किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 18
इत्युक्तः प्रश्रितं वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम्। परुषं वालिना रामो निहतेन विचेतसा ॥ १ ॥ तं निष्प्रभमिवादित्यं मुक्ततोयमिवाम्बुदम्। उक्तवाक्यं हरिश्रेष्ठमुपशान्तमिवानलम् ॥ २ ॥ धर्मार्थगुणसम्पन्नं हरीश्वरमनुत्तमम्। अधिक्षिप्तस्तदा रामः पश्चाद् वालिनमब्रवीत् ॥ ३ ॥
भावार्थ
वहाँ मारे जाकर अचेत हुए वालीने जब इस प्रकार विनयाभास, धर्माभास, अर्थाभास और हिताभाससे युक्त कठोर बातें कहीं, आक्षेप किया, तब उन बातोंको कहकर मौन हुए वानरश्रेष्ठ वालीसे श्रीरामचन्द्रजीने धर्म, अर्थ और श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त परम उत्तम बात कही । उस समय वाली प्रभाहीन सूर्य, जलहीन बादल और बुझी हुई आगके समान श्रीहीन प्रतीत होता था ॥ १—३ ॥
धर्ममर्थं च कामं च समयं चापि लौकिकम्। अविज्ञाय कथं बाल्यान्मामिहाद्य विगर्हसे ॥ ४ ॥
भावार्थ
( श्रीराम बोले— ) ‘वानर ! धर्म, अर्थ, काम और लौकिक सदाचारको तो तुम स्वयं ही नहीं जानते हो । फिर बालोचित अविवेकके कारण आज यहाँ मेरी निन्दा क्यों करते हो ? ॥ ४ ॥
अपृष्ट्वा बुद्धिसम्पन्नान् वृद्धानाचार्यसम्मतान्। सौम्य वानरचापल्यात् त्वं मां वक्तुमिहेच्छसि ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘सौम्य ! तुम आचार्योंद्वारा सम्मानित बुद्धिमान् वृद्ध पुरुषोंसे पूछे बिना ही—उनसे धर्मके स्वरूपको ठीक-ठीक समझे बिना ही वानरोचित चपलतावश मुझे यहाँ उपदेश देना चाहते हो ? अथवा मुझपर आक्षेप करनेकी इच्छा रखते हो ॥ ५ ॥
इक्ष्वाकूणामियं भूमिः सशैलवनकानना। मृगपक्षिमनुष्याणां निग्रहानुग्रहेष्वपि ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘पर्वत, वन और काननोंसे युक्त यह सारी पृथ्वी इक्ष्वाकुवंशी राजाओंकी है; अतः वे यहाँके पशु-पक्षी और मनुष्योंपर दया करने और उन्हें दण्ड देनेके भी अधिकारी हैं॥६॥
तां पालयति धर्मात्मा भरतः सत्यवानृजुः। धर्मकामार्थतत्त्वज्ञो निग्रहानुग्रहे रतः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘धर्मात्मा राजा भरत इस पृथ्वीका पालन करते हैं । वे सत्यवादी, सरल तथा धर्म, अर्थ और कामके तत्त्वको जाननेवाले हैं; अतः दुष्टोंके निग्रह तथा साधु पुरुषोंके प्रति अनुग्रह करनेमें तत्पर रहते हैं ॥ ७ ॥
नयश्च विनयश्चोभौ यस्मिन् सत्यं च सुस्थितम्। विक्रमश्च यथा दृष्टः स राजा देशकालवित् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘जिसमें नीति, विनय, सत्य और पराक्रम आदि सभी राजोचित गुण यथावत् रूपसे स्थित देखे जायँ, वही देश-काल-तत्त्वको जाननेवाला राजा होता है ( भरतमें ये सभी गुण विद्यमान हैं ) ॥ ८ ॥
तस्य धर्मकृतादेशा वयमन्ये च पार्थिवाः। चरामो वसुधां कृत्स्नां धर्मसंतानमिच्छवः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘भरतकी ओरसे हमें तथा दूसरे राजाओंको यह आदेश प्राप्त है कि जगत्में धर्मके पालन और प्रसारके लिये यत्न किया जाय । इसलिये हमलोग धर्मका प्रचार करनेकी इच्छासे सारी पृथ्वीपर विचरते रहते हैं ॥ ९ ॥
तस्मिन् नृपतिशार्दूले भरते धर्मवत्सले। पालयत्यखिलां पृथ्वीं कश्चरेद् धर्मविप्रियम् ॥ १० ॥
भावार्थ
‘राजाओंमें श्रेष्ठ भरत धर्मपर अनुराग रखनेवाले हैं । वे समूची पृथ्वीका पालन कर रहे हैं । उनके रहते हुए इस पृथ्वीपर कौन प्राणी धर्मके विरुद्ध आचरण कर सकता है ? ॥ १० ॥
ते वयं मार्गविभ्रष्टं स्वधर्मे परमे स्थिताः। भरताज्ञां पुरस्कृत्य निगृह्णीमो यथाविधि ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘हम सब लोग अपने श्रेष्ठ धर्ममें दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर भरतकी आज्ञाको सामने रखते हुए धर्ममार्गसे भ्रष्ट पुरुषको विधिपूर्वक दण्ड देते हैं ॥११॥
त्वं तु संक्लिष्टधर्मश्च कर्मणा च विगर्हितः। कामतन्त्रप्रधानश्च न स्थितो राजवर्त्मनि ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘तुमने अपने जीवनमें कामको ही प्रधानता दे रक्खी थी । राजोचित मार्गपर तुम कभी स्थिर नहीं रहे । तुमने सदा ही धर्मको बाधा पहुँचायी और बुरे कर्मोंके कारण सत्पुरुषोंद्वारा सदा तुम्हारी निन्दा की गयी ॥ १२ ॥
ज्येष्ठो भ्राता पिता वापि यश्च विद्यां प्रयच्छति। त्रयस्ते पितरो ज्ञेया धर्मे च पथि वर्तिनः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘बड़ा भाई, पिता तथा जो विद्या देता है, वह गुरु— ये तीनों धर्ममार्गपर स्थित रहनेवाले पुरुषोंके लिये पिताके तुल्य माननीय हैं, ऐसा समझना चाहिये ॥१३॥
यवीयानात्मनः पुत्रः शिष्यश्चापि गुणोदितः। पुत्रवत्ते त्रयश्चिन्त्या धर्मश्चैवात्र कारणम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘इसी प्रकार छोटा भाई, पुत्र और गुणवान् शिष्य— ये तीन पुत्रके तुल्य समझे जाने योग्य हैं। उनके प्रति ऐसा भाव रखनेमें धर्म ही कारण है ॥ १४॥
सूक्ष्मः परमदुर्ज्ञेयः सतां धर्मः प्लवङ्गम । हृदिस्थः सर्वभूतानामात्मा वेद शुभाशुभम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘वानर ! सज्जनोंका धर्म सूक्ष्म होता है वह परम दुर्ज्ञेय है—उसे समझना अत्यन्त कठिन है । समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें विराजमान जो परमात्मा हैं, वे ही सबके शुभ और अशुभको जानते हैं ॥ १५ ॥
चपलश्चपलैः सार्धं वानरैरकृतात्मभिः । जात्यन्ध इव जात्यन्धैर्मन्त्रयन् प्रेक्षसे नु किम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘तुम स्वयं भी चपल हो और चञ्चल चित्तवाले अजितात्मा वानरोंके साथ रहते हो; अतः जैसे कोई जन्मान्ध पुरुष जन्मान्धोंसे ही रास्ता पूछे, उसी प्रकार तुम उन चपल वानरोंके साथ परामर्श करते हो, फिर तुम धर्मका विचार क्या कर सकते हो ?—उसके स्वरूपको कैसे समझ सकते हो ? ॥ १६ ॥
अहं तु व्यक्ततामस्य वचनस्य ब्रवीमि ते । नहि मां केवलं रोषात् त्वं विगर्हितुमर्हसि ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘मैंने यहाँ जो कुछ कहा है, उसका अभिप्राय तुम्हें स्पष्ट करके बताता हूँ । तुम्हें केवल रोषवश मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये ॥ १७ ॥
तदेतत् कारणं पश्य यदर्थं त्वं मया हतः । भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘मैंने तुम्हें क्यों मारा है ? उसका कारण सुनो और समझो । तुम सनातन धर्मका त्याग करके अपने छोटे भाईकी स्त्रीसे सहवास करते हो ॥ १८ ॥
अस्य त्वं धरमाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः । रुमायां वर्तसे कामात् स्नुषायां पापकर्मकृत् ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘इस महामना सुग्रीवके जीते-जी इसकी पत्नी रुमाका, जो तुम्हारी पुत्रवधूके समान है, कामवश उपभोग करते हो । अतः पापाचारी हो ॥ १९ ॥
तद् व्यतीतस्य ते धर्मात् कामवृत्तस्य वानर । भ्रातृभार्याभिमर्शेऽस्मिन् दण्डोऽयं प्रतिपादितः ॥२०॥
भावार्थ
‘वानर ! इस तरह तुम धर्मसे भ्रष्ट हो स्वेच्छाचारी हो गये हो और अपने भाईकी स्त्रीको गले लगाते हो । तुम्हारे इसी अपराधके कारण तुम्हें यह दण्ड दिया गया है ॥ २० ॥
नहि लोकविरुद्धस्य लोकवृत्तादपेयुषः । दण्डादन्यत्र पश्यामि निग्रहं हरियूथप ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘वानरराज ! जो लोकाचारसे भ्रष्ट होकर लोकविरुद्ध आचरण करता है, उसे रोकने या राहपर लानेके लिये मैं दण्डके सिवा और कोई उपाय नहीं देखता ॥ २१ ॥
न च ते मर्षये पापं क्षत्रियोऽहं कुलोद्गतः । औरसीं भगिनीं वापि भार्यां वाप्यनुजस्य यः ॥ २२ ॥ प्रचरेत नरः कामात् तस्य दण्डो वधः स्मृतः ।
भावार्थ
‘मैं उत्तम कुलमें उत्पन्न क्षत्रिय हूँ; अतः मैं तुम्हारे पापको क्षमा नहीं कर सकता । जो पुरुष अपनी कन्या, बहिन अथवा छोटे भाईकी स्त्रीके पास काम-बुद्धिसे जाता है, उसका वध करना ही उसके लिये उपयुक्त दण्ड माना गया है ॥ २२½ ॥
भरतस्तु महीपालो वयं त्वादेशवर्तिनः ॥ २३ ॥ त्वं च धर्मादतिक्रान्तः कथं शक्यमुपेक्षितुम् ।
भावार्थ
‘हमारे राजा भरत हैं । हमलोग तो केवल उनके आदेशका पालन करनेवाले हैं । तुम धर्मसे गिर गये हो; अतः तुम्हारी उपेक्षा कैसे की जा सकती थी ॥ २३½ ॥
गुरुधर्मव्यतिक्रान्तं प्राज्ञो धर्मेण पालयन् ॥ २४ ॥ भरतः कामयुक्तानां निग्रहे पर्यवस्थितः ।
भावार्थ
‘विद्वान् राजा भरत महान् धर्मसे भ्रष्ट हुए पुरुषको दण्ड देते और धर्मात्मा पुरुषका धर्मपूर्वक पालन करते हुए कामासक्त स्वेच्छाचारी पुरुषोंके निग्रहमें तत्पर रहते हैं ॥ २४½ ॥
वयं तु भरतादेशावधिं कृत्वा हरीश्वर । त्वद्विधान् भिन्नमर्यादान् निग्रहीतुं व्यवस्थिताः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘हरीश्वर ! हमलोग तो भरतकी आज्ञाको ही प्रमाण मानकर धर्ममर्यादाका उल्लङ्घन करनेवाले तुम्हारे-जैसे लोगोंको दण्ड देनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं ॥ २५ ॥
सुग्रीवेण च मे सख्यं लक्ष्मणेन यथा तथा । दारराज्यनिमित्तं च निःश्रेयसकरः स मे ॥ २६ ॥ प्रतिज्ञा च मया दत्ता तदा वानरसंनिधौ । प्रतिज्ञा च कथं शक्या मद्विधेनानवेक्षितुम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘सुग्रीवके साथ मेरी मित्रता हो चुकी है । उनके प्रति मेरा वही भाव है, जो लक्ष्मणके प्रति है । वे अपनी स्त्री और राज्यकी प्राप्तिके लिये मेरी भलाई करनेके लिये भी कटिबद्ध हैं । मैंने वानरोंके समीप इन्हें स्त्री और राज्य दिलानेके लिये प्रतिज्ञा भी कर ली है । ऐसी दशामें मेरे-जैसा मनुष्य अपनी प्रतिज्ञाकी ओरसे कैसे दृष्टि हटा सकता है ॥ २६-२७ ॥
तदेभिः कारणैः सर्वैर्महद्भिर्धर्मसंश्रितैः । शासनं तव यद् युक्तं तद् भवाननुमन्यताम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘ये सभी धर्मानुकूल महान् कारण एक साथ उपस्थित हो गये, जिनसे विवश होकर तुम्हें उचित दण्ड देना पड़ा है । तुम भी इसका अनुमोदन करो ॥ २८ ॥
सर्वथा धर्म इत्येव द्रष्टव्यस्तव निग्रहः । वयस्यस्योपकर्तव्यं धर्ममेवानुपश्यता ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘धर्मपर दृष्टि रखनेवाले मनुष्यके लिये मित्रका उपकार करना धर्म ही माना गया है; अतः तुम्हें जो यह दण्ड दिया गया है, वह धर्मके अनुकूल है । ऐसा ही तुम्हें समझना चाहिये ॥ २९ ॥
शाक्यं त्वयापि तत्कार्ये धर्ममेवानुवर्तता । श्रूयते मनुना गीतौ श्लोकौ चारित्रवत्सलौ । गृहीतौ धर्मकुशलैस्तथा तच्चरितं मया ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘यदि राजा होकर तुम धर्मका अनुसरण करते तो तुम्हें भी वही काम करना पड़ता, जो मैंने किया है । मनुने राजोचित सदाचारका प्रतिपादन करनेवाले दो श्लोक कहे हैं, जो स्मृतियोंमें सुने जाते हैं और जिन्हें धर्मपालनमें कुशल पुरुषोंने सादर स्वीकार किया । उन्हींके अनुसार इस समय यह मेरा बर्ताव हुआ है ( वे श्लोक इस प्रकार हैं— ) ॥ ३० ॥
राजभिर्धृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ ३१ ॥ शासनाद् वापि मोक्षाद् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते । राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्बिषम् ॥ ३२॥
भावार्थ
‘मनुष्य पाप करके यदि राजाके दिये हुए दण्डको भोग लेते हैं तो वे शुद्ध होकर पुण्यात्मा साधु पुरुषोंकी भाँति स्वर्गलोकमें जाते हैं । ( चोर आदि पापी जब राजाके सामने उपस्थित हों उस समय उन्हें ) राजा दण्ड दे अथवा दया करके छोड़ दे । चोर आदि पापी पुरुष अपने पापसे मुक्त हो जाता है; किंतु यदि राजा पापीको उचित दण्ड नहीं देता तो उसे स्वयं उसके पापका फल भोगना पड़ता है*॥३१-३२॥
आर्येण मम मान्धात्रा व्यसनं घोरमीप्सितम् । श्रमणेन कृते पापे यथा पापं कृतं त्वया ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘तुमने जैसा पाप किया है, वैसा ही पाप प्राचीन कालमें एक श्रमणने किया था । उसे मेरे पूर्वज महाराज मान्धाताने बड़ा कठोर दण्ड दिया था, जो शास्त्रके अनुसार अभीष्ट था ॥३३॥
अन्यैरपि कृतं पापं प्रमत्तैर्वसुधाधिपैः । प्रायश्चित्तं च कुर्वन्ति तेन तच्छाम्यते रजः ॥ ३४ ॥ तदलं परितापेन धर्मतः परिकल्पितः । वधो वानरशार्दूल न वयं स्ववशे स्थिताः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘यदि राजा दण्ड देनेमें प्रमाद कर जायँ तो उन्हें दूसरोंके किये हुए पाप भी भोगने पड़ते हैं तथा उसके लिये जब वे प्रायश्चित्त करते हैं तभी उनका दोष शान्त होता है ॥ ‘अतः वानरश्रेष्ठ ! पश्चात्ताप करनेसे कोई लाभ नहीं है । सर्वथा धर्मके अनुसार ही तुम्हारा वध किया गया है; क्योंकि हमलोग अपने वशमें नहीं हैं ( शास्त्रके ही अधीन हैं )॥ ३५ ॥
शृणु चाप्यपरं भूयः कारणं हरिपुंगव । तच्छ्रुत्वा हि महद् वीर न मन्युं कर्तुमर्हसि ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘वानरशिरोमणे ! तुम्हारे वधका जो दूसरा कारण है, उसे भी सुन लो । वीर ! उस महान् कारणको सुनकर तुम्हें मेरे प्रति क्रोध नहीं करना चाहिये ॥ ३६ ॥
न मे तत्र मनस्तापो न मन्युर्हरिपुंगव । वागुराभिश्च पाशैश्च कूटैश्च विविधैर्नराः ॥ ३७ ॥ प्रतिच्छन्नाश्च दृश्याश्च गृह्णन्ति सुबहून् मृगान् । प्रधावितान् वा वित्रस्तान् विस्रब्धानतिविष्ठितान् ॥३८॥ प्रमत्तानप्रमत्तान् वा नरा मांसाशिनो भृशम् । विध्यन्ति विमुखांश्चापि न च दोषोऽत्र विद्यते ॥ ३९ ॥
भावार्थ
‘वानरश्रेष्ठ ! इस कार्यके लिये मेरे मनमें न तो संताप होता है और न खेद ही । मनुष्य ( राजा आदि ) बड़े-बड़े जाल बिछाकर, फंदे फैलाकर और नाना प्रकारके कूट उपाय ( गुप्त गड्ढोंके निर्माण आदि ) करके छिपे रहकर सामने आकर बहुत-से मृगोंको पकड़ लेते हैं; भले ही वे भयभीत होकर भागते हों या विश्वस्त होकर अत्यन्त निकट बैठे हों ॥ ‘मांसाहारी मनुष्य ( क्षत्रिय ) सावधान, असावधान अथवा विमुख होकर भागनेवाले पशुओंको भी अत्यन्त घायल कर देते हैं; किंतु उनके लिये इस मृगयामें दोष नहीं होता ॥ ३९ ॥
यान्ति राजर्षयश्चात्र मृगयां धर्मकोविदाः । तस्मात् त्वं निहतो युद्धे मया बाणेन वानर । अयुध्यन् प्रतियुध्यन् वा यस्माच्छाखामृगो ह्यसि ॥४०॥
भावार्थ
‘वानर ! धर्मज्ञ राजर्षि भी इस जगत्में मृगयाके लिये जाते हैं और विविध जन्तुओंका वध करते हैं । इसलिये मैंने तुम्हें युद्धमें अपने बाणका निशाना बनाया है । तुम मुझसे युद्ध करते थे या नहीं करते थे, तुम्हारी वध्यतामें कोई अन्तर नहीं आता; क्योंकि तुम शाखामृग हो ( और मृगया करनेका क्षत्रियको अधिकार है ) ॥ ४० ॥
दुर्लभस्य च धर्मस्य जीवितस्य शुभस्य च । राजानो वानरश्रेष्ठ प्रदातारो न संशयः ॥ ४१ ॥
भावार्थ
‘वानरश्रेष्ठ ! राजालोग दुर्लभ धर्म, जीवन और लौकिक अभ्युदयके देनेवाले होते हैं; इसमें संशय नहीं है ॥ ४१ ॥
तान् न हिंस्याच्च नाक्रोशेन्नाक्षिपेन्नाप्रियं वदेत् । देवा मानुषरूपेण चरन्त्येते महीतले ॥ ४२ ॥
भावार्थ
‘अतः उनकी हिंसा न करे, उनकी निन्दा न करे, उनके प्रति आक्षेप भी न करे और न उनसे अप्रिय वचन ही बोले; क्योंकि वे वास्तवमें देवता हैं, जो मनुष्यरूपसे इस पृथ्वीपर विचरते रहते हैं ॥ ४२ ॥
त्वं तु धर्ममविज्ञाय केवलं रोषमास्थितः । विदूषयसि मां धर्मे पितृपैतामहे स्थितम् ॥ ४३ ॥
भावार्थ
‘तुम तो धर्मके स्वरूपको न समझकर केवल रोषके वशीभूत हो गये हो, इसलिये पिता-पितामहोंके धर्मपर स्थित रहनेवाले मेरी निन्दा कर रहे हो’ ॥ ४३ ॥
एवमुक्तस्तु रामेण वाली प्रव्यथितो भृशम् । न दोषं राघवे दध्यौ धर्मेऽधिगतनिश्चयः ॥ ४४ ॥
भावार्थ
श्रीरामके ऐसा कहनेपर वालीके मनमें बड़ी व्यथा हुई । इसे धर्मके तत्त्वका निश्चय हो गया । उसने श्रीरामचन्द्रजीके दोषका चिन्तन त्याग दिया ॥ ४४ ॥
प्रत्युवाच ततो रामं प्राञ्जलिर्वानरेश्वरः । यत् त्वमात्थ नरश्रेष्ठ तत् तथैव न संशयः ॥ ४५ ॥
भावार्थ
इसके बाद वानरराज वालीने श्रीरामचन्द्रजीसे हाथ जोड़कर कहा—‘नरश्रेष्ठ ! आप जो कुछ कहते हैं, बिल्कुल ठीक है; इसमें संशय नहीं है ॥ ४५ ॥
प्रतिवक्तुं प्रकृष्टे हि नापकृष्टस्तु शक्नुयात् । यदयुक्तं मया पूर्वं प्रमादाद् वाक्यमप्रियम् ॥ ४६ ॥ तत्रापि खलु मां दोषं कर्तुं नार्हसि राघव । त्वं हि दृष्टार्थतत्त्वज्ञः प्रजानां च हिते रतः । कार्यकारणसिद्धौ च प्रसन्ना बुद्धिरव्यया ॥ ४७ ॥
भावार्थ
‘आप-जैसे श्रेष्ठ पुरुषको मुझ-जैसा निम्न श्रेणीका प्राणी उचित उत्तर नहीं दे सकता; अतः मैंने प्रमादवश पहले जो अनुचित बात कह डाली है, उसमें भी आपको मेरा अपराध नहीं मानना चाहिये । रघुनन्दन ! आप परमार्थ-तत्त्वके यथार्थ ज्ञाता और प्रजाजनोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं । आपकी बुद्धि कार्य-कारणके निश्चयमें निर्भ्रान्त एवं निर्मल है ॥४६-४७॥
मामप्यवगतं धर्माद् व्यतिक्रान्तपुरस्कृतम् । धर्मसंहितया वाचा धर्मज्ञ परिपालय ॥ ४८ ॥ बाष्पसंरुद्धकण्ठस्तु वाली सार्तरवः शनैः । उवाच रामं सम्प्रेक्ष्य पङ्कलग्न इव द्विपः ॥ ४९ ॥
भावार्थ
‘धर्मज्ञ ! मैं धर्मभ्रष्ट प्राणियोंमें अग्रगण्य हूँ और इसी रूपमें मेरी सर्वत्र प्रसिद्धि है तो भी आज आपकी शरणमें आया हूँ । अपनी धर्मतत्त्वकी वाणीसे आज मेरी भी रक्षा कीजिये’ ॥ इतना कहते-कहते आँसुओंसे वालीका गला भर आया और वह कीचड़में फँसे हुए हाथीकी तरह आर्तनाद करके श्रीरामकी ओर देखता हुआ धीरे-धीरे बोला—॥ ४९ ॥
न चात्मानमहं शोचे न तारां नापि बान्धवान् । यथा पुत्रं गुणज्येष्ठमङ्गदं कनकाङ्गदम् ॥ ५० ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! मुझे अपने लिये, ताराके लिये तथा बन्धु-बान्धवोंके लिये भी उतना शोक नहीं होता है, जितना सुवर्णका अङ्गद धारण करनेवाले श्रेष्ठ गुणसम्पन्न पुत्र अङ्गदके लिये हो रहा है ॥ ५० ॥
स ममादर्शनाद् दीनो बाल्यात् प्रभृति लालितः । तटाक इव पीताम्बुरुपशोषं गमिष्यति ॥ ५१ ॥
भावार्थ
‘मैंने बचपनसे ही उसका बड़ा दुलार किया है; अब मुझे न देखकर वह बहुत दुखी होगा और जिसका जल पी लिया गया हो, उस तालाबकी तरह सूख जायगा ॥ ५१ ॥
बालश्चाकृतबुद्धिश्च एकपुत्रश्च मे प्रियः । तारेयो राम भवता रक्षणीयो महाबलः ॥ ५२ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! वह अभी बालक है । उसकी बुद्धि परिपक्व नहीं हुई है । मेरा इकलौता बेटा होनेके कारण ताराकुमार अङ्गद मुझे बड़ा प्रिय है । आप मेरे उस महाबली पुत्रकी रक्षा कीजियेगा ॥ ५२ ॥
सुग्रीवे चाङ्गदे चैव विधत्स्व मतिमुत्तमाम् । त्वं हि गोप्ता च शास्ता च कार्याकार्यविधौ स्थितः ॥५३॥
भावार्थ
‘सुग्रीव और अङ्गद दोनोंके प्रति आप सद्भाव रक्खें । अब आप ही इन लोगोंके रक्षक तथा इन्हें कर्तव्य-अकर्तव्यकी शिक्षा देनेवाले हैं ॥ ५३ ॥
या ते नरपते वृत्तिर्भरते लक्ष्मणे च या । सुग्रीवे चाङ्गदे राजंस्तां चिन्तयितुमर्हसि ॥ ५४ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! नरेश्वर ! भरत और लक्ष्मणके प्रति आपका जैसा बर्ताव है, वही सुग्रीव तथा अङ्गदके प्रति भी होना चाहिये । आप उसी भावसे इन दोनोंका स्मरण करें ॥ ५४ ॥
मद्दोषकृतदोषां तां यथा तारां तपस्विनीम् । सुग्रीवो नावमन्येत तथावस्थातुमर्हसि ॥ ५५ ॥
भावार्थ
‘बेचारी ताराकी बड़ी शोचनीय अवस्था हो गयी है । मेरे ही अपराधसे उसे भी अपराधिनी समझकर सुग्रीव उसका तिरस्कार न करे, इस बातकी भी व्यवस्था कीजियेगा ॥५५॥
त्वया ह्यनुगृहीतेन शक्यं राज्यमुपासितुम् । त्वद्वशे वर्तमानेन तव चित्तानुवर्तिना ॥ ५६ ॥ शक्यं दिवं चार्जयितुं वसुधां चापि शासितुम् ।
भावार्थ
‘सुग्रीव आपका कृपापात्र होकर ही इस राज्यका यथार्थ रूपसे पालन कर सकता है । आपके अधीन होकर आपके चित्तका अनुसरण करनेवाला पुरुष स्वर्ग और पृथ्वीका भी राज्य पा सकता और उसका अच्छी तरह पालन कर सकता है ॥ ५६½ ॥
त्वत्तोऽहं वधमाकाङ्क्षन् वार्यमाणोऽपि तारया ॥५७॥ सुग्रीवेण सह भ्रात्रा द्वन्द्वयुद्धमुपागतः ।
भावार्थ
‘मैं चाहता था कि आपके हाथसे मेरा वध हो; इसीलिये ताराके मना करनेपर भी मैं अपने भाई सुग्रीवके साथ द्वन्द्वयुद्ध करनेके लिये चला आया’ ॥ ५७½ ॥
इत्युक्त्वा वानरो रामं विरराम हरीश्वरः ॥ ५८ ॥ स तमाश्वासयद् रामो वालिनं व्यक्तदर्शनम् । साधुसम्मतया वाचा धर्मतत्त्वार्थयुक्तया ॥ ५९ ॥ न संतापस्त्वया कार्य प्लवङ्गम । न वयं भवता चिन्त्या नाप्यात्मा हरिसत्तम । वयं भवद्विशेषेण धर्मतः कृतनिश्चयाः ॥ ६० ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीसे ऐसा कहकर वानरराज वाली चुप हो गया । उस समय उसकी ज्ञानशक्तिका विकास हो गया था । श्रीरामचन्द्रजीने धर्मके यथार्थ स्वरूपको प्रकट करनेवाली साधु पुरुषोंद्वारा प्रशंसित वाणीमें उससे कहा—‘वानरश्रेष्ठ ! तुम्हें इसके लिये संताप नहीं करना चाहिये । कपिप्रवर ! तुम्हें हमारे और अपने लिये भी चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है; क्योंकि हमलोग तुम्हारी अपेक्षा विशेषज्ञ हैं, इसलिये हमने धर्मानुकूल कार्य करनेका ही निश्चय कर रखा है ॥५८–६०॥
दण्ड्ये यः पातयेद् दण्डं दण्ड्यो यश्चापि दण्ड्यते । कार्यकारणसिद्धार्थावुभौ तौ नावसीदतः ॥ ६१ ॥
भावार्थ
‘जो दण्डनीय पुरुषको दण्ड देता है तथा जो दण्डका अधिकारी होकर दण्ड भोगता है, उनमेंसे दण्डनीय व्यक्ति अपने अपराधके फलरूपमें शासकका दिया हुआ दण्ड भोगकर तथा दण्ड देनेवाला शासक उसके उस फलभोगमें कारण—निमित्त बनकर कृतार्थ हो जाते हैं—अपना-अपना कर्तव्य पूरा कर लेनेके कारण कर्मरूप ऋणसे मुक्त हो जाते हैं । अतः वे दुखी नहीं होते ॥ ६१ ॥
तद् भवान् दण्डसंयोगादस्माद् विगतकल्मषः । गतः स्वां प्रकृतिं धर्म्यां दण्डदिष्टेन वर्त्मना ॥ ६२ ॥
भावार्थ
‘तुम इस दण्डको पाकर पापरहित हुए और इस दण्डका विधान करनेवाले शास्त्रद्वारा कथित दण्डग्रहणरूप मार्गसे ही चलकर तुम्हें धर्मानुकूल शुद्ध स्वरूपकी प्राप्ति हो गयी ॥६२॥
त्यज शोकं च मोहं च भयं च हृदये स्थितम् । त्वया विधानं हर्यश्च न शक्यमतिवर्तितुम् ॥ ६३ ॥
भावार्थ
‘अब तुम अपने हृदयमें स्थित शोक, मोह और भयका त्याग कर दो । वानरश्रेष्ठ ! तुम दैवके विधानको नहीं लाँघ सकते ॥ ६३ ॥
यथा त्वय्यङ्गदो नित्यं वर्तते वानरेश्वर । तथा वर्तेत सुग्रीवे मयि चापि न संशयः ॥ ६४ ॥
भावार्थ
‘वानरेश्वर ! कुमार अङ्गद तुम्हारे जीवित रहनेपर जैसा था, उसी प्रकार सुग्रीवके और मेरे पास भी सुखसे रहेगा, इसमें संशय नहीं है’ ॥ ६४ ॥
स तस्य वाक्यं मधुरं महात्मनः समाहितं धर्मपथानुवर्तितम् । निशम्य रामस्य रणावमर्दिनो वचः सुयुक्तं निजगाद वानरः ॥ ६५ ॥
भावार्थ
युद्धमें शत्रुका मानमर्दन करनेवाले महात्मा श्रीरामचन्द्रजीका धर्ममार्गके अनुकूल और मानसिक शङ्काओंका समाधान करनेवाला मधुर वचन सुनकर वानर वालीने यह सुन्दर युक्तियुक्त वचन कहा—॥ ६५ ॥
शराभितप्तेन विचेतसा मया प्रभाषितस्त्वं यदजानता विभो । इदं महेन्द्रोपमभीमविक्रम प्रसादितस्त्वं क्षम मे नरेश्वर ॥ ६६ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! देवराज इन्द्रके समान भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले नरेश्वर ! मैं आपके बाणसे पीड़ित होनेके कारण अचेत हो गया था । इसलिये अनजानमें मैंने जो आपके प्रति कठोर बात कह डाली है, उसे आप क्षमा कीजियेगा । इसके लिये मैं प्रार्थनापूर्वक आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ’ ॥
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