बालकाण्ड, सर्ग 65
अथ हैमवतीं राम दिशं त्यक्त्वा महामुनिः । पूर्वां दिशमनुप्राप्य तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ १ ॥
भावार्थ
(शतानन्दजी कहते हैं—) श्रीराम ! पूर्वोक्त प्रतिज्ञाके अनन्तर महामुनि विश्वामित्र उत्तर दिशाको त्यागकर पूर्व दिशामें चले गये और वहीं रहकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे ॥ १ ॥
मौनं वर्षसहस्रस्य कृत्वा व्रतमनुत्तमम् । चकाराप्रतिमं राम तपः परमदुष्करम् ॥ २ ॥
भावार्थ
रघुनन्दन ! एक सहस्र वर्षोंतक परम उत्तम मौन व्रत धारण करके वे परम दुष्कर तपस्यामें लगे रहे । उनके उस तपकी कहीं तुलना न थी ॥ २ ॥
पूर्णे वर्षसहस्रे तु काष्ठभूतं महामुनिम् । विघ्नैर्बहुभिराधूतं क्रोधो नान्तरमाविशत् ॥ ३ ॥ स कृत्वा निश्चयं राम तप आतिष्ठताव्ययम् । तस्य वर्षसहस्रस्य व्रते पूर्णे महाव्रतः ॥ ४ ॥ भोक्तुमारब्धवानन्नं तस्मिन् काले रघूत्तम । इन्द्रो द्विजातिर्भूत्वा तं सिद्धमन्नमयाचत ॥ ५ ॥
भावार्थ
एक हजार वर्ष पूर्ण होनेतक वे महामुनि काष्ठकी भाँति निश्चेष्ट बने रहे । बीच-बीचमें उनपर बहुत-से विघ्नोंका आक्रमण हुआ, परंतु क्रोध उनके भीतर नहीं घुसने पाया ॥ श्रीराम ! अपने निश्चयपर अटल रहकर उन्होंने अक्षय तपका अनुष्ठान किया । उनका एक सहस्र वर्षोंका व्रत पूर्ण होनेपर वे महान् व्रतधारी महर्षि व्रत समाप्त करके अन्न ग्रहण करनेको उद्यत हुए । रघुकुलभूषण ! इसी समय इन्द्रने ब्राह्मणके वेषमें आकर उनसे तैयार अन्नकी याचना की ॥ ४-५ ॥
तस्मै दत्त्वा तदा सिद्धं सर्वं विप्राय निश्चितः । निःशेषितेऽन्ने भगवानभुक्त्वैव महातपाः ॥ ६ ॥
भावार्थ
तब उन्होंने वह सारा तैयार किया हुआ भोजन उस ब्राह्मणको देनेका निश्चय करके दे डाला । उस अन्नमेंसे कुछ भी शेष नहीं बचा । इसलिये वे महातपस्वी भगवान् विश्वामित्र बिना खाये-पीये ही रह गये ॥ ६ ॥
न किंचिदवदद् विप्रं मौनव्रतमुपास्थितः । तथैवासीत् पुनर्मौनमनुच्छ्वासं चकार ह ॥ ७ ॥
भावार्थ
फिर भी उन्होंने उस ब्राह्मणसे कुछ कहा नहीं । अपने मौन व्रतका यथार्थरूपसे पालन किया । इसके बाद पुनः पहलेकी ही भाँति श्वासोच्छ्वाससे रहित मौन व्रतका अनुष्ठान आरम्भ किया ॥ ७ ॥
अथ वर्षसहस्रं च नोच्छ्वसन् मुनिपुङ्गवः । तस्यानुच्छ्वसमानस्य मूर्ध्नि धूमो व्यजायत ॥ ८ ॥
भावार्थ
पूरे एक हजार वर्षोंतक उन मुनिश्रेष्ठने साँसतक नहीं ली । इस तरह साँस न लेनेके कारण उनके मस्तकसे धुआँ उठने लगा ॥ ८ ॥
त्रैलोक्यं येन सम्भ्रान्तमातापितमिवाभवत् । ततो देवर्षिगन्धर्वाः पन्नगोरगराक्षसाः ॥ ९ ॥ मोहितास्तपसा तस्य तेजसा मन्दरश्मयः । कश्मलं चोपहताः सर्वे पितामहमथाब्रुवन् ॥ १० ॥
भावार्थ
उससे तीनों लोकोंके प्राणी घबरा उठे, सभी संतप्त-से होने लगे । उस समय देवता, ऋषि, गन्धर्व, नाग, सर्प और राक्षस सब मुनिकी तपस्यासे मोहित हो गये । उनके तेजसे सबकी कान्ति फीकी पड़ गयी । वे सब-के-सब दुःखसे व्याकुल हो पितामह ब्रह्माजीसे बोले—॥ ९-१० ॥
बहुभिः कारणैर्देव विश्वामित्रो महामुनिः । लोभितः क्रोधितश्चैव तपसा चाभिवर्धते ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘देव ! अनेक प्रकारके निमित्तोंद्वारा महामुनि विश्वामित्रको लोभ और क्रोध दिलानेकी चेष्टा की गयी; किंतु वे अपनी तपस्याके प्रभावसे निरन्तर आगे बढ़ते जा रहे हैं ॥ ११ ॥
नह्यस्य वृजिनं किंचिद् दृश्यते सूक्ष्ममप्युत । न दीयते यदि त्वस्य मनसा यदभीप्सितम् ॥ १२ ॥ विनाशयति त्रैलोक्यं तपसा सचराचरम् । व्याकुलाश्च दिशः सर्वा न च किंचित् प्रकाशते ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘हमें उनमें कोई छोटा-सा भी दोष नहीं दिखायी देता । यदि इन्हें इनकी मनचाही वस्तु नहीं दी गयी तो ये अपनी तपस्यासे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंका नाश कर डालेंगे । इस समय सारी दिशाएँ धूमसे आच्छादित हो गयी हैं, कहीं कुछ भी सूझता नहीं है ॥ १२-१३ ॥
सागराः क्षुभिताः सर्वे विशीर्यन्ते च पर्वताः । प्रकम्पते च वसुधा वायुर्वातीह संकुलः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘समुद्र क्षुब्ध हो उठे हैं, सारे पर्वत विदीर्ण हुए जाते हैं, धरती डगमग हो रही है और प्रचण्ड आँधी चलने लगी है ॥ १४ ॥
ब्रह्मन् न प्रतिजानीमो नास्तिको जायते जनः । सम्मूढमिव त्रैलोक्यं सम्प्रक्षुभितमानसम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! हमें इस उपद्रवके निवारणका कोई उपाय नहीं समझमें आता है । सब लोग नास्तिककी भाँति कर्मानुष्ठानसे शून्य हो रहे हैं । तीनों लोकोंके प्राणियोंका मन क्षुब्ध हो गया है । सभी किंकर्तव्यविमूढ़-से हो रहे हैं ॥ १५ ॥
भास्करो निष्प्रभश्चैव महर्षेस्तस्य तेजसा । बुद्धिं न कुरुते यावन्नाशे देव महामुनिः ॥ १६ ॥ तावत् प्रसादो भगवन्नग्निरूपो महाद्युतिः ।
भावार्थ
‘महर्षि विश्वामित्रके तेजसे सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी है । भगवन् ! ये महाकान्तिमान् मुनि अग्निस्वरूप हो रहे हैं । देव ! महामुनि विश्वामित्र जबतक जगत्के विनाशका विचार नहीं करते तबतक ही इन्हें प्रसन्न कर लेना चाहिये ॥ १६½ ॥
कालाग्निना यथा पूर्वं त्रैलोक्यं दह्यतेऽखिलम् ॥ १७ ॥ देवराज्यं चिकीर्षेत दीयतामस्य यन्मनः ।
भावार्थ
‘जैसे पूर्वकालमें प्रलयकालिक अग्निने सम्पूर्ण त्रिलोकीको दग्ध कर डाला था, उसी प्रकार ये भी सबको जलाकर भस्म कर देंगे । यदि ये देवताओंका राज्य प्राप्त करना चाहें तो वह भी इन्हें दे दिया जाय । इनके मनमें जो भी अभिलाषा हो, उसे पूर्ण किया जाय’ ॥ १७½ ॥
ततः सुरगणाः सर्वे पितामहपुरोगमाः ॥ १८ ॥ विश्वामित्रं महात्मानं वाक्यं मधुरमब्रुवन् ।
भावार्थ
तदनन्तर ब्रह्मा आदि सब देवता महात्मा विश्वामित्रके पास जाकर मधुर वाणीमें बोले—॥ १८½ ॥
ब्रह्मर्षे स्वागतं तेऽस्तु तपसा स्म सुतोषिताः ॥ १९ ॥ ब्राह्मण्यं तपसोग्रेण प्राप्तवानसि कौशिक ।
भावार्थ
‘ब्रह्मर्षे ! तुम्हारा स्वागत है, हम तुम्हारी तपस्यासे बहुत संतुष्ट हुए हैं । कुशिकनन्दन ! तुमने अपनी उग्र-तपस्यासे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया ॥ १९½ ॥
दीर्घमायुश्च ते ब्रह्मन् ददामि समरुद्गणः ॥ २० ॥ स्वस्ति प्राप्नुहि भद्रं ते गच्छ सौम्य यथासुखम् ।
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! मरुद्गणोंसहित मैं तुम्हें दीर्घायु प्रदान करता हूँ । तुम्हारा कल्याण हो । सौम्य ! तुम मङ्गलके भागी बनो और तुम्हारी जहाँ इच्छा हो वहाँ सुखपूर्वक जाओ’ ॥ २०½ ॥
पितामहवचः श्रुत्वा सर्वेषां त्रिदिवौकसाम् ॥ २१ ॥ कृत्वा प्रणामं मुदितो व्याजहार महामुनिः ।
भावार्थ
पितामह ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्रने अत्यन्त प्रसन्न होकर सम्पूर्ण देवताओंको प्रणाम किया और कहा—॥ २१½ ॥
ब्राह्मण्यं यदि मे प्राप्तं दीर्घमायुस्तथैव च ॥ २२ ॥ ॐकारोऽथ वषट्कारो वेदाश्च वरयन्तु माम् । क्षत्रवेदविदां श्रेष्ठो ब्रह्मवेदविदामपि ॥ २३ ॥ ब्रह्मपुत्रो वसिष्ठो मामेवं वदतु देवताः । यद्येवं परमः कामः कृतो यान्तु सुरर्षभाः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘देवगण ! यदि मुझे ( आपकी कृपासे ) ब्राह्मणत्व मिल गया और दीर्घ आयुकी भी प्राप्ति हो गयी तो ॐकार, वषट्कार और चारों वेद स्वयं आकर मेरा वरण करें । इसके सिवा जो क्षत्रिय-वेद ( धनुर्वेद आदि ) तथा ब्रह्मवेद ( ऋक् आदि चारों वेद ) के ज्ञाताओंमें भी सबसे श्रेष्ठ हैं, वे ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ स्वयं आकर मुझसे ऐसा कहें ( कि तुम ब्राह्मण हो गये ), यदि ऐसा हो जाय तो मैं समझूँगा कि मेरा उत्तम मनोरथ पूर्ण हो गया । उस अवस्थामें आप सभी श्रेष्ठ देवगण यहाँसे जा सकते हैं’ ॥ २२—२४ ॥
ततः प्रसादितो देवैर्वसिष्ठो जपतां वरः । सख्यं चकार ब्रह्मर्षिरेवमस्त्विति चाब्रवीत् ॥ २५ ॥
भावार्थ
तब देवताओंने मन्त्रजप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिको प्रसन्न किया । इसके बाद ब्रह्मर्षि वसिष्ठने ‘एवमस्तु’ कहकर विश्वामित्रका ब्रह्मर्षि होना स्वीकार कर लिया और उनके साथ मित्रता स्थापित कर ली ॥ २५ ॥
ब्रह्मर्षिस्त्वं न संदेहः सर्वं सम्पद्यते तव । इत्युक्त्वा देवताश्चापि सर्वा जग्मुर्यथागतम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘मुने ! तुम ब्रह्मर्षि हो गये, इसमें संदेह नहीं है । तुम्हारा सब ब्राह्मणोचित संस्कार सम्पन्न हो गया ।’ ऐसा कहकर सम्पूर्ण देवता जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥ २६ ॥
विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा लब्ध्वा ब्राह्मण्यमुत्तमम् । पूजयामास ब्रह्मर्षिं वसिष्ठं जपतां वरम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उत्तम ब्राह्मणत्व प्राप्त करके धर्मात्मा विश्वामित्रजीने भी मन्त्र-जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठका पूजन किया ॥ २७ ॥
कृतकामो महीं सर्वां चचार तपसि स्थितः । एवं त्वनेन ब्राह्मण्यं प्राप्तं राम महात्मना ॥ २८ ॥
भावार्थ
इस तरह अपना मनोरथ सफल करके तपस्यामें लगे रहकर ही ये सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरने लगे । श्रीराम ! इस प्रकार कठोर तपस्या करके इन महात्माने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया ॥ २८ ॥
एष राम मुनिश्रेष्ठ एष विग्रहवांस्तपः । एष धर्मः परो नित्यं वीर्यस्यैष परायणम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
रघुनन्दन ! ये विश्वामित्रजी समस्त मुनियोंमें श्रेष्ठ हैं, ये तपस्याके मूर्तिमान् स्वरूप हैं, उत्तम धर्मके साक्षात् विग्रह हैं और पराक्रमकी परम निधि हैं ॥ २९ ॥
एवमुक्त्वा महातेजा विरराम द्विजोत्तमः । शतानन्दवचः श्रुत्वा रामलक्ष्मणसंनिधौ ॥ ३० ॥ जनकः प्राञ्जलिर्वाक्यमुवाच कुशिकात्मजम् ।
भावार्थ
ऐसा कहकर महातेजस्वी विप्रवर शतानन्दजी चुप हो गये । शतानन्दजीके मुखसे यह कथा सुनकर महाराज जनकने श्रीराम और लक्ष्मणके समीप विश्वामित्रजीसे हाथ जोड़कर कहा—॥ ३०½ ॥
धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यस्य मे मुनिपुङ्गव॥ ३१ ॥ यज्ञं काकुत्स्थसहितः प्राप्तवानसि कौशिक । पावितोऽहं त्वया ब्रह्मन् दर्शनेन महामुने ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘मुनिप्रवर कौशिक ! आप ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मणके साथ मेरे यज्ञमें पधारे, इससे मैं धन्य हो गया । आपने मुझपर बड़ी कृपा की । महामुने ! ब्रह्मन् ! आपने दर्शन देकर मुझे पवित्र कर दिया ॥ ३१-३२ ॥
गुणा बहुविधाः प्राप्तास्तव संदर्शनान्मया । विस्तरेण च वै ब्रह्मन् कीर्त्यमानं महत्तपः ॥ ३३ ॥ श्रुतं मया महातेजो रामेण च महात्मना । सदस्यैः प्राप्य च सदः श्रुतास्ते बहवो गुणाः॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘आपके दर्शनसे मुझे बड़ा लाभ हुआ, अनेक प्रकारके गुण उपलब्ध हुए । ब्रह्मन् ! आज इस सभामें आकर मैंने महात्मा राम तथा अन्य सदस्योंके साथ आपके महान् तेज ( प्रभाव ) का वर्णन सुना है, बहुत-से गुण सुने हैं । ब्रह्मन् ! शतानन्दजीने आपके महान् तपका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया है ॥ ३३-३४ ॥
अप्रमेयं तपस्तुभ्यमप्रमेयं च ते बलम् । अप्रमेया गुणाश्चैव नित्यं ते कुशिकात्मज ॥ ३५ ॥
भावार्थ
‘कुशिकनन्दन ! आपकी तपस्या अप्रमेय है, आपका बल अनन्त है तथा आपके गुण भी सदा ही माप और संख्यासे परे हैं ॥ ३५ ॥
तृप्तिराश्चर्यभूतानां कथानां नास्ति मे विभो । कर्मकालो मुनिश्रेष्ठ लम्बते रविमण्डलम् ॥ ३६ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! आपकी आश्चर्यमयी कथाओंके श्रवणसे मुझे तृप्ति नहीं होती है; किंतु मुनिश्रेष्ठ ! यज्ञका समय हो गया है, सूर्यदेव ढलने लगे हैं ॥ ३६ ॥
श्वः प्रभाते महातेजो द्रष्टुमर्हसि मां पुनः । स्वागतं जपतां श्रेष्ठ मामनुज्ञातुमर्हसि ॥ ३७ ॥
भावार्थ
‘जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी मुने ! आपका स्वागत है । कल प्रातःकाल फिर मुझे दर्शन दें, इस समय मुझे जानेकी आज्ञा प्रदान करें’ ॥ ३७ ॥
एवमुक्तो मुनिवरः प्रशस्य पुरुषर्षभम् । विससर्जाशु जनकं प्रीतं प्रीतमनास्तदा ॥ ३८ ॥
भावार्थ
राजाके ऐसा कहनेपर मुनिवर विश्वामित्रजी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने प्रीतियुक्त नरश्रेष्ठ राजा जनककी प्रशंसा करके शीघ्र ही उन्हें विदा कर दिया ॥ ३८ ॥
एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं वैदेहो मिथिलाधिपः । प्रदक्षिणं चकाराशु सोपाध्यायः सबान्धवः ॥ ३९ ॥
भावार्थ
उस समय मिथिलापति विदेहराज जनकने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रसे पूर्वोक्त बात कहकर अपने उपाध्याय और बन्धु-बान्धवोंके साथ उनकी शीघ्र ही परिक्रमा की । फिर वहाँसे वे चल दिये ॥ ३९ ॥
विश्वामित्रोऽपि धर्मात्मा सहरामः सलक्ष्मणः । स्वावासमभिचक्राम पूज्यमानो महात्मभिः ॥ ४० ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् धर्मात्मा विश्वामित्र भी महात्माओंसे पूजित होकर श्रीराम और लक्ष्मणके साथ अपने विश्रामस्थानपर लौट आये ॥ ४० ॥
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