किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 24
तामाशु वेगेन दुरासदेन स्वभिप्लुतां शोकमहार्णवेन । पश्यंस्तदा वाल्यनुजस्तरस्वी भ्रातुर्वधेनाप्रतिमेन तेपे ॥ १ ॥
भावार्थ
अत्यन्त वेगशाली और दुःसह शोकसमुद्रमें डूबी हुई ताराकी ओर दृष्टिपात करके वालीके छोटे भाई वेगवान् सुग्रीवको उस समय अपने भाईके वधसे बड़ा संताप हुआ ॥ १ ॥
स बाष्पपूर्णेन मुखेन पश्यन् क्षणेन निर्विण्णमना मनस्वी । जगाम रामस्य शनैः समीपं भृत्यैर्वृतः सम्परिदूयमानः ॥ २ ॥
भावार्थ
उनके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली । उनका मन खिन्न हो गया और वे भीतर-ही-भीतर कष्टका अनुभव करते हुए अपने भृत्योंके साथ धीरे-धीरे श्रीरामचन्द्रजीके पास गये ॥२॥
स तं समासाद्य गृहीतचाप- मुदात्तमाशीविषतुल्यबाणम् । यशस्विनं लक्षणलक्षिताङ्ग- मवस्थितं राघवमित्युवाच ॥ ३ ॥
भावार्थ
जिन्होंने धनुष ले रक्खा था, जिनमें धीरोदात्त नायकका स्वभाव विद्यमान था, जिनके बाण विषधर सर्पके समान भयंकर थे, जिनका प्रत्येक अङ्ग सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार उत्तम लक्षणोंसे लक्षित था तथा जो परम यशस्वी थे, वहाँ खड़े हुए उन श्रीरघुनाथजीके पास जाकर सुग्रीव इस प्रकार बोले—॥ ३ ॥
यथा प्रतिज्ञातमिदं नरेन्द्र कृतं त्वया दृष्टफलं च कर्म । ममाद्य भोगेषु नरेन्द्रसूनो मनो निवृत्तं हतजीवितेन ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘नरेन्द्र ! आपने जैसी प्रतिज्ञा की थी, उसके अनुसार यह काम कर दिखाया । इस कर्मका राज्य-लाभरूप फल भी प्रत्यक्ष ही है । किंतु राजकुमार ! इससे मेरा जीवन निन्दनीय हो गया है । अतः अब मेरा मन सभी भोगोंसे निवृत्त हो गया ॥ ४ ॥
अस्यां महिष्यां तु भृशं रुदत्यां पुरेऽतिविक्रोशति दुःखतप्ते । हते नृपे संशयितेऽङ्गदे च न राम राज्ये रमते मनो मे ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! राजा वालीके मारे जानेसे ये महारानी तारा अत्यन्त विलाप कर रही हैं । सारा नगर दुःखसे संतप्त होकर चीख रहा है तथा कुमार अङ्गदका जीवन भी संशयमें पड़ गया है । इन सब कारणोंसे अब राज्यमें मेरा मन नहीं लगता है ॥ ५ ॥
क्रोधादमर्षादतिविप्रधर्षाद् भ्रातुर्वधो मेऽनुमतः पुरस्तात् । हते त्विदानीं हरियूथपेऽस्मिन् सुतीक्ष्णमिक्ष्वाकुवर प्रतप्स्ये ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘इक्ष्वाकुकुलके गौरव श्रीरघुनाथजी ! भाईने मेरा बहुत अधिक तिरस्कार किया था, इसलिये क्रोध और अमर्षके कारण पहले मैंने उसके वधके लिये अनुमति दे दी थी; परंतु अब वानर-यूथपति वालीके मारे जानेपर मुझे बड़ा संताप हो रहा है। सम्भवतः जीवनभर यह संताप बना ही रहेगा ॥ ६ ॥
श्रेयोऽद्य मन्ये मम शैलमुख्ये तस्मिन् हि वासश्चिरमृष्यमूके । यथा तथा वर्तयतः स्ववृत्त्या नेमं निहत्य त्रिदिवस्य लाभः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘अपनी जातीय वृत्तिके अनुसार जैसे-तैसे जीवन-निर्वाह करते हुए उस श्रेष्ठ पर्वत ऋष्यमूकपर चिरकालतक रहना ही आज मैं अपने लिये कल्याणकारी समझता हूँ; किंतु अपने इस भाईका वध कराकर अब मुझे स्वर्गका भी राज्य मिल जाय तो मैं उसे अपने लिये श्रेयस्कर नहीं मानता हूँ ॥७॥
न त्वा जिघांसामि चरेति यस्मा- मयं महात्मा मतिमानुवाच । तस्यैव तद् राम वचोऽनुरूप- मिदं वचः कर्म च मेऽनुरूपम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘बुद्धिमान् महात्मा वालीने युद्धके समय मुझसे कहा था कि ‘तुम चले जाओ, मैं तुम्हारे प्राण लेना नहीं चाहता’ । श्रीराम ! उनकी यह बात उन्हींके योग्य थी और मैंने जो आपसे कहकर उनका वध कराया, मेरा वह क्रूरतापूर्ण वचन और कर्म मेरे ही अनुरूप है ॥ ८ ॥
भ्राता कथं नाम महागुणस्य भ्रातुर्वधं राम विरोचयेत । राज्यस्य दुःखस्य च वीर सारं विचिन्तयन् कामपुरस्कृतोऽपि ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘वीर रघुनन्दन ! कोई कितना ही स्वार्थी क्यों न हो ? यदि राज्यके सुख तथा भ्रातृ-वधसे होनेवाले दुःखकी प्रबलता-पर विचार करेगा तो वह भाई होकर अपने महान् गुणवान् भाईका वध कैसे अच्छा समझेगा ? ॥ ९ ॥
वधो हि मे मतो नासीत् खमाहात्म्यव्यतिक्रमात् । ममासीद् बुद्धिर्दौरात्म्यात् प्राणहारीव्यतिक्रमः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘वालीके मनमें मेरे वधका विचार नहीं था; क्योंकि इससे उन्हें अपनी मान-प्रतिष्ठामें बट्टा लगनेका डर था । मेरी ही बुद्धिमें दुष्टता भरी थी, जिसके कारण मैंने अपने भाईके प्रति ऐसा अपराध कर डाला, जो उनके लिये घातक सिद्ध हुआ ॥ १० ॥
द्रुमशाखावभग्नोऽहं मुहूर्तं परिनिष्टनन् । सान्त्वयित्वा त्वनेनोक्तो न पुनः कर्तुमर्हसि ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘जब वालीने मुझे एक वृक्षकी शाखासे घायल कर दिया और मैं दो घड़ीतक कराहता रहा, तब उन्होंने मुझे सान्त्वना देकर कहा—‘जाओ, फिर मेरे साथ युद्ध करनेकी इच्छा न करना’ ॥ ११ ॥
भ्रातृत्वमार्यभावश्च धर्मश्चानेन रक्षितः । मया क्रोधश्च कामश्च कपित्वं च प्रदर्शितम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘उन्होंने भ्रातृभाव, आर्यभाव और धर्मकी भी रक्षा की है; परंतु मैंने केवल काम, क्रोध और वानरोचित चपलताका ही परिचय दिया है ॥ १२ ॥
अचिन्तनीयं परिवर्जनीय- मनीप्सनीयं स्वनवेक्षणीयम् । प्राप्तोऽस्मि पाप्मानमिदं वयस्य भ्रातुर्वधात् त्वाष्ट्रवधादिवेन्द्रः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘मित्र ! जैसे वृत्रासुरका वध करनेसे इन्द्र पापके भागी हुए थे, उसी प्रकार मैं भाईका वध कराकर ऐसे पापका भागी हुआ हूँ, जिसको करना तो दूर रहा, सोचना भी अनुचित है । श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये जो सर्वथा त्याज्य, अवाञ्छनीय तथा देखनेके भी अयोग्य है ॥ १३ ॥
पाप्मानमिन्द्रस्य मही जलं च वृक्षाश्च कामं जगृहुः स्त्रियश्च । को नाम पाप्मानमिमं सहेत शाखामृगस्य प्रतिपत्तुमिच्छेत् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘इन्द्रके पापको तो पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियोंने स्वेच्छासे ग्रहण कर लिया था; परंतु मुझ-जैसे वानरके इस पापको कौन लेना चाहेगा ? अथवा कौन ले सकेगा ? ॥ १४ ॥
नार्हामि सम्मानमिमं प्रजानां न यौवराज्यं कुत एव राज्यम् । अधर्मयुक्तं कुलनाशयुक्त- मेवंविधं राघव कर्म कृत्वा ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘रघुनाथजी ! अपने कुलका नाश करनेवाला ऐसा पापपूर्ण कर्म करके मैं प्रजाके सम्मानका पात्र नहीं रहा । राज्य पाना तो दूरकी बात है, मुझमें युवराज होनेकी भी योग्यता नहीं है॥ १५ ॥
पापस्य कर्तास्मि विगर्हितस्य क्षुद्रस्य लोकापकृतस्य लोके। शोको महान् मामभिवर्ततेऽयं वृष्टेर्यथा निम्नमिवाम्बुवेगः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘मैंने वह लोकनिन्दित पापकर्म किया है, जो नीच पुरुषोंके योग्य तथा सम्पूर्ण जगत्को हानि पहुँचानेवाला है । जैसे वर्षाके जलका वेग नीची भूमिकी ओर जाता है, उसी प्रकार यह भ्रातृ-वधजनित महान् शोक सब ओरसे मुझपर ही आक्रमण कर रहा है ॥ १६ ॥
सोदर्यघातापरगात्रवालः संतापहस्ताक्षिशिरोविषाणः । एनोमयो मामभिहन्ति हस्ती दत्तो नदीकूलमिव प्रवृद्धः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘भाईका वध ही जिसके शरीरका पिछला भाग और पुच्छ है तथा उससे होनेवाला संताप ही जिसकी सूँड़, नेत्र, मस्तक और दाँत हैं, वह पापरूपी महान् मदमत्त गजराज नदी-तटकी भाँति मुझपर ही आघात कर रहा है ॥ १७ ॥
अंहो बतेदं नृवराविषह्यं निवर्तते मे हृदि साधुवृत्तम् । अग्नौ विवर्णं परितप्यमानं किट्टं यथा राघव जातरूपम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘नरेश्वर ! रघुनन्दन ! मैंने जो दुःसह पाप किया है, यह मेरे हृदयस्थित सदाचारको भी नष्ट कर रहा है । ठीक उसी तरह, जैसे आगमें तपाया जानेवाला मलिन सुवर्ण अपने भीतरके मलको नष्ट कर देता है ॥ १८ ॥
महाबलानां हरियूथपाना- मिदं कुलं राघव मन्निमित्तम् । अस्याङ्गदस्यापि च शोकतापा- दर्धस्थितप्राणमितीव मन्ये ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘रघुनाथजी ! मेरे ही कारण वालीका वध हुआ, जिससे इस अङ्गदका भी शोक-संताप बढ़ गया और इसीलिये इन महाबली वानर-यूथपतियोंका समुदाय अधमरा-सा जान पड़ता है ॥ १९ ॥
सुतः सुलभ्यः सुजनः सुवश्यः कुतस्तु पुत्रः सदृशोऽङ्गदेन । न चापि विद्येत स वीर देशो यस्मिन् भवेत् सोदरसंनिकर्षः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘वीरवर ! सुजन और वशमें रहनेवाला पुत्र तो मिल सकता है, परंतु अङ्गदके समान बेटा कहाँ मिलेगा? तथा ऐसा कोई देश नहीं है, जहाँ मुझे अपने भाईका सामीप्य मिल सके ॥ २० ॥
अद्याङ्गदो वीरवरो न जीवे- जीवेत माता परिपालनार्थम् । विना तु पुत्रं परितापदीना सा नैव जीवेदिति निश्चितं मे ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘अब वीरवर अङ्गद भी जीवित नहीं रह सकता । यदि जी सकता तो उसकी रक्षाके लिये उसकी माता भी जीवन धारण करती । वह बेचारी तो यों ही संतापसे दीन हो रही है, यदि पुत्र भी न रहा तो उसके जीवनका अन्त हो जायगा — यह बिल्कुल निश्चित बात है ॥ २१ ॥
सोऽहं प्रवेक्ष्याम्यतिदीप्तमग्निं भ्रात्रा च पुत्रेण च सख्यमिच्छन् । इमे विचेष्यन्ति हरिप्रवीराः सीतां निदेशे परिवर्तमानाः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘अतः मैं अपने भाई और पुत्रका साथ देनेकी इच्छासे प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश करूँगा । ये वानर वीर आपकी आज्ञामें रहकर सीताकी खोज करेंगे ॥ २२ ॥
कृत्स्नं तु ते सेत्स्यति कार्यमेत- न्मय्यप्यतीते मनुजेन्द्रपुत्र । कुलस्य हन्तारमजीवनार्हं रामानुजानीहि कृतागसं माम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘राजकुमार ! मेरी मृत्यु हो जानेपर भी आपका सारा कार्य सिद्ध हो जायगा । मैं कुलकी हत्या करनेवाला और अपराधी हूँ । अतः संसारमें जीवन धारण करनेके योग्य नहीं हूँ । इसलिये श्रीराम ! मुझे प्राणत्याग करनेकी आज्ञा दीजिये’ ॥ २३ ॥
इत्येवमार्तस्य रघुप्रवीरः श्रुत्वा वचो वालिजघन्यजस्य । संजातबाष्पः परवीरहन्ता रामो मुहूर्तं विमना बभूव ॥ २४ ॥
भावार्थ
दुःखसे आतुर हुए सुग्रीवके, जो वालीके छोटे भाई थे, ऐसे वचन सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेमें समर्थ, रघुकुलके वीर भगवान् श्रीरामके नेत्रोंसे आँसू बहने लगे। वे दो घड़ीतक मन-ही-मन दुःखका अनुभव करते रहे ॥ २४ ॥
तस्मिन् क्षणेऽभीक्ष्णमवेक्षमाणः क्षितिक्षमावान् भुवनस्य गोप्ता । रामो रुदन्तीं व्यसने निमग्नां समुत्सुकः सोऽथ ददर्श ताराम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजी पृथ्वीके समान क्षमाशील और सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करनेवाले हैं । उन्होंने उस समय अधिक उत्सुक होकर जब इधर-उधर बारंबार दृष्टि दौड़ायी, तब शोकमग्ना तारा उन्हें दिखायी दी, जो अपने स्वामीके लिये रो रही थी ॥ २५॥
तां चारुनेत्रां कपिसिंहनाथां पतिं समाश्लिष्य तदा शयानाम्। उत्थापयामासुरदीनसत्त्वां मन्त्रिप्रधानाः कपिराजपत्नीम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
कपियोंमें सिंहके समान वीर वाली जिसके स्वामी एवं संरक्षक थे, जो वानरराज वालीकी रानी थी, जिसका हृदय उदार और नेत्र मनोहर थे, वह तारा उस समय अपने मृत पतिका आलिङ्गन करके पड़ी थी । श्रीरामको आते देख प्रधान-प्रधान मन्त्रियोंने ताराको वहाँसे उठाया ॥ २६ ॥
सा विस्फुरन्ती परिरभ्यमाणा भर्तुः समीपादपनीयमाना । ददर्श रामं शरचापपाणिं स्वतेजसा सूर्यमिव ज्वलन्तम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
तारा जब पतिके समीपसे हटायी जाने लगी, तब बारंबार उसका आलिङ्गन करती हुई वह अपनेको छुड़ाने और छटपटाने लगी । इतनेहीमें उसने अपने सामने धनुष-बाण धारण किये श्रीरामको खड़ा देखा, जो अपने तेजसे सूर्यदेवके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ २७ ॥
सुसंवृतं पार्थिवलक्षणैश्च तं चारुनेत्रं मृगशावनेत्रा । अदृष्टपूर्वं पुरुषप्रधान- मयं स काकुत्स्थ इति प्रजज्ञे ॥ २८ ॥
भावार्थ
वे राजोचित शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थे । उनके नेत्र बड़े मनोहर थे । उन पुरुषप्रवर श्रीरामको, जो पहले कभी देखनेमें नहीं आये थे, देखकर मृगशावकनयनी तारा समझ गयी कि ये ही ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम हैं ॥ २८॥
तस्येन्द्रकल्पस्य दुरासदस्य महानुभावस्य समीपमार्या । आर्तातितूर्णं व्यसनं प्रपन्ना जगाम तारा परिविह्वलन्ती ॥ २९ ॥
भावार्थ
उस समय घोर संकटमें पड़ी हुई शोकपीड़ित आर्या तारा अत्यन्त विह्वल हो गिरती-पड़ती तीव्र गतिसे महेन्द्रतुल्य दुर्जय वीर महानुभाव भगवान् श्रीरामके समीप गयी ॥२९॥
तं सा समासाद्य विशुद्धसत्त्वं शोकेन सम्भ्रान्तशरीरभावा । मनस्विनी वाक्यमुवाच तारा रामं रणोत्कर्षणलब्धलक्ष्यम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
शोकके कारण वह अपने शरीरकी भी सुध-बुध खो बैठी थी । भगवान् श्रीराम विशुद्ध अन्तःकरणवाले तथा युद्धस्थलमें सबसे अधिक निपुणताके कारण लक्ष्य बेधनेमें अचूक थे, उनके पास पहुँचकर वह मनस्विनी तारा इस प्रकार बोली—॥ ३० ॥
त्वमप्रमेयश्च दुरासदश्च जितेन्द्रियश्चोत्तमधर्मकश्च । अक्षीणकीर्तिश्च विचक्षणश्च क्षितिक्षमावान् क्षतजोपमाक्षः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! आप अप्रमेय ( देश, काल और वस्तुकी सीमासे रहित )हैं। आपको पाना बहुत कठिन है । आप जितेन्द्रिय तथा उत्तम धर्मका पालन करनेवाले हैं । आपकी कीर्ति कभी नष्ट नहीं होती । आप दूरदर्शी एवं पृथ्वीके समान क्षमाशील हैं । आपकी आँखें कुछ-कुछ लाल हैं ॥ ३१ ॥
त्वमात्तबाणासनबाणपाणि- र्महाबलः संहननोपपन्नः । मनुष्यदेहाभ्युदयं विहाय दिव्येन देहाभ्युदयेन युक्तः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘आपके हाथमें धनुष और बाण शोभा पा रहे हैं।आपका बल महान् है । आप सुदृढ़ शरीरसे सम्पन्न हैं और मनुष्य-शरीरसे प्राप्त होनेवाले लौकिक सुखका परित्याग करके भी दिव्य शरीरके ऐश्वर्यसे युक्त हैं ॥ ३२ ॥
येनैव बाणेन हतः प्रियो मे तेनैव बाणेन हि मां जहीहि । हता गमिष्यामि समीपमस्य न मां विना वीर रमेत वाली ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘( अतः मैं प्रार्थना करती हूँ कि ) आपने जिस बाणसे मेरे प्रियतम पतिका वध किया है, उसी बाणसे आप मुझे भी मार डालिये । मैं मरकर उनके समीप चली जाऊँगी । वीर ! मेरे बिना वाली कहीं भी सुखी नहीं रह सकेंगे ॥३३॥
स्वर्गेऽपि पद्मामलपत्रनेत्र समेत्य सम्प्रेक्ष्य च मामपश्यन् । न होष उच्चावचताम्रचूडा विचित्रवेषाप्सरसोऽभजिष्यत् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘अमलकमलदललोचन राम ! स्वर्गमें जाकर भी जब वाली सब ओर दृष्टि डालनेपर मुझे नहीं देखेंगे, तब उनका मन वहाँ कदापि नहीं लगेगा; नाना प्रकारके लाल फूलोंसे विभूषित चोटी धारण करनेवाली तथा विचित्र वेशभूषासे मनोहर प्रतीत होनेवाली स्वर्गकी अप्सराओंको वे कभी स्वीकार नहीं करेंगे ॥ ३४ ॥
स्वर्गेऽपि शोकं च विवर्णतां च मया विना प्राप्स्यति वीर वाली। रम्ये नगेन्द्रस्य तटावकाशे विदेहकन्यारहितो यथा त्वम् ॥ ३५ ॥ त्वं वेत्थ तावद् वनिताविहीनः प्राप्नोति दुःखं पुरुषः कुमारः । तत् त्वं प्रजानञ्जहि मां न वाली दुःखं ममादर्शनजं भजेत ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘वीरवर! स्वर्गमें भी वाली मेरे बिना शोकका अनुभव करेंगे और उनके शरीरकी कान्ति फीकी पड़ जायगी । वे उसी तरह दुखी रहेंगे जैसे गिरिराज ऋष्यमूकके सुरम्य तट-प्रान्तमें विदेहनन्दिनी सीताके बिना आप कष्टका अनुभव करते हैं ॥ ‘स्त्रीके बिना युवा पुरुषको जो दुःख उठाना पड़ता है, उसे आप अच्छी तरह जानते हैं । इस तत्त्वको समझकर आप मेरा वध करिये, जिससे वालीको मेरे विरहका दुःख न भोगना पड़े ॥ ३६ ॥
यच्चापि मन्येत भवान् महात्मा स्त्रीघातदोषस्तु भवेन्न मह्यम् । आत्मेयमस्येति हि मां जहि त्वं न स्त्रीवधः स्यान्मनुजेन्द्रपुत्र ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘महाराजकुमार ! आप महात्मा हैं, इसलिये यदि ऐसा चाहते हों कि मुझे स्त्री-हत्याका पाप न लगे तो ‘यह वालीकी आत्मा है’ ऐसा समझकर मेरा वध कीजिये । इससे आपको स्त्री-हत्याका पाप नहीं लगेगा ॥ ३७ ॥
शास्त्रप्रयोगाद् विविधाच्च वेदा- दनन्यरूपाः पुरुषस्य दाराः । दारप्रदानाद्धि न दानमन्यत् प्रदृश्यते ज्ञानवतां हि लोके ॥ ३८ ॥
भावार्थ
‘शास्त्रोक्त यज्ञ-यागादि कर्मोंमें पति और पत्नी दोनोंका संयुक्त अधिकार होता है—पत्नीको साथ लिये बिना पुरुष यज्ञकर्मका अनुष्ठान नहीं कर सकता । इसके सिवा नाना प्रकारकी वैदिक श्रुतियाँ भी पत्नीको पतिका आधा शरीर बतलाती हैं । दूसरे स्त्रियोंका अपने पतिसे अभिन्न होना सिद्ध होता है ( अतः मुझे मारनेसे आपको स्त्रीवधका दोष नहीं लग सकता और वालीको स्त्रीकी प्राप्ति हो जायगी; क्योंकि ) संसारमें ज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमें स्त्रीदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है ॥ ३८ ॥
त्वं चापि मां तस्य मम प्रियस्य प्रदास्यसे धर्ममवेक्ष्य वीर । अनेन दानेन न लप्स्यसे त्व- मधर्मयोगं मम वीर घातात् ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘वीरशिरोमणे ! यदि धर्मकी ओर दृष्टि रखते हुए आप भी मुझे मेरे प्रियतम वालीको समर्पित कर देंगे तो इस दानके प्रभावसे मेरी हत्या करनेपर भी आपको पाप नहीं लगेगा ॥३९॥
आर्तामनाथामपनीयमाना- मेवंगतां नार्हसि मामहन्तुम् । अहं हि मातङ्गविलासगामिना प्लवंगमानामृषभेण धीमता । विना वरार्होत्तमहेममालिना चिरं न शक्ष्यामि नरेन्द्र जीवितुम् ॥ ४० ॥
भावार्थ
‘मैं दुःखिनी और अनाथा हूँ। पतिसे दूर कर दी गयी हूँ। ऐसी दशामें मुझे जीवित छोड़ना आपके लिये उचित नहीं है। नरेन्द्र ! मैं सुन्दर एवं बहुमूल्य श्रेष्ठ सुवर्णमालासे अलंकृत तथा गजराजके समान विलासयुक्त गतिसे चलनेवाले बुद्धिमान् वानरश्रेष्ठ वालीके बिना अधिक कालतक जीवित नहीं रह सकूँगी’ ॥ ४० ॥
इत्येवमुक्तस्तु विभुर्महात्मा तारां समाश्वास्य हितं बभाषे । मा वीरभार्ये विमतिं कुरुष्व लोको हि सर्वो विहितो विधात्रा ॥ ४१ ॥
भावार्थ
ताराके ऐसा कहनेपर महात्मा भगवान् श्रीरामने उसे आश्वासन देकर हितकी बात कही—‘वीरपत्नी ! तुम मृत्यु-विषयक विपरीत विचारका त्याग करो; क्योंकि विधाताने इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की है ॥ ४१ ॥
तं चैव सर्वं सुखदुःखयोगं लोकोऽब्रवीत् तेन कृतं विधात्रा। त्रयोऽपि लोका विहितं विधानं नातिक्रमन्ते वशगा हि तस्य ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘विधाताने ही इस सारे जगत्को सुख-दुःखसे संयुक्त किया है। यह बात साधारणलोग भी कहते और जानते हैं । तीनों लोकोंके प्राणी विधाताके विधानका उल्लङ्घन नहीं कर सकते; क्योंकि सभी उसके अधीन हैं ॥ ४२ ॥
प्रीतिं परां प्राप्स्यसि तां तथैव पुत्रश्च ते प्राप्स्यति यौवराज्यम् । धात्रा विधानं विहितं तथैव न शूरपत्न्यः परिदेवयन्ति ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘तुम्हें पहलेकी ही भाँति अत्यन्त सुख एवं आनन्दकी प्राप्ति होगी तथा तुम्हारा पुत्र युवराजपद प्राप्त करेगा । विधाताका ऐसा ही विधान है । शूरवीरोंकी स्त्रियाँ इस प्रकार विलाप नहीं करती हैं ( अतः तुम भी शोक छोड़कर शान्त हो जाओ )’ ॥ ४३ ॥
आश्वासिता तेन महात्मना तु प्रभावयुक्तेन परंतपेन । सा वीरपत्नी ध्वनता मुखेन सुवेषरूपा विरराम तारा ॥ ४४ ॥
भावार्थ
शत्रुओंको संताप देनेवाले परम प्रभावशाली महात्मा श्रीरामके इस प्रकार सान्त्वना देनेपर सुन्दर वेष और रूपवाली वीरपत्नी तारा, जिसके मुखसे विलापकी ध्वनि निकलती रहती थी, चुप हो गयी—उसने रोना-धोना छोड़ दिया ॥ ४४ ॥
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