बालकाण्ड, सर्ग 64
सुरकार्यमिदं रम्भे कर्तव्यं सुमहत् त्वया । लोभनं कौशिकस्येह काममोहसमन्वितम् ॥ १ ॥
भावार्थ
(इन्द्र बोले—) रम्भे ! देवताओंका एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित हुआ है । इसे तुम्हें ही पूरा करना है । तू महर्षि विश्वामित्रको इस प्रकार लुभा, जिससे वे काम और मोहके वशीभूत हो जायँ ॥ १ ॥
तथोक्ता साप्सरा राम सहस्राक्षेण धीमता । व्रीडिता प्राञ्जलिर्वाक्यं प्रत्युवाच सुरेश्वरम् ॥ २ ॥
भावार्थ
श्रीराम ! बुद्धिमान् इन्द्रके ऐसा कहनेपर वह अप्सरा लज्जित हो हाथ जोड़कर देवेश्वर इन्द्रसे बोली—॥ २ ॥
अयं सुरपते घोरो विश्वामित्रो महामुनिः । क्रोधमुत्स्रक्ष्यते घोरं मयि देव न संशयः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘सुरपते ! ये महामुनि विश्वामित्र बड़े भयंकर हैं । देव ! इसमें संदेह नहीं कि ये मुझपर भयानक क्रोधका प्रयोग करेंगे ॥ ३ ॥
ततो हि मे भयं देव प्रसादं कर्तुमर्हसि । एवमुक्तस्तया राम सभयं भीतया तदा ॥ ४ ॥ तामुवाच सहस्राक्षो वेपमानां कृताञ्जलिम् । मा भैषी रम्भे भद्रं ते कुरुष्व मम शासनम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘अतः देवेश्वर ! मुझे उनसे बड़ा डर लगता है, आप मुझपर कृपा करें ।’ श्रीराम ! डरी हुई रम्भाके इस प्रकार भयपूर्वक कहनेपर सहस्र नेत्रधारी इन्द्र हाथ जोड़कर खड़ी और थर-थर काँपती हुई रम्भासे इस प्रकार बोले—‘रम्भे ! तू भय न कर, तेरा भला हो, तू मेरी आज्ञा मान ले॥४-५॥
कोकिलो हृदयग्राही माधवे रुचिरद्रुमे । अहं कन्दर्पसहितः स्थास्यामि तव पार्श्वतः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘वैशाख मासमें जब कि प्रत्येक वृक्ष नवपल्लवोंसे परम सुन्दर शोभा धारण कर लेता है, अपनी मधुर काकलीसे सबके हृदयको खींचनेवाले कोकिल और कामदेवके साथ मैं भी तेरे पास रहूँगा ॥ ६ ॥
त्वं हि रूपं बहुगुणं कृत्वा परमभास्वरम् । तमृषिं कौशिकं भद्रे भेदयस्व तपस्विनम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘भद्रे ! तू अपने परम कान्तिमान् रूपको हाव-भाव आदि विविध गुणोंसे सम्पन्न करके उसके द्वारा विश्वामित्र मुनिको तपस्यासे विचलित कर दे’ ॥ ७ ॥
सा श्रुत्वा वचनं तस्य कृत्वा रूपमनुत्तमम् । लोभयामास ललिता विश्वामित्रं शुचिस्मिता ॥ ८ ॥
भावार्थ
देवराजका यह वचन सुनकर उस मधुर मुसकानवाली सुन्दरी अप्सराने परम उत्तम रूप बनाकर विश्वामित्रको लुभाना आरम्भ किया ॥ ८ ॥
कोकिलस्य तु शुश्राव वल्गु व्याहरतः स्वनम् । सम्प्रहृष्टेन मनसा स चैनामन्ववैक्षत ॥ ९ ॥
भावार्थ
विश्वामित्रने मीठी बोली बोलनेवाले कोकिलकी मधुर काकली सुनी । उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर जब उस ओर दृष्टिपात किया, तब सामने रम्भा खड़ी दिखायी दी ॥ ९ ॥
अथ तस्य च शब्देन गीतेनाप्रतिमेन च । दर्शनेन च रम्भाया मुनिः संदेहमागतः ॥ १० ॥
भावार्थ
कोकिलके कलरव, रम्भाके अनुपम गीत और अप्रत्याशित दर्शनसे मुनिके मनमें संदेह हो गया ॥ १० ॥
सहस्राक्षस्य तत्सर्वं विज्ञाय मुनिपुङ्गवः । रम्भां क्रोधसमाविष्टः शशाप कुशिकात्मजः ॥ ११ ॥
भावार्थ
देवराजका वह सारा कुचक्र उनकी समझमें आ गया । फिर तो मुनिवर विश्वामित्रने क्रोधमें भरकर रम्भाको शाप देते हुए कहा—॥ ११ ॥
यन्मां लोभयसे रम्भे कामक्रोधजयैषिणम् । दशवर्षसहस्राणि शैली स्थास्यसि दुर्भगे ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘दुर्भगे रम्भे ! मैं काम और क्रोधपर विजय पाना चाहता हूँ और तू आकर मुझे लुभाती है । अतः इस अपराधके कारण तू दस हजार वर्षोंतक पत्थरकी प्रतिमा बनकर खड़ी रहेगी ॥ १२ ॥
ब्राह्मणः सुमहातेजास्तपोबलसमन्वितः । उद्धरिष्यति रम्भे त्वां मत्क्रोधकलुषीकृताम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘रम्भे ! शापका समय पूरा हो जानेके बाद एक महान् तेजस्वी और तपोबलसम्पन्न ब्राह्मण ( ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठ ) मेरे क्रोधसे कलुषित तेरा उद्धार करेंगे’ ॥ १३ ॥
एवमुक्त्वा महातेजा विश्वामित्रो महामुनिः । अशक्नुवन् धारयितुं कोपं संतापमात्मनः ॥ १४ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र अपना क्रोध न रोक सकनेके कारण मन-ही-मन संतप्त हो उठे ॥ १४ ॥
तस्य शापेन महता रम्भा शैली तदाभवत् । वचः श्रुत्वा च कन्दर्पो महर्षेः स च निर्गतः ॥ १५ ॥
भावार्थ
मुनिके उस महाशापसे रम्भा तत्काल पत्थरकी प्रतिमा बन गयी । महर्षिका वह शापयुक्त वचन सुनकर कन्दर्प और इन्द्र वहाँसे खिसक गये ॥ १५ ॥
कोपेन च महातेजास्तपोऽपहरणे कृते । इन्द्रियैरजितै राम न लेभे शान्तिमात्मनः ॥ १६ ॥
भावार्थ
श्रीराम ! क्रोधसे तपस्याका क्षय हो गया और इन्द्रियाँ अभीतक काबूमें न आ सकीं, यह विचारकर उन महातेजस्वी मुनिके चित्तको शान्ति नहीं मिलती थी ॥ १६ ॥
बभूवास्य मनश्चिन्ता तपोऽपहरणे कृते । नैवं क्रोधं गमिष्यामि न च वक्ष्ये कथंचन ॥ १७ ॥
भावार्थ
तपस्याका अपहरण हो जानेपर उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि ‘अबसे न तो क्रोध करूँगा और न किसी भी अवस्थामें मुँहसे कुछ बोलूँगा ॥ १७ ॥
अथवा नोच्छ्वसिष्यामि संवत्सरशतान्यपि । अहं हि शोषयिष्यामि आत्मानं विजितेन्द्रियः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘अथवा सौ वर्षोंतक मैं श्वास भी न लूँगा । इन्द्रियोंको जीतकर इस शरीरको सुखा डालूँगा ॥ १८ ॥
तावद् यावद्धि मे प्राप्तं ब्राह्मण्यं तपसार्जितम् । अनुच्छ्वसन्नभुञ्जानस्तिष्ठेयं शाश्वतीः समाः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘जबतक अपनी तपस्यासे उपार्जित ब्राह्मणत्व मुझे प्राप्त न होगा, तबतक चाहे अनन्त वर्ष बीत जाय, मैं बिना खाये-पीये खड़ा रहूँगा और साँसतक न लूँगा ॥ १९ ॥
नहि मे तप्यमानस्य क्षयं यास्यन्ति मूर्तयः । एवं वर्षसहस्रस्य दीक्षां स मुनिपुङ्गवः । चकाराप्रतिमां लोके प्रतिज्ञां रघुनन्दन ॥ २० ॥
भावार्थ
‘तपस्या करते समय मेरे शरीरके अवयव कदापि नष्ट नहीं होंगे ।’ रघुनन्दन ! ऐसा निश्चय करके मुनिवर विश्वामित्रने पुनः एक हजार वर्षोंतक तपस्या करनेके लिये दीक्षा ग्रहण की । उन्होंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसकी संसारमें कहीं तुलना नहीं है ॥ २० ॥
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