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किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 12

एतच्च वचनं श्रुत्वा सुग्रीवस्य सुभाषितम् । प्रत्ययार्थं महातेजा रामो जग्राह कार्मुकम् ॥ १ ॥

भावार्थ

सुग्रीवके सुन्दर ढंगसे कहे हुए इस वचनको सुनकर महातेजस्वी श्रीरामने उन्हें विश्वास दिलानेके लिये धनुष हाथमें लिया ॥ १ ॥

स गृहीत्वा धनुर्घोरं शरमेकं च मानदः । सालमुद्दिश्य चिक्षेप पूरयन् स रवैर्दिशः ॥ २ ॥

भावार्थ

दूसरोंको मान देनेवाले श्रीरघुनाथजीने वह भयंकर धनुष और एक बाण लेकर धनुषकी टंकारसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजाते हुए उस बाणको सालवृक्षकी ओर छोड़ दिया ॥ २॥

स विसृष्टो बलवता बाणः स्वर्णपरिष्कृतः । भित्त्वा सालान् गिरिप्रस्थं सप्तभूमिं विवेश ह॥ ३ ॥

भावार्थ

उन बलवान् वीरशिरोमणिके द्वारा छोड़ा गया वह सुवर्णभूषित बाण उन सातों सालवृक्षोंको एक ही साथ बींधकर पर्वत तथा पृथ्वीके सातों तलोंको छेदता हुआ पातालमें चला गया ॥ ३ ॥

सायकस्तु मुहूर्तेन सालान् भित्त्वा महाजवः । निष्पत्य च पुनस्तूर्णं तमेव प्रविवेश ह ॥ ४ ॥

भावार्थ

इस प्रकार एक ही मुहूर्तमें उन सबका भेदन करके वह महान् वेगशाली बाण पुनः वहाँसे निकलकर उनके तरकसमें ही प्रविष्ट हो गया ॥ ४ ॥

तान् दृष्ट्वा सप्त निर्भिन्नान् सालान् वानरपुङ्गवः । रामस्य शरवेगेन विस्मयं परमं गतः ॥ ५ ॥

भावार्थ

श्रीरामके बाणके वेगसे उन सातों सालवृक्षोंको विदीर्ण हुआ देख वानरशिरोमणि सुग्रीवको बड़ा विस्मय हुआ ॥५॥

स मूर्ध्ना न्यपतद् भूमौ प्रलम्बीकृतभूषणः । सुग्रीवः परमप्रीतो राघवाय कृताञ्जलिः ॥ ६ ॥

भावार्थ

साथ ही उन्हें मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नता हुई। सुग्रीवने हाथ जोड़कर धरतीपर माथा टेक दिया और श्रीरघुनाथजीको साष्टाङ्ग प्रणाम किया । प्रणामके लिये झुकते समय उनके कण्ठहारादि भूषण लटकते हुए दिखायी देते थे ॥ ६ ॥

इदं चोवाच धर्मज्ञं कर्मणा तेन हर्षितः । रामं सर्वास्त्रविदुषां श्रेष्ठं शूरमवस्थितम् ॥ ७ ॥

भावार्थ

श्रीरामके उस महान् कर्मसे अत्यन्त प्रसन्न हो उन्होंने सामने खड़े हुए सम्पूर्ण अस्त्र-वेत्ताओंमें श्रेष्ठ, धर्मज्ञ, शूरवीर श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार कहा——॥ ७ ॥

सेन्द्रानपि सुरान् सर्वांस्त्वं बाणैः पुरुषर्षभ । समर्थः समरे हन्तुं किं पुनर्वालिनं प्रभो ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘पुरुषप्रवर ! भगवन् ! आप तो अपने बाणोंसे समराङ्गणमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंका वध भी करनेमें समर्थ हैं । फिर वालीको मारना आपके लिये कौन बड़ी बात है ?॥ ८ ॥

येन सप्त महासाला गिरिर्भूमिश्च दारिताः । बाणेनैकेन काकुत्स्थ स्थाता ते को रणाग्रतः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘काकुत्स्थ ! जिन्होंने सात बड़े-बड़े सालवृक्ष, पर्वत और पृथ्वीको भी एक ही बाणसे विदीर्ण कर डाला, उन्हीं आपके समक्ष युद्धके मुहानेपर कौन ठहर सकता है ॥ ९ ॥

अद्य मे विगतः शोकः प्रीतिरद्य परा मम । सुहृदं त्वां समासाद्य महेन्द्रवरुणोपमम् ॥ १० ॥

भावार्थ

‘महेन्द्र और वरुणके समान पराक्रमी आपको सुहृद्के रूपमें पाकर आज मेरा सारा शोक दूर हो गया । आज मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है ॥ १० ॥

तमद्यैव प्रियार्थं मे वैरिणं भ्रातृरूपिणम् । वालिनं जहि काकुत्स्थ मया बद्धोऽयमञ्जलिः ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलभूषण ! मैं हाथ जोड़ता हूँ । आप आज ही मेरा प्रिय करनेके लिये उस वालीका, जो भाईके रूपमें मेरा शत्रु है, वध कर डालिये’ ॥ ११ ॥

ततो रामः परिष्वज्य सुग्रीवं प्रियदर्शनम् । प्रत्युवाच महाप्राज्ञो लक्ष्मणानुगतं वचः ॥ १२ ॥

भावार्थ

सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजीको लक्ष्मणके समान प्रिय हो गये थे । उनकी बात सुनकर महाप्राज्ञ श्रीरामने अपने उस प्रिय सुहृद्को हृदयसे लगा लिया और इस प्रकार उत्तर दिया——॥ १२ ॥

अस्माद्गच्छाम किष्किन्धां क्षिप्रं गच्छ त्वमग्रतः । गत्वा चाह्वय सुग्रीव वालिनं भ्रातृगन्धिनम् ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘सुग्रीव ! हमलोग शीघ्र ही इस स्थानसे किष्किन्धाको चलते हैं । तुम आगे जाओ और जाकर व्यर्थ ही भाई कहलानेवाले वालीको युद्धके लिये ललकारो’ ॥ १३ ॥

सर्वे ते त्वरितं गत्वा किष्किन्धां वालिनः पुरीम् । वृक्षैरात्मानमावृत्य ह्यातिष्ठन् गहने वने ॥ १४ ॥

भावार्थ

तदनन्तर वे सब लोग वालीकी राजधानी किष्किन्धापुरीमें गये और वहाँ गहन वनके भीतर वृक्षोंकी आड़में अपनेको छिपकर खड़े हो गये ॥ १४ ॥

सुग्रीवोऽप्यनदद् घोरं वालिनो ह्वानकारणात् । गाढं परिहितो वेगान्नादैर्भिन्दन्निवाम्बरम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

सुग्रीवने लँगोटसे अपनी कमर खूब कस ली और वालीको बुलानेके लिये भयंकर गर्जना की । वेगपूर्वक किये हुए उस सिंहनादसे मानो वे आकाशको फाड़े डालते थे ॥ १५ ॥

तं श्रुत्वा निनदं भ्रातुः क्रुद्धो वाली महाबलः । निष्पपात सुसंरब्धो भास्करोऽस्ततटादिव ॥ १६ ॥

भावार्थ

भाईका सिंहनाद सुनकर महाबली वालीको बड़ा क्रोध हुआ । वह अमर्षमें भरकर अस्ताचलसे नीचे जानेवाले सूर्यके समान बड़े वेगसे बरसे निकला ॥ १६ ॥

ततः सुतुमुलं युद्धं वालिसुग्रीवयोरभूत् । गगने ग्रहयोर्घोरं बुधाङ्गारकयोरिव ॥ १७ ॥

भावार्थ

फिर तो वाली और सुग्रीवमें बड़ा भयंकर युद्ध छिड़ गया, मानो आकाशमें बुध और मङ्गल इन दोनों ग्रहोंमें घोर संग्राम हो रहा हो ॥ १७ ॥

तलैरशनिकल्पैश्च वज्रकल्पैश्च मुष्टिभिः । जघ्नतुः समरेऽन्योन्यं भ्रातरौ क्रोधमूर्च्छितौ ॥ १८ ॥

भावार्थ

वे दोनों भाई क्रोधसे मूर्च्छित हो एक-दूसरेपर वज्र और अशनिके समान तमाचों और घूँसोंका प्रहार करने लगे ॥१८॥

ततो रामो धनुष्पाणिस्तावुभौ समुदैक्षत । अन्योन्यसदृशौ वीरावुभौ देवाविवाश्विनौ ॥ १९ ॥

भावार्थ

उसी समय श्रीरामचन्द्रजीने धनुष हाथमें लिया और उन दोनोंकी ओर देखा । वे दोनों वीर अश्विनीकुमारोंकी भाँति परस्पर मिलते-जुलते दिखायी दिये ॥ १९ ॥

यत्रावगच्छत् सुग्रीवं वालिनं वापि राघवः । ततो न कृतवान् बुद्धिं मोक्तुमन्तकरं शरम् ॥ २० ॥

भावार्थ

श्रीरामचन्द्रजीको यह पता न चला कि इनमें कौन सुग्रीव है और कौन वाली; इसलिये उन्होंने अपना वह प्राणान्तकारी बाण छोड़नेका विचार स्थगित कर दिया ॥ २० ॥

एतस्मिन्नन्तरे भग्नः सुग्रीवस्तेन वालिना । अपश्यन् राघवं नाथमृष्यमूकं प्रदुद्रुवे ॥ २१ ॥

भावार्थ

इसी बीचमें वालीने सुग्रीवके पाँव उखाड़ दिये । वे अपने रक्षक श्रीरघुनाथजीको न देखकर ऋष्यमूक पर्वतकी ओर भागे ॥ २१ ॥

क्लान्तो रुधिरसिक्ताङ्गः प्रहारैर्जर्जरीकृतः । वालिनाभिद्रुतः क्रोधात् प्रविवेश महावनम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

वे बहुत थक गये थे । उनका सारा शरीर लहूलुहान और प्रहारोंसे जर्जर हो रहा था । इतनेपर भी वालीने क्रोधपूर्वक उनका पीछा किया । किंतु वे मतंग मुनिके महान् वनमें घुस गये ॥ २२ ॥

तं प्रविष्टं वनं दृष्ट्वा वाली शापभयात् ततः । मुक्तो ह्यसि त्वमित्युक्त्वा स निवृत्तो महाबलः ॥ २३ ॥

भावार्थ

सुग्रीवको उस वनमें प्रविष्ट हुआ देख महाबली वाली शापके भयसे वहाँ नहीं गया और ‘जाओ तुम बच गये’ ऐसा कहकर वहाँसे लौट आया ॥ २३ ॥

राघवोऽपि सह भ्रात्रा सह चैव हनूमता । तदेव वनमागच्छत् सुग्रीवो यत्र वानरः ॥ २४ ॥

भावार्थ

इधर श्रीरघुनाथजी भी अपने भाई लक्ष्मण तथा श्रीहनुमान्जीके साथ उसी समय वनमें आ गये; जहाँ वानर सुग्रीव विद्यमान थे ॥ २४ ॥

तं समीक्ष्यागतं रामं सुग्रीवः सहलक्ष्मणम् । ह्रीमान् दीनमुवाचेदं वसुधामवलोकयन् ॥ २५ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणसहित श्रीरामको आया देख सुग्रीवको बड़ी लज्जा हुई और वे पृथ्वीकी ओर देखते हुए दीन वाणीमें उनसे बोले—॥ २५ ॥

आह्वयस्वेति मामुक्त्वा दर्शयित्वा च विक्रमम् । वैरिणा घातयित्वा च किमिदानीं त्वया कृतम् ॥ २६ ॥ तामेव वेलां वक्तव्यं त्वया राघव तत्त्वतः । वालिनं न निहन्मीति ततो नाहमितो व्रजे ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! आपने अपना पराक्रम दिखाया और मुझे यह कहकर भेज दिया कि जाओ; वालीको युद्धके लिये ललकारो, यह सब हो जानेपर आपने शत्रुसे पिटवाया और स्वयं छिप गये । बताइये, इस समय आपने ऐसा क्यों किया ? आपको उसी समय सच-सच बता देना चाहिये था कि मैं वालीको नहीं मारूँगा । ऐसी दशामें मैं यहाँसे उसके पास जाता ही नहीं’ ॥ २६-२७ ॥

तस्य चैवं ब्रुवाणस्य सुग्रीवस्य महात्मनः । करुणं दीनया वाचा राघवः पुनरब्रवीत् ॥ २८ ॥

भावार्थ

महामना सुग्रीव जब दीन वाणीद्वारा इस प्रकार करुणा जनक बात कहने लगे, तब श्रीराम फिर उनसे बोले—॥२८॥

सुग्रीव श्रूयतां तात क्रोधश्च व्यपनीयताम् । कारणं येन बाणोऽयं स मया न विसर्जितः ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘तात सुग्रीव ! मेरी बात सुनो, क्रोधको अपने मनसे निकाल दो । मैंने क्यों नहीं बाण चलाया, इसका कारण बतलाता हूँ ॥ २९ ॥

अलंकारेण वेषेण प्रमाणेन गतेन च । त्वं च सुग्रीव वाली च सदृशौ स्थः परस्परम् ॥३०॥

भावार्थ

‘सुग्रीव ! वेशभूषा, कद और चाल-ढालमें तुम और वाली दोनों एक-दूसरेसे मिलते-जुलते हो ॥ ३० ॥

स्वरेण वर्चसा चैव प्रेक्षितेन च वानर । विक्रमेण च वाक्यैश्च व्यक्तिं वां नोपलक्षये ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘स्वर, कान्ति, दृष्टि, पराक्रम और बोलचालके द्वारा भी मुझे तुम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता ॥ ३१ ॥

ततोऽहं रूपसादृश्यान्मोहितो वानरोत्तम । नोत्सृजामि महावेगं शरं शत्रुनिबर्हणम् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘वानरश्रेष्ठ ! तुम दोनोंके रूपकी इतनी समानता देखकर मैं मोहमें पड़ गया—तुम्हें पहचान न सका; इसीलिये मैंने अपना महान् वेगशाली शत्रुसंहारक बाण नहीं छोड़ा ॥३२॥

जीवितान्तकरं घोरं सादृश्यात् तु विशङ्कितः । मूलघातो न नौ स्याद्धि द्वयोरिति कृतो मया ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘मेरा वह भयंकर बाण शत्रुके प्राण लेनेवाला था, इसलिये तुम दोनोंकी समानतासे संदेहमें पड़कर मैंने उस बाणको नहीं छोड़ा । सोचा, कहीं ऐसा न हो कि हम दोनोंके मूल उद्देश्यका ही विनाश हो जाय ॥ ३३ ॥

त्वयि वीर विपन्ने हि अज्ञानाल्लाघवान्मया । मौढ्यं च मम बाल्यं च ख्यापितं स्यात् कपीश्वर ॥३४॥

भावार्थ

‘वीर ! वानरराज ! यदि अनजानमें या जल्दबाजीके कारण मेरे बाणसे तुम्हीं मारे जाते तो मेरी बालोचित चपलता और मूढ़ता ही सिद्ध होती ॥ ३४ ॥

दत्ताभयवधो नाम पातकं महदद्भुतम् । अहं च लक्ष्मणश्चैव सीता च वरवर्णिनी ॥ ३५ ॥ त्वदधीना वयं सर्वे वनेऽस्मिन्शरणं भवान् । तस्माद् युध्यस्व भूयस्त्वं मा माशङ्कीश्च वानर ॥३६॥

भावार्थ

‘जिसको अभय दान दे दिया गया हो, उसका वध करनेसे बड़ा भारी पाप होता है; यह एक अद्भुत पातक है । इस समय मैं, लक्ष्मण और सुन्दरी सीता सब तुम्हारे अधीन हैं । इस वनमें तुम्हीं हमलोगोंके आश्रय हो; इसलिये वानरराज ! शङ्का न करो; पुनः चलकर युद्ध प्रारम्भ करो ॥ ३५-३६ ॥

पतन्मुहूर्तं तु मया पश्य वालिनमाहवे । निरस्तमिषुणैकेन चेष्टमानं महीतले ॥ ३७ ॥

भावार्थ

‘तुम इसी मुहूर्तमें वालीको मेरे एक ही बाणका निशाना बनकर धरतीपर लोटता देखोगे ॥ ३७ ॥

अभिज्ञानं कुरुष्व त्वमात्मनो वानरेश्वर । येन त्वामभिजानीयां द्वन्द्वयुद्धमुपागतम् ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘वानरेश्वर ! अपनी पहचानके लिये तुम कोई चिह्न धारण कर लो, जिससे द्वन्द्वयुद्धमें प्रवृत्त होनेपर मैं तुम्हें पहचान सकूँ’ ॥ ३८ ॥

गजपुष्पीमिमां फुल्लामुत्पाट्य शुभलक्षणाम् । कुरु लक्ष्मण कण्ठेऽस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ॥ ३९ ॥ ततो गिरितटे जातामुत्पाट्य कुसुमायुताम् । लक्ष्मणो गजपुष्पीं तां तस्य कण्ठे व्यसर्जयत् ॥ ४० ॥

भावार्थ

( सुग्रीवसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणसे बोले– ) ‘लक्ष्मण ! यह उत्तम लक्षणोंसे युक्त गजपुष्पी लता फूल रही है । इसे उखाड़कर तुम महामना सुग्रीवके गलेमें पहना दो’ ॥ यह आज्ञा पाकर लक्ष्मणने पर्वतके किनारे उत्पन्न हुई फूलोंसे भरी वह गजपुष्पी लता उखाड़कर सुग्रीवके गलेमें डाल दिया ॥ ४० ॥

स तया शुशुभे श्रीमाँल्लतया कण्ठसक्तया । मालयेव बलाकानां ससंध्य इव तोयदः ॥ ४१ ॥

भावार्थ

गलेमें पड़ी हुई उस लतासे श्रीमान् सुग्रीव वकपंक्तिसे अलंकृत संध्याकालके मेघकी भाँति शोभा पाने लगे ॥ ४१ ॥

विभ्राजमानो वपुषा रामवाक्यसमाहितः । जगाम सह रामेण किष्किन्धां पुनराप सः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

श्रीरामके वचनसे आश्वासन पाकर अपने सुन्दर शरीरसे शोभा पानेवाले सुग्रीव श्रीरघुनाथजीके साथ फिर किष्किन्धापुरीमें जा पहुँचे ॥ ४२ ॥

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