बालकाण्ड, सर्ग 36
उक्तवाक्ये मुनौ तस्मिन्नुभौ राघवलक्ष्मणौ । प्रतिनन्द्य कथां वीरावूचतुर्मुनिपुङ्गवम् ॥ १ ॥
भावार्थ
विश्वामित्रजीकी बात समाप्त होनेपर श्रीराम और लक्ष्मण दोनों वीरोंने उनकी कही हुई कथाका अभिनन्दन करके मुनिवर विश्वामित्रसे इस प्रकार कहा--॥ १ ॥
धर्मयुक्तमिदं ब्रह्मन् कथितं परमं त्वया । दुहितुः शैलराजस्य ज्येष्ठाया वक्तुमर्हसि । विस्तरं विस्तरज्ञोऽसि दिव्यमानुषसम्भवम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! आपने यह बड़ी उत्तम धर्मयुक्त कथा सुनायी । अब आप गिरिराज हिमवानकी ज्येष्ठ पुत्री गङ्गाके दिव्यलोक तथा मनुष्यलोकसे सम्बन्ध होनेका वृत्तान्त विस्तारके साथ सुनाइये; क्योंकि आप विस्तृत वृत्तान्तके ज्ञाता हैं ॥ २ ॥
त्रीन् पथो हेतुना केन प्लावयेल्लोकपावनी । कथं गङ्गा त्रिपथगा विश्रुता सरिदुत्तमा ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘लोकको पवित्र करनेवाली गङ्गा किस कारणसे तीन मार्गोंमें प्रवाहित होती हैं ? सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाकी ‘त्रिपथगा’ नामसे प्रसिद्धि क्यों हुई ? ॥ ३ ॥
त्रिषु लोकेषु धर्मज्ञ कर्मभिः कैः समन्विता । तथा ब्रुवति काकुत्स्थे विश्वामित्रस्तपोधनः ॥ ४ ॥ निखिलेन कथां सर्वामृषिमध्ये न्यवेदयत् । पुरा राम कृतोद्वाहः शितिकण्ठो महातपाः ॥ ५ ॥ दृष्ट्वा च भगवान् देवीं मैथुनायोपचक्रमे ।
भावार्थ
‘धर्मज्ञ महर्षे ! तीनों लोकोंमें वे अपनी तीन धाराओंके द्वारा कौन-कौन-से कार्य करती हैं ?’ श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर तपोधन विश्वामित्रने मुनिमण्डलीके बीच गङ्गाजीसे सम्बन्ध रखनेवाली सारी बातें पूर्णरूपसे कह सुनायीं--॥ ‘श्रीराम ! पूर्वकालमें महातपस्वी भगवान् नीलकण्ठने उमादेवीके साथ विवाह करके उनको नववधूके रूपमें अपने निकट आयी देख उनके साथ रति-क्रीडा आरम्भ की ॥ ५½ ॥
तस्य संक्रीडमानस्य महादेवस्य धीमतः । शितिकण्ठस्य देवस्य दिव्यं वर्षशतं गतम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘परम बुद्धिमान् महान् देवता भगवान् नीलकण्ठके उमादेवीके साथ क्रीडा-विहार करते सौ दिव्य वर्ष बीत गये ॥ ६ ॥
न चापि तनयो राम तस्यामासीत् परंतप । सर्वे देवाः समुद्युक्ताः पितामहपुरोगमाः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम ! इतने वर्षोंतक विहारके बाद भी महादेवजीके उमादेवीके गर्भसे कोई पुत्र नहीं हुआ । यह देख ब्रह्मा आदि सभी देवता उन्हें रोकनेका उद्योग करने लगे ॥ ७ ॥
यदिहोत्पद्यते भूतं कस्तत् प्रतिसहिष्यति । अभिगम्य सुराः सर्वे प्रणिपत्येदमब्रुवन् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘उन्होंने सोचा--इतने दीर्घकालके पश्चात् यदि रुद्रके तेजसे उमादेवीके गर्भसे कोई महान् प्राणी प्रकट हो भी जाय तो कौन उसके तेजको सहन करेगा ? यह विचारकर सब देवता भगवान् शिवके पास जा उन्हें प्रणाम करके यों बोले--॥८॥
देवदेव महादेव लोकस्यास्य हिते रत । सुराणां प्रणिपातेन प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘‘इस लोकके हितमें तत्पर रहनेवाले देवदेव महादेव ! देवता आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं । इससे प्रसन्न होकर आप इन देवताओंपर कृपा करें ॥ ९ ॥
न लोका धारयिष्यन्ति तव तेजः सुरोत्तम । ब्राह्मेण तपसा युक्तो देव्या सह तपश्चर ॥ १० ॥
भावार्थ
‘‘सुरश्रेष्ठ ! ये लोक आपके तेजको नहीं धारण कर सकेंगे; अतः आप क्रीडासे निवृत्त हो वेदबोधित तपस्यासे युक्त होकर उमादेवीके साथ तप कीजिये ॥ १० ॥
त्रैलोक्यहितकामार्थं तेजस्तेजसि धारय । रक्ष सर्वानिमाँल्लोकान् नालोकं कर्तुमर्हसि ॥ ११ ॥ देवतानां वचः श्रुत्वा सर्वलोकमहेश्वरः । बाढमित्यब्रवीत् सर्वान् पुनश्चेदमुवाच ह ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘‘तीनों लोकोंके हितकी कामनासे अपने तेज ( वीर्य ) को तेजःस्वरूप अपने आपमें ही धारण कीजिये । इन सब लोकोंकी रक्षा कीजिये । लोकोंका विनाश न कर डालिये’ ॥ ‘देवताओंकी यह बात सुनकर सर्वलोकमहेश्वर शिवने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया; फिर उनसे इस प्रकार कहा--॥ १२ ॥
धारयिष्याम्यहं तेजस्तेजसैव सहोमया । त्रिदशाः पृथिवी चैव निर्वाणमधिगच्छतु ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘‘देवताओ ! उमासहित मैं अर्थात् हम दोनों अपने तेजसे ही तेजको धारण कर लेंगे । पृथ्वी आदि सभी लोकोंके निवासी शान्ति लाभ करें ॥ १३ ॥
यदिदं क्षुभितं स्थानान्मम तेजो ह्यनुत्तमम् । धारयिष्यति कस्तन्मे ब्रुवन्तु सुरसत्तमाः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘‘किंतु सुरश्रेष्ठगण ! यदि मेरा यह सर्वोत्तम तेज ( वीर्य ) क्षुब्ध होकर अपने स्थानसे स्खलित हो जाय तो उसे कौन धारण करेगा?––यह मुझे बताओ’ ॥ १४ ॥
एवमुक्तास्ततो देवाः प्रत्यूचुर्वृषभध्वजम् । यत्तेजः क्षुभितं ह्यद्य तद्धरा धारयिष्यति ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘उनके ऐसा कहनेपर देवताओंने वृषभध्वज भगवान् शिवसे कहा––‘भगवन् ! आज आपका जो तेज क्षुब्ध होकर गिरेगा, उसे यह पृथ्वीदेवी धारण करेगी’ ॥ १५ ॥
एवमुक्तः सुरपतिः प्रमुमोच महाबलः । तेजसा पृथिवी येन व्याप्ता सगिरिकानना ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘देवताओंका यह कथन सुनकर महाबली देवेश्वर शिवने अपना तेज छोड़ा, जिससे पर्वत और वनोंसहित यह सारी पृथ्वी व्याप्त हो गयी ॥ १६ ॥
ततो देवाः पुनरिदमूचुश्चापि हुताशनम् । आविश त्वं महातेजो रौद्रं वायुसमन्वितः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘तब देवताओंने अग्निदेवसे कहा––‘अग्ने ! तुम वायुके सहयोगसे भगवान् शिवके इस महान् तेजको अपने भीतर रख लो’ ॥ १७ ॥
तदग्निना पुनर्व्याप्तं संजातं श्वेतपर्वतम् । दिव्यं शरवणं चैव पावकादित्यसंनिभम् ॥ १८ ॥ यत्र जातो महातेजाः कार्तिकेयोऽग्निसम्भवः । अथोमां च शिवं चैव देवाः सर्षिगणास्तथा ॥ १९ ॥ पूजयामासुरत्यर्थं सुप्रीतमनसस्तदा ।
भावार्थ
‘अग्निसे व्याप्त होनेपर वह तेज श्वेत पर्वतके रूपमें परिणत हो गया । साथ ही वहाँ दिव्य सरकंडोंका वन भी प्रकट हुआ, जो अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी प्रतीत होता था ॥ ‘उसी वनमें अग्निजनित महातेजस्वी कार्तिकेयका प्रादुर्भाव हुआ । तदनन्तर ऋषियोंसहित देवताओंने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर देवी उमा और भगवान् शिवका बड़े भक्तिभावसे पूजन किया ॥ १९½ ॥
अथ शैलसुता राम त्रिदशानिदमब्रवीत् ॥ २० ॥ समन्युरशपत् सर्वान् क्रोधसंरक्तलोचना ।
भावार्थ
‘श्रीराम ! इसके बाद गिरिराजनन्दिनी उमाके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये । उन्होंने समस्त देवताओंको रोषपूर्वक शाप दे दिया । वे बोलीं—॥ २०½ ॥
यस्मान्निवारिता चाहं संगता पुत्रकाम्यया ॥ २१ ॥ अपत्यं स्वेषु दारेषु नोत्पादयितुमर्हथ । अद्यप्रभृति युष्माकमप्रजाः सन्तु पत्नयः ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘देवताओ ! मैंने पुत्र-प्राप्तिकी इच्छासे पतिके साथ समागम किया था; परंतु तुमने मुझे रोक दिया । अतः अब तुमलोग भी अपनी पत्नियोंसे संतान उत्पन्न करने योग्य नहीं रह जाओगे । आजसे तुम्हारी पत्नियाँ संतानोत्पादन नहीं कर सकेंगी––संतानहीन हो जायँगी’ ॥ २१-२२ ॥
एवमुक्त्वा सुरान् सर्वाञ्शशाप पृथिवीमपि । अवने नैकरूपा त्वं बहुभार्या भविष्यसि ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘सब देवताओंसे ऐसा कहकर उमादेवीने पृथिवीको भी शाप दिया––‘भूमे ! तेरा एक रूप नहीं रह जायगा । तू बहुतोंकी भार्या होगी ॥ २३ ॥
न च पुत्रकृतां प्रीतिं मत्क्रोधकलुषीकृता । प्राप्स्यसि त्वं सुदुर्मेधो मम पुत्रमनिच्छती ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘खोटी बुद्धिवाली पृथ्वी ! तू चाहती थी कि मेरे पुत्र न हो । अतः मेरे क्रोधसे कलुषित होकर तू भी पुत्रजनित सुख या प्रसन्नताका अनुभव न कर सकेगी’ ॥ २४ ॥
तान् सर्वान् पीडितान् दृष्ट्वा सुरान् सुरपतिस्तदा । गमनायोपचक्राम दिशं वरुणपालिताम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘उन सब देवताओंको उमादेवीके शापसे पीडित देख देवेश्वर भगवान् शिवने उस समय पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थान कर दिया ॥ २५ ॥
स गत्वा तप आतिष्ठत् पार्श्वे तस्योत्तरे गिरेः । हिमवत्प्रभवे शृङ्गे सह देव्या महेश्वरः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘वहाँसे जाकर हिमालय पर्वतके उत्तर भागमें उसीके एक शिखरपर उमादेवीके साथ भगवान् महेश्वर तप करने लगे ॥ २६ ॥
एष ते विस्तरो राम शैलपुत्र्या निवेदितः । गङ्गायाः प्रभवं चैव शृणु मे सहलक्ष्मण ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मणसहित श्रीराम ! यह मैंने तुम्हें गिरिराज हिमवान्की छोटी पुत्री उमादेवीका विस्तृत वृत्तान्त बताया है । अब मुझसे गङ्गाके प्रादुर्भावकी कथा सुनो’ ॥ २७ ॥
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