किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 16
तामेवं ब्रुवतीं तारां ताराधिपनिभाननाम् । वाली निर्भर्त्सयामास वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
तारापति चन्द्रमाके समान मुखवाली ताराको ऐसी बातें करती देख वालीने उसे फटकारा और इस प्रकार कहा–॥१॥
गर्जतोऽस्य सुसंरब्धं भ्रातुः शत्रोर्विशेषतः । मर्षयिष्यामि केनापि कारणेन वरानने ॥ २ ॥
भावार्थ
‘वरानने ! इस गर्जते हुए भाईकी, जो विशेषतः मेरा शत्रु है, यह उत्तेजनापूर्ण चेष्टा मैं किस कारणसे सहन करूँगा ॥ २ ॥
अधर्षितानां शूराणां समरेष्वनिवर्तिनाम् । धर्षणामर्षणं भीरु मरणादतिरिच्यते ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘भीरु ! जो कभी परास्त नहीं हुए और जिन्होंने युद्धके अवसरोंपर कभी पीठ नहीं दिखायी, उन शूरवीरोंके लिये शत्रुकी ललकार सह लेना मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायी होता है ॥ ३ ॥
सोढुं न च समर्थोऽहं युद्धकामस्य संयुगे । सुग्रीवस्य च संरम्भं हीनग्रीवस्य गर्जितम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘यह हीन ग्रीवावाला सुग्रीव संग्रामभूमिमें मेरे साथ युद्धकी इच्छा रखता है । मैं इसके रोषावेश और गर्जन-तर्जन-को सहन करनेमें असमर्थ हूँ ॥ ४ ॥
न च कार्यो विषादस्ते राघवं प्रति मत्कृते । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च कथं पापं करिष्यति ॥ ‘५ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजीकी बात सोचकर भी तुम्हें मेरे लिये विषाद नहीं करना चाहिये । क्योंकि वे धर्मके ज्ञाता तथा कर्तव्याकर्तव्यको समझनेवाले हैं । अतः पाप कैसे करेंगे ॥५॥
निवर्तस्व सह स्त्रीभिः कथं भूयोऽनुगच्छसि । सौहृदं दर्शितं तावन्मयि भक्तिस्त्वया कृता ॥ ६ ॥ प्रतियोत्स्याम्यहं गत्वा सुग्रीवं जहि सम्भ्रमम् । दर्पं चास्य विनेष्यामि न च प्राणैर्वियोक्ष्यते ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘तुम इन स्त्रियोंके साथ लौट जाओ । क्यों मेरे पीछे बार-बार आ रही हो । तुमने मेरे प्रति अपना स्नेह दिखाया । भक्तिका भी परिचय दे दिया । अब जाओ । घबराहट छोड़ो । मैं आगे बढ़कर सुग्रीवका सामना करूँगा । उसके घमण्डको चूर-चूर कर डालूँगा । किंतु प्राण नहीं लूँगा ॥ ६-७ ॥
अहंह्याजिस्थितस्यास्य करिष्यामि यदीप्सितम् । वृक्षैर्मुष्टिप्रहारैश्च पीडितः प्रतियास्यति ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘युद्धके मैदानमें खड़े हुए सुग्रीवकी जो-जो इच्छा है, उसे मैं पूर्ण करूँगा । वृक्षों और मुक्कोंकी मारसे पीडित होकर वह स्वयं ही भाग जायगा ॥ ८ ॥
न मे गर्वितमायस्तं सहिष्यति दुरात्मवान् । कृतं तारे सहायत्वं दर्शितं सौहृदं मयि ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘तारे ! दुरात्मा सुग्रीव मेरे युद्धविषयक दर्प और आयास ( उद्योग ) को नहीं सह सकेगा । तुमने मेरी बौद्धिक सहायता अच्छी तरह कर दी और मेरे प्रति अपना सौहार्द भी दिखा दिया ॥ ९ ॥
शापितासि मम प्राणैर्निवर्तस्व जनेन च । अलं जित्वा निवर्तिष्ये तमहं भ्रातरं रणे ॥ १० ॥
भावार्थ
‘अब मैं प्राणोंकी सौगन्ध दिलाकर कहता हूँ कि अब तुम इन स्त्रियोंके साथ लौट जाओ । अब अधिक कहनेकी आवश्यकता नहीं है, मैं युद्धमें अपने उस भाईको जीतकर लौट आऊँगा’ ॥ १० ॥
तं तु तारा परिष्वज्य वालिनं प्रियवादिनी । चकार रुदती मन्दं दक्षिणा सा प्रदक्षिणम् ॥ ११ ॥ ततः स्वस्त्ययनं कृत्वा मन्त्रविद् विजयैषिणी । अन्तःपुरं सह स्त्रीभिः प्रविष्टा शोकमोहिता ॥ १२ ॥
भावार्थ
यह सुनकर अत्यन्त उदार स्वभाववाली ताराने वालीका आलिङ्गन करके मन्द स्वरमें रोते-रोते उसकी परिक्रमा की ॥ वह पतिकी विजय चाहती थी और उसे मन्त्रका भी ज्ञान था । इसलिये उसने वालीकी मङ्गल-कामनासे स्वस्तिवाचन किया और शोकसे मोहित हो वह अन्य स्त्रियोंके साथ अन्तःपुरको चली गयी ॥ १२ ॥
प्रविष्टायां तु तारायां सह स्त्रीभिः स्वमालयम् । नगर्या निर्ययौ क्रुद्धो महासर्प इव श्वसन् ॥ १३ ॥
भावार्थ
स्त्रियोंसहित ताराके अपने महलमें चले जानेपर वाली क्रोधसे भरे हुए महान् सर्पकी भाँति लम्बी साँस खींचता हुआ नगरसे बाहर निकला ॥ १३ ॥
स निःश्वस्य महारोषो वाली परमवेगवान् । सर्वतश्चारयन् दृष्टिं शत्रुदर्शनकाङ्क्षया ॥ १४ ॥
भावार्थ
महान् रोषसे युक्त और अत्यन्त वेगशाली वाली लम्बी साँस छोड़कर शत्रुको देखनेकी इच्छासे चारों ओर अपनी दृष्टि दौड़ाने लगा ॥ १४ ॥
स ददर्श ततः श्रीमान् सुग्रीवं हेमपिङ्गलम् । सुसंवीतमवष्टब्धं दीप्यमानमिवानलम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
इतनेहीमें श्रीमान् वालीने सुवर्णके समान पिङ्गल वर्णवाले सुग्रीवको देखा, जो लँगोट बाँधकर युद्धके लिये डटकर खड़े थे और प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥१५॥
तं स दृष्ट्वा महाबाहुः सुग्रीवं पर्यवस्थितम् । गाढं परिदधे वासो वाली परमकोपनः ॥ १६ ॥
भावार्थ
सुग्रीवको खड़ा देख महाबाहु वाली अत्यन्त कुपित हो उठा । उसने अपना लँगोट भी दृढ़ताके साथ बाँध लिया ॥ १६ ॥
स वाली गाढसंवीतो मुष्टिमुद्यम्य वीर्यवान् । सुग्रीवमेवाभिमुखो ययौ योद्धुं कृतक्षणः ॥ १७ ॥
भावार्थ
लँगोटको मजबूतीके साथ कसकर पराक्रमी वाली प्रहारका अवसर देखता हुआ मुक्का तानकर सुग्रीवकी ओर चला ॥१७॥
श्लिष्टं मुष्टिं समुद्यम्य संरब्धतरमागतः । सुग्रीवोऽपि समुद्दिश्य वालिनं हेममालिनम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
सुग्रीव भी सुवर्णमालाधारी वालीके उद्देश्यसे बँधा हुआ मुक्का ताने बड़े आवेशके साथ उसकी ओर बढ़े ॥ १८ ॥
तं वाली क्रोधताम्राक्षः सुग्रीवं रणकोविदम् । आपतन्तं महावेगमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १९ ॥
भावार्थ
युद्धकलाके पण्डित महावेगशाली सुग्रीवको अपनी ओर आते देख वालीकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं और वह इस प्रकार बोला—॥ १९ ॥
एष मुष्टिर्महान् बद्धो गाढः सुनियताङ्गुलिः । मया वेगविमुक्तस्ते प्राणानादाय यास्यति ॥ २० ॥
भावार्थ
‘सुग्रीव ! देख ले । यह बड़ा भारी मुक्का खूब कसकर बँधा हुआ है । इसमें सारी अङ्गुलियाँ सुनियन्त्रितरूपसे परस्पर सटी हुई हैं । मेरे द्वारा वेगपूर्वक चलाया हुआ यह मुक्का तेरे प्राण लेकर ही जायगा’ ॥ २० ॥
एवमुक्तस्तु सुग्रीवः क्रुद्धो वालिनमब्रवीत् । तव चैष हरन् प्राणान् मुष्टिः पततु मूर्धनि ॥ २१ ॥
भावार्थ
वालीके ऐसा कहनेपर सुग्रीव क्रोधपूर्वक उससे बोले— ‘मेरा यह मुक्का भी तेरे प्राण लेनेके लिये तेरे मस्तकपर गिरे’ ॥ २१ ॥
ताडितस्तेन तं क्रुद्धः समभिक्रम्य वेगतः । अभवच्छोणितोद्गारी सापीड इव पर्वतः ॥ २२ ॥
भावार्थ
इतनेहीमें वालीने वेगपूर्वक आक्रमण करके सुग्रीवपर मुक्केका प्रहार किया । उस चोटसे घायल एवं कुपित हुए सुग्रीव झरनोंसे युक्त पर्वतकी भाँति मुँहसे रक्त वमन करने लगे ॥ २२ ॥
सुग्रीवेण तु निःशङ्कं सालमुत्पाट्य तेजसा । गात्रेष्वभिहतो वाली वज्रेणेव महागिरिः ॥ २३ ॥ स तु वृक्षेण निर्भग्नः सालताडनविह्वलः । गुरुभारभराक्रान्ता नौः ससार्थेव सागरे ॥ २४ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् सुग्रीवने भी निःशङ्क होकर बलपूर्वक एक सालवृक्षको उखाड़ लिया और उसे वालीके शरीरपर दे मारा, मानो इन्द्रने किसी विशाल पर्वतपर वज्रका प्रहार किया हो ॥ उस वृक्षकी चोटसे वालीके शरीरमें घाव हो गया । उस आघातसे विह्वल हुआ वाली व्यापारियोंके समूहके चढ़नेसे भारी भारके द्वारा दबकर समुद्रमें डगमगाती हुई नौकाके समान काँपने लगा ॥ २४ ॥
तौ भीमबलविक्रान्तौ सुपर्णसमवेगितौ । प्रवृद्धौ घोरवपुषौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ॥ २५ ॥
भावार्थ
उन दोनों भाइयोंका बल और पराक्रम भयंकर था । दोनोंके ही वेग गरुड़के समान थे । वे दोनों भयंकर रूप धारण करके बड़े जोरसे जूझ रहे थे और पूर्णिमाके आकाशमें चन्द्रमा और सूर्यके समान दिखायी देते थे ॥२५॥
परस्परममित्रघ्नौ छिद्रान्वेषणतत्परौ । ततोऽवर्धत वाली तु बलवीर्यसमन्वितः ॥ २६ ॥ सूर्यपुत्रो महावीर्यः सुग्रीवः परिहीयत ।
भावार्थ
वे शत्रुसूदन वीर अपने विपक्षीको मार डालनेकी इच्छासे एक-दूसरेकी दुर्बलता ढूँढ़ रहे थे; परंतु उस युद्धमें बल-विक्रमसम्पन्न वाली बढ़ने लगा और महापराक्रमी सूर्यपुत्र सुग्रीवकी शक्ति क्षीण होने लगी ॥ २६½ ॥
वालिना भग्नदर्पस्तु सुग्रीवो मन्दविक्रमः ॥ २७ ॥ वालिनं प्रति सामर्षो दर्शयामास राघवम् ।
भावार्थ
वालीने सुग्रीवका घमण्ड चूर्ण कर दिया । उनका पराक्रम मन्द पड़ने लगा । तब वालीके प्रति अमर्षमें भरे हुए सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीको अपनी अवस्थाका लक्ष्य कराया ॥२७½॥
वृक्षैः सशाखैः शिखरैर्वज्रकोटिनिभैर्नखैः ॥ २८ ॥ मुष्टिभिर्जानुभिः पद्भिर्बाहुभिश्च पुनः पुनः । तयोर्युद्धमभूद्घोरं वृत्रवासवयोरिव ॥ २९ ॥
भावार्थ
इसके बाद डालियोंसहित वृक्षों, पर्वतके शिखरों, वज्रके समान भयंकर नखों, मुक्कों, घुटनों, लातों और हाथोंकी मारसे उन दोनोंमें इन्द्र और वृत्रासुरकी भाँति भयंकर संग्राम होने लगा ॥ २८-२९ ॥
तौ शोणिताक्तौ युध्येतां वानरौ वनचारिणौ । मेघाविव महाशब्दैस्तर्जमानौ परस्परम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
वे दोनों वनचारी वानर लहूलुहान होकर लड़ रहे थे और दो बादलोंकी तरह अत्यन्त भयंकर गर्जना करते हुए एक-दूसरेको डाँट रहे थे ॥ ३० ॥
हीयमानमथापश्यत् सुग्रीवं वानरेश्वरम् । प्रेक्षमाणं दिशश्चैव राघवः स मुहुर्मुहुः ॥ ३१ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीने देखा, वानरराज सुग्रीव कमजोर पड़ रहे हैं और बारंबार इधर-उधर दृष्टि दौड़ा रहे हैं ॥ ३१ ॥
ततो रामो महातेजा आर्तं दृष्ट्वा हरीश्वरम् । स शरं वीक्षते वीरो वालिनो वधकाङ्क्षया ॥ ३२ ॥
भावार्थ
वानरराजको पीड़ित देख महातेजस्वी श्रीरामने वालीके वधकी इच्छासे अपने बाणपर दृष्टिपात किया ॥ ३२ ॥
ततो धनुषि संधाय शरमाशीविषोपमम् । पूरयामास तच्चापं कालचक्रमिवान्तकः ॥ ३३ ॥
भावार्थ
उन्होंने अपने धनुषपर विषधर सर्पके समान भयंकर बाण रक्खा और उसे जोरसे खींचा, मानो यमराजने कालचक्र उठा लिया हो ॥ ३३ ॥
तस्य ज्यातलघोषेण त्रस्ताः पत्ररथेश्वराः । प्रदुद्रुवुर्मृगाश्चैव युगान्त इव मोहिताः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
उसकी प्रत्यञ्चाकी टङ्कारध्वनिसे भयभीत हो बड़े-बड़े पक्षी और मृग भाग खड़े हुए । वे प्रलयकालके समय मोहित हुए जीवोंके समान किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये ॥ ३४ ॥
मुक्तस्तु वज्रनिर्घोषः प्रदीप्ताशनिसंनिभः । राघवेण महाबाणो वालिवक्षसि पातितः ॥ ३५ ॥ ततस्तेन महातेजा वीर्ययुक्तः कपीश्वरः । वेगेनाभिहतो वाली निपपात महीतले ॥ ३६ ॥
भावार्थ
श्रीरघुनाथजीने वज्रकी भाँति गड़गड़ाहट और प्रज्वलित अशनिकी भाँति प्रकाश पैदा करनेवाला वह महान् बाण छोड़ दिया तथा उसके द्वारा वालीके वक्षःस्थलपर चोट पहुँचायी ॥ उस बाणसे वेगपूर्वक आहत हो महातेजस्वी पराक्रमी वानरराज वाली तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ३६ ॥
इन्द्रध्वज इवोद्धूतः पौर्णमास्यां महीतले । आश्वयुक्समये मासि गतश्रीको विचेतनः । बाष्पसंरुद्धकण्ठस्तु वाली चार्तस्वरः शनैः ॥ ३७ ॥
भावार्थ
आश्विनकी पूर्णिमाके दिन इन्द्रध्वजोत्सवके अन्तमें ऊपर फेंका गया इन्द्रध्वज जैसे पृथ्वीपर गिर पड़ता है, उसी प्रकार वाली ग्रीष्मऋतुके अन्तमें श्रीहीन, अचेत और आँसुओंसे गद्गदकण्ठ हो धराशायी हो गया और धीरे-धीरे आर्तनाद करने लगा ॥ ३७ ॥
नरोत्तमः काल युगान्तकोपमं शरोत्तमं काञ्चनरूप्यभूषितम् । ससर्ज दीप्तं तममित्रमर्दनं सधूममग्निं मुखतो यथा हरः ॥ ३८ ॥
भावार्थ
श्रीरामका वह उत्तम बाण युगान्तकालके समान भयंकर तथा सोने-चाँदीसे विभूषित था । पूर्वकालमें महादेवजीने जैसे अपने मुखसे ( मुख-मण्डलके अन्तर्गत ललाटवर्ती नेत्रसे ) शत्रुभूत कामदेवका नाश करनेके लिये धूमयुक्त अग्निकी सृष्टि की थी, उसी प्रकार पुरुषोत्तम श्रीरामने सुग्रीवशत्रु वालीका मर्दन करनेके लिये उस प्रज्वलित बाणको छोड़ा था ॥ ३८ ॥
अथोक्षितः शोणिततोयविस्रवैः सुपुष्पिताशोक इवानिलोद्धतः। विचेतनो वासवसूनुराहवे प्रभ्रंशितेन्द्रध्वजवत् क्षितिं गतः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
इन्द्रकुमार वालीके शरीरसे पानीके समान रक्तकी धारा बहने लगी । वह उससे नहा गया और अचेत हो वायुके उखाड़े हुए पुष्पित अशोकवृक्ष एवं आकाशसे नीचे गिरे हुए इन्द्रध्वजके समान समराङ्गणमें पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥३९॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें