किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 25
स सुग्रीवं च तारां च साङ्गदां सहलक्ष्मणः। समानशोकः काकुत्स्थः सान्त्वयन्निदमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीव आदिके शोकसे उनके समान ही दुखी थे । उन्होंने सुग्रीव, अङ्गद और ताराको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
न शोकपरितापेन श्रेयसा युज्यते मृतः। यदत्रानन्तरं कार्यं तत् समाधातुमर्हथ ॥ २ ॥
भावार्थ
‘शोक-संताप करनेसे मरे हुए जीवकी कोई भलाई नहीं होती । अतः अब आगे जो कुछ कर्तव्य है, उसको तुम्हें विधिपूर्वक सम्पन्न करना चाहिये ॥ २ ॥
लोकवृत्तमनुष्ठेयं कृतं वो बाष्पमोक्षणम् । न कालादुत्तरं किंचित् कर्म शक्यमुपासितुम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘तुम सब लोग बहुत आँसू बहा चुके । अब उसकी आवश्यकता नहीं है । लोकाचारका भी पालन होना चाहिये । समय बिताकर कोई भी विहित कर्म नहीं किया जा सकता ( क्योंकि उचित समयपर न किया जाय तो उस कर्मका कोई फल नहीं होता )॥ ३ ॥
नियतिः कारणं लोके नियतिः कर्मसाधनम् । नियतिः सर्वभूतानां नियोगेष्विह कारणम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘जगत्में नियति ( काल ) ही सबका कारण है । वही समस्त कर्मोंका साधन है और काल ही समस्त प्राणियोंको विभिन्न कर्मोंमें नियुक्त करनेका कारण है ( क्योंकि वही सबका प्रवर्तक है ) ॥ ४ ॥
न कर्ता कस्यचित् कश्चिन्नियोगे नापि चेश्वरः। स्वभावे वर्तते लोकस्तस्य कालः परायणम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘कोई भी पुरुष न तो स्वतन्त्रतापूर्वक किसी कामको कर सकता है और न किसी दूसरेको ही उसमें लगानेकी शक्ति रखता है । सारा जगत् स्वभावके अधीन है और स्वभावका आधार काल है ॥ ५ ॥
न कालः कालमत्येति न कालः परिहीयते। स्वभावं च समासाद्य न कश्चिदतिवर्तते ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘काल भी कालका ( अपनी की हुई व्यवस्थाका ) उल्लङ्घन नहीं कर सकता । वह काल कभी क्षीण नहीं होता । स्वभाव ( प्रारब्धकर्म ) को पाकर कोई भी उसका उल्लङ्घन नहीं करता ॥ ६ ॥
न कालस्यास्ति बन्धुत्वं न हेतुर्न पराक्रमः। न मित्रज्ञातिसम्बन्धः कारणं नात्मनो वशः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘कालका किसीके साथ भाई-चारेका, मित्रताका अथवा जाति-बिरादरीका सम्बन्ध नहीं है । उसको वशमें करनेका कोई उपाय नहीं है तथा उसपर किसीका पराक्रम नहीं चल सकता । कारणस्वरूप भगवान् काल जीवके भी वशमें नहीं है ॥ ७ ॥
किं तु कालपरीणामो द्रष्टव्यः साधु पश्यता। धर्मश्चार्थश्च कामश्च कालक्रमसमाहिताः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘अतः साधुदर्शी विवेकी पुरुषको सब कुछ कालका ही परिणाम समझना चाहिये । धर्म, अर्थ और काम भी कालक्रमसे ही प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥
इतः स्वां प्रकृतिं वाली गतः प्राप्तः क्रियाफलम् । सामदानार्थसंयोगैः पवित्रं प्लवगेश्वरः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘( मेरे द्वारा मारे जानेके कारण ) वानरराज वाली शरीरसे मुक्त हो अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुए हैं । नीतिशास्त्रके अनुकूल साम, दान और अर्थके समुचित प्रयोगसे मिलनेवाले जो पवित्र कर्म हैं, वे सभी उन्हें प्राप्त हो गये ॥ ९ ॥
स्वधर्मस्य च संयोगाज्जितस्तेन महात्मना। स्वर्गः परिगृहीतश्च प्राणानपरिरक्षता ॥ १० ॥
भावार्थ
‘महात्मा वालीने पहले अपने धर्मके संयोगसे जिसपर विजय पायी थी, उसी स्वर्गको इस समय युद्धमें प्राणोंकी रक्षा न करके उन्होंने अपने हाथमें कर लिया है ॥ १० ॥
एषा वै नियतिः श्रेष्ठा यां गतो हरियूथपः। तदलं परितापेन प्राप्तकालमुपास्यताम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘यही सर्वश्रेष्ठ गति है, जिसे वानरोंके सरदार वालीने प्राप्त किया है । अतः अब उनके लिये शोक करना व्यर्थ है । इस समय तुम्हारे सामने जो कर्तव्य उपस्थित है, उसे पूरा करो’ ॥ ११ ॥
वचनान्ते तु रामस्य लक्ष्मणः परवीरहा । अवदत् प्रश्रितं वाक्यं सुग्रीवं गतचेतसम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीकी बात समाप्त होनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने, जिनकी विवेकशक्ति नष्ट हो गयी थी, उन सुग्रीवसे नम्रतापूर्वक इस प्रकार कहा—॥ १२ ॥
कुरु त्वमस्य सुग्रीव प्रेतकार्यमनन्तरम् । ताराङ्गदाभ्यां सहितो वालिनो दहनं प्रति ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘सुग्रीव ! अब तुम अङ्गद और तारांके साथ रहकर वालीके दाह-संस्कार-सम्बन्धी प्रेतकार्य करो ॥ १३ ॥
समाज्ञापय काष्ठानि शुष्काणि च बहूनि च । चन्दनानि च दिव्यानि वालिसंस्कारकारणात् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘सेवकोंको आज्ञा दो–वे वालीके दाह-संस्कारके निमित्त प्रचुर मात्रामें सूखी लकड़ियाँ और दिव्य चन्दन ले आवें ॥ १४ ॥
समाश्वासय दीनं त्वमङ्गदं दीनचेतसम् । मा भूर्बालिशबुद्धिस्त्वं त्वदधीनमिदं पुरम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘अङ्गदका चित्त बहुत दुखी हो गया है । इन्हें धैर्य बँधाओ । तुम अपने मनमें मूढ़ता न लाओ–किंकर्तव्यविमूढ़ न बनो; क्योंकि यह सारा नगर तुम्हारे ही अधीन है ॥१५॥
अङ्गदस्त्वानयेन्माल्यं वस्त्राणि विविधानि च । घृतं तैलमथो गन्धान् यच्चात्र समनन्तरम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘अङ्गद पुष्पमाला, नाना प्रकारके वस्त्र, घी, तेल, सुगन्धित पदार्थ तथा अन्य सामान, जिनकी अभी आवश्यकता है, स्वयं ले आवें ॥ १६ ॥
त्वं तार शिबिकां शीघ्रमादायागच्छ सम्भ्रमात् । त्वरा गुणवती युक्ता ह्यस्मिन् काले विशेषतः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘तार ! तुम शीघ्र जाकर वेगपूर्वक एक पालकी ले आओ; क्योंकि इस समय अधिक स्फूर्ति दिखानी चाहिये । ऐसे अवसरपर वही लाभदायक होती है ॥ १७ ॥
सज्जीभवन्तु प्लवगाः शिबिकावाहनोचिताः । समर्था बलिनश्चैव निर्हरिष्यन्ति वालिनम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘पालकीको उठाकर ले चलनेके योग्य जो बलवान् एवं समर्थ वानर हों, वे तैयार हो जायँ । वे ही वालीको यहाँसे श्मशानभूमिमें ले चलेंगे’ ॥१८॥
एवमुक्त्वा तु सुग्रीवं सुमित्रानन्दवर्धनः । तस्थौ भ्रातृसमीपस्थो लक्ष्मणः परवीरहा ॥ १९ ॥
भावार्थ
सुग्रीवसे ऐसा कहकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुमित्रानन्दन लक्ष्मण अपने भाईके पास जाकर खड़े हो गये ॥१९॥
लक्ष्मणस्य वचः श्रुत्वा तारः सम्भ्रान्तमानसः । प्रविवेश गुहां शीघ्रं शिबिकासक्तमानसः ॥ २० ॥
भावार्थ
लक्ष्मणकी बात सुनकर तारके मनमें हड़बड़ी मच गयी । वह शिबिका ले आनेके लिये शीघ्रतापूर्वक किष्किन्धा नामक गुफामें गया ॥ २० ॥
आदाय शिबिकां तारः स तु पर्यापतत् पुनः । वानरैरुह्यमानां तां शूरैरुद्वहनोचितैः ॥ २१ ॥
भावार्थ
वहाँसे शिबिका ढोनेके योग्य शूरवीर वानरोंद्वारा कंधोंपर उठायी हुई उस शिबिकाको साथ लेकर तार फिर तुरंत ही लौट आया ॥ २१ ॥
दिव्यां भद्रासनयुतां शिबिकां स्यन्दनोपमाम् । पक्षिकर्मभिराचित्रां द्रुमकर्मविभूषिताम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
वह दिव्य पालकी रथके समान बनी हुई थी । उसके बीचमें राजाके बैठने योग्य उत्तम आसन था । उसमें शिल्पियोंद्वारा कृत्रिम पक्षी और वृक्ष बनाये गये थे, जो उस पालकीको विचित्र शोभासे सम्पन्न बना रहे थे ॥ २२ ॥
आचितां चित्रपत्तीभिः सुनिविष्टां समन्ततः । विमानमिव सिद्धानां जालवातायनायुताम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
वह शिबिका चित्रके रूपमें बने हुए पैदल सिपाहियोंसे भरी प्रतीत होती थी । उसकी निर्माणकला सब ओरसे बड़ी सुन्दर दिखायी देती थी । देखनेमें वह सिद्धोंके विमान-सी प्रतीत होती थी । उसमें कई खिड़कियाँ बनी थीं, जिनमें जालियाँ लगी हुई थीं ॥ २३ ॥
सुनियुक्तां विशालां च सुकृतां शिल्पिभिः कृताम् । दारुपर्वतकोपेतां चारुकर्मपरिष्कृताम् ॥ २४ ॥
भावार्थ
कारीगरोंने उस पालकीको बहुत सुन्दर बनानेका प्रयत्न किया था । उसका एक-एक भाग बड़ा सुघड़ बनाया गया था । आकारमें वह बहुत बड़ी थी । उसमें लकड़ियोंके क्रीडा-पर्वत बने हुए थे । वह मनोहर शिल्प-कर्मसे सुशोभित थी ॥२४॥
वराभरणहारैश्च चित्रमाल्योपशोभिताम् । गुहागहनसंछन्नां रक्तचन्दनभूषिताम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
सुन्दर आभूषण और हारोंसे उसको सजाया गया था । विचित्र फूलोंसे उसकी शोभा बढ़ायी गयी थी । शिल्पियोंद्वारा निर्मित गुफा और वनसे वह संयुक्त थी तथा लाल चन्दनद्वारा उसे विभूषित किया गया था ॥ २५ ॥
पुष्पौघैः समभिच्छन्नां पद्ममालाभिरेव च । तरुणादित्यवर्णाभिर्भ्राजमानाभिरावृताम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
नाना प्रकारके पुष्पसमूहोंद्वारा वह सब ओरसे आच्छादित थी तथा प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिवाली दीप्तिमती पद्ममालाओंसे अलंकृत थी ॥ २६ ॥
ईदृशीं शिबिकां दृष्ट्वा रामो लक्ष्मणमब्रवीत् । क्षिप्रं विनीयतां वाली प्रेतकार्यं विधीयताम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
ऐसी पालकीका अवलोकन करके श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणकी ओर देखते हुए कहा—‘अब वालीको शीघ्र ही यहाँसे श्मशानभूमिमें ले जाया जाय और उनका प्रेतकार्य किया जाय’ ॥ २७ ॥
ततो वालिनमुद्यम्य सुग्रीवः शिबिकां तदा । आरोपयत विक्रोशन्नङ्गदेन सहैव तु ॥ २८ ॥
भावार्थ
तब अङ्गदके साथ करुण-क्रन्दन करते हुए सुग्रीवने वालीके शवको उठाकर उस शिबिकामें रक्खा ॥ २८ ॥
आरोप्य शिबिकां चैव वालिनं गतजीवितम् । अलंकारैश्च विविधैर्माल्यैर्वस्त्रैश्च भूषितम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
मृत वालीको शिबिकामें चढ़ाकर उन्हें नाना प्रकारके अलंकारों, फूलोंके गजरों और भाँति-भाँतिके वस्त्रोंसे विभूषित किया ॥ २९ ॥
आज्ञापयत् तदा राजा सुग्रीवः प्लवगेश्वरः । और्ध्वदेहिकमार्यस्य क्रियतामनुकूलतः ॥ ३० ॥
भावार्थ
तदनन्तर वानरोंके स्वामी राजा सुग्रीवने आज्ञा दी कि ‘मेरे बड़े भाईका और्ध्वदेहिक संस्कार शास्त्रानुकूल विधिसे सम्पन्न किया जाय ॥ ३० ॥
विश्राणयन्तो रत्नानि विविधानि बहूनि च । अग्रतः प्लवगा यान्तु शिबिका तदनन्तरम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘आगे-आगे बहुत-से वानर नाना प्रकारके बहुसंख्यक रत्न लुटाते हुए चलें । उनके पीछे शिबिका चले ॥ ३१ ॥
राज्ञामृद्धिविशेषा हि दृश्यन्ते भुवि यादृशाः । तादृशैरिह कुर्वन्तु वानरा भर्तृसत्क्रियाम् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘इस भूतलपर राजाओंके और्ध्वदेहिक संस्कार उनकी बढ़ी हुई समृद्धिके अनुसार जैसे धूमधामसे होते देखे जाते हैं, उसी प्रकार अधिक धन लगाकर सब वानर अपने स्वामी महाराज वालीका अन्त्येष्टि-संस्कार करें’ ॥ ३२ ॥
तादृशं वालिनः क्षिप्रं प्राकुर्वन्नौर्ध्वदेहिकम् । अङ्गदं परिरभ्याशु तारप्रभृतयस्तथा ॥ ३३ ॥ क्रोशन्तः प्रययुः सर्वे वानरा हतबान्धवाः ।
भावार्थ
तब तार आदि वानरोंने वालीके और्ध्वदेहिक संस्कार-का शीघ्र वैसा ही आयोजन किया । जिनके बान्धव वाली मारे गये थे, वे सब-के-सब वानर अङ्गदको हृदयसे लगाकर शीघ्रतापूर्वक वहाँसे रोते हुए शवके साथ चले ॥ ३३½ ॥
ततः प्रणिहिताः सर्वा वानर्योऽस्य वशानुगाः ॥ ३४ ॥ चुक्रुशुर्वीरवीरेति भूयः क्रोशन्ति ताः प्रियम् ।
भावार्थ
उनके पीछे वालीके अधीन रहनेवाली सभी वानर-पत्नियाँ समीप आकर ‘हा वीर, हा वीर’ कहती हुई अपने प्रियतमको पुकार-पुकारकर बारंबार रोने-चिल्लाने लगीं ॥ ३४½ ॥
ताराप्रभृतयः सर्वा वानर्यो हतबान्धवाः ॥ ३५ ॥ अनुजग्मुश्च भर्तारं क्रोशन्त्यः करुणस्वनाः ।
भावार्थ
जिनके जीवन-धनका वध किया गया था, वे तारा आदि सब वानरियाँ करुणस्वरसे विलाप करती हुई अपने स्वामीके पीछे-पीछे चलने लगीं ॥ ३५½ ॥
तासां रुदितशब्देन वानरीणां वनान्तरे ॥ ३६ ॥ वनानि गिरयश्चैव विक्रोशन्तीव सर्वतः ।
भावार्थ
वनके भीतर रोती हुई उन वानर-वधुओंके रोदन-शब्दसे गूँजते हुए वन और पर्वत भी सब ओर रोते हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ३६½ ॥
पुलिने गिरिनद्यास्तु विविक्ते जलसंवृते ॥ ३७ ॥ चितां चक्रुः सुबहवो वानरा वनचारिणः ।
भावार्थ
पहाड़ी¹ नदी तुङ्गभद्राके एकान्त तटपर जो जलसे घिरा था, पहुँचकर बहुत-से वनचारी वानरोंने एक चिता तैयार की ॥ ३७½ ॥
अवरोप्य ततः स्कन्धाच्छिबिकां वानरोत्तमाः ॥ ३८ ॥ तस्थुरेकान्तमाश्रित्य सर्वे शोकपरायणाः ।
भावार्थ
तदनन्तर पालकी ढोनेवाले श्रेष्ठ वानरोंने उसे अपने कंधेसे उतारा और वे सब शोकमग्न हो एकान्त स्थानमें जा बैठे ॥ ३८½ ॥
ततस्तारा पतिं दृष्ट्वा शिबिकातलशायिनम् ॥ ३९ ॥ आरोप्याङ्के शिरस्तस्य विललाप सुदुःखिता ।
भावार्थ
तत्पश्चात् ताराने शिबिकामें सुलाये हुए अपने पतिके शवको देखकर उनके मस्तकको अपनी गोदमें ले लिया और अत्यन्त दुखी होकर वह विलाप करने लगी—॥ ३९½ ॥
हा वानरमहाराज हा नाथ मम वत्सल ॥ ४० ॥ हा महार्ह महाबाहो हा मम प्रिय पश्य माम् । जनं न पश्यसीमं त्वं कस्माच्छोकाभिपीडितम् ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘हा वानरोंके महाराज ! हा मेरे दयालु प्राणनाथ ! हा परम पूजनीय महाबाहु वीर ! हा मेरे प्रियतम ! एक बार मेरी ओर देखो तो सही । इस शोकपीड़ित दासीकी ओर तुम दृष्टिपात क्यों नहीं करते हो ? ॥ ४०-४१ ॥
प्रहृष्टमिह ते वक्त्रं गतासोरपि मानद । अस्तार्कसमवर्णं च दृश्यते जीवतो यथा ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘दूसरोंको मान देनेवाले प्राणवल्लभ ! प्राणोंके निकल जानेपर भी तुम्हारा मुख जीवित अवस्थाकी भाँति अस्ताचल-वर्ती सूर्यके समान अरुण प्रभासे युक्त एवं प्रसन्न ही दिखायी देता है ॥ ४२ ॥
एष त्वां रामरूपेण कालः कर्षति वानर । येन स्म विधवाः सर्वाः कृता एकेषुणा रणे ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘वानरराज ! श्रीरामके रूपमें यह काल ही तुम्हें खींचकर लिये जा रहा है, जिसने युद्धके मैदानमें एक ही बाण मारकर हम सबको विधवा बना दिया ॥ ४३ ॥
इमास्तास्तव राजेन्द्र वानर्योऽप्लवगास्तव । पादैर्विकृष्टमध्वानमागताः किं न बुध्यसे ॥ ४४ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! ये तुम्हारी प्यारी वानरियाँ, जो वानरोंकी भाँति उछलकर चलना नहीं जानती हैं, तुम्हारे पीछे-पीछे बहुत दूरके मार्गपर पैदल ही चली आयी हैं । इस बातको क्या तुम नहीं जानते ? ॥ ४४ ॥
तवेष्टा ननु चैवेमा भार्याश्चन्द्रनिभाननाः । इदानीं नेक्षसे कस्मात् सुग्रीवं प्लवगेश्वर ॥ ४५ ॥
भावार्थ
‘वानरराज ! जो तुम्हें परम प्रिय थीं, वे तुम्हारी सभी चन्द्रमुखी भार्याएँ यहाँ उपस्थित हैं । तुम इन सबको तथा अपने भाई सुग्रीवको भी इस समय क्यों नहीं देख रहे हो ? ॥ ४५ ॥
एते हि सचिवा राजंस्तारप्रभृतयस्तव । पुरवासिजनश्चायं परिवार्य विषीदति ॥ ४६ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! ये तार आदि तुम्हारे सचिव तथा ये पुरवासी-जन तुम्हें चारों ओरसे घेरकर दुखी हो रहे हैं ॥ ४६ ॥
विसर्जयैनान् सचिवान् यथापुरमरिंदम । ततः क्रीडामहे सर्वा वनेषु मदनोत्कटाः ॥ ४७ ॥
भावार्थ
‘शत्रुदमन ! आप पहलेकी भाँति इन मन्त्रियोंको विदा कर दीजिये । फिर हम सब प्रेमोन्मत्त होकर इन वनोंमें आपके साथ क्रीडा करेंगी’ ॥ ४७ ॥
एवं विलपतीं तारां पतिशोकपरिप्लुताम् । उत्थापयन्ति स्म तदा वानर्यः शोककर्शिताः ॥ ४८ ॥
भावार्थ
पतिके शोकमें डूबी हुई ताराको इस प्रकार विलाप करती देख उस समय शोकसे दुर्बल हुई अन्य वानरियोंने उसे उठाया ॥ ४८ ॥
सुग्रीवेण ततः सार्धं सोऽङ्गदः पितरं रुदन् । चितामारोपयामास शोकेनाभिप्लुतेन्द्रियः ॥ ४९ ॥
भावार्थ
इसके बाद संतापपीड़ित इन्द्रियोंवाले अङ्गदने रोते-रोते सुग्रीवकी सहायतासे पिताको चितापर रक्खा ॥ ४९ ॥
ततोऽग्निं विधिवद् दत्त्वा सोऽपसव्यं चकार ह । पितरं दीर्घमध्वानं प्रस्थितं व्याकुलेन्द्रियः ॥ ५० ॥
भावार्थ
फिर शास्त्रीय विधिके अनुसार उसमें आग लगाकर उन्होंने उसकी प्रदक्षिणा की । इसके बाद यह सोचकर कि ‘मेरे पिता लंबी यात्राके लिये प्रस्थित हुए हैं’ अङ्गदकी सारी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठीं ॥ ५० ॥
संस्कृत्य वालिनं तं तु विधिवत् प्लवगर्षभाः । आजग्मुरुदकं कर्तुं नदीं शुभजलां शिवाम् ॥ ५१ ॥
भावार्थ
इस प्रकार विधिवत् वालीका दाह-संस्कार करके सभी वानर जलाञ्जलि देनेके लिये पवित्र जलसे भरी हुई कल्याणमयी तुङ्गभद्रा नदीके तटपर आये ॥ ५१ ॥
ततस्ते सहितास्तत्र ह्यङ्गदं स्थाप्य चाग्रतः । सुग्रीवतारासहिताः सिषिचुर्वानरा जलम् ॥ ५२ ॥
भावार्थ
वहाँ अङ्गदको आगे रखकर सुग्रीव और तारासहित सभी वानरोंने वालीके लिये एक साथ जलाञ्जलि दी ॥ ५२ ॥
सुग्रीवेणैव दीनेन दीनो भूत्वा महाबलः । समानशोकः काकुत्स्थः प्रेतकार्याण्यकारयत् ॥ ५३ ॥
भावार्थ
दुखी हुए सुग्रीवके साथ ही उन्हींके समान शोकग्रस्त एवं दुखी हो महाबली श्रीरामने वालीके समस्त प्रेतकार्य करवाये ॥ ५३ ॥
ततोऽथ तं वालिनमग्र्यपौरुषं प्रकाशमिक्ष्वाकुवरेषुणा हतम् । प्रदीप्य दीप्ताग्निसमौजसं तदा सलक्ष्मणं राममुपेयिवान् हरिः ॥ ५४ ॥
भावार्थ
इस प्रकार इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामके बाणसे मारे गये श्रेष्ठ पराक्रमी और प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी सुविख्यात वालीका दाह-संस्कार करके सुग्रीव उस समय लक्ष्मणसहित श्रीरामके पास आये ॥ ५४ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें