बालकाण्ड, सर्ग 67
जनकस्य वचः श्रुत्वा विश्वामित्रो महामुनिः । धनुर्दर्शय रामाय इति होवाच पार्थिवम् ॥ १ ॥
भावार्थ
जनककी यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्र बोले—— ‘राजन् ! आप श्रीरामको अपना धनुष दिखाइये’ ॥ १ ॥
ततः स राजा जनकः सचिवान् व्यादिदेश ह। धनुरानीयतां दिव्यं गन्धमाल्यानुलेपितम् ॥ २ ॥
भावार्थ
तब राजा जनकने मन्त्रियोंको आज्ञा दी—‘चन्दन और मालाओंसे सुशोभित वह दिव्य धनुष यहाँ ले आओ’ ॥ २ ॥
जनकेन समादिष्टाः सचिवाः प्राविशन् पुरम् । तद्धनुः पुरतः कृत्वा निर्जग्मुरमितौजसः ॥ ३ ॥
भावार्थ
राजा जनककी आज्ञा पाकर वे अमित तेजस्वी मन्त्री नगरमें गये और उस धनुषको आगे करके पुरीसे बाहर निकले ॥ ३ ॥
नृणां शतानि पञ्चाशद् व्यायतानां महात्मनाम्। मञ्जूषामष्टचक्रां तां समूहुस्ते कथंचन ॥ ४ ॥
भावार्थ
वह धनुष आठ पहियोंवाली लोहेकी बहुत बड़ी संदूक-में रक्खा गया था । उसे मोटे-ताजे पाँच हजार महामनस्वी वीर किसी तरह ठेलकर वहाँतक ला सके ॥ ४ ॥
तमादाय सुमञ्जूषामायसीं यत्र तद्धनुः। सुरोपमं ते जनकमूचुर्नृपतिमन्त्रिणः ॥ ५ ॥
भावार्थ
लोहेकी वह संदूक, जिसमें धनुष रक्खा गया था, लाकर उन मन्त्रियोंने देवोपम राजा जनकसे कहा—॥ ५ ॥
इदं धनुर्वरं राजन् पूजितं सर्वराजभिः। मिथिलाधिप राजेन्द्र दर्शनीयं यदीच्छसि ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! मिथिलापते ! राजेन्द्र ! यह समस्त राजाओंद्वारा सम्मानित श्रेष्ठ धनुष है । यदि आप इन दोनों राजकुमारोंको दिखाना चाहते हैं तो दिखाइये’ ॥ ६ ॥
तेषां नृपो वचः श्रुत्वा कृताञ्जलिरभाषत । विश्वामित्रं महात्मानं तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥ ७ ॥
भावार्थ
उनकी बात सुनकर राजा जनकने हाथ जोड़कर महात्मा विश्वामित्र तथा दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे कहा—॥७॥
इदं धनुर्वरं ब्रह्मन् जनकैरभिपूजितम्। राजभिश्च महावीर्यैरशक्तैः पूरितं तदा ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! यही वह श्रेष्ठ धनुष है, जिसका जनकवंशी नरेशोंने सदा ही पूजन किया है तथा जो इसे उठानेमें समर्थ न हो सके, उन महापराक्रमी नरेशोंने भी इसका पूर्वकालमें सम्मान किया है ॥ ८ ॥
नैतत् सुरगणाः सर्वे सासुरा न च राक्षसाः। गन्धर्वयक्षप्रवराः सकिन्नरमहोरगाः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘इसे समस्त देवता, असुर, राक्षस, गन्धर्व, बड़े-बड़े यक्ष, किन्नर और महानाग भी नहीं चढ़ा सके हैं ॥ ९ ॥
क गतिर्मानुषाणां च धनुषोऽस्य प्रपूरणे। आरोपणे समायोगे वेपने तोलने तथा ॥ १० ॥
भावार्थ
‘फिर इस धनुषको खींचने, चढ़ाने, इसपर बाण संधान करने, इसकी प्रत्यञ्चापर टङ्कार देने तथा इसे उठाकर इधर-उधर हिलानेमें मनुष्योंकी कहाँ शक्ति है ? ॥ १० ॥
तदेतद् धनुषां श्रेष्ठमानीतं मुनिपुङ्गव । दर्शयैतन्महाभाग अनयो राजपुत्रयोः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘मुनिप्रवर ! यह श्रेष्ठ धनुष यहाँ लाया गया है । महाभाग ! आप इसे इन दोनों राजकुमारोंको दिखाइये’ ॥ ११ ॥
विश्वामित्रः सरामस्तु श्रुत्वा जनकभाषितम् । वत्स राम धनुः पश्य इति राघवमब्रवीत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
श्रीरामसहित विश्वामित्रने जनकका वह कथन सुनकर रघुनन्दनसे कहा—‘वत्स राम ! इस धनुषको देखो’ ॥१२॥
महर्षेर्वचनाद् रामो यत्र तिष्ठति तद्धनुः । मञ्जूषां तामपावृत्य दृष्ट्वा धनुरथाब्रवीत् ॥ १३ ॥
भावार्थ
महर्षिकी आज्ञासे श्रीरामने जिसमें वह धनुष था उस संदूकको खोलकर उस धनुषको देखा और कहा—॥ १३ ॥
इदं धनुर्वरं दिव्यं संस्पृशामीह पाणिना । यत्नवांश्च भविष्यामि तोलने पूरणेऽपि वा ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘अच्छा अब मैं इस दिव्य एवं श्रेष्ठ धनुषमें हाथ लगाता हूँ । मैं इसे उठाने और चढ़ानेका भी प्रयत्न करूँगा’ ॥१४॥
बाढमित्यब्रवीद् राजा मुनिश्च समभाषत । लीलया स धनुर्मध्ये जग्राह वचनान्मुनेः ॥ १५ ॥ पश्यतां नृसहस्राणां बहूनां रघुनन्दनः । आरोपयत् स धर्मात्मा सलीलमिव तद्धनुः ॥ १६ ॥
भावार्थ
तब राजा और मुनिने एक स्वरसे कहा—‘हाँ, ऐसा ही करो ।’ मुनिकी आज्ञासे रघुकुलनन्दन धर्मात्मा श्रीरामने उस धनुषको बीचसे पकड़कर लीलापूर्वक उठा लिया और खेल-सा करते हुए उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा दी । उस समय कई हजार मनुष्योंकी दृष्टि उनपर लगी थी ॥ १५-१६ ॥
आरोपयित्वा मौर्वीं च पूरयामास तद्धनुः । तद् बभञ्ज धनुर्मध्ये नरश्रेष्ठो महायशाः ॥ १७ ॥
भावार्थ
प्रत्यञ्चा चढ़ाकर महायशस्वी नरश्रेष्ठ श्रीरामने ज्यों ही उस धनुषको कानतक खींचा त्यों ही वह बीचसे ही टूट गया ॥ १७ ॥
तस्य शब्दो महानासीन्निर्घातसमनिःस्वनः । भूमिकम्पश्च सुमहान् पर्वतस्येव दीर्यतः ॥ १८ ॥
भावार्थ
टूटते समय उससे वज्रपातके समान बड़ी भारी आवाज हुई । ऐसा जान पड़ा मानो पर्वत फट पड़ा हो । उस समय महान् भूकम्प आ गया ॥ १८ ॥
निपेतुश्च नराः सर्वे तेन शब्देन मोहिताः । वर्जयित्वा मुनिवरं राजानं तौ च राघवौ ॥ १९ ॥
भावार्थ
मुनिवर विश्वामित्र, राजा जनक तथा रघुकुलभूषण दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको छोड़कर शेष जितने लोग वहाँ खड़े थे, वे सब धनुष टूटनेके उस भयंकर शब्दसे मूर्छित होकर गिर पड़े ॥ १९ ॥
प्रत्याश्वस्ते जने तस्मिन् राजा विगतसाध्वसः । उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं वाक्यज्ञो मुनिपुङ्गवम् ॥ २० ॥
भावार्थ
थोड़ी देरमें जब सबको चेत हुआ, तब निर्भय हुए राजा जनकने, जो बोलनेमें कुशल और वाक्यके मर्मको समझनेवाले थे, हाथ जोड़कर मुनिवर विश्वामित्रसे कहा—॥ २० ॥
भगवन् दृष्टवीर्यो मे रामो दशरथात्मजः । अत्यद्भुतमचिन्त्यं च अतर्कितमिदं मया ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! मैंने दशरथनन्दन श्रीरामका पराक्रम आज अपनी आँखों देख लिया । महादेवजीके धनुषको चढ़ाना— यह अत्यन्त अद्भुत, अचिन्त्य और अतर्कित घटना है ॥२१॥
जनकानां कुले कीर्तिमाहरिष्यति मे सुता । सीता भर्तारमासाद्य रामं दशरथात्मजम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मेरी पुत्री सीता दशरथकुमार श्रीरामको पतिरूपमें प्राप्त करके जनकवंशकी कीर्तिका विस्तार करेगी ॥ २२ ॥
मम सत्या प्रतिज्ञा सा वीर्यशुल्केति कौशिक । सीता प्राणैर्बहुमता देया रामाय मे सुता ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘कुशिकनन्दन ! मैंने सीताको वीर्यशुल्का ( पराक्रम-रूपी शुल्कसे ही प्राप्त होनेवाली ) बताकर जो प्रतिज्ञा की थी, वह आज सत्य एवं सफल हो गयी । सीता मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर है । अपनी यह पुत्री मैं श्रीरामको समर्पित करूँगा ॥ २३ ॥
भवतोऽनुमते ब्रह्मञ्शीघ्रं गच्छन्तु मन्त्रिणः । मम कौशिक भद्रं ते अयोध्यां त्वरिता रथैः ॥ २४ ॥ राजानं प्रश्रितैर्वाक्यैरानयन्तु पुरं मम । प्रदानं वीर्यशुल्कायाः कथयन्तु च सर्वशः ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! कुशिकनन्दन ! आपका कल्याण हो । यदि आपकी आज्ञा हो तो मेरे मन्त्री रथपर सवार होकर बड़ी उतावलीके साथ शीघ्र ही अयोध्याको जायँ और विनययुक्त वचनोंद्वारा महाराज दशरथको मेरे नगरमें लिवा लायें । साथ ही यहाँका सब समाचार बताकर यह निवेदन करें कि जिसके लिये पराक्रमका ही शुल्क नियत किया गया था, उस जनककुमारी सीताका विवाह श्रीरामचन्द्रजीके साथ होने जा रहा है ॥ २४-२५ ॥
मुनिगुप्तौ च काकुत्स्थौ कथयन्तु नृपाय वै । प्रीतियुक्तं तु राजानमानयन्तु सुशीघ्रगाः ॥ २६ ॥ कौशिकस्तु तथेत्याह राजा चाभाष्य मन्त्रिणः । अयोध्यां प्रेषयामास धर्मात्मा कृतशासनान् । यथावृत्तं समाख्यातुमानेतुं च नृपं तथा ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘ये लोग महाराज दशरथसे यह भी कह दें कि आपके दोनों पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण विश्वामित्रजीके द्वारा सुरक्षित हो मिथिलामें पहुँच गये हैं । इस प्रकार प्रीतियुक्त हुए राजा दशरथको ये शीघ्रगामी सचिव जल्दी यहाँ बुला लायें’ ॥ विश्वामित्रने ‘तथास्तु’ कहकर राजाकी बातका समर्थन किया । तब धर्मात्मा राजा जनकने अपनी आज्ञाका पालन करनेवाले मन्त्रियोंको समझा-बुझाकर यहाँका ठीक-ठीक समाचार महाराज दशरथको बताने और उन्हें मिथिलापुरीमें ले आनेके लिये भेज दिया ॥ २७ ॥
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