किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 34
तमप्रतिहतं क्रुद्धं प्रविष्टं पुरुषर्षभम् । सुग्रीवो लक्ष्मणं दृष्ट्वा बभूव व्यथितेन्द्रियः ॥ १ ॥
भावार्थ
लक्ष्मण बेरोक-टोक भीतर घुस आये थे । उन पुरुष-शिरोमणिको क्रोधसे भरा देख सुग्रीवकी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं ॥ १ ॥
क्रुद्धं निःश्वसमानं तं प्रदीप्तमिव तेजसा । भ्रातुर्व्यसनसंतप्तं दृष्ट्वा दशरथात्मजम् ॥ २ ॥ उत्पपात हरिश्रेष्ठो हित्वा सौवर्णमासनम् । महान् महेन्द्रस्य यथा स्वलंकृत इव ध्वजः ॥ ३ ॥
भावार्थ
दशरथपुत्र लक्ष्मण शेषपूर्वक लंबी साँस खींच रहे थे और तेजसे प्रज्वलित-से जान पड़ते थे । अपने भाईके कष्टसे उनके मनमें बड़ा संताप था । उन्हें सामने आया देख वानरश्रेष्ठ सुग्रीव सुवर्णका सिंहासन छोड़कर कूद पड़े, मानो देवराज इन्द्रका भलीभाँति सजाया हुआ महान् ध्वज आकाशसे पृथ्वीपर उतर आया हो ॥ २-३ ॥
उत्पतन्तमनूत्पेतू रुमाप्रभृतयः स्त्रियः । सुग्रीवं गगने पूर्णं चन्द्रं तारागणा इव ॥ ४ ॥
भावार्थ
सुग्रीवके उतरते ही रुमा आदि स्त्रियाँ भी उनके पीछे उस सिंहासनसे उतरकर खड़ी हो गयीं । जैसे आकाशमें पूर्ण चन्द्रमाका उदय होनेपर तारोंके समुदाय भी उदित हो गये हों ॥ ४ ॥
संरक्तनयनः श्रीमान् संचचार कृताञ्जलिः । बभूवावस्थितस्तत्र कल्पवृक्षो महानिव ॥ ५ ॥
भावार्थ
श्रीमान् सुग्रीवके नेत्र मदसे लाल हो रहे थे । वे टहलते हुए लक्ष्मणके पास आये और हाथ जोड़कर खड़े हो गये । लक्ष्मण वहाँ महान् कल्पवृक्षके समान स्थित थे ॥५॥
रुमाद्वितीयं सुग्रीवं नारीमध्यगतं स्थितम् । अब्रवील्लक्ष्मणः क्रुद्धः सतारं शशिनं यथा ॥ ६ ॥ सत्त्वाभिजनसम्पन्नः सानुक्रोशो जितेन्द्रियः । कृतज्ञः सत्यवादी च राजा लोके महीयते ॥ ७ ॥
भावार्थ
सुग्रीवके साथ उनकी पत्नी रुमा भी थी । वे स्त्रियोंके बीचमें खड़े होकर तारिकाओंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति शोभा पाते थे । उन्हें देखकर लक्ष्मणने क्रोधपूर्वक कहा—॥ ‘वानरराज ! धैर्यवान्, कुलीन, दयालु, जितेन्द्रिय और सत्यवादी राजाका ही संसारमें आदर होता है ॥ ७ ॥
यस्तु राजा स्थितोऽधर्मे मित्राणामुपकारिणाम् । मिथ्या प्रतिज्ञां कुरुते को नृशंसतरस्ततः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘जो राजा अधर्ममें स्थित होकर उपकारी मित्रोंके सामने की हुई अपनी प्रतिज्ञाको झूठी कर देता है, उससे बढ़कर अत्यन्त क्रूर कौन होगा ? ॥ ८ ॥
शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं तु गवानृते । आत्मानं स्वजनं हन्ति पुरुषः पुरुषानृते ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘अश्वदानकी प्रतिज्ञा करके उसकी पूर्ति न करनेपर ‘अश्वानृत’ ( अश्वविषयक असत्य ) नामक पाप होता है । यह पाप बन जानेपर मनुष्य सौ अश्वोंकी हत्याके पापका भागी होता है । इसी प्रकार गोदानविषयक प्रतिज्ञाको मिथ्या कर देनेपर सहस्र गौओंके वधका पाप लगता है तथा किसी पुरुषके समक्ष उसका कार्य पूर्ण कर देनेकी प्रतिज्ञा करके जो उसकी पूर्ति नहीं करता है, वह पुरुष आत्मघात और स्वजन-वधके पापका भागी होता है ( फिर जो परम पुरुष श्रीरामके समक्षकी हुई प्रतिज्ञाको मिथ्या करता है, उसके पापकी कोई इयत्ता नहीं हो सकती ) ॥९॥
पूर्वं कृतार्थो मित्राणां न तत्प्रतिकरोति यः । कृतघ्नः सर्वभूतानां स वध्यः प्लवगेश्वर ॥ १० ॥
भावार्थ
‘वानरराज ! जो पहले मित्रोंके द्वारा अपना कार्य सिद्ध करके बदलेमें उन मित्रोंका कोई उपकार नहीं करता है, वह कृतघ्न एवं सब प्राणियोंके लिये वध्य है ॥ १० ॥
गीतोऽयं ब्रह्मणा श्लोकः सर्वलोकनमस्कृतः । दृष्ट्वा कृतघ्नं क्रुद्धेन तन्निबोध प्लवंगम ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘कपिराज ! किसी कृतघ्नको देखकर कुपित हुए ब्रह्माजीने सब लोगोंके लिये आदरणीय यह एक श्लोक कहा है, इसे सुनो ॥ ११ ॥
गोघ्ने चैव सुरापे च चौरे भग्नव्रते तथा । निष्कृतिर्विहिता सद्भिः कृतघ्ने नास्ति निष्कृतिः ॥१२॥
भावार्थ
‘गोहत्यारे, शराबी, चोर और व्रत भंग करनेवाले पुरुषके लिये सत्पुरुषोंने प्रायश्चित्तका विधान किया है; किंतु कृतघ्नके उद्धारका कोई उपाय नहीं है ॥ १२ ॥
अनार्यस्त्वं कृतघ्नश्च मिथ्यावादी च वानर । पूर्वं कृतार्थो रामस्य न तत्प्रतिकरोषि यत् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘वानर ! तुम अनार्य, कृतघ्न और मिथ्यावादी हो; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजीकी सहायतासे तुमने पहले अपना काम तो बना लिया, किंतु जब उनके लिये सहायता करनेका अवसर आया, तब तुम कुछ नहीं करते ॥ १३ ॥
ननु नाम कृतार्थेन त्वया रामस्य वानर । सीताया मार्गणे यत्नः कर्तव्यः कृतमिच्छता ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘वानर ! तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो चुका है; अतः अब तुम्हें प्रत्युपकारकी इच्छासे श्रीरामकी पत्नी सीताकी खोजके लिये प्रयत्न करना चाहिये ॥ १४ ॥
स त्वं ग्राम्येषु भोगेषु सक्तो मिथ्याप्रतिश्रवः । न त्वां रामो विजानीते सर्पं मण्डूकराविणम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘परंतु तुम्हारी दशा यह है कि अपनी प्रतिज्ञाको झूठी करके ग्राम्यभोगोंमें आसक्त हो रहे हो । श्रीरामचन्द्रजी यह नहीं जानते हैं कि तुम मेढककी-सी बोली बोलनेवाले सर्प हो ( जैसे साँप अपने मुँहमें किसी मेढकको जब दबा लेता है, तब केवल मेढक ही बोलता है, दूसरे लोग उसे मेढक ही समझते हैं; परंतु वह वास्तवमें सर्प होता है । वही दशा तुम्हारी है । तुम्हारी बातें कुछ और हैं और स्वरूप कुछ और ) ॥ १५ ॥
महाभागेन रामेण पापः करुणवेदिना । हरीणां प्रापितो राज्यं त्वं दुरात्मा महात्मना ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘महाभाग श्रीरामचन्द्रजी परम महात्मा तथा दयासे द्रवित हो जानेवाले हैं; अतएव उन्होंने तुम-जैसे पापी और दुरात्माको भी वानरोंके राज्यपर बिठा दिया ॥ १६ ॥
कृतं चेन्नातिजानीषे राघवस्य महात्मनः । सद्यस्त्वं निशितैर्बाणैर्हतो द्रक्ष्यसि वालिनम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘यदि तुम महात्मा रघुनाथजीके किये हुए उपकारको नहीं समझोगे तो शीघ्र ही उनके तीखे बाणोंसे मारे जाकर वालीका दर्शन करोगे ॥ १७ ॥
न स संकुचितः पन्था येन वाली हतो गतः । समये तिष्ठ सुग्रीव मा वालिपथमन्वगाः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘सुग्रीव ! वाली मारा जाकर जिस रास्तेसे गया है, वह आज भी बंद नहीं हुआ है । इसलिये तुम अपनी प्रतिज्ञापर डटे रहो । वालीके मार्गका अनुसरण न करो ॥ १८ ॥
न नूनमिक्ष्वाकुवरस्य कार्मुका- च्छरांश्च तान् पश्यसि वज्रसंनिभान् । ततः सुखं नाम विषेवसे सुखी न रामकार्यं मनसाप्यवेक्षसे ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीके धनुषसे छूटे हुए उन वज्रतुल्य बाणोंकी ओर निश्चय ही तुम्हारी दृष्टि नहीं जा रही है । इसीलिये तुम ग्राम्य सुखका सेवन कर रहे हो और उसीमें सुख मानकर श्रीरामचन्द्रजीके कार्यका मनसे भी विचार नहीं करते हो’ ॥ १९ ॥
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