जिसकी ध्वनिसे समस्त दिशाएँ गूँज उठीं ॥ २६ ॥
चारित्रेण महाबाहुरपकृष्टः स लक्ष्मणः । तस्थावेकान्तमाश्रित्य रामकोपसमन्वितः ॥ २७ ॥
भावार्थ
रघुकुलोचित सदाचारका खयाल करके महाबाहु लक्ष्मण कुछ पीछे हट गये और एकान्तमें जाकर खड़े हो गये । श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धिके लिये वहाँ कोई प्रयत्न होता न देख वे मन-ही-मन कुपित हो रहे थे ॥ २७ ॥
तेन चापस्वनेनाथ सुग्रीवः प्लवगाधिपः । विज्ञायागमनं त्रस्तः स चचाल वरासनात् ॥ २८ ॥
भावार्थ
धनुषकी टंकार सुनकर वानरराज सुग्रीव समझ गये कि लक्ष्मण यहाँतक आ पहुँचे हैं । फिर तो वे भयसे संत्रस्त होकर अपना सिंहासन छोड़कर खड़े हो गये ॥ २८ ॥
अङ्गदेन यथा मह्यं पुरस्तात् प्रतिवेदितम् । सुव्यक्तमेष सम्प्राप्तः सौमित्रिर्भ्रातृवत्सलः ॥ २९ ॥
भावार्थ
वे मन-ही-मन सोचने लगे कि अङ्गदने पहले मुझे जैसा बताया था, उसके अनुसार ये भ्रातृवत्सल सुमित्राकुमार लक्ष्मण अवश्य ही यहाँ आ गये ॥ २९ ॥
अङ्गदेन समाख्यातो ज्यास्वनेन च वानरः । बुबुधे लक्ष्मणं प्राप्तं मुखं चास्य व्यशुष्यत ॥ ३० ॥
भावार्थ
अङ्गदके द्वारा उनके आगमनका समाचार तो उन्हें पहले ही मिल गया था । अब धनुषकी टंकारसे वानर सुग्रीवको इस बातका प्रत्यक्ष अनुभव हो गया कि लक्ष्मणने अवश्य यहाँ पदार्पण किया है । फिर तो उनका मुख सूख गया ॥ ३० ॥
ततस्तारां हरिश्रेष्ठः सुग्रीवः प्रियदर्शनाम् । उवाच हितमव्यग्रस्त्राससम्भ्रान्तमानसः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
भयके कारण वे मन-ही-मन घबरा उठे । ( लक्ष्मणके सामने जानेका उन्हें साहस न हुआ । ) तथापि किसी तरह धैर्य धारण करके वानरश्रेष्ठ सुग्रीव परम सुन्दरी तारासे हितकी बात बोले—॥ ३१ ॥
किं नु रुट्कारणं सुभ्रु प्रकृत्या मृदुमानसः । सरोष इव सम्प्राप्तो येनायं राघवानुजः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘सुन्दरी ! इनके रोषका क्या कारण हो सकता है ? जिससे स्वभावतः कोमल चित्त होनेपर भी ये श्रीरघुनाथजीके छोटे भाई रुष्ट-से होकर यहाँ पधारे हैं ॥ ३२ ॥
किं पश्यसि कुमारस्य रोषस्थानमनिन्दिते । न खल्वकारणे कोपमाहरेन्नरपुंगवः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘अनिन्दिते ! तुम्हारे देखनेमें कुमार लक्ष्मणके रोषका आधार क्या है ? ये मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं । अतः बिना किसी कारणके निश्चय ही क्रोध नहीं कर सकते ॥ ३३ ॥
यद्यस्य कृतमस्माभिर्बुध्यसे किंचिदप्रियम् । तद्बुद्ध्या सम्प्रधार्याशु क्षिप्रमेवाभिधीयताम् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘यदि हमलोगोंने इनका कोई अपराध किया हो और तुम्हें उसका पता हो तो अपनी बुद्धिसे विचारकर शीघ्र ही बताओ ॥ ३४ ॥
अथवा स्वयमेवैनं द्रष्टुमर्हसि भामिनि । वचनैः सान्त्वयुक्तैश्च प्रसादयितुमर्हसि ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘अथवा भामिनि ! तुम स्वयं ही जाकर लक्ष्मणको देखो और सान्त्वनायुक्त बातें कहकर उन्हें प्रसन्न करनेका प्रयत्न करो ॥ ३५ ॥
त्वद्दर्शने विशुद्धात्मा न स्म कोपं करिष्यति । नहि स्त्रीषु महात्मानः कचित् कुर्वन्ति दारुणम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘उनका हृदय शुद्ध है । तुम्हारे सामने वे क्रोध नहीं करेंगे; क्योंकि महात्मा पुरुष स्त्रियोंके प्रति कभी कठोर बर्ताव नहीं करते हैं ॥ ३६ ॥
त्वया सान्त्वैरुपक्रान्तं प्रसन्नेन्द्रियमानसम् । ततः कमलपत्राक्षं द्रक्ष्याम्यहमरिंदमम् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘जब तुम उनके पास जाकर मीठे वचनोंसे उन्हें शान्त कर दोगी और जब उनका मन स्वस्थ एवं इन्द्रियाँ प्रसन्न हो जायँगी; उस समय मैं उन शत्रुदमन कमलनयन लक्ष्मणका दर्शन करूँगा’ ॥ ३७ ॥
सा प्रस्खलन्ती मदविह्वलाक्षी प्रलम्बकाञ्चीगुणहेमसूत्रा । सलक्षणा लक्ष्मणसंनिधानं जगाम तारा नमिताङ्गयष्टिः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
सुग्रीवके ऐसा कहनेपर शुभलक्षणा तारा लक्ष्मणके पास गयी । उसका पतला शरीर स्वाभाविक संकोच एवं विनयसे झुका हुआ था । उसके नेत्र मदसे चञ्चल हो रहे थे, पैर लड़खड़ा रहे थे और उसकी करधनीके सुवर्णमय सूत्र लटक रहे थे ॥ ३८ ॥
स तां समीक्ष्यैव हरीशपत्नीं तस्थावुदासीनतया महात्मा । अवाङ्मुखोऽभून्मनुजेन्द्रपुत्रः स्त्रीसंनिकर्षाद् विनिवृत्तकोपः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
वानरराजकी पत्नी तारापर दृष्टि पड़ते ही राजकुमार महात्मा लक्ष्मण अपना मुँह नीचा करके उदासीन भावसे खड़े हो गये । स्त्रीके समीप होनेसे उनका क्रोध दूर हो गया ॥ ३९ ॥
सा पानयोगाच्च निवृत्तलज्जा दृष्टिप्रसादाच्च नरेन्द्रसूनोः । उवाच तारा प्रणयप्रगल्भं वाक्यं महार्थं परिसान्त्वरूपम् ॥ ४० ॥
भावार्थ
मधुपानके कारण ताराकी नारीसुलभ लज्जा निवृत्त हो गयी थी । उसे राजकुमार लक्ष्मणकी दृष्टिमें कुछ प्रसन्नताका आभास मिला । इसलिये उसने स्नेहजनित निर्भीकताके साथ महान् अर्थसे युक्त यह सान्त्वनापूर्ण बात कही-॥४०॥
किं कोपमूलं मनुजेन्द्रपुत्र कस्ते न संतिष्ठति वाङ्निदेशे । कः शुष्कवृक्षं वनमापतन्तं दावाग्निमासीदति निर्विशङ्कः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘राजकुमार ! आपके क्रोधका क्या कारण है ? कौन आपकी आज्ञाके अधीन नहीं है ? कौन निडर होकर सूखे वृक्षोंसे भरे हुए वनके भीतर चारों ओर फैलते हुए दावा-नलमें प्रवेश कर रहा है ?’ ॥ ४१ ॥
स तस्या वचनं श्रुत्वा सान्त्वपूर्वमशङ्कितः । भूयःप्रणयदृष्टार्थं लक्ष्मणो वाक्यमब्रवीत् ॥ ४२ ॥
भावार्थ
ताराके इस वचनमें सान्त्वना भरी थी । उसमें अधिक प्रेमपूर्वक हृदयका भाव प्रकट किया गया था । उसे सुनकर लक्ष्मणके हृदयकी आशङ्का जाती रही । वे कहने लगे— ॥ ४२ ॥
किमयं कामवृत्तस्ते लुप्तधर्मार्थसंग्रहः । भर्ता भर्तृहिते युक्ते न चैनमवबुध्यसे ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘अपने स्वामीके हितमें संलग्न रहनेवाली तारा ! तुम्हारा यह पति विषय-भोगमें आसक्त होकर धर्म और अर्थके संग्रहका लोप कर रहा है । क्या तुम्हें इसकी इस अवस्थाका पता नहीं है ? तुम इसे समझाती क्यों नहीं ? ॥ ४३ ॥
न चिन्तयति राज्यार्थं सोऽस्मान्शोकपरायणान् । सामात्यपरिषत् तारे कामेमेवोपसेवते ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘तारे ! सुग्रीव अपने राज्यकी स्थिरताके लिये ही प्रयास करता है । हमलोग शोकमें डूबे हुए हैं, परंतु हमारी इसे तनिक भी चिन्ता नहीं होती है । यह अपने मन्त्रियों तथा राज-सभाके सदस्योंसहित केवल विषय-भोगोंका ही सेवन कर रहा है ॥ ४४ ॥
स मासांश्चतुरः कृत्वा प्रमाणं प्लवगेश्वरः । व्यतीतांस्तान् मदोदग्रो विहरन् नावबुध्यते ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘वानरराज सुग्रीवने चार महीनोंकी अवधि निश्चित की थी । वे कभी बीत गये, परंतु वह मधुपानके मदसे अत्यन्त उन्मत्त होकर स्त्रियोंके साथ क्रीडा-विहार कर रहा है । उसे बीते हुए समयका पता ही नहीं है ॥ ४५ ॥
नहि धर्मार्थसिद्ध्यर्थं पानमेवं प्रशस्यते । पानादर्थश्च कामश्च धर्मश्च परिहीयते ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘धर्म और अर्थकी सिद्धिके निमित्त प्रयत्न करनेवाले पुरुषके लिये इस तरह मद्यपान अच्छा नहीं माना जाता है; क्योंकि मद्यपानसे अर्थ, धर्म और काम तीनोंका नाश होता है ॥ ४६ ॥
धर्मलोपो महांस्तावत् कृते ह्यप्रतिकुर्वतः । अर्थलोपश्च मित्रस्य नाशो गुणवतो महान् ॥ ४७ ॥
भावार्थ
‘मित्रके किये हुए उपकारका यदि अवसर आनेपर भी बदला न चुकाया जाय तो धर्मकी हानि तो होती ही है । गुणवान् मित्रके साथ मित्रताका नाता टूट जानेपर अपने अर्थकी भी बहुत बड़ी हानि उठानी पड़ती है ॥ ४७ ॥
मित्रं ह्यर्थगुणश्रेष्ठं सत्यधर्मपरायणम् । तद्द्वयं तु परित्यक्तं न तु धर्मे व्यवस्थितम् ॥ ४८ ॥
भावार्थ
‘मित्र दो प्रकारके होते हैं—एक तो अपने मित्रके अर्थसाधनमें तत्पर होता है और दूसरा सत्य एवं धर्मके ही आश्रित रहता है । तुम्हारे स्वामीने मित्रके दोनों ही गुणोंका परित्याग कर दिया है। वह न तो मित्रका कार्य सिद्ध करता है और न स्वयं ही धर्ममें स्थित है ॥ ४८ ॥
तदेवं प्रस्तुते कार्ये कार्यमस्माभिरुत्तरम् । तत् कार्ये कार्यतत्त्वज्ञे त्वमुदाहर्तुमर्हसि ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘ऐसी स्थितिमें प्रस्तुत कार्यकी सिद्धिके लिये हमलोगोंको भविष्यमें क्या करना चाहिये ? हमारे लिये जो समुचित कर्तव्य हो, उसे तुम्हीं बताओ; क्योंकि तुम कार्यके तत्त्वको जानती हो’ ॥ ४९ ॥
सा तस्य धर्मार्थसमाधियुक्तं निशाम्य वाक्यं मधुरस्वभावम् । तारा गतार्थे मनुजेन्द्रकार्ये विश्वासयुक्तं तमुवाच भूयः ॥ ५० ॥
भावार्थ
लक्ष्मणका वचन धर्म और अर्थके निश्चयसे संयुक्त था । उससे उनके मधुर स्वभावका परिचय मिल रहा था । उसे सुनकर तारा भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके कार्यके विषयमें, जिसका प्रयोजन उसे ज्ञात हो चुका था, पुनः लक्ष्मणसे विश्वासके योग्य बात बोली—॥ ५० ॥
न कोपकालः क्षितिपालपुत्र न चापि कोपः स्वजने विधेयः । त्वदर्थकामस्य जनस्य तस्य प्रमादमप्यर्हसि वीर सोढुम् ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘वीर राजकुमार ! यह क्रोध करनेका समय नहीं है । आत्मीय जनोंपर क्रोध करना भी नहीं चाहिये । सुग्रीवके मनमें सदा आपका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छा बनी रहती है । अतः यदि उनसे कोई भूल भी हो जाय तो उसे आपको क्षमा करना चाहिये ॥ ५१ ॥
कोपं कथं नाम गुणप्रकृष्टः कुमार कुर्यादपकृष्टसत्त्वे । कस्त्वद्विधः कोपवशं हि गच्छेत् सत्त्वावरुद्धस्तपसः प्रसूतिः ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘कुमार ! गुणोंमें श्रेष्ठ पुरुष किसी हीन गुणवाले प्राणीपर क्रोध कैसे कर सकता है ? जो सत्त्वगुणसे अवरुद्ध होनेके कारण शास्त्र-विपरीत व्यापारमें लग नहीं सकता, अतएव जो सद्विचारको जन्म देनेवाला है, वह आप-जैसा कौन पुरुष क्रोधके वशीभूत हो सकता है ? ॥ ५२ ॥
जानामि कोपं हरिवीरबन्धो- र्जानामि कार्यस्य च कालसङ्गम् । जानामि कार्यं त्वयि यत्कृतं न- स्तच्चापि जानामि यदत्र कार्यम् ॥ ५३ ॥
भावार्थ
‘वानरवीर सुग्रीवके मित्र भगवान् श्रीरामके क्रोधका कारण मैं जानती हूँ । उनके कार्यमें जो विलम्ब हुआ है, उससे भी मैं अपरिचित नहीं हूँ । सुग्रीवका जो कार्य आपके अधीन था और जिसे आपलोगोंने पूरा किया है, उसका भी मुझे पता है तथा इस समय जो आपका कार्य प्रस्तुत है, उसके विषयमें हमलोगोंका क्या कर्तव्य है, इसका भी मुझे अच्छी तरह ज्ञान है ॥ ५३ ॥
तच्चापि जानामि तथाविषह्यं बलं नरश्रेष्ठ शरीरजस्य । जानामि यस्मिंश्च जनेऽवबद्धं कामेन सुग्रीवमसक्तमद्य ॥ ५४ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! इस शरीरमें उत्पन्न हुए कामका जो असह्य बल है, उसको भी मैं जानती हूँ तथा उस कामद्वारा आबद्ध होकर सुग्रीव जहाँ आसक्त हो रहे हैं, वह भी मुझे मालूम है । साथ ही इस बातसे भी मैं परिचित हूँ कि कामासक्तिके कारण ही इन दिनों सुग्रीवका मन दूसरे किसी काममें नहीं लगता ॥ ५४ ॥
न कामतन्त्रे तव बुद्धिरस्ति त्वं वै यथा मन्युवशं प्रपन्नः । न देशकालौ हि यथार्थधर्मा- ववेक्षते कामरतिर्मनुष्यः ॥ ५५ ॥
भावार्थ
‘आप जो क्रोधके वशीभूत हो गये हैं, इससे जान पड़ता है कि कामके अधीन हुए पुरुषकी स्थितिका आपको बिल्कुल ज्ञान नहीं है, वानरकी तो बात ही क्या है ? कामासक्त मनुष्यको भी देश, काल, अर्थ और धर्मका ज्ञान नहीं रह जाता—उनकी ओर उसकी दृष्टि नहीं जाती है ॥५५॥
तं कामवृत्तं मम संनिकृष्टं कामाभियोगाच्च विमुक्तलज्जम् । क्षमस्व तावत् परवीरहन्त- स्त्वद्भ्रातरं वानरवंशनाथम् ॥ ५६ ॥
भावार्थ
‘विपक्षी वीरोंका विनाश करनेवाले राजकुमार ! वानरराज सुग्रीव विषय-भोगमें आसक्त होकर इस समय मेरे ही पास थे । कामके आवेशमें उन्होंने अपनी लज्जाका परित्याग कर दिया है, तो भी उन्हें अपना भाई समझकर क्षमा कीजिये ॥ ५६ ॥
महर्षयो धर्मतपोऽभिरामाः कामानुकामाः प्रतिबद्धमोहाः । अयं प्रकृत्या चपलः कपिस्तु कथं न सज्जेत सुखेषु राजा ॥ ५७ ॥
भावार्थ
‘जो निरन्तर धर्म और तपस्यामें ही संलग्न रहते हैं, जिन्होंने मोहको अवरुद्ध कर दिया है—अविवेकको दूर भगा दिया है, वे महर्षि भी कभी-कभी विषयाभिलाषी हो जाते हैं; फिर जो स्वभावसे ही चञ्चल वानर हैं, वह राजा सुग्रीव सुख-भोगमें क्यों न आसक्त हों ?’ ॥ ५७ ॥
इत्येवमुक्त्वा वचनं महार्थं सा वानरी लक्ष्मणमप्रमेयम् । पुनः सखेदं मदविह्वलाक्षी भर्तुर्हितं वाक्यमिदं बभाषे ॥ ५८ ॥
भावार्थ
अप्रमेय शक्तिशाली लक्ष्मणसे इस प्रकार महान् अर्थसे युक्त बात कहकर मदसे चञ्चल नेत्रवाली वानर-पत्नी ताराने पुनः खेदपूर्वक स्वामीके लिये यह हितकर वचन कहा–॥५८॥
उद्योगस्तु चिराज्ञप्तः सुग्रीवेण नरोत्तम । कामस्यापि विधेयेन तवार्थप्रतिसाधने ॥ ५९ ॥
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! यद्यपि सुग्रीव इस समय कामके गुलाम हो रहे हैं, तथापि इन्होंने आपका कार्य सिद्ध करनेके लिये बहुत पहलेसे ही उद्योग आरम्भ करनेकी आज्ञा दे रक्खी है ॥५९॥
आगता हि महावीर्या हरयः कामरूपिणः । कोटीः शतसहस्राणि नानानगनिवासिनः ॥ ६० ॥
भावार्थ
‘इसके फलस्वरूप इस समय विभिन्न पर्वतोंपर निवास करनेवाले लाखों और करोड़ों वानर, जो इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ एवं महान् पराक्रमी हैं, यहाँ उपस्थित हुए हैं ॥ ६० ॥
तदागच्छ महाबाहो चारित्रं रक्षितं त्वया । अच्छलं मित्रभावेन सतां दारावलोकनम् ॥ ६१ ॥
भावार्थ
‘महाबाहो ! ( दूसरेकी स्त्रियोंको देखना अनुचित समझ कर जो आप भीतर नहीं आये, बाहर ही खड़े रह गये— इसके द्वारा ) आपने सदाचारकी रक्षा की है; अतः अब भीतर आइये । मित्रभावसे स्त्रियोंकी ओर देखना ( उनके प्रति माता बहन आदिका भाव रखकर दृष्टि डालना ) सत्पुरुषोंके लिये अधर्म नहीं है’ ॥ ६१ ॥
तारया चाभ्यनुज्ञातस्त्वरया चापि चोदितः । प्रविवेश महाबाहुरभ्यन्तरमरिंदमः ॥ ६२ ॥
भावार्थ
ताराके आग्रह और कार्यकी जल्दीसे प्रेरित होकर शत्रुदमन महाबाहु लक्ष्मण सुग्रीवके महलके भीतर गये ॥६२॥
ततः सुग्रीवमासीनं काञ्चने परमासने । महार्हास्तरणोपेते ददर्शादित्यसंनिभम् ॥ ६३ ॥
भावार्थ
वहाँ जाकर उन्होंने देखा, एक सोनेके सिंहासनपर बहुमूल्य बिछौना बिछा है और वानरराज सुग्रीव सूर्यतुल्य तेजस्वी रूप धारण किये उसके ऊपर विराजमान हैं ॥ ६३ ॥
दिव्याभरणचित्राङ्गं दिव्यरूपं यशस्विनम् । दिव्यमाल्याम्बरधरं महेन्द्रमिव दुर्जयम् ॥ ६४ ॥
भावार्थ
उस समय दिव्य आभूषणोंके कारण उनके शरीरकी विचित्र शोभा हो रही थी । दिव्यरूपधारी यशस्वी सुग्रीव दिव्य मालाएँ और दिव्य वस्त्र धारण करके दुर्जय वीर देवराज इन्द्रके समान दिखायी दे रहे थे ॥ ६४॥
दिव्याभरणमाल्याभिः प्रमदाभिः समावृतम् । संरक्तनयनः क्रोधाद्बभूवान्तकसंनिभः ॥ ६५ ॥
भावार्थ
दिव्य आभूषणों और मालाओंसे अलंकृत युवती स्त्रियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़ी थीं । उन्हें इस अवस्थामें देख लक्ष्मणके नेत्र रोषावेशके कारण लाल हो गये । वे उस समय यमराजके समान भयंकर प्रतीत होने लगे ॥ ६५ ॥
रुमां तु वीरः परिरभ्य गाढं वरासनस्थो वरहेमवर्णः । ददर्श सौमित्रिमदीनसत्त्वं विशालनेत्रः स विशालनेत्रम् ॥ ६६ ॥
भावार्थ
सुन्दर सुवर्णके समान कान्ति और विशाल नेत्रवाले वीर सुग्रीव अपनी पत्नी रुमाको गाढ आलिङ्गन-पाशमें बाँधे हुए एक श्रेष्ठ आसनपर विराजमान थे । उसी अवस्थामें उन्होंने उदार हृदय और विशाल नेत्रवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणको देखा ॥ ६६ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें