बालकाण्ड, सर्ग 37
तप्यमाने तदा देवे सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः । सेनापतिमभीप्सन्तः पितामहमुपागमन् ॥ १ ॥
भावार्थ
जब महादेवजी तपस्या कर रहे थे, उस समय इन्द्र और अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता अपने लिये सेनापतिकी इच्छा लेकर ब्रह्माजीके पास आये ॥ १ ॥
ततोऽब्रुवन् सुराः सर्वे भगवन्तं पितामहम् । प्रणिपत्य सुराराम सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः ॥ २ ॥
भावार्थ
देवताओंको आराम देनेवाले श्रीराम ! इन्द्र और अग्निसहित समस्त देवताओंने भगवान् ब्रह्माको प्रणाम करके इस प्रकार कहा—॥ २ ॥
येन सेनापतिर्दैव दत्तो भगवता पुरा । स तपः परमास्थाय तप्यते स्म सहोमया ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! पूर्वकालमें जिन भगवान् महेश्वरने हमें ( बीज-रूपसे ) सेनापति प्रदान किया था, वे उमा देवीके साथ उत्तम तपका आश्रय लेकर तपस्या करते हैं ॥ ३ ॥
यदत्रानन्तरं कार्यं लोकानां हितकाम्यया । संविधत्स्व विधानज्ञ त्वं हि नः परमा गतिः ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘विधि-विधानके ज्ञाता पितामह ! अब लोकहितके लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, उसको पूर्ण कीजिये; क्योंकि आप ही हमारे परम आश्रय हैं’ ॥ ४ ॥
देवतानां वचः श्रुत्वा सर्वलोकपितामहः । सान्त्वयन् मधुरैर्वाक्यैस्त्रिदशानिदमब्रवीत् ॥ ५ ॥ शैलपुत्र्या यदुक्तं तन्न प्रजाः स्वासु पत्निषु । तस्या वचनमक्लिष्टं सत्यमेव न संशयः ॥ ६ ॥
भावार्थ
देवताओंकी यह बात सुनकर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने मधुर वचनोंद्वारा उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—॥ ‘देवताओ ! गिरिराजकुमारी पार्वतीने जो शाप दिया है, उसके अनुसार तुम्हें अपनी पत्नियोंके गर्भसे अब कोई संतान नहीं होगी । उमादेवीकी वाणी अमोघ है; अतः वह सत्य होकर ही रहेगी; इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥
इयमाकाशगङ्गा च यस्यां पुत्रं हुताशनः । जनयिष्यति देवानां सेनापतिमरिंदमम् ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘ये हैं उमाकी बड़ी बहिन आकाशगङ्गा, जिनके गर्भमें शङ्करजीके उस तेजको स्थापित करके अग्निदेव एक ऐसे पुत्रको जन्म देंगे, जो देवताओंके शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ सेनापति होगा ॥ ७ ॥
ज्येष्ठा शैलेन्द्रदुहिता मानयिष्यति तं सुतम् । उमायास्तद्बहुमतं भविष्यति न संशयः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘ये गङ्गा गिरिराजकी ज्येष्ठ पुत्री हैं, अतः अपनी छोटी बहिनके उस पुत्रको अपने ही पुत्रके समान मानेंगी । उमाको भी यह बहुत प्रिय लगेगा । इसमें संशय नहीं है’ ॥ ८ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कृतार्था रघुनन्दन । प्रणिपत्य सुराः सर्वे पितामहमपूजयन् ॥ ९ ॥
भावार्थ
रघुनन्दन ! ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर सब देवता कृतकृत्य हो गये । उन्होंने ब्रह्माजीको प्रणाम करके उनका पूजन किया ॥ ९ ॥
ते गत्वा परमं राम कैलासं धातुमण्डितम् । अग्निं नियोजयामासुः पुत्रार्थं सर्वदेवताः ॥ १० ॥
भावार्थ
श्रीराम ! विविध धातुओंसे अलंकृत उत्तम कैलास पर्वतपर जाकर उन सम्पूर्ण देवताओंने अग्निदेवको पुत्र उत्पन्न करनेके कार्यमें नियुक्त किया ॥ १० ॥
देवकार्यमिदं देव समाधत्स्व हुताशन । शैलपुत्र्यां महातेजो गङ्गायां तेज उत्सृज ॥ ११ ॥
भावार्थ
वे बोले—‘देव ! हुताशन ! यह देवताओंका कार्य है, इसे सिद्ध कीजिये । भगवान् रुद्रके उस महान् तेजको अब आप गङ्गाजीमें स्थापित कर दीजिये’ ॥ ११ ॥
देवतानां प्रतिज्ञाय गङ्गामभ्येत्य पावकः । गर्भं धारय वै देवि देवतानामिदं प्रियम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
तब देवताओंसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर अग्निदेव गङ्गाजीके निकट आये और बोले—‘देवि ! आप इस गर्भको धारण करें । यह देवताओंका प्रिय कार्य है’ ॥ १२ ॥
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा दिव्यं रूपमधारयत् । स तस्या महिमां दृष्ट्वा समन्तादवशीर्यत ॥ १३ ॥ समन्ततस्तदा देवीमभ्यषिञ्चत पावकः । सर्वस्रोतांसि पूर्णानि गङ्गाया रघुनन्दन ॥ १४ ॥
भावार्थ
अग्निदेवकी यह बात सुनकर गङ्गादेवीने दिव्यरूप धारण कर लिया । उनकी यह महिमा—यह रूप-वैभव देखकर अग्निदेवने उस रुद्र-तेजको उनके सब ओर बिखेर दिया ॥ रघुनन्दन ! अग्निदेवने जब गङ्गादेवीको सब ओरसे उस रुद्र-तेजद्वारा अभिषिक्त कर दिया, तब गङ्गाजीके सारे स्रोत उससे परिपूर्ण हो गये ॥ १४ ॥
तमुवाच ततो गङ्गा सर्वदेवपुरोगमम् । अशक्ता धारणे देव तेजस्तव समुद्धतम् ॥ १५ ॥ दह्यमानाग्निना तेन सम्प्रव्यथितचेतना ।
भावार्थ
तब गङ्गाने समस्त देवताओंके अग्रगामी अग्निदेवसे इस प्रकार कहा——‘देव ! आपके द्वारा स्थापित किये गये इस बढ़े हुए तेजको धारण करनेमें मैं असमर्थ हूँ । इसकी आँचसे जल रही हूँ और मेरी चेतना व्यथित हो गयी है’ ॥ १५½ ॥
अथाब्रवीदिदं गङ्गां सर्वदेवहुताशनः ॥ १६ ॥ इह हैमवते पार्श्वे गर्भोऽयं संनिवेश्यताम् ।
भावार्थ
तब सम्पूर्ण देवताओंके हविष्यको भोग लगानेवाले अग्निदेवने गङ्गा देवीसे कहा—‘देवि ! हिमालय पर्वतके पार्श्वभागमें इस गर्भको स्थापित कर दीजिये’ ॥ १६½ ॥
श्रुत्वा त्वग्निवचो गङ्गा तं गर्भमतिभास्वरम् ॥ १७ ॥ उत्ससर्ज महातेजाः स्रोतोभ्यो हि तदानघ ।
भावार्थ
निष्पाप रघुनन्दन ! अग्निकी यह बात सुनकर महातेजस्विनी गङ्गाने उस अत्यन्त प्रकाशमान गर्भको अपने स्रोतोंसे निकालकर यथोचित स्थानमें रख दिया ॥ १७½ ॥
यदस्या निर्गतं तस्मात् तप्तजाम्बूनदप्रभम् ॥ १८ ॥ काञ्चनं धरणीं प्राप्तं हिरण्यमतुलप्रभम् । ताम्रं कार्ष्णायसं चैव तैक्ष्ण्यादेवाभिजायत ॥ १९ ॥ मलं तस्याभवत् तत्र त्रपु सीसकमेव च । तदेतद्धरणीं प्राप्य नानाधातुरवर्धत ॥ २० ॥
भावार्थ
गङ्गाके गर्भसे जो तेज निकला, वह तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान कान्तिमान् दिखायी देने लगा ( गङ्गा सुवर्णमय मेरुगिरिसे प्रकट हुई हैं; अतः उनका बालक भी वैसे ही रूप-रंगका हुआ ) । पृथ्वीपर जहाँ वह तेजस्वी गर्भ स्थापित हुआ, वहाँकी भूमि तथा प्रत्येक वस्तु सुवर्णमयी हो गयी । उसके आस-पासका स्थान अनुपम प्रभासे प्रकाशित होनेवाला रजत हो गया । उस तेजकी तीक्ष्णतासे ही दूरवर्ती भूभागकी वस्तुएँ ताँबे और लोहेके रूपमें परिणत हो गयीं ॥ उस तेजस्वी गर्भका जो मल था, वही वहाँ राँगा और सीसा हुआ । इस प्रकार पृथ्वीपर पड़कर वह तेज नाना प्रकारके धातुओंके रूपमें वृद्धिको प्राप्त हुआ ॥ २० ॥
निक्षिप्तमात्रे गर्भे तु तेजोभिरभिरञ्जितम् । सर्वे पर्वतसंनद्धं सौवर्णमभवद् वनम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
पृथ्वीपर उस गर्भके रखे जाते ही उसके तेजसे व्याप्त होकर पूर्वोक्त श्वेतपर्वत और उससे सम्बन्ध रखनेवाला सारा वन सुवर्णमय होकर जगमगाने लगा ॥ २१ ॥
जातरूपमिति ख्यातं तदाप्रभृति राघव । सुवर्णं पुरुषव्याघ्र हुताशनसमप्रभम् । तृणवृक्षलतागुल्मं सर्वं भवति काञ्चनम् ॥ २२ ॥
भावार्थ
पुरुषसिंह रघुनन्दन ! तभीसे अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले सुवर्णका नाम जातरूप हो गया; क्योंकि उसी समय सुवर्णका तेजस्वी रूप प्रकट हुआ था । उस गर्भके सम्पर्कसे वहाँका तृण, वृक्ष, लता और गुल्म—सब कुछ सोनेका हो गया ॥ २२ ॥
तं कुमारं ततो जातं सेन्द्राः सह मरुद्गणाः । क्षीरसम्भावनार्थाय कृत्तिकाः समयोजयन् ॥ २३ ॥
भावार्थ
तदनन्तर इन्द्र और मरुद्गणोंसहित सम्पूर्ण देवताओंने वहाँ उत्पन्न हुए कुमारको दूध पिलानेके लिये छहों कृत्तिकाओं-को नियुक्त किया ॥ २३ ॥
ताः क्षीरं जातमात्रस्य कृत्वा समयमुत्तमम् । ददुः पुत्रोऽयमस्माकं सर्वासामिति निश्चिताः ॥ २४ ॥
भावार्थ
तब उन कृत्तिकाओंने ‘यह हम सबका पुत्र हो’ ऐसी उत्तम शर्त रखकर और इस बातका निश्चित विश्वास लेकर उस नवजात बालकको अपना दूध प्रदान किया ॥ २४ ॥
ततस्तु देवताः सर्वाः कार्तिकेय इति ब्रुवन् । पुत्रस्त्रैलोक्यविख्यातो भविष्यति न संशयः ॥ २५ ॥
भावार्थ
उस समय सब देवता बोले—‘यह बालक कार्तिकेय कहलायेगा और तुमलोगोंका त्रिभुवनविख्यात पुत्र होगा—इसमें संशय नहीं है’ ॥ २५ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा स्कन्नं गर्भपरिस्रवे । स्नापयन् परया लक्ष्म्या दीप्यमानं यथानलम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
देवताओंका यह अनुकूल वचन सुनकर शिव और पार्वती-से स्कन्दित ( स्खलित ) तथा गङ्गाद्वारा गर्भस्राव होनेपर प्रकट हुए अग्निके समान उत्तम प्रभासे प्रकाशित होनेवाले उस बालकको कृत्तिकाओंने नहलाया ॥ २६ ॥
स्कन्द इत्यब्रुवन् देवाः स्कन्नं गर्भपरिस्रवे । कार्तिकेयं महाबाहुं काकुत्स्थ ज्वलनोपमम् ॥ २७ ॥
भावार्थ
ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! अग्नितुल्य तेजस्वी महाबाहु कार्तिकेय गर्भस्रावकालमें स्कन्दित हुए थे; इसलिये देवताओंने उन्हें स्कन्द कहकर पुकारा ॥ २७ ॥
प्रादुर्भूतं ततः क्षीरं कृत्तिकानामनुत्तमम् । षण्णां षडाननो भूत्वा जग्राह स्तनजं पयः ॥ २८ ॥
भावार्थ
तदनन्तर कृत्तिकाओंके स्तनोंमें परम उत्तम दूध प्रकट हुआ । उस समय स्कन्दने अपने छः मुख प्रकट करके उन छहोंका एक साथ ही स्तनपान किया ॥ २८ ॥
गृहीत्वा क्षीरमेकाह्ना सुकुमारवपुस्तदा । अजयत् स्वेन वीर्येण दैत्यसैन्यगणान् विभुः ॥ २९ ॥
भावार्थ
एक ही दिन दूध पीकर उस सुकुमार शरीरवाले शक्तिशाली कुमारने अपने पराक्रमसे दैत्योंकी सारी सेनाओंपर विजय प्राप्त की ॥ २९ ॥
सुरसेनागणपतिमभ्यषिञ्चन्महाद्युतिम् । ततस्तममराः सर्वे समेत्याग्निपुरोगमाः ॥ ३० ॥ एष ते राम गङ्गाया विस्तरोऽभिहितो मया । कुमारसम्भवश्चैव धन्यः पुण्यस्तथैव च ॥ ३१ ॥ भक्तश्च यः कार्तिकेये काकुत्स्थ भुवि मानवः । आयुष्मान् पुत्रपौत्रैश्च स्कन्दसालोक्यतां व्रजेत् ॥ ३२ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् अग्नि आदि सब देवताओंने मिलकर उन महातेजस्वी स्कन्दका देवसेनापतिके पदपर अभिषेक किया ॥ श्रीराम ! यह मैंने तुम्हें गङ्गाजीके चरित्रको विस्तारपूर्वक बताया है; साथ ही कुमार कार्तिकेयके जन्मका भी प्रसङ्ग सुनाया है, जो श्रोताको धन्य एवं पुण्यात्मा बनानेवाला है ॥ काकुत्स्थ ! इस पृथ्वीपर जो मनुष्य कार्तिकेयमें भक्तिभाव रखता है, वह इस लोकमें दीर्घायु तथा पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न हो मृत्युके पश्चात् स्कन्दके लोकमें जाता है ॥ ३२ ॥
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