बालकाण्ड, सर्ग 66
ततः प्रभाते विमले कृतकर्मा नराधिपः। विश्वामित्रं महात्मानमाजुहाव सराघवम् ॥ १ ॥ तमर्चयित्वा धर्मात्मा शास्त्रदृष्टेन कर्मणा। राघवौ च महात्मानौ तदा वाक्यमुवाच ह ॥ २ ॥
भावार्थ
तदनन्तर दूसरे दिन निर्मल प्रभातकाल आनेपर धर्मात्मा राजा जनकने अपना नित्य नियम पूरा करके श्रीराम और लक्ष्मणसहित महात्मा विश्वामित्रजीको बुलाया और शास्त्रीय विधिके अनुसार मुनि तथा उन दोनों महामनस्वी राजकुमारोंका पूजन करके इस प्रकार कहा—॥ १-२ ॥
भगवन् स्वागतं तेऽस्तु किं करोमि तवानघ। भवानाज्ञापयतु मामाज्ञाप्यो भवता ह्यहम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! आपका स्वागत है। निष्पाप महर्षे ! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; क्योंकि मैं आपका आज्ञापालक हूँ’ ॥ ३ ॥
एवमुक्तः स धर्मात्मा जनकेन महात्मना। प्रत्युवाच मुनिश्रेष्ठो वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ ४ ॥
भावार्थ
महात्मा जनकके ऐसा कहनेपर बोलनेमें कुशल धर्मात्मा मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रने उनसे यह बात कही—॥ ४ ॥
पुत्रौ दशरथस्येमौ क्षत्रियौ लोकविश्रुतौ। द्रष्टुकामौ धनुःश्रेष्ठं यदेतत्त्वयि तिष्ठति ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘महाराज ! राजा दशरथके ये दोनों पुत्र विश्वविख्यात क्षत्रिय वीर हैं और आपके यहाँ जो यह श्रेष्ठ धनुष रक्खा है, उसे देखनेकी इच्छा रखते हैं ॥ ५ ॥
एतद् दर्शय भद्रं ते कृतकामौ नृपात्मजौ। दर्शनादस्य धनुषो यथेष्टं प्रतियास्यतः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘आपका कल्याण हो, वह धनुष इन्हें दिखा दीजिये । इससे इनकी इच्छा पूरी हो जायगी । फिर ये दोनों राजकुमार उस धनुषके दर्शनमात्रसे संतुष्ट हो इच्छानुसार अपनी राजधानीको लौट जायँगे’ ॥ ६ ॥
एवमुक्तस्तु जनकः प्रत्युवाच महामुनिम्। श्रूयतामस्य धनुषो यदर्थमिह तिष्ठति ॥ ७ ॥
भावार्थ
मुनिके ऐसा कहनेपर राजा जनक महामुनि विश्वामित्रसे बोले—‘मुनिवर ! इस धनुषका वृत्तान्त सुनिये। जिस उद्देश्यसे यह धनुष यहाँ रक्खा गया, वह सब बताता हूँ ॥७॥
देवरात इति ख्यातो निमेर्ज्येष्ठो महीपतिः। न्यासोऽयं तस्य भगवन् हस्ते दत्तो महात्मनः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! निमिके ज्येष्ठ पुत्र राजा देवरातके नामसे विख्यात थे । उन्हीं महात्माके हाथमें यह धनुष धरोहरके रूपमें दिया गया था ॥ ८ ॥
दक्षयज्ञवधे पूर्वं धनुरायम्य वीर्यवान्। विध्वंस्य त्रिदशान् रोषात् सलीलमिदमब्रवीत् ॥ ९ ॥ यस्माद् भागार्थिनो भागं नाकल्पयत मे सुराः। वराङ्गानि महार्हाणि धनुषा शातयामि वः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘कहते हैं, पूर्वकालमें दक्षयज्ञविध्वंसके समय परम पराक्रमी भगवान् शङ्करने खेल-खेलमें ही रोषपूर्वक इस धनुषको उठाकर यज्ञ-विध्वंसके पश्चात् देवताओंसे कहा—‘देवगण ! मैं यज्ञमें भाग प्राप्त करना चाहता था, किंतु तुमलोगोंने नहीं दिया । इसलिये इस धनुषसे मैं तुम सब लोगोंके परम पूजनीय श्रेष्ठ अङ्ग—मस्तक काट डालूँगा’ ॥ ९-१० ॥
ततो विमनसः सर्वे देवा वै मुनिपुङ्गव। प्रसादयन्त देवेशं तेषां प्रीतोऽभवद् भवः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘मुनिश्रेष्ठ ! यह सुनकर सम्पूर्ण देवता उदास हो गये और स्तुतिके द्वारा देवाधिदेव महादेवजीको प्रसन्न करने लगे । अन्तमें उनपर भगवान् शिव प्रसन्न हो गये ॥ ११ ॥
प्रीतियुक्तस्तु सर्वेषां ददौ तेषां महात्मनाम्। तदेतद् देवदेवस्य धनूरत्नं महात्मनः ॥ १२ ॥ न्यासभूतं तदा न्यस्तमस्माकं पूर्वजे विभौ।
भावार्थ
‘प्रसन्न होकर उन्होंने उन सब महामनस्वी देवताओंको यह धनुष अर्पण कर दिया । वही यह देवाधिदेव महात्मा भगवान् शङ्करका धनुष-रत्न है, जो मेरे पूर्वज महाराज देवरातके पास धरोहरके रूपमें रक्खा गया था ॥ १२½ ॥
अथ मे कृषतः क्षेत्रं लाङ्गलादुत्थिता ततः ॥ १३ ॥ क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता। भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘एक दिन मैं यज्ञके लिये भूमिशोधन करते समय खेतमें हल चला रहा था । उसी समय हलके अग्रभागसे जोती गयी भूमि ( हराई या सीता ) से एक कन्या प्रकट हुई । सीता ( हलद्वारा खींची गयी रेखा ) से उत्पन्न होनेके कारण उसका नाम सीता रखा गया। पृथ्वीसे प्रकट हुई वह मेरी कन्या क्रमशः बढ़कर सयानी हुई ॥ १३-१४ ॥
वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा। भूतलादुत्थितां तां तु वर्धमानां ममात्मजाम् ॥ १५ ॥ वरयामासुरागत्य राजानो मुनिपुङ्गव।
भावार्थ
‘अपनी इस अयोनिजा कन्याके विषयमें मैंने यह निश्चय किया कि जो अपने पराक्रमसे इस धनुषको चढ़ा देगा, उसीके साथ मैं इसका व्याह करूँगा । इस तरह इसे वीर्यशुल्का ( पराक्रमरूप शुल्कवाली ) बनाकर अपने घरमें रख छोड़ा है । मुनिश्रेष्ठ ! भूतलसे प्रकट होकर दिनोंदिन बढ़नेवाली मेरी पुत्री सीताको कई राजाओंने यहाँ आकर माँगा ॥ १५½ ॥
तेषां वरयतां कन्यां सर्वेषां पृथिवीक्षिताम् ॥ १६ ॥ वीर्यशुल्केति भगवन् न ददामि सुतामहम् ।
भावार्थ
‘परंतु भगवन् ! कन्याका वरण करनेवाले उन सभी राजाओंको मैंने यह बता दिया कि मेरी कन्या वीर्यशुल्का है । ( उचित पराक्रम प्रकट करनेपर ही कोई पुरुष उसके साथ विवाह करनेका अधिकारी हो सकता है । ) यही कारण है कि मैंने आजतक किसीको अपनी कन्या नहीं दी ॥ १६½ ॥
ततः सर्वे नृपतयः समेत्य मुनिपुङ्गव ॥ १७ ॥ मिथिलामप्युपागम्य वीर्यं जिज्ञासवस्तदा ।
भावार्थ
‘मुनिपुङ्गव ! तब सभी राजा मिलकर मिथिलामें आये और पूछने लगे कि राजकुमारी सीताको प्राप्त करनेके लिये कौन-सा पराक्रम निश्चित किया गया है ॥ १७½ ॥
तेषां जिज्ञासमानानां शैवं धनुरुपाहृतम् ॥ १८ ॥ न शेकुर्ग्रहणे तस्य धनुषस्तोलनेऽपि वा ।
भावार्थ
‘मैंने पराक्रमकी जिज्ञासा करनेवाले उन राजाओंके सामने यह शिवजीका धनुष रख दिया; परंतु वे लोग इसे उठाने या हिलानेमें भी समर्थ न हो सके ॥ १८½ ॥
तेषां वीर्यवतां वीर्यमल्पं ज्ञात्वा महामुने ॥ १९ ॥ प्रत्याख्याता नृपतयस्तन्निबोध तपोधन । ततः परमकोपेन राजानो मुनिपुङ्गव ॥ २० ॥ अरुन्धन् मिथिलां सर्वे वीर्यसंदेहमागताः ।
भावार्थ
‘महामुने ! उन पराक्रमी नरेशोंकी शक्ति बहुत थोड़ी जानकर मैंने उन्हें कन्या देनेसे इन्कार कर दिया । तपोधन ! इसके बाद जो घटना घटी, उसे भी आप सुन लीजिये ॥ ‘मुनिप्रवर ! मेरे इन्कार करनेपर ये सब राजा अत्यन्त कुपित हो उठे और अपने पराक्रमके विषयमें संशयापन्न हो मिथिलाको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ २०½ ॥
आत्मानमवधूतं मे विज्ञाय नृपपुङ्गवाः ॥ २१ ॥ रोषेण महताविष्टाः पीडयन् मिथिलां पुरीम् ।
भावार्थ
‘मेरे द्वारा अपना तिरस्कार हुआ मानकर उन श्रेष्ठ नरेशोंने अत्यन्त रुष्ट हो मिथिलापुरीको सब ओरसे पीड़ा देना प्रारम्भ कर दिया ॥ २१½ ॥
ततः संवत्सरे पूर्णे क्षयं यातानि सर्वशः ॥ २२ ॥ साधनानि मुनिश्रेष्ठ ततोऽहं भृशदुःखितः ।
भावार्थ
‘मुनिश्रेष्ठ ! पूरे एक वर्षतक वे घेरा डाले रहे । इस बीचमें युद्धके सारे साधन क्षीण हो गये । इससे मुझे बड़ा दुःख हुआ ॥ २२½ ॥
ततो देवगणान् सर्वांस्तपसाहं प्रसादयम् ॥ २३ ॥ ददुश्च परमप्रीताश्चतुरङ्गबलं सुराः ।
भावार्थ
‘तब मैंने तपस्याके द्वारा समस्त देवताओंको प्रसन्न करनेकी चेष्टा की । देवता बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने मुझे चतुरंगिणी सेना प्रदान की ॥ २३½ ॥
ततो भग्ना नृपतयो हन्यमाना दिशो ययुः ॥ २४ ॥ अवीर्या वीर्यसंदिग्धाः सामात्याः पापकारिणः । तदेतन्मुनिशार्दूल धनुः परमभास्वरम् ॥ २५ ॥ रामलक्ष्मणयोश्चापि दर्शयिष्यामि सुव्रत ।
भावार्थ
‘फिर तो हमारे सैनिकोंकी मार खाकर वे सभी पापाचारी राजा, जो बलहीन थे अथवा जिनके बलवान् होनेमें संदेह था, मन्त्रियोंसहित भागकर विभिन्न दिशाओंमें चले गये ॥ ‘मुनिश्रेष्ठ ! यही वह परम प्रकाशमान धनुष है । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे ! मैं उसे श्रीराम और लक्ष्मणको भी दिखाऊँगा ॥ २५½ ॥
यद्यस्य धनुषो रामः कुर्यादारोपणं मुने । सुतामयोनिजां सीतां दद्यां दाशरथेरहम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘मुने ! यदि श्रीराम इस धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ा दें तो मैं अपनी अयोनिजा कन्या सीताको इन दशरथकुमारके हाथमें दे दूँ’ ॥ २६ ॥
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