किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 14
सर्वे ते त्वरितं गत्वा किष्किन्धां वालिनः पुरीम् । वृक्षैरात्मानमावृत्य व्यतिष्ठन् गहने वने ॥ १ ॥
भावार्थ
वे सब लोग शीघ्रतापूर्वक वालीकी किष्किन्धापुरीमें पहुँचकर एक गहनवनमें वृक्षोंकी ओटमें अपने आपको छिपाकर खड़े हो गये ॥ १ ॥
विसार्य सर्वतो दृष्टिं कानने काननप्रियः । सुग्रीवो विपुलग्रीवः क्रोधमाहारयद् भृशम् ॥ २ ॥
भावार्थ
वनके प्रेमी विशाल ग्रीवावाले सुग्रीवने उस वनमें चारों ओर दृष्टि दौड़ायी और अपने मनमें अत्यन्त क्रोधका संचय किया ॥ २ ॥
ततस्तु निनदं घोरं कृत्वा युद्धाय चाह्वयत् । परिवारैः परिवृतो नादैर्भिन्दन्निवाम्बरम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
तदनन्तर अपने सहायकोंसे घिरे हुए उन्होंने अपने सिंहनादसे आकाशको फाड़ते हुए-से घोर गर्जना की और वालीको युद्धके लिये ललकारा ॥ ३ ॥
गर्जन्निव महामेघो वायुवेगपुरःसरः । अथ बालार्कसदृशो दर्पसिंहगतिस्तदा ॥ ४ ॥
भावार्थ
उस समय सुग्रीव वायुके वेगके साथ गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ते थे । अपनी अङ्गकान्ति और प्रतापके द्वारा प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होते थे । उनकी चाल दर्पभरे सिंहके समान प्रतीत होती थी ॥ ४ ॥
दृष्ट्वा रामं क्रियादक्षं सुग्रीवो वाक्यमब्रवीत् । हरिवागुरया व्याप्तां तप्तकाञ्चनतोरणाम् ॥ ५ ॥ प्राप्ताः स्म ध्वजयन्त्राढ्यां किष्किन्धां वालिनः पुरीम् । प्रतिज्ञा या कृता वीर त्वया वालिवधे पुरा ॥ ६ ॥ सफलां कुरु तां क्षिप्रं लतां काल इवागतः । एवमुक्तस्तु धर्मात्मा सुग्रीवेण स राघवः ॥ ७ ॥ तमेवोवाच वचनं सुग्रीवं शत्रुसूदनः । कृताभिज्ञानचिह्नस्त्वमनया गजसाह्वया ॥ ८ ॥ लक्ष्मणेन समुत्पाट्य एषा कण्ठे कृता तव । शोभसेऽप्यधिकं वीर लतया कण्ठसक्तया ॥ ९ ॥ विपरीत इवाकाशे सूर्यो नक्षत्रमालया ।
भावार्थ
कार्यकुशल श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखकर सुग्रीवने कहा—‘भगवन् ! वालीकी यह किष्किन्धापुरी तपाये हुए सुवर्णके द्वारा निर्मित नगरद्वारसे सुशोभित है । इसमें सब ओर वानरोंका जाल-सा बिछा हुआ है तथा यह ध्वजों और यन्त्रोंसे सम्पन्न है । हम सब लोग इस पुरीमें आ पहुँचे हैं । वीर ! आपने पहले वाली-वधके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसे अब शीघ्र सफल कीजिये । ठीक उसी तरह जैसे आया हुआ अनुकूल समय लताको फल-फूलसे सम्पन्न कर देता है’ ॥ सुग्रीवके ऐसा कहनेपर शत्रुसूदन धर्मात्मा श्रीरघुनाथजीने फिर अपनी पूर्वोक्त बातको दुहराते हुए ही सुग्रीवसे कहा—॥ ‘वीर ! अब तो इस गजपुष्पी लताके द्वारा तुमने अपनी पहचानके लिये चिह्न धारण कर ही लिया है । लक्ष्मणने इसे उखाड़कर तुम्हारे कण्ठमें पहना ही दिया है । तुम कण्ठमें धारण की हुई इस लताके द्वारा बड़ी शोभा पा रहे हो । यदि आकाशमें यह विपरीत घटना हो कि सूर्य-मण्डल नक्षत्र-मालासे घिर जाय, तभी इस कण्ठ-लम्बिनी लतासे सुशोभित होनेवाले तुम्हारी उस सूर्यसे तुलना हो सकती है ॥ ८-९½ ॥
अद्य वालिसमुत्थं ते भयं वैरं च वानर ॥ १० ॥ एकेनाहं प्रमोक्ष्यामि बाणमोक्षेण संयुगे ।
भावार्थ
‘वानरराज ! आज मैं वालीसे उत्पन्न हुए तुम्हारे भय और वैर दोनोंको युद्धस्थलमें एक ही बार बाण छोड़कर मिटा दूँगा ॥ १०½ ॥
मम दर्शय सुग्रीव वैरिणं भ्रातृरूपिणम् ॥ ११ ॥ वाली विनिहतो यावद्वने पांसुषु चेष्टते ।
भावार्थ
‘सुग्रीव ! तुम मुझे अपने उस भ्रातारूपी शत्रुको दिखा तो दो । फिर वाली मारा जाकर वनके भीतर धूलमें लोटता दिखायी देगा ॥ ११½ ॥
यदि दृष्टिपथं प्राप्तो जीवन् स विनिवर्तते ॥ १२ ॥ ततो दोषेण मा गच्छेत् सद्यो गर्हेच्च मां भवान् ।
भावार्थ
‘यदि मेरी दृष्टिमें पड़ जानेपर भी वह जीवित लौट जाय तो तुम मुझे दोषी समझना और तत्काल जी भरकर मेरी निन्दा करना ॥ १२½ ॥
प्रत्यक्षं सप्त ते साला मया बाणेन दारिताः ॥ १३ ॥ तेनावेहि बलेनाद्य वालिनं निहतं रणे ।
भावार्थ
‘तुम्हारी आँखोंके सामने मैंने अपने एक ही बाणसे सात सालके वृक्ष विदीर्ण किये थे, मेरे उसी बलसे आज समराङ्गणमें ( एक बाणसे ही ) तुम वालीको मारा गया समझो ॥ १३½ ॥
अनृतं नोक्तपूर्वं मे चिरं कृच्छ्रेऽपि तिष्ठता ॥ १४ ॥ धर्मलोभपरीतेन न च वक्ष्ये कथंचन । सफलां च करिष्यामि प्रतिज्ञां जहि संभ्रमम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘बहुत समयसे संकट झेलते रहनेपर भी मैं कभी झूठ नहीं बोला हूँ। मेरे मनमें धर्मका लोभ है। इसलिये किसी तरह मैं झूठ तो बोलूँगा ही नहीं । साथ ही अपनी प्रतिज्ञाको भी अवश्य सफल करूँगा । अतः तुम भय और घबराहटको अपने हृदयसे निकाल दो ॥ १४-१५ ॥
प्रसूतं कलमक्षेत्रं वर्षेणेव शतक्रतुः । तदाह्वाननिमित्तं च वालिनो हेममालिनः ॥ १६ ॥ सुग्रीव कुरु तं शब्दं निष्पतेद् येन वानरः ।
भावार्थ
‘जैसे इन्द्र वर्षा करके उगे हुए धानके खेतको फलसे सम्पन्न करते हैं, उसी तरह मैं भी बाणका प्रयोग करके वालीके वधद्वारा तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा । इसलिये सुग्रीव ! तुम सुवर्णमालाधारी वालीको बुलानेके लिये इस समय ऐसी गर्जना करो, जिससे तुम्हारा सामना करनेके लिये वह वामर नगरसे बाहर निकल आये ॥ १६½ ॥
जितकाशी जयश्लाघी त्वया चाधर्षितः पुरात् ॥ १७ ॥ निष्पतिष्यत्यसङ्गेन वाली स प्रियसंयुगः ।
भावार्थ
‘वह अनेक युद्धोंमें विजय पाकर विजयश्रीसे सुशोभित हुआ है । सबपर विजय पानेकी इच्छा रखता है और उसने कभी तुमसे हार नहीं खायी है । इसके अलावे युद्धसे उसका बड़ा प्रेम है, अतः वाली कहीं भी आसक्त न होकर नगरके बाहर अवश्य निकलेगा ॥ १७½ ॥
रिपूणां धर्षितं श्रुत्वा मर्षयन्ति न संयुगे ॥ १८ ॥ जानन्तस्तु स्वकं वीर्यं स्त्रीसमक्षं विशेषतः ।
भावार्थ
‘क्योंकि अपने पराक्रमको जाननेवाले वीर पुरुष, विशेषतः स्त्रियोंके सामने, युद्धके लिये शत्रुओंके तिरस्कारपूर्ण शब्द सुनकर कदापि सहन नहीं करते हैं’ ॥ १८½ ॥
स तु रामवचः श्रुत्वा सुग्रीवो हेमपिङ्गलः ॥ १९ ॥ ननर्द क्रूरनादेन विनिर्भिन्दन्निवाम्बरम् ।
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर सुवर्णके समान पिङ्गलवर्णवाले सुग्रीवने आकाशको विदीर्ण-सा करते हुए कठोर स्वरमें बड़ी भयंकर गर्जना की ॥ १९½ ॥
तत्र शब्देन वित्रस्ता गावो यान्ति हतप्रभाः ॥ २० ॥ राजदोषपरामृष्टाः कुलस्त्रिय इवाकुलाः ।
भावार्थ
उस सिंहनादसे भयभीत हो बड़े-बड़े बैल शक्तिहीन हो राजाके दोषसे परपुरुषोंद्वारा पकड़ी जानेवाली कुलाङ्गनाओंके समान व्याकुलचित्त हो सब ओर भाग चले ॥ २०½ ॥
द्रवन्ति च मृगाः शीघ्रं भग्ना इव रणे हयाः । पतन्ति च खगा भूमौ क्षीणपुण्या इव ग्रहाः ॥ २१ ॥
भावार्थ
मृग युद्धस्थलमें अस्त्र-शस्त्रोंकी चोट खाकर भागे हुए घोड़ोंके समान तीव्र गतिसे भागने लगे और पक्षी जिनके पुण्य नष्ट हो गये हैं, ऐसे ग्रहोंके समान आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ २१ ॥
ततः स जीमूतकृतप्रणादो नादं हमुञ्चत् त्वरया प्रतीतः । सूर्यात्मजः शौर्यविवृद्धतेजाः सरित्पतिर्वानिलचञ्चलोर्मिः ॥ २२ ॥
भावार्थ
तदनन्तर जिनका सिंहनाद मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर था और शौर्यके द्वारा जिनका तेज बढ़ा हुआ था, वे सुविख्यात सूर्यकुमार सुग्रीव बड़ी उतावलीके साथ बारंबार गर्जना करने लगे; मानो वायुके वेगसे चञ्चल हुई उत्ताल तरङ्गमालाओंसे सुशोभित सरिताओंका स्वामी समुद्र कोलाहल कर रहा हो ॥ २२ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें