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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 17

ततः शरेणाभिहतो रामेण रणकर्कशः। पपात सहसा वाली निकृत्त इव पादपः ॥ १ ॥

भावार्थ

युद्धमें कठोरता दिखानेवाला वाली श्रीरामके बाणसे घायल हो कटे वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १ ॥

स भूमौ न्यस्तसर्वाङ्गस्तप्तकाञ्चनभूषणः। अपतद् देवराजस्य मुक्तरश्मिरिव ध्वजः ॥ २ ॥

भावार्थ

उसका सारा शरीर पृथ्वीपर पड़ा हुआ था । तपाये हुए सुवर्णके आभूषण अब भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । वह देवराज इन्द्रके बन्धनरहित ध्वजकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा था ॥ २ ॥

अस्मिन् निपतिते भूमौ हर्यृक्षाणां गणेश्वरे। नष्टचन्द्रमिव व्योम न व्यराजत मेदिनी ॥ ३ ॥

भावार्थ

वानरों और भालुओंके यूथपति वालीके घराशायी हो जानेपर यह पृथ्वी चन्द्ररहित आकाशकी भाँति शोभाहीन हो गयी ॥ ३ ॥

भूमौ निपतितस्यापि तस्य देहं महात्मनः। न श्रीर्जहाति न प्राणा न तेजो न पराक्रमः ॥ ४ ॥

भावार्थ

पृथ्वीपर पड़े होनेपर भी महामना वालीके शरीरको शोभा, प्राण, तेज और पराक्रम नहीं छोड़ सके थे ॥ ४ ॥

शक्रदत्ता वरा माला काञ्चनी रत्नभूषिता। दधार हरिमुख्यस्य प्राणांस्तेजः श्रियं च सा ॥ ५ ॥

भावार्थ

इन्द्रकी दी हुई रत्नजटित श्रेष्ठ सुवर्णमाला उस वानरराजके प्राण, तेज और शोभाको धारण किये हुए थी ॥ ५ ॥

स तया मालया वीरो हैमया हरियूथपः। संध्यानुगतपर्यन्तः पयोधर इवाभवत् ॥ ६ ॥

भावार्थ

उस सुवर्णमालासे विभूषित हुआ वानरयूथपति वीर वाली संध्याकी लालीसे रँगे हुए प्रान्त भागवाले मेघखण्डके समान शोभा पा रहा था ॥ ६ ॥

तस्य माला च देहश्च मर्मघाती च यः शरः। त्रिधेव रचिता लक्ष्मीः पतितस्यापि शोभते ॥ ७ ॥

भावार्थ

पृथ्वीपर गिरे होनेपर भी वालीकी वह सुवर्णमाला, उसका शरीर तथा मर्मस्थलको विदीर्ण करनेवाला वह बाण-ये तीनों पृथक्-पृथक् तीन भागोंमें विभक्त की हुई अङ्गलक्ष्मी-के समान शोभा पा रहे थे ॥ ७ ॥

तदस्त्रं तस्य वीरस्य स्वर्गमार्गप्रभावनम्। रामबाणासनक्षिप्तमावहत् परमां गतिम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

वीरवर श्रीरामके धनुषसे चलाये गये उस अस्त्रने वालीके लिये स्वर्गका मार्ग प्रकाशित कर दिया और उसे परमपदको पहुँचा दिया ॥ ८ ॥

तं तथा पतितं संख्ये गतार्चिषमिवानलम्। ययातिमिव पुण्यान्ते देवलोकादिह च्युतम् ॥ ९ ॥ आदित्यमिव कालेन युगान्ते भुवि पातितम्। महेन्द्रमिव दुर्धर्षमुपेन्द्रमिव दुःसहम् ॥ १० ॥ महेन्द्रपुत्रं पतितं वालिनं हेममालिनम्। व्यूढोरस्कं महाबाहुं दीप्तास्यं हरिलोचनम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

इस प्रकार युद्धस्थलमें गिरा हुआ इन्द्रपुत्र वाली ज्वालारहित अग्निके समान, पुण्योंका क्षय होनेपर पुण्यलोकसे इस पृथ्वीपर गिरे हुए राजा ययातिके समान तथा महाप्रलयके समय कालद्वारा पृथ्वीपर गिराये गये सूर्यके समान जान पड़ता था । उसके गलेमें सोनेकी माला शोभा दे रही थी । वह महेन्द्रके समान दुर्जय और भगवान् विष्णुके समान दुस्सह था । उसकी छाती चौड़ी, भुजाएँ बड़ी-बड़ी, मुख दीप्तिमान् और नेत्र कपिलवर्णके थे ॥ ९–११ ॥

लक्ष्मणानुचरो रामो ददर्शोपससर्प च। तं तथा पतितं वीरं गतार्चिषमिवानलम् ॥ १२ ॥ बहुमान्य च तं वीरं वीक्षमाणं शनैरिव। उपयातौ महावीर्यौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १३ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणको साथ लिये श्रीरामने वालीको इस अवस्थामें देखा और वे उसके समीप गये। इस प्रकार ज्वालारहित अग्निकी भाँति वहाँ गिरा हुआ वह वीर धीरे-धीरे देख रहा था। महापराक्रमी दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण उस वीरका विशेष सम्मान करते हुए उसके पास गये ॥ १२-१३ ॥

तं दृष्ट्वा राघवं वाली लक्ष्मणं च महाबलम् । अब्रवीत् परुषं वाक्यं प्रश्रितं धर्मसंहितम् ॥ १४ ॥

भावार्थ

उन श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणको देखकर वाली धर्म और विनयसे युक्त कठोर वाणीमें बोला—॥ १४ ॥

स भूमावल्पतेजोऽसुर्निहतो नष्टचेतनः । अर्थसंहितया वाचा गर्वितं रणगर्वितम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

अब उसमें तेज और प्राण स्वल्पमात्रामें ही रह गये ये। वह बाणसे घायल होकर पृथ्वीपर पड़ा था और उसकी चेष्टा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही थी। उसने युद्धमें गर्वयुक्त पराक्रम प्रकट करनेवाले गर्वीले श्रीरामसे कठोर वाणीमें इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥१५ ॥

त्वं नराधिपतेः पुत्रः प्रथितः प्रियदर्शनः । पराङ्मुखवधं कृत्वा कोऽत्र प्राप्तस्त्वया गुणः । यदहं युद्धसंरब्धस्त्वत्कृते निधनं गतः ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! आप राजा दशरथके सुविख्यात पुत्र हैं। आपका दर्शन सबको प्रिय है। मैं आपसे युद्ध करने नहीं आया था। मैं तो दूसरेके साथ युद्धमें उलझा हुआ था। उस दशामें आपने मेरा वध करके यहाँ कौन-सा गुण प्राप्त किया है—किस महान् यशका उपार्जन किया है ? क्योंकि मैं युद्धके लिये दूसरेपर रोष प्रकट कर रहा था, किंतु आपके कारण बीचमें ही मृत्युको प्राप्त हुआ ॥ १६ ॥

कुलीनः सत्त्वसम्पन्नस्तेजस्वी चरितव्रतः । रामः करुणवेदी च प्रजानां च हिते रतः ॥ १७ ॥ सानुक्रोशो महोत्साहः समयज्ञो दृढव्रतः । इत्येतत् सर्वभूतानि कथयन्ति यशो भुवि ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘इस भूतलपर सब प्राणी आपके यशका वर्णन करते हुए कहते हैं—श्रीरामचन्द्रजी कुलीन, सत्त्वगुणसम्पन्न, तेजस्वी, उत्तम व्रतका आचरण करनेवाले, करुणाका अनुभव करनेवाले, प्रजाके हितैषी, दयालु, महान् उत्साही, समयोचित कार्य एवं सदाचारके ज्ञाता और दृढ़प्रतिज्ञ हैं ॥ १७-१८ ॥

दमः शमः क्षमा धर्मो धृतिः सत्यं पराक्रमः । पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! इन्द्रियनिग्रह, मनका संयम, क्षमा, धर्म, धैर्य, सत्य, पराक्रम तथा अपराधियोंको दण्ड देना—ये राजाके गुण हैं ॥ १९ ॥

तान् गुणान् सम्प्रधार्याहमग्र्यं चाभिजनं तव । तारया प्रतिषिद्धः सन् सुग्रीवेण समागतः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘मैं आपमें इन सभी सद्गुणोंका विश्वास करके आपके उत्तम कुलको यादकर ताराके मना करनेपर भी सुग्रीवके साथ लड़ने आ गया ॥ २० ॥

न मामन्येन संरब्धं प्रमत्तं वेद्धुमर्हसि । इति मे बुद्धिरुत्पन्ना बभूवादर्शने तव ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘जबतक मैंने आपको नहीं देखा था, तबतक मेरे मनमें यही विचार उठता था कि दूसरेके साथ रोषपूर्वक जूझते हुए मुझको आप असावधान अवस्थामें अपने बाणसे बेधना उचित नहीं समझेंगे ॥ २१ ॥

स त्वां विनिहतात्मानं धर्मध्वजमधार्मिकम् । जाने पापसमाचारं तृणैः कूपमिवावृतम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘परंतु आज मुझे मालूम हुआ कि आपकी बुद्धि मारी गयी है। आप धर्मध्वजी हैं। दिखावेके लिये धर्मका चोला पहने हुए हैं। वास्तवमें अधर्मी हैं। आपका आचार-व्यवहार पापपूर्ण है। आप घास-फूससे ढके हुए कूपके समान धोखा देनेवाले हैं ॥ २२ ॥

सतां वेषधरं पापं प्रच्छन्नमिव पावकम् । नाहं त्वामभिजानामि धर्मच्छद्माभिसंवृतम् ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘आपने साधु पुरुषोंका-सा वेश धारण कर रक्खा है; परंतु हैं पापी। राखसे ढकी हुई आगके समान आपका असली रूप साधु-वेषमें छिप गया है। मैं नहीं जानता था कि आपने लोगोंको छलनेके लिये ही धर्मकी आड़ ली है ॥ २३ ॥

विषये वा पुरे वा ते यदा पापं करोम्यहम् । न च त्वामवजानेऽहं कस्मात् तं हंस्यकिल्बिषम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘जब मैं आपके राज्य या नगरमें कोई उपद्रव नहीं कर रहा था तथा आपका भी तिरस्कार नहीं करता था, तब आपने मुझ निरपराधको क्यों मारा ? ॥ २४ ॥

फलमूलाशनं नित्यं वानरं वनगोचरम् । मामिहाप्रतियुध्यन्तमन्येन च समागतम् ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘मैं सदा फल-मूलका भोजन करनेवाला और वनमें ही विचरनेवाला वानर हूँ। मैं यहाँ आपसे युद्ध नहीं करता था, दूसरेके साथ मेरी लड़ाई हो रही थी। फिर बिना अपराधके आपने मुझे क्यों मारा ? ॥ २५ ॥

त्वं नराधिपतेः पुत्रः प्रतीतः प्रियदर्शनः । लिङ्गमप्यस्ति ते राजन् दृश्यते धर्मसंहितम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! आप एक सम्माननीय नरेशके पुत्र हैं। विश्वासके योग्य हैं और देखनेमें भी प्रिय हैं। आपमें धर्मका साधनभूत चिह्न ( जटा ) वल्कल धारण आदि भी प्रत्यक्ष दिखायी देता है ॥ २६ ॥

कः क्षत्रियकुले जातः श्रुतवान् नष्टसंशयः । धर्मलिङ्गप्रतिच्छन्नः क्रूरं कर्म समाचरेत् ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘क्षत्रियकुलमें उत्पन्न शास्त्रका ज्ञाता, संशयरहित तथा धार्मिक वेश-भूषासे आच्छन्न होकर भी कौन मनुष्य ऐसा क्रूरतापूर्ण कर्म कर सकता है ॥ २७ ॥

त्वं राघवकुले जातो धर्मवानिति विश्रुतः । अभव्यो भव्यरूपेण किमर्थं परिधावसे ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘महाराज ! रघुके कुलमें आपका प्रादुर्भाव हुआ है । आप धर्मात्माके रूपमें प्रसिद्ध हैं तो भी इतने अभव्य (क्रूर) निकले ! यदि यही आपका असली रूप है तो फिर किस लिये ऊपरसे भव्य ( विनीत एवं दयालु ) साधु पुरुषका-सा रूप धारण करके चारों ओर दौड़ते फिरते हैं ? ॥ २८ ॥

साम दानं क्षमा धर्मः सत्यं धृतिपराक्रमौ । पार्थिवानां गुणा राजन् दण्डश्चाप्यपकारिषु ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘राजन् ! साम, दान, क्षमा, धर्म, सत्य, धृति, पराक्रम और अपराधियोंको दण्ड देना-ये भूपालोंके गुण हैं ॥२९॥

वयं वनचरा राम मृगा मूलफलाशिनः । एषा प्रकृतिरस्माकं पुरुषस्त्वं नरेश्वर ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘नरेश्वर राम ! हम फल-मूल खानेवाले वनचारी मृग हैं । यही हमारी प्रकृति है; किंतु आप तो पुरुष ( मनुष्य ) हैं ( अतः हमारे और आपमें वैरका कोई कारण नहीं है ) ॥ ३० ॥

भूमिर्हिरण्यं रूपं च विग्रहे कारणानि च । तत्र कस्ते वने लोभो मदीयेषु फलेषु वा ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘पृथ्वी, सोना और चाँदी—इन्हीं वस्तुओंके लिये राजाओंमें परस्पर युद्ध होते हैं । ये ही तीन कलहके मूल कारण हैं । परंतु यहाँ वे भी नहीं हैं । इस दिशामें इस वनमें या हमारे फलोंमें आपका क्या लोभ हो सकता है ? ॥ ३१ ॥

नयश्च विनयश्चोभौ निग्रहानुग्रहावपि । राजवृत्तिरसंकीर्णा न नृपाः कामवृत्तयः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘नीति और विनय, दण्ड और अनुग्रह—ये राजधर्म हैं, किंतु इनके उपयोगके भिन्न-भिन्न अवसर हैं ( इनका अविवेकपूर्वक उपयोग करना उचित नहीं है ) । राजाओंको स्वेच्छाचारी नहीं होना चाहिये ॥ ३२ ॥

त्वं तु कामप्रधानश्च कोपनश्चानवस्थितः । राजवृत्तेषु संकीर्णः शरासनपरायणः ॥ ३३ ॥ न तेऽस्त्यपचितिर्धर्मे नार्थे बुद्धिरवस्थिता । इन्द्रियैः कामवृत्तः सन् कृष्यसे मनुजेश्वर ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘परंतु आप तो कामके गुलाम, क्रोधी और मर्यादामें स्थित न रहनेवाले—चञ्चल हैं । नय-विनय आदि जो राजाओंके धर्म हैं, उनके अवसरका विचार किये बिना ही किसीका कहीं भी प्रयोग कर देते हैं । जहाँ कहीं भी बाण चलाते-फिरते हैं ॥ ‘आपका धर्मके विषयमें आदर नहीं है और न अर्थसाधनमें ही आपकी बुद्धि स्थिर है । नरेश्वर ! आप स्वेच्छाचारी हैं । इसलिये आपकी इन्द्रियाँ आपको कहीं भी खींच ले जाती हैं ॥ ३४ ॥

हत्वा बाणेन काकुत्स्थ मामिहानपराधिनम् । किं वक्ष्यसि सतां मध्ये कर्म कृत्वा जुगुप्सितम् ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘काकुत्स्थ ! मैं सर्वथा निरपराध था तो भी यहाँ मुझे बाणसे मारनेका घृणित कर्म करके सत्पुरुषोंके बीचमें आप क्या कहेंगे ? ॥ ३५ ॥

राजहा ब्रह्महा गोघ्नश्चोरः प्राणिवधे रतः । नास्तिकः परिवेत्ता च सर्वे निरयगामिनः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘राजाका वध करनेवाला, ब्रह्म-हत्यारा, गोघाती, चोर, प्राणियोंकी हिंसामें तत्पर रहनेवाला, नास्तिक और परिवेत्ता ( बड़े भाईके अविवाहित रहते अपना विवाह करनेवाला छोटा भाई )—ये सब-के-सब नरकगामी होते हैं ॥ ३६ ॥

सूचकश्च कदर्यश्च मित्रघ्नो गुरुतल्पगः । लोकं पापात्मनामेते गच्छन्ते नात्र संशयः ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘चुगली खानेवाला, लोभी, मित्र-हत्यारा तथा गुरुपत्नी-गामी—ये पापात्माओंके लोकमें जाते हैं—इसमें संशय नहीं है ॥ ३७ ॥

अधार्यं चर्म मे सद्भी रोमाण्यस्थि च वर्जितम् । अभक्ष्याणि च मांसानि त्वद्विधैर्धर्मचारिभिः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘हम वानरोंका चमड़ा भी तो सत्पुरुषोंके धारण करने योग्य नहीं होता । हमारे रोम और हड्डियाँ भी वर्जित हैं ( छूने योग्य नहीं हैं । आप जैसे धर्माचारी पुरुषोंके लिये मांस तो सदा ही अभक्ष्य है; फिर किस लोभसे आपने मुझ वानरको अपने बाणोंका शिकार बनाया है ? ) ॥ ३८ ॥

पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या ब्रह्मक्षत्रेण राघव । शल्यकः श्वाविधो गोधा शशः कूर्मश्च पञ्चमः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! त्रैवर्णिकोंमें जिनकी किसी कारणसे मांसाहार ( जैसे निन्दनीय कर्म ) में प्रवृत्ति हो गयी है, उनके लिये भी पाँच नखवाले जीवोंमेंसे पाँच ही भक्षणके योग्य बताये गये हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं—गेंडा, साही, गोह, खरहा और पाँचवाँ कछुआ ॥ ३९ ॥

चर्म चास्थि च मे राम न स्पृशन्ति मनीषिणः । अभक्ष्याणि च मांसानि सोऽहं पञ्चनखो हतः ॥ ४० ॥ तारया वाक्यमुक्तोऽहं सत्यं सर्वज्ञया हितम् । तदतिक्रम्य मोहेन कालस्य वशमागतः ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! मनीषी पुरुष मेरे ( वानरके ) चमड़े और हड्डीका स्पर्श नहीं करते हैं । वानरके मांस भी सभीके लिये अभक्ष्य होते हैं । इस तरह जिसका सब कुछ निषिद्ध है, ऐसा पाँच नखवाला मैं आज आपके हाथसे मारा गया हूँ ॥ ‘मेरी स्त्री तारा सर्वज्ञ है । उसने मुझे सत्य और हितकी बात बतायी थी । किंतु मोहवश उसका उल्लङ्घन करके मैं कालके अधीन हो गया ॥ ४१ ॥

त्वया नाथेन काकुत्स्थ न सनाथा वसुंधरा । प्रमदा शीलसम्पूर्णा पत्येव च विधर्मणा ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘काकुत्स्थ ! जैसे सुशीला युवती पापात्मा पतिसे सुरक्षित नहीं हो पाती, उसी प्रकार आप जैसे स्वामीको पाकर यह वसुधा सनाथ नहीं हो सकती ॥ ४२ ॥

शठो नैकृतिकः क्षुद्रो मिथ्याप्रश्रितमानसः । कथं दशरथेन त्वं जातः पापो महात्मना ॥ ४३ ॥ छिन्नचारित्र्यकक्ष्येण सतां धर्मातिवर्तिना । त्यक्तधर्माङ्कुशेनाहं निहतो रामहस्तिना ॥ ४४ ॥

भावार्थ

‘आप शठ ( छिपे रहकर दूसरोंका अप्रिय करनेवाले ), अपकारी, क्षुद्र और झूठे ही शान्तचित्त बने रहनेवाले हैं । महात्मा राजा दशरथने आप-जैसे पापीको कैसे उत्पन्न किया ॥ ‘हाय ! जिसने सदाचारका रस्सा तोड़ डाला है, सत्पुरुषोंके धर्म एवं मर्यादाका उल्लङ्घन किया है तथा जिसने धर्मरूपी अङ्कुशकी भी अवहेलना कर दी है, उस रामरूपी हाथीके द्वारा आज मैं मारा गया ॥ ४४ ॥

अशुभं चाप्ययुक्तं च सतां चैव विगर्हितम् । वक्ष्यसे चेदृशं कृत्वा सद्भिः सह समागतः ॥ ४५ ॥

भावार्थ

‘ऐसा अशुभ, अनुचित और सत्पुरुषोंद्वारा निन्दित कर्म करके आप श्रेष्ठ पुरुषोंसे मिलनेपर उनके सामने क्या कहेंगे ॥ ४५ ॥

उदासीनेषु योऽस्मासु विक्रमोऽयं प्रकाशितः । अपकारिषु ते राम नैवं पश्यामि विक्रमम् ॥ ४६ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! हम उदासीन प्राणियोंपर आपने जो यह पराक्रम प्रकट किया है, ऐसा बल-पराक्रम आप अपना अपकार करनेवालोंपर प्रकट कर रहे हों, ऐसा मुझे नहीं दिखायी देता ॥ ४६ ॥

दृश्यमानस्तु युध्येथा मया युधि नृपात्मज । अद्य वैवस्वतं देवं पश्येस्त्वं निहतो मया ॥ ४७ ॥

भावार्थ

‘राजकुमार ! यदि आप युद्धस्थलमें मेरी दृष्टिके सामने आकर मेरे साथ युद्ध करते तो आज मेरे द्वारा मारे जाकर सूर्यपुत्र यम देवताका दर्शन करते होते ॥ ४७ ॥

त्वयादृश्येन तु रणे निहतोऽहं दुरासदः । प्रसुप्तः पन्नगेनैव नरः पापवशं गतः ॥ ४८ ॥

भावार्थ

‘जैसे किसी सोये हुए पुरुषको साँप आकर डँस ले और वह मर जाय, उसी प्रकार रणभूमिमें मुझ दुर्जय वीरको आपने छिपे रहकर मारा है तथा ऐसा करके आप पापके भागी हुए हैं ॥ ४८ ॥

सुग्रीवप्रियकामेन यदहं निहतस्त्वया । मामेव यदि पूर्वं त्वमेतदर्थमचोदयः । मैथिलीमहमेकाह्ना तव चानीतवान् भवेः ॥ ४९ ॥ राक्षसं च दुरात्मानं तव भार्यापहारिणम् । कण्ठे बद्ध्वा प्रदद्यां तेऽनिहतं रावणं रणे ॥ ५० ॥

भावार्थ

‘जिस उद्देश्यको लेकर सुग्रीवका प्रिय करनेकी कामनासे आपने मेरा वध किया है, उसी उद्देश्यकी सिद्धिके लिये यदि आपने पहले मुझसे ही कहा होता तो मैं मिथिलेशकुमारी जानकीको एक ही दिनमें ढूँढ़कर आपके पास ला देता ॥ ‘आपकी पत्नीका अपहरण करनेवाले दुरात्मा राक्षस रावणको मैं युद्धमें मारे बिना ही उसके गलेमें रस्सी बाँधकर पकड़ लाता और उसे आपके हवाले कर देता ॥ ५० ॥

न्यस्तां सागरतोये वा पाताले वापि मैथिलीम् । आनयेयं तवादेशाच्छ्वेतामश्वतरीमिव ॥ ५१ ॥

भावार्थ

‘जैसे मधुकैटभद्वारा अपहृत हुई श्वेताश्वतरी श्रुतिका भगवान् हयग्रीवने उद्धार किया था, उसी प्रकार मैं आपके आदेशसे मिथिलेशकुमारी सीताको यदि वे समुद्रके जलमें या पातालमें रक्खी गयी होती तो भी वहाँसे ला देता ॥५१॥

युक्तं यत्प्राप्नुयाद् राज्यं सुग्रीवः स्वर्गते मयि । अयुक्तं यदधर्मेण त्वयाहं निहतो रणे ॥ ५२ ॥

भावार्थ

‘मेरे स्वर्गवासी हो जानेपर सुग्रीव जो यह राज्य प्राप्त करेंगे, वह तो उचित ही है । अनुचित इतना ही हुआ है कि आपने मुझे रणभूमिमें अधर्मपूर्वक मारा है ॥ ५२ ॥

काममेवंविधो लोकः कालेन विनियुज्यते । क्षमं चेद्भवता प्राप्तमुत्तरं साधु चिन्त्यताम् ॥ ५३ ॥

भावार्थ

‘यह जगत् कभी-न-कभी कालके अधीन होता ही है । इसका ऐसा स्वभाव ही है । अतः भले ही मेरी मृत्यु हो जाय । इसके लिये मुझे खेद नहीं है । परंतु मेरे इस तरह मारे जानेका यदि आपने उचित उत्तर ढूँढ़ निकाला हो तो उसे अच्छी तरह सोच-विचारकर कहिये’ ॥ ५३ ॥

इत्येवमुक्त्वा परिशुष्कवक्त्रः शराभिघाताद् व्यथितो महात्मा । समीक्ष्य रामं रविसंनिकाशं तूष्णीं बभौ वानरराजसूनुः ॥ ५४ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर महामनस्वी वानरराजकुमार वाली सूर्यके समान तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखकर चुप हो गया । उसका मुँह सूख गया था और बाणके आघातसे उसको बड़ी पीड़ा हो रही थी ॥ ५४ ॥

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