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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 32

अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा सुग्रीवः सचिवैः सह । लक्ष्मणं कुपितं श्रुत्वा मुमोचासनमात्मवान् ॥ १ ॥

भावार्थ

मन्त्रियोंसहित अङ्गदका वचन सुनकर और लक्ष्मणके कुपित होनेका समाचार पाकर मनको वशमें रखनेवाले सुग्रीव आसन छोड़कर खड़े हो गये ॥ १ ॥

स च तानब्रवीद् वाक्यं निश्चित्य गुरुलाघवम् । मन्त्रज्ञान् मन्त्रकुशलो मन्त्रेषु परिनिष्ठितः ॥ २ ॥

भावार्थ

वे मन्त्रणा ( कर्तव्यविषयक विचार ) के परिनिष्ठित विद्वान् होनेके कारण मन्त्रप्रयोगमें अत्यन्त कुशल थे । उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीकी महत्ता और अपनी लघुताका विचार करके मन्त्रज्ञ मन्त्रियोंसे कहा—॥ २ ॥

न मे दुर्व्याहृतं किञ्चिन्नापि मे दुरनुष्ठितम् । लक्ष्मणो राघवभ्राता क्रुद्धः किमिति चिन्तये ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘मैंने न तो कोई अनुचित बात मुँहसे निकाली है और न कोई बुरा काम ही किया है । फिर श्रीरघुनाथजीके भ्राता लक्ष्मण मुझपर कुपित क्यों हुए हैं ! इस बातपर मैं बारंबार विचार करता हूँ ॥ ३ ॥

असुहृद्भिर्ममामित्रैर्नित्यमन्तरदर्शिभिः । मम दोषानसम्भूताञ्श्रावितो राघवानुजः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘जो सदा मेरे छिद्र देखनेवाले हैं तथा जिनका हृदय मेरे प्रति शुद्ध नहीं है, उन शत्रुओंने निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीके छोटे भाई लक्ष्मणसे मेरे ऐसे दोष सुनाये हैं जो मेरे भीतर कभी प्रकट नहीं हुए थे ॥ ४ ॥

अत्र तावद् यथाबुद्धिः सर्वैरेव यथाविधि । भावस्य निश्चयस्तावद् विज्ञेयो निपुणं शनैः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘लक्ष्मणके कोपके विषयमें पहले तुम सब लोगोंको धीरे-धीरे कुशलतापूर्वक उनके मनोभावका विधिवत् निश्चय कर लेना चाहिये, जिससे उनके कोपके कारणका यथार्थरूपसे ज्ञान हो जाय ॥ ५ ॥

न खल्वस्ति मम त्रासो लक्ष्मणान्नापि राघवात् । मित्रं खस्थानकुपितं जनयत्येव सम्भ्रमम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘अवश्य ही मुझे लक्ष्मणसे तथा श्रीरघुनाथजीसे कोई भय नहीं है, तथापि बिना अपराधके कुपित हुआ मित्र हृदयमें घबराहट उत्पन्न कर ही देता है ॥ ६ ॥

सर्वथा सुकरं मित्रं दुष्करं प्रतिपालनम् । अनित्यत्वात् तु चित्तानां प्रीतिरल्पेऽपि भिद्यते ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘किसीको मित्र बना लेना सर्वथा सुकर है, परंतु उस मैत्रीको पालना या निभाना बहुत ही कठिन है; क्योंकि मनका भाव सदा एक-सा नहीं रहता । किसीके द्वारा थोड़ी-सी भी चुगली कर दी जानेपर प्रेममें अन्तर आ जाता है ॥ ७ ॥

अतोनिमित्तं त्रस्तोऽहं रामेण तु महात्मना । यन्ममोपकृतं शक्यं प्रतिकर्तुं न तन्मया ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘इसी कारण मैं और भी डर गया हूँ; क्योंकि महात्मा श्रीरामने मेरा जो उपकार किया है, उसका बदला चुकानेकी मुझमें शक्ति नहीं है’ ॥ ८ ॥

सुग्रीवेणैवमुक्ते तु हनूमान् हरिपुंगवः । उवाच स्वेन तर्केण मध्ये वानरमन्त्रिणाम् ॥ ९ ॥

भावार्थ

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर वानरोंमें श्रेष्ठ हनुमान्जी अपनी युक्तिका सहारा लेकर वानरमन्त्रियोंके बीचमें बोले—॥ ९ ॥

सर्वथा नैतदाश्चर्यं यत् त्वं हरिगणेश्वर । न विस्मरसि सुस्निग्धमुपकारं कृतं शुभम् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘कपिराज ! मित्रके द्वारा अत्यन्त स्नेहपूर्वक किये गये उत्तम उपकारको जो आप भूल नहीं रहे हैं, इसमें सर्वथा कोई आश्चर्यकी बात नहीं है ( क्योंकि अच्छे पुरुषोंका ऐसा स्वभाव ही होता है ) ॥ १० ॥

राघवेण तु वीरेण भयमुत्सृज्य दूरतः । त्वत्प्रियार्थं हतो वाली शक्रतुल्यपराक्रमः ॥ ११ ॥ सर्वथा प्रणयात् क्रुद्धो राघवो नात्र संशयः । भ्रातरं सम्प्रहितवाँल्लक्ष्मणं लक्ष्मिवर्धनम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘वीरवर श्रीरघुनाथजीने तो लोकापवादके भयको दूर हटाकर आपका प्रिय करनेके लिये इन्द्रतुल्य पराक्रमी वालीका वध किया है; अतः वे निःसंदेह आपपर कुपित नहीं हैं । श्रीरामचन्द्रजीने शोभा-सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाले अपने भाई लक्ष्मणको जो आपके पास भेजा है, इसमें सर्वथा आपके प्रति उनका प्रेम ही कारण है ॥ ११-१२ ॥

त्वं प्रमत्तो न जानीषे कालं कालविदां वर । फुल्लसप्तच्छदश्यामा प्रवृत्ता तु शरच्छुभा ॥ १३ ॥ निर्मलग्रहनक्षत्रा द्यौः प्रणष्टबलाहका । प्रसन्नाश्च दिशः सर्वाः सरितश्च सरांसि च ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘समयका ज्ञान रखनेवालोंमें श्रेष्ठ कपिराज ! आपने सीताकी खोज करनेके ऽिये जो समय निश्चित किया था, उसे आप इन दिनों प्रमादमें पड़ जानेके कारण भूल गये हैं । देखिये न, यह सुन्दर शरद्-ऋतु आरम्भ हो गयी है, जो खिले हुए छितवनके फूलोंसे श्यामवर्णकी प्रतीत होती है॥ ‘आकाशमें अब बादल नहीं रहे । ग्रह, नक्षत्र निर्मल दिखायी देते हैं । सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश छा गया है तथा नदियों और सरोवरोंके जल पूर्णतः स्वच्छ हो गये हैं ॥१४॥

प्राप्तमुद्योगकालं तु नावैषि हरिपुंगव । त्वं प्रमत्त इति व्यक्तं लक्ष्मणोऽयमिहागतः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘वानरराज ! राजाओंके लिये विजय-यात्राकी तैयारी करनेका समय आ गया है; किंतु आपको कुछ पता ही नहीं है । इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि आप प्रमादमें पड़ गये हैं । इसीलिये लक्ष्मण यहाँ आये हैं ॥ १५ ॥

आर्तस्य हृतदारस्य परुषं पुरुषान्तरात् । वचनं मर्षणीयं ते राघवस्य महात्मनः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘महात्मा श्रीरामचन्द्रजीकी पत्नीका अपहरण हुआ है, इसलिये वे बहुत दुखी हैं । अतः यदि लक्ष्मणके मुखसे उनका कठोर वचन भी सुनना पड़े तो आपको चुपचाप सह लेना चाहिये ॥ १६ ॥

कृतापराधस्य हि ते नान्यत् पश्याम्यहं क्षमम् । अन्तरेणाञ्जलिं बद्ध्वा लक्ष्मणस्य प्रसादनात् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘आपकी ओरसे अपराध हुआ है । अतः हाथ जोड़कर लक्ष्मणको प्रसन्न करनेके सिवा आपके लिये और कोई उचित कर्तव्य मैं नहीं देखता ॥ १७ ॥

नियुक्तैर्मन्त्रिभिर्वाच्यो ह्यवश्यं पार्थिवो हितम् । इत एव भयं त्यक्त्वा ब्रवीम्यवधूतं वचः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘राज्यकी भलाईके कामपर नियुक्त हुए मन्त्रियोंका यह कर्तव्य है कि राजाको उसके हितकी बात अवश्य बतावें । अतएव मैं भय छोड़कर अपना निश्चित विचार बता रहा हूँ ॥ ॥ १८ ॥

अभिक्रुद्धः समर्थो हि चापमुद्यम्य राघवः । सदेवासुरगन्धर्वं वशे स्थापयितुं जगत् ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘भगवान् श्रीराम यदि क्रोध करके धनुष हाथमें ले लें तो देवता-असुर-गन्धर्वोंसहित सम्पूर्ण जगत्को अपने वशमें कर सकते हैं ॥ १९ ॥

न स क्षमः कोपयितुं यः प्रसाद्यः पुनर्भवेत् । पूर्वोपकारं स्मरता कृतज्ञेन विशेषतः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘जिसे पीछे हाथ जोड़कर मनाना पड़े, ऐसे पुरुषको क्रोध दिलाना कदापि उचित नहीं है । विशेषतः वह पुरुष जो मित्रके किये हुए पहले उपकारको याद रखता हो और कृतज्ञ हो, इस बातका अधिक ध्यान रखे ॥ २० ॥

तस्य मूर्ध्ना प्रणम्य त्वं सपुत्रः ससुहृज्जनः । राजंस्तिष्ठ स्वसमये भर्तुर्भार्येव तद्वशे ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! इसलिये आप पुत्र और मित्रोंके साथ मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम कीजिये और अपनी प्रतिज्ञापर अटल रहिये । जैसे पत्नी अपने पतिके वशमें रहती है, उसी प्रकार आप सदा श्रीरामचन्द्रजीके अधीन रहिये ॥ २१ ॥

न रामरामानुजशासनं त्वया कपीन्द्र युक्तं मनसाप्यपोहितुम् । मनो हि ते ज्ञास्यति मानुषं बलं सराघवस्यास्य सुरेन्द्रवर्चसः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘वानरराज ! श्रीराम और लक्ष्मणके आदेशकी आपको मनसे भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये । देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीके अलौलिक बलका ज्ञान तो आपके मनको है ही’ ॥ २२ ॥

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