किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 19
स वानरमहाराजः शयानः शरपीडितः । प्रत्युक्तो हेतुमद्वाक्यैर्नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥ १ ॥
भावार्थ
वानरोंका महाराज वाली बाणसे पीड़ित होकर भूमिपर पड़ा था । श्रीरामचन्द्रजीके युक्तियुक्त वचनोंद्वारा अपनी बातका उत्तर पाकर उसे फिर कोई जवाब न सूझा ॥ १ ॥
अश्मभिः परिभिन्नाङ्गः पादपैराहतो भृशम् । रामबाणेन चाक्रान्तो जीवितान्ते मुमोह सः ॥ २ ॥
भावार्थ
पत्थरोंकी मार पड़नेसे उसके अङ्ग टूट-फूट गये थे । वृक्षोंके आघातसे भी वह बहुत घायल हो गया था और श्रीरामके बाणसे आक्रान्त होकर तो वह जीवनके अन्तकालमें ही पहुँच गया था । उस समय वह मूर्छित हो गया ॥ २ ॥
तं भार्या बाणमोक्षेण रामदत्तेन संयुगे। हतं प्लवगशार्दूलं तारा शुश्राव वालिनम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
उसकी पत्नी ताराने सुना कि युद्धस्थलमें वानरश्रेष्ठ वाली श्रीरामके चलाये हुए बाणसे मारे गये ॥ ३ ॥
सा सपुत्राप्रियं श्रुत्वा वधं भर्तुः सुदारुणम् । निष्पपात भृशं तस्मादुद्विग्ना गिरिकन्दरात् ॥ ४ ॥
भावार्थ
अपने स्वामीके वधका अत्यन्त भयंकर एवं अप्रिय समाचार सुनकर वह बहुत उद्विग्न हो उठी और अपने पुत्र अङ्गदको साथ ले उस पर्वतकी कन्दरासे बाहर निकली ॥४॥
ये त्वङ्गदपरीवारा वानरा हि महाबलाः । ते सकार्मुकमालोक्य रामं त्रस्ताः प्रदुद्रुवुः ॥ ५ ॥
भावार्थ
अङ्गदको चारों ओरसे घेरकर उनकी रक्षा करनेवाले जो महाबली वानर थे, वे श्रीरामचन्द्रजीको धनुष लिये देख भयभीत होकर भाग चले ॥ ५ ॥
सा ददर्श ततस्त्रस्तान् हरीनापततो द्रुतम् । यूथादेव परिभ्रष्टान् मृगान् निहतयूथपान् ॥ ६ ॥
भावार्थ
ताराने वेगसे भागकर आते हुए उन भयभीत वानरोंको देखा । वे जिनके यूथपति मारे गये हों, उन यूथभ्रष्ट मृगोंके समान जान पड़ते थे ॥ ६ ॥
तानुवाच समासाद्य दुःखितान् दुःखिता सती । रामवित्रासितान् सर्वाननुबद्धानिवेषुभिः ॥ ७ ॥
भावार्थ
वे सब वानर श्रीरामसे इस प्रकार डरे हुए थे, मानो उनके बाण इनके पीछे आ रहे हों । उन दुखी वानरोंके पास पहुँचकर सती-साध्वी तारा और भी दुखी हो गयी तथा उनसे इस प्रकार बोली—॥ ७ ॥
वानरा राजसिंहस्य यस्य यूयं पुरःसराः । तं विहाय सुवित्रस्ताः कस्माद् द्रवत दुर्गताः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘वानरो ! तुम तो उन राजसिंह वालीके आगे-आगे चलनेवाले थे । अब उन्हें छोड़कर अत्यन्त भयभीत हो दुर्गतिमें पड़कर क्यों भागे जा रहे हो ? ॥ ८ ॥
राज्यहेतोः स चेद् भ्राता भ्रात्रा क्रूरेण पातितः । रामेण प्रहितैर्दूरान्मार्गणैर्दूरपातिभिः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘यदि राज्यके लोभसे उस क्रूर भाई सुग्रीवने श्रीरामको प्रेरित करके उनके द्वारा दूरसे चलाये हुए और दूरतक जानेवाले बाणोंद्वारा अपने भाईको मरवा दिया है तो तुमलोग क्यों भागे जा रहे हो ?’ ॥ ९ ॥
कपिपत्न्या वचः श्रुत्वा कपयः कामरूपिणः । प्राप्तकालमविलिष्टमूचुर्वचनमङ्गनाम् ॥ १० ॥
भावार्थ
वालीकी पत्नीका वह वचन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले उन वानरोंने कल्याणमयी तारा देवीको सम्बोधित करके सर्वसम्मतिसे स्पष्ट शब्दोंमें यह समयोचित बात कही—॥ १० ॥
जीवपुत्रे निवर्तस्व पुत्रं रक्षस्व चाङ्गदम् । अन्तको रामरूपेण हत्वा नयति वालिनम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘देवि ! अभी तुम्हारा पुत्र जीवित है । तुम लौट चलो और अपने पुत्र अङ्गदकी रक्षा करो । श्रीरामका रूप धारण करके स्वयं यमराज आ पहुँचा है, जो वालीको मारकर अपने साथ ले जा रहा है ॥ ११ ॥
क्षिप्तान् वृक्षान् समाविध्य विपुलाश्च तथा शिलाः । वाली वज्रसमैर्बाणैर्वज्रेणेव निपातितः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘वालीके चलाये हुए वृक्षों और बड़ी-बड़ी शिलाओंको अपने वज्रतुल्य बाणोंसे विदीर्ण करके श्रीरामने वालीको मार गिराया है । मानो वज्रधारी इन्द्रने अपने वज्रके द्वारा किसी महान् पर्वतको धराशायी कर दिया हो ॥ १२ ॥
अभिभूतमिदं सर्वं विद्रुतं वानरं बलम् । अस्मिन् प्लवगशार्दूले हते शक्रसमप्रभे ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘इन्द्रके समान तेजस्वी इन वानरश्रेष्ठ वालीके मारे जानेपर यह सारी वानर-सेना श्रीरामसे पराजित-सी होकर भाग खड़ी हुई है ॥ १३ ॥
रक्ष्यतां नगरी शूरैरङ्गदश्चाभिषिच्यताम् । पदस्थं वालिनः पुत्रं भजिष्यन्ति प्लवंगमाः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘तुम शूरवीरोंद्वारा इस नगरीकी रक्षा करो । कुमार अङ्गदका किष्किन्धाके राज्यपर अभिषेक कर दो । राजसिंहासनपर बैठे हुए वालिकुमार अङ्गदकी सभी वानर सेवा करेंगे ॥ १४ ॥
अथवारुचितं स्थानमिह ते रुचिरानने। आविशन्ति च दुर्गाणि क्षिप्रमद्यैव वानराः ॥ १५ ॥ अभार्याः सहभार्याश्च सन्त्यत्र वनचारिणः । लुब्धेभ्यो विप्रलब्धेभ्यस्तेभ्यो नः सुमहद्भयम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘अथवा सुमुखि! अब इस नगरमें तुम्हारा रहना हमें अच्छा नहीं जान पड़ता; क्योंकि किष्किन्धाके दुर्गम स्थानोंमें अभी सुग्रीवपक्षीय वानर शीघ्र प्रवेश करेंगे । यहाँ बहुत-से ऐसे वनचारी वानर हैं, जिनमेंसे कुछ तो अपनी स्त्रियोंके साथ हैं और कुछ स्त्रियोंसे बिछुड़े हुए हैं । उनमें राज्यविषयक लोभ पैदा हो गया है और पहले हमलोगोंके द्वारा राज्य-सुखसे वञ्चित किये गये हैं । अतः इस समय उन सबसे हमलोगोंको महान् भय प्राप्त हो सकता है’ ॥ १५-१६ ॥
अल्पान्तरगतानां तु श्रुत्वा वचनमङ्गना । आत्मनः प्रतिरूपं सा बभाषे चारुहासिनी ॥ १७ ॥
भावार्थ
अभी थोड़ी ही दूरतक आये हुए उन वानरोंकी यह बात सुनकर मनोहर हासवाली कल्याणी ताराने उन्हें अपने अनुरूप उत्तर दिया—॥ १७ ॥
पुत्रेण मम किं कार्यं राज्येनापि किमात्मना। कपिसिंहे महाभागे तस्मिन् भर्तरि नश्यति ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘वानरो ! जब मेरे महाभाग पतिदेव कपिसिंह वाली ही नष्ट हो रहे हैं, तब मुझे पुत्रसे, राज्यसे तथा अपने इस जीवनसे भी क्या प्रयोजन है ? ॥ १८ ॥
पादमूलं गमिष्यामि तस्यैवाहं महात्मनः। योऽसौ रामप्रयुक्तेन शरेण विनिपातितः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘मैं तो, जिन्हें श्रीरामके चलाये हुए बाणने मार गिराया है, उन महात्मा वालीके चरणोंके समीप ही जाऊँगी’ ॥१९॥
एवमुक्त्वा प्रदुद्राव रुदती शोकमूर्च्छिता। शिरश्चोरश्च बाहुभ्यां दुःखेन समभिघ्नती ॥ २० ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर शोकसे व्याकुल हुई तारा रोती और अपने दोनों हाथोंसे दुःखपूर्वक सिर एवं छाती पीटती हुई बड़े जोरसे दौड़ी ॥ २० ॥
सा व्रजन्ती ददर्शाथ पतिं निपतितं भुवि। हन्तारं दानवेन्द्राणां समरेष्वनिवर्तिनाम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
आगे बढ़ती हुई ताराने देखा, जो युद्धमें कभी पीठ न दिखानेवाले दानवराजोंका भी वध करनेमें समर्थ थे, वे मेरे पति वानरराज वाली पृथ्वीपर पड़े हुए हैं ॥ २१ ॥
क्षेप्तारं पर्वतेन्द्राणां वज्राणामिव वासवम्। महावातसमाविष्टं महामेघौघनिःस्वनम् ॥ २२ ॥ शक्रतुल्यपराक्रान्तं वृष्ट्वोपरतं घनम्। नर्दन्तं नर्दतां भीमं शूरं शूरेण पातितम्। शार्दूलेनामिषस्यार्थे मृगराजमिवाहतम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
वज्र चलानेवाले इन्द्रके समान जो रणभूमिमें बड़े-बड़े पर्वतोंको उठाकर फेंकते थे, जिनके वेगमें प्रचण्ड आँधीका समावेश था, जिनका सिंहनाद महान् मेघोंकी गम्भीर गर्जनाको भी तिरस्कृत कर देता था तथा जो इन्द्रके तुल्य पराक्रमी थे, वे ही इस समय वर्षा करके शान्त हुए बादलके समान चेष्टासे विरत हो गये हैं । जो स्वयं गर्जना करके गर्जनेवाले वीरोंके मनमें भय उत्पन्न कर देते थे, वे शूरवीर वाली एक दूसरे शूरवीरके द्वारा मार गिराये गये हैं । जैसे मांसके लिये एक सिंहने दूसरे सिंहको मार डाला हो, उसी प्रकार राज्यके लिये अपने भाईके द्वारा ही इनका वध किया गया है ॥२२-२३॥
अर्चितं सर्वलोकस्य सपताकं सवेदिकम्। नागहेतोः सुपर्णेन चैत्यमुन्मथितं यथा ॥ २४ ॥
भावार्थ
जो सब लोगोंके द्वारा पूजित हो, जहाँ पताका फहरायी गयी हो तथा जिसके पास देवताकी वेदी शोभा पाती हो, उस चैत्य वृक्ष या देवालयको वहाँ छिपे हुए किसी नागको पकड़नेके लिये यदि गरुड़ने मथ डाला हो—नष्ट-भ्रष्ट कर दिया हो तो उसकी जैसी दुरवस्था देखी जाती है, वैसी ही दशा आज वालीकी हो रही है ( यह सब ताराने देखा ) ॥ २४ ॥
अवष्टभ्यावतिष्ठन्तं ददर्श धनुरूर्जितम्। रामं रामानुजं चैव भर्तुश्चैव तथानुजम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
आगे जानेपर उसने देखा, अपने तेजस्वी धनुषको धरतीपर टेककर उसके सहारे श्रीरामचन्द्रजी खड़े हैं । साथ ही उनके छोटे भाई लक्ष्मण हैं और वहीं पतिके छोटे भाई सुग्रीव भी मौजूद हैं ॥ २५ ॥
तानतीत्य समासाद्य भर्तारं निहतं रणे। समीक्ष्य व्यथिता भूमौ सम्भ्रान्ता निपपात ह ॥ २६ ॥
भावार्थ
उन सबको पार करके वह रणभूमिमें घायल पड़े हुए अपने पतिके पास पहुँची । उन्हें देखकर उसके मनमें बड़ी व्यथा हुई और वह अत्यन्त व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २६ ॥
सुप्तेव पुनरुत्थाय आर्यपुत्रेति वादिनी। रुरोद सा पतिं दृष्ट्वा संवीतं मृत्युदामभिः ॥ २७ ॥
भावार्थ
फिर मानो वह सोकर उठी हो, इस प्रकार ‘हा आर्यपुत्र !’ कहकर मृत्युपाशसे बँधे हुए पतिकी ओर देखती हुई रोने लगी ॥ २७ ॥
तामवेक्ष्य तु सुग्रीवः क्रोशन्तीं कुररीमिव। विषादमगमत् कष्टं दृष्ट्वा चाङ्गदमागतम् ॥ २८ ॥
भावार्थ
उस समय कुररीके समान करुण क्रन्दन करती हुई तारा तथा उसके साथ आये हुए अङ्गदको देखकर सुग्रीवको बड़ा कष्ट हुआ । वे विषादमें डूब गये ॥ २८ ॥
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