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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 26

ततः शोकाभिसंतप्तं सुग्रीवं क्लिन्नवाससम् । शाखामृगमहामात्राः परिवार्योपतस्थिरे ॥ १ ॥ अभिगम्य महाबाहुं राममक्लिष्टकारिणम् । स्थिताः प्राञ्जलयः सर्वे पितामहमिवर्षयः ॥ २ ॥

भावार्थ

तदनन्तर वानरसेनाके प्रधान-प्रधान वीर ( हनुमान् आदि ) भीगे वस्त्रवाले शोक-संतप्त सुग्रीवको चारों ओरसे घेरकर उन्हें साथ लिये अनायास ही महान् कर्म करनेवाले महाबाहु श्रीरामकी सेवामें उपस्थित हुए । श्रीरामके पास आकर वे सभी वानर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये, जैसे ब्रह्माजीके सम्मुख महर्षिगण खड़े रहते हैं ॥ १-२ ॥

ततः काञ्चनशैलाभस्तरुणार्कनिभाननः । अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं हनूमान् मारुतात्मजः ॥ ३ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् सुवर्णमय मेरु पर्वतके समान सुन्दर एवं विशाल शरीरवाले वायुपुत्र हनुमान्जी, जिनका मुख प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण प्रभासे प्रकाशित हो रहा था, दोनों हाथ जोड़कर बोले--॥ ३ ॥

भवत्प्रसादात् काकुत्स्थ पितृपैतामहं महत् । वानराणां सुदंष्ट्राणां सम्पन्नबलशालिनाम् ॥ ४ ॥ महात्मनां सुदुष्प्रापं प्राप्तं राज्यमिदं प्रभो । भवता समनुज्ञातः प्रविश्य नगरं शुभम् ॥ ५ ॥ संविधास्यति कार्याणि सर्वाणि ससुहृद्गणः ।

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलनन्दन ! आपकी कृपासे सुग्रीवको सुन्दर दाढ़वाले पूर्णबलशाली और महामनस्वी वानरोंका यह विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ, जो इनके बाप-दादोंके समयसे चला आ रहा है । प्रभो ! यद्यपि इसका मिलना बहुत ही कठिन था तो भी आपके प्रसादसे यह इन्हें सुलभ हो गया । अब यदि आप आज्ञा दें तो ये अपने सुन्दर नगरमें प्रवेश करके सुहृदोंके साथ अपना सब राजकार्य सँभालें ॥ ४-५½ ॥

स्नातोऽयं विविधैर्गन्धैरौषधैश्च यथाविधि ॥ ६ ॥ अर्चयिष्यति माल्यैश्च रत्नैश्च त्वां विशेषतः । इमां गिरिगुहां रम्यामभिगन्तुं त्वमर्हसि ॥ ७ ॥ कुरुष्व स्वामिसम्बन्धं वानरान् सम्प्रहर्षय ।

भावार्थ

‘ये शास्त्रविधिके अनुसार नाना प्रकारके सुगन्धित पदार्थों और ओषधियोंसहित जलसे राज्यपर अभिषिक्त होकर मालाओं तथा रत्नोंद्वारा आपकी विशेष पूजा करेंगे । अतः आप इस रमणीय पर्वत-गुफा किष्किन्धामें पधारनेकी कृपा करें और इन्हें इस राज्यका स्वामी बनाकर वानरोंका हर्ष बढ़ावें’ ॥ ६-७½ ॥

एवमुक्तो हनुमता राघवः परवीरहा ॥ ८ ॥ प्रत्युवाच हनूमन्तं बुद्धिमान् वाक्यकोविदः ।

भावार्थ

हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले तथा बातचीतमें कुशल बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीने उन्हें यों उत्तर दिया—॥ ८½ ॥

चतुर्दश समाः सौम्य ग्रामंवा यदि वा पुरम् ॥ ९ ॥ न प्रवेक्ष्यामि हनुमन् पितुर्निर्देशपालकः ।

भावार्थ

‘हनुमन् ! सौम्य ! मैं पिताकी आज्ञाका पालन कर रहा हूँ, अतः चौदह वर्षोंके पूर्ण होनेतक किसी ग्राम या नगरमें प्रवेश नहीं करूँगा ॥ ९½ ॥

सुसमृद्धां गुहां दिव्यां सुग्रीवो वानरर्षभः ॥ १० ॥ प्रविष्टो विधिवद् वीरः क्षिप्रं राज्येऽभिषिच्यताम् ।

भावार्थ

‘वानरश्रेष्ठ वीर सुग्रीव इस समृद्धिशालिनी दिव्य गुफामें प्रवेश करें और वहाँ शीघ्र ही इनका विधिपूर्वक राज्याभिषेक कर दिया जाय’ ॥ १०½ ॥

एवमुक्त्वा हनूमन्तं रामः सुग्रीवमब्रवीत् ॥ ११ ॥ वृत्तज्ञो वृत्तसम्पन्नमुदारबलविक्रमम् । इममप्यङ्गदं वीरं यौवराज्येऽभिषेचय ॥ १२ ॥

भावार्थ

हनुमान्से ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीवसे बोले— ‘मित्र ! तुम लौकिक और शास्त्रीय सभी व्यवहार जानते हो । कुमार अङ्गद सदाचारसम्पन्न तथा महान् बल-पराक्रमसे परिपूर्ण हैं । इनमें वीरता कूट-कूटकर भरी है, अतः तुम इनको भी युवराजके पदपर अभिषिक्त करो ॥ ११-१२ ॥

ज्येष्ठस्य हि सुतो ज्येष्ठः सदृशो विक्रमेण च । अङ्गदोऽयमदीनात्मा यौवराज्यस्य भाजनम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘ये तुम्हारे बड़े भाईके ज्येष्ठ पुत्र हैं । पराक्रममें भी उन्हींके समान हैं तथा इनका हृदय उदार है । अतः अङ्गद युवराज-पदके सर्वथा अधिकारी हैं ॥ १३ ॥

पूर्वोऽयं वार्षिको मासः श्रावणः सलिलागमः । प्रवृत्ताः सौम्य चत्वारो मासा वार्षिकसंज्ञिताः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! वर्षा कहलानेवाले चार मास या चौमासे आ गये । इनमें पहला मास यह श्रावण, जो जलकी प्राप्ति करानेवाला है, आरम्भ हो गया ॥ १४ ॥

नायमुद्योगसमयः प्रविश त्वं पुरीं शुभाम् । अस्मिन् वत्स्याम्यहं सौम्य पर्वते सहलक्ष्मणः ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘सौम्य ! यह किसीपर चढ़ाई करनेका समय नहीं है । इसलिये तुम अपनी सुन्दर नगरीमें जाओ । मैं लक्ष्मणके साथ इस पर्वतपर निवास करूँगा ॥ १५ ॥

इयं गिरिगुहा रम्या विशाला युक्तमारुता । प्रभूतसलिला सौम्य प्रभूतकमलोत्पला ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘सौम्य सुग्रीव ! यह पर्वतीय गुफा बड़ी रमणीय और विशाल है । इसमें आवश्यकताके अनुरूप हवा भी मिल जाती है । यहाँ पर्याप्त जल भी सुलभ है और कमल तथा उत्पल भी बहुत हैं ॥ १६ ॥

कार्तिके समनुप्राप्ते त्वं रावणवधे यत । एष नः समयः सौम्य प्रविश त्वं स्वमालयम् ॥ १७ ॥ अभिषिञ्चस्व राज्ये च सुहृदः सम्प्रहर्षय ।

भावार्थ

‘सखे ! कार्तिक आनेपर तुम रावणके वधके लिये प्रयत्न करना । यही हमलोगोंका निश्चय रहा । अब तुम अपने महलमें प्रवेश करो और राज्यपर अभिषिक्त होकर सुहृदोंको आनन्दित करो’ ॥ १७½ ॥

इति रामाभ्यनुज्ञातः सुग्रीवो वानरर्षभः ॥ १८ ॥ प्रविवेश पुरीं रम्यां किष्किन्धां वालिपालिताम् । तं वानरसहस्राणि प्रविष्टं वानरेश्वरम् ॥ १९ ॥ अभिवार्य प्रविष्टानि सर्वतः प्लवगेश्वरम् ।

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीकी यह आज्ञा पाकर वानरश्रेष्ठ सुग्रीव उस रमणीय किष्किन्धापुरीमें गये, जिसकी रक्षा वालीने की थी ॥ उस समय गुफामें प्रविष्ट हुए उन वानरराजको चारों ओरसे घेरकर हजारों वानर उनके साथ ही गुहामें घुसे ॥१९½॥

ततः प्रकृतयः सर्वा दृष्ट्वा हरिगणेश्वरम् ॥ २० ॥ प्रणम्य मूर्ध्ना पतिता वसुधायां समाहिताः । सुग्रीवः प्रकृतीः सर्वाः सम्भाष्योत्थाप्य वीर्यवान् ॥२१॥ भ्रातुरन्तःपुरं सौम्यं प्रविवेश महाबलः ।

भावार्थ

वानरराजको देखकर प्रजा आदि समस्त प्रकृतियोंने एकाग्रचित्त हो पृथ्वीपर माथा टेककर उन्हें प्रणाम किया ॥ महाबली पराक्रमी सुग्रीवने उन सबको उठनेकी आज्ञा दी और उन सबसे बातचीत करके वे भाईके सौम्य अन्तःपुरमें प्रविष्ट हुए ॥२१½॥

प्रविष्टं भीमविक्रान्तं सुग्रीवं वानरर्षभम् ॥ २२ ॥ अभ्यषिञ्चन्त सुहृदः सहस्राक्षमिवामराः ।

भावार्थ

भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले वानरश्रेष्ठ सुग्रीवको अन्तःपुरमें आया देख उनके सुहृदोंने उनका उसी प्रकार अभिषेक किया, जैसे देवताओंने सहस्र नेत्रधारी इन्द्रका किया था ॥ २२½ ॥

तस्य पाण्डुरमाजह्रुश्छत्रं हेमपरिष्कृतम् ॥ २३ ॥ शुक्ले च वालव्यजने हेमदण्डे यशस्करे । तथा रत्नानि सर्वाणि सर्वबीजौषधानि च ॥ २४ ॥ सक्षीराणां च वृक्षाणां प्ररोहान् कुसुमानि च । शुक्लानि चैव वस्त्राणि श्वेतं चैवानुलेपनम् ॥ २५ ॥ सुगन्धीनि च माल्यानि स्थलजान्यम्बुजानि च । चन्दनानि च दिव्यानि गन्धांश्च विविधान् बहून् ॥ २६ ॥ अक्षतं जातरूपं च प्रियङ्गुं मधुसर्पिषी । दधि चर्म च वैयाघ्रं पराध्यें चाप्युपानहौ ॥ २७ ॥ समालम्भनमादाय गोरोचनं मनःशिलाम् । आजग्मुस्तत्र मुदिता वराः कन्याश्च षोडश ॥ २८ ॥

भावार्थ

पहले तो वे सब लोग उनके लिये सुवर्णभूषित श्वेत छत्र, सोनेकी डाँड़ीवाले दो सफेद चँवर, सब प्रकारके रत्न, बीज और ओषधियाँ, दूधवाले वृक्षोंकी नीचे लटकनेवाली जटाएँ, श्वेत पुष्प, श्वेत वस्त्र, श्वेत अनुलेपन, जल और थलमें होनेवाले सुगन्धित फूलोंकी मालाएँ, दिव्य चन्दन, नाना प्रकारके बहुत-से सुगन्धित पदार्थ, अक्षत, सोना, प्रियङ्गु ( कगनी ), मधु, घी, दही, व्याघ्रचर्म, सुन्दर एवं बहुमूल्य जूते, अङ्गराग, गोरोचन और मैनसिल आदि सामग्री लेकर वहाँ उपस्थित हुए, साथ ही हर्षसे भरी हुई सोलह सुन्दरी कन्याएँ भी सुग्रीवके पास आयीं ॥ २३—२८ ॥

ततस्ते वानरश्रेष्ठमभिषेक्तुं यथाविधि । रत्नैर्वस्त्रैश्च भक्ष्यैश्च तोषयित्वा द्विजर्षभान् ॥ २९ ॥

भावार्थ

तदनन्तर उन सबने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न, वस्त्र और भक्ष्य पदार्थोंसे संतुष्ट करके वानरश्रेष्ठ सुग्रीवका विधिपूर्वक अभिषेक-कार्य आरम्भ किया ॥ २९ ॥

ततः कुशपरिस्तीर्णं समिद्धं जातवेदसम् । मन्त्रपूतेन हविषा हुत्वा मन्त्रविदो जनाः ॥ ३० ॥

भावार्थ

मन्त्रवेत्ता पुरुषोंने वेदीपर अग्निकी स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया और अग्निवेदीके चारों ओर कुश बिछाये । फिर अग्निका संस्कार करके मन्त्रपूत हविष्यके द्वारा प्रज्वलित अग्निमें आहुति दी ॥ ३० ॥

ततो हेमप्रतिष्ठाने वरास्तरणसंवृते । प्रासादशिखरे रम्ये चित्रमाल्योपशोभिते ॥ ३१ ॥ प्राङ्मुखं विधिवन्मन्त्रैः स्थापयित्वा वरासने ।

भावार्थ

तत्पश्चात् रंग-बिरंगी पुष्पमालाओंसे सुशोभित रमणीय अट्टालिकापर एक सोनेका सिंहासन रक्खा गया और उसपर सुन्दर बिछौना बिछाकर उसके ऊपर सुग्रीवको पूर्वाभिमुख करके विधिवत् मन्त्रोच्चारण करते हुए बिठाया गया ॥३१½॥

नदीनदेभ्यः संहृत्य तीर्थेभ्यश्च समन्ततः ॥ ३२ ॥ आहृत्य च समुद्रेभ्यः सर्वेभ्यो वानरर्षभाः । अपः कनककुम्भेषु निधाय विमलं जलम् ॥ ३३ ॥ शुभैर्ऋषभशृङ्गैश्च कलशैश्चैव काञ्चनैः । शास्त्रदृष्टेन विधिना महर्षिविहितेन च ॥ ३४ ॥ गजो गवाक्षो गवयः शरभो गन्धमादनः । मैन्दश्च द्विविदश्चैव हनूमाञ्जाम्बवांस्तथा ॥ ३५ ॥ अभ्यषिञ्चत सुग्रीवं प्रसन्नेन सुगन्धिना । सलिलेन सहस्राक्षं वसवो वासवं यथा ॥ ३६ ॥

भावार्थ

इसके बाद श्रेष्ठ वानरोंने नदियों, नदों, सम्पूर्ण दिशाओंके तीर्थों और समस्त समुद्रोंसे लाये हुए निर्मल जलको एकत्र करके उसे सोनेके कलशोंमें रक्खा । फिर गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, हनुमान् और जाम्बवान्ने महर्षियोंकी बतायी हुई शास्त्रोक्त विधिके अनुसार सुवर्णमय कलशोंमें रक्खे हुए स्वच्छ और सुगन्धित जलसे साँड़के सींगोंद्वारा सुग्रीवका उसी प्रकार अभिषेक किया, जैसे वसुओंने इन्द्रका अभिषेक किया था ॥ ३२—३६ ॥

अभिषिक्ते तु सुग्रीवे सर्वे वानरपुङ्गवाः । प्रचुक्रुशुर्महात्मानो हृष्टाः शतसहस्रशः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

सुग्रीवका अभिषेक हो जानेपर वहाँ लाखोंकी संख्यामें एकत्र हुए समस्त महामनस्वी श्रेष्ठ वानर हर्षसे भरकर जय-घोष करने लगे ॥ ३७ ॥

रामस्य तु वचः कुर्वन् सुग्रीवो वानरेश्वरः । अङ्गदं सम्परिष्वज्य यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥ ३८ ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन करते हुए वानरराज सुग्रीवने अङ्गदको हृदयसे लगाकर उन्हें भी युवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ३८ ॥

अङ्गदे चाभिषिक्ते तु सानुक्रोशाः प्लवंगमाः । साधु साध्विति सुग्रीवं महात्मानो ह्यपूजयन् ॥ ३९ ॥

भावार्थ

अङ्गदका अभिषेक हो जानेपर महामनस्वी दयालु वानर ‘साधु-साधु’ कहकर सुग्रीवकी सराहना करने लगे ॥३९॥

रामं चैव महात्मानं लक्ष्मणं च पुनः पुनः । प्रीताश्च तुष्टुवुः सर्वे तादृशे तत्र वर्तिनि ॥ ४० ॥ हृष्टपुष्टजनाकीर्णा पताकाध्वजशोभिता । बभूव नगरी रम्या किष्किन्धा गिरिगह्वरे ॥ ४१ ॥

भावार्थ

इस प्रकार अभिषेक होकर किष्किन्धामें सुग्रीव और अङ्गदके विराजमान होनेपर समस्त वानर परम प्रसन्न हो महात्मा श्रीराम और लक्ष्मणकी बारंबार स्तुति करने लगे ॥ उस समय पर्वतकी गुफामें बसी हुई किष्किन्धापुरी हृष्ट-पुष्ट पुरवासियोंसे व्याप्त तथा ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित होनेके कारण बड़ी रमणीय प्रतीत होती थी ॥ ४१ ॥

निवेद्य रामाय तदा महात्मने महाभिषेकं कपिवाहिनीपतिः । रुमां च भार्यामुपलभ्य वीर्यवा- नवाप राज्यं त्रिदशाधिपो यथा ॥ ४२ ॥

भावार्थ

वानरसेनाके स्वामी पराक्रमी सुग्रीवने महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर अपने महाभिषेकका समाचार निवेदन किया और अपनी पत्नी रुमाको पाकर उन्होंने उसी प्रकार वानरोंका साम्राज्य प्राप्त किया, जैसे देवराज इन्द्रने त्रिलोकीका ॥ ४२ ॥

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