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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 13

ऋष्यमूकात् स धर्मात्मा किष्किन्धां लक्ष्मणाग्रजः । जगाम सह सुग्रीवो वालिविक्रमपालिताम् ॥ १ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणके बड़े भाई धर्मात्मा श्रीराम सुग्रीवको साथ लेकर पुनः ऋष्यमूकसे उस किष्किन्धापुरीकी ओर चले, जो वालीके पराक्रमसे सुरक्षित थी ॥ १ ॥

समुद्यम्य महच्चापं रामः काञ्चनभूषितम् । शरांश्चादित्यसंकाशान् गृहीत्वा रणसाधकान् ॥ २ ॥

भावार्थ

अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषको उठाकर और युद्धमें सफलता दिखानेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी बाणोंको लेकर श्रीराम वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ २ ॥

अग्रतस्तु ययौ तस्य राघवस्य महात्मनः । सुग्रीवः संहतग्रीवो लक्ष्मणश्च महाबलः ॥ ३ ॥

भावार्थ

महात्मा रघुनाथजीके आगे-आगे सुगठित ग्रीवावाले सुग्रीव और महाबली लक्ष्मण चल रहे थे ॥ ३ ॥

पृष्ठतो हनुमान् वीरो नलो नीलश्च वीर्यवान् । तारश्चैव महातेजा हरियूथपयूथपः ॥ ४ ॥

भावार्थ

और उनके पीछे वीर हनुमान्, नल, पराक्रमी नील तथा वानर-यूथपोंके भी यूथपति महातेजस्वी तार चल रहे थे ॥४॥

ते वीक्षमाणा वृक्षांश्च पुष्पभारावलम्बिनः । प्रसन्नाम्बुवहाश्चैव सरितः सागरंगमाः ॥ ५ ॥ कन्दराणि च शैलांश्च निर्दराणि गुहास्तथा । शिखराणि च मुख्यानि दरीश्च प्रियदर्शनाः ॥ ६ ॥

भावार्थ

वे सब लोग फूलोंके भारसे झुके हुए वृक्षों, स्वच्छ जलवाली समुद्रगामिनी नदियों, कन्दराओं, पर्वतों, शिला-विवरों, गुफाओं, मुख्य-मुख्य शिखरों और सुन्दर दिखायी देनेवाली गहन गुफाओंको देखते हुए आगे बढ़ने लगे ॥ ५-६ ॥

वैदूर्यविमलैस्तोयैः पद्मैश्चाकोशकुड्मलैः । शोभितान् सजलान् मार्गे तटाकांश्चावलोकयन् ॥७॥

भावार्थ

उन्होंने मार्गमें ऐसे सजल सरोवरोंको भी देखा, जो वैदूर्यमणिके समान रंगवाले, निर्मल जल तथा कम खिले हुए मुकुलयुक्त कमलोंसे सुशोभित थे ॥ ७ ॥

कारण्डैः सारसैर्हंसैर्वञ्जुलैर्जलकुक्कुटैः । चक्रवाकैस्तथा चान्यैः शकुनैः प्रतिनादितान् ॥ ८ ॥

भावार्थ

कारण्डव, सारस, हंस, वञ्जुल, जलमुर्ग, चक्रवाक तथा अन्य पक्षी उन सरोवरोंमें चहचहा रहे थे । उन सबकी प्रतिध्वनि वहाँ गूँज रही थी ॥ ८ ॥

मृदुशष्पाङ्कुराहारान्निर्भयान् वनगोचरान् । चरतः सर्वतः पश्यन् स्थलीषु हरिणान् स्थितान् ॥

भावार्थ

स्थलोंमें सब ओर हरी-हरी कोमल घासके अङ्कुरोंका आहार करनेवाले वनचारी हरिण कहीं निर्भय होकर चरते थे और कहीं खड़े दिखायी देते थे ( इन सबको देखते हुए श्रीराम आदि किष्किन्धाकी ओर जा रहे थे ) ॥ ९ ॥

तटाकवैरिणश्चापि शुक्लदन्तविभूषितान् । घोरानेकचरान् वन्यान् द्विरदान् कूलघातिनः ॥ १० ॥ मत्तान् गिरितटोत्कृष्टान् पर्वतानिव जङ्गमान् । वानरान् द्विरदप्रख्यान् महीरेणुसमुक्षितान् ॥ ११ ॥ वने वनचरांश्चान्यान् खेचरांश्च विहंगमान् । पश्यन्तस्त्वरिता जग्मुः सुग्रीववशवर्तिनः ॥ १२ ॥

भावार्थ

जो सफेद दाँतोंसे सुशोभित थे, देखनेमें भयंकर थे, अकेले विचरते थे और किनारोंको खोदकर नष्ट कर देनेके कारण सरोवरोंके शत्रु समझे जाते थे, ऐसे दो दाँतोंवाले मदमत्त जङ्गली हाथी चलते-फिरते पर्वतोंके समान जाते दिखायी देते थे । उन्होंने अपने दाँतोंसे पर्वतके तटप्रान्तको विदीर्ण कर दिया था । कहीं हाथी-जैसे विशालकाय वानर दृष्टिगोचर होते थे, जो धरतीकी धूलसे नहा उठे थे । इनके सिवा उस वनमें और भी बहुत-से जंगली जीव-जन्तु तथा आकाशचारी पक्षी विचरते देखे जाते थे । इन सबको देखते हुए श्रीराम आदि सब लोग सुग्रीवके वशवर्ती हो तीव्र गतिसे आगे बढ़ने लगे ॥ १०–१२ ॥

तेषां तु गच्छतां तत्र त्वरितं रघुनन्दनः । द्रुमषण्डवनं दृष्ट्वा रामः सुग्रीवमब्रवीत् ॥ १३ ॥

भावार्थ

उन यात्रा करनेवाले लोगोंमें वहाँ रघुकुलनन्दन श्रीरामने वृक्षसमूहोंसे सघन वनको देखकर सुग्रीवसे पूछा–॥१३॥

एष मेघ इवाकाशे वृक्षषण्डः प्रकाशते । मेघसंघातविपुलः पर्यन्तकदलीवृतः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘वानरराज ! आकाशमें मेघकी भाँति जो यह वृक्षोंका समूह प्रकाशित हो रहा है, क्या है ? यह इतना विस्तृत है कि मेघोंकी घटाके समान छा रहा है । इसके किनारे-किनारे केलेके वृक्ष लगे हुए हैं, जिनसे यह घिरा वृक्ष-समूह घिर गया है ॥ १४ ॥

किमेतज्ज्ञातुमिच्छामि सखे कौतूहलं मम । कौतूहलापनयनं कर्तुमिच्छाम्यहं त्वया ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘सखे ! यह कौन-सा वन है, यह मैं जानना चाहता हूँ । इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है । मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे द्वारा मेरे इस कौतूहलका निवारण हो’ ॥१५॥

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः । गच्छन्नेवाचचक्षेऽथ सुग्रीवस्तन्महद् वनम् ॥ १६ ॥

भावार्थ

महात्मा रघुनाथजीकी यह बात सुनकर सुग्रीवने चलते-चलते ही उस विशाल वनके विषयमें बताना आरम्भ किया ॥ १६ ॥

एतद् राघव विस्तीर्णमाश्रमं श्रमनाशनम् । उद्यानवनसम्पन्नं स्वादुमूलफलोदकम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! यह एक विस्तृत आश्रम है, जो सबके श्रमका निवारण करनेवाला है । यह उद्यानों और उपवनोंसे युक्त है । यहाँ स्वादिष्ट फल-मूल और जल सुलभ होते हैं ॥ १७ ॥

अत्र सप्तजना नाम मुनयः संशितव्रताः । सप्तैवासन्नधःशीर्षा नियतं जलशायिनः ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘इस आश्रममें सप्तजन नामसे प्रसिद्ध सात ही मुनि रहते थे, जो कठोर व्रतके पालनमें तत्पर थे । वे नीचे सिर करके तपस्या करते थे । नियमपूर्वक रहकर जलमें शयन करनेवाले थे ॥ १८ ॥

सप्तरात्रे कृताहारा वायुनाचलवासिनः । दिवं वर्षशतैर्याताः सप्तभिः सकलेवराः ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘सात दिन और सात रात व्यतीत करके वे केवल वायुका आहार करते थे तथा एक स्थानपर निश्चल भावसे रहते थे । इस प्रकार सात सौ वर्षोंतक तपस्या करके वे सशरीर स्वर्गलोकको चले गये ॥ १९ ॥

तेषामेतत्प्रभावेण द्रुमप्राकारसंवृतम् । आश्रमं सुदुराधर्षमपि सेन्द्रैः सुरासुरैः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘उन्हींके प्रभावसे सघन वृक्षोंकी चहारदीवारीसे घिरा हुआ यह आश्रम इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्धर्ष बना हुआ है ॥ २० ॥

पक्षिणो वर्जयन्त्येतत् तथान्ये वनचारिणः । विशन्ति मोहाद् येऽप्यत्र न निवर्तन्ति ते पुनः ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘पक्षी तथा दूसरे वनचर जीव इसे दूरसे ही त्याग देते हैं। जो मोहवश इसके भीतर प्रवेश करते हैं, वे फिर कभी नहीं लौटते हैं ॥ २१ ॥

विभूषणरवाश्चात्र श्रूयन्ते सकलाक्षराः । तूर्यगीतस्वनश्चापि गन्धो दिव्यश्च राघव ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! यहाँ मधुर अक्षरवाली वाणीके साथ-साथ आभूषणोंकी झनकारें भी सुनी जाती हैं । वाद्य और गीतकी मधुर ध्वनि भी कानोंमें पड़ती है और दिव्य सुगन्धका भी अनुभव होता है ॥ २२ ॥

त्रेताग्नयोऽपि दीप्यन्ते धूमो ह्येष प्रदृश्यते । वेष्टयन्निव वृक्षाग्रान् कपोताङ्गारुणो घनः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘यहाँ आहवनीय आदि त्रिविध अग्नियाँ भी प्रज्वलित होती हैं । यह कबूतरके अंगोंकी भाँति धूसर रंगवाला घना धूम उठता दिखायी देता है, जो वृक्षोंकी शिखाओंको आवेष्टित-सा कर रहा है ॥ २३ ॥

एते वृक्षाः प्रकाशन्ते धूमसंसक्तमस्तकाः । मेघजालप्रतिच्छन्ना वैदूर्यगिरयो यथा ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘जिनके शिखाओंपर होम-धूम छा रहे हैं, वे ये वृक्ष मेघसमूहोंसे आच्छादित हुए नीलमके पर्वतोंकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं ॥ २४ ॥

कुरु प्रणामं धर्मात्मंस्तेषामुद्दिश्य राघव । लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा प्रयतः संहताञ्जलिः ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘धर्मात्मा रघुनन्दन ! आप मनको एकाग्र करके दोनों हाथ जोड़कर भाई लक्ष्मणके साथ उन मुनियोंके उद्देश्यसे प्रणाम कीजिये ॥ २५ ॥

प्रणमन्ति हि ये तेषामृषीणां भावितात्मनाम् । न तेषामशुभं किंचिच्छरीरे राम विद्यते ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! जो उन पवित्र अन्तःकरणवाले ऋषियोंको प्रणाम करते हैं, उनके शरीरमें किंचिन्मात्र भी अशुभ नहीं रह जाता है’ ॥ २६ ॥

ततो रामः सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन कृताञ्जलिः । समुद्दिश्य महात्मानस्तानृषीनभ्यवादयत् ॥ २७ ॥

भावार्थ

तब भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामने हाथ जोड़कर उन महात्मा ऋषियोंके उद्देश्यसे प्रणाम किया ॥ २७ ॥

अभिवाद्य च धर्मात्मा रामो भ्राता च लक्ष्मणः । सुग्रीवो वानराश्चैव जग्मुः संहृष्टमानसाः ॥ २८ ॥

भावार्थ

धर्मात्मा श्रीराम, उनके छोटे भाई लक्ष्मण, सुग्रीव तथा अन्य सभी वानर उन ऋषियोंको प्रणाम करके प्रसन्नचित्त हो आगे बढ़े ॥ २८ ॥

ते गत्वा दूरमध्वानं तस्मात् सप्तजनाश्रमात् । दद्दशुस्तां दुराधर्षां किष्किन्धां वालिपालिताम् ॥ २९ ॥

भावार्थ

उस सप्तजनाश्रमसे दूरतकका मार्ग तय कर लेनेके पश्चात् उन सबने वालीद्वारा सुरक्षित किष्किन्धापुरीको देखा ॥ २९ ॥

ततस्तु रामानुजरामवानराः प्रगृह्य शस्त्राण्युदितोग्रतेजसः । पुरीं सुरेशात्मजवीर्यपालितां वधाय शत्रोः पुनरागतास्त्विह ॥ ३० ॥

भावार्थ

तदनन्तर श्रीरामके छोटे भाई लक्ष्मण, श्रीराम तथा वानर, जिनका उग्रतेज उदित हुआ था, हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर इन्द्रकुमार वालीके पराक्रमसे पालित किष्किन्धापुरीमें शत्रुवधके निमित्त पुनः आ पहुँचे ॥ ३० ॥

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