बालकाण्ड, सर्ग 38
तां कथां कौशिको रामे निवेद्य मधुराक्षराम् । पुनरेवापरं वाक्यं काकुत्स्थमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
विश्वामित्रजीने मधुर अक्षरोंसे युक्त वह कथा श्रीरामको सुनाकर फिर उनसे दूसरा प्रसङ्ग इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
अयोध्याधिपतिर्वीर पूर्वमासीन्नराधिपः । सगरो नाम धर्मात्मा प्रजाकामः स चाप्रजः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘वीर ! पहलेकी बात है, अयोध्यामें सगर नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे । उन्हें कोई पुत्र नहीं था; अतः वे पुत्र-प्राप्तिके लिये सदा उत्सुक रहा करते थे ॥ २ ॥
वैदर्भदुहिता राम केशिनी नाम नामतः । ज्येष्ठा सगरपत्नी सा धर्मिष्ठा सत्यवादिनी ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘श्रीराम ! विदर्भराजकुमारी केशिनी राजा सगरकी ज्येष्ठ पत्नी थी । वह बड़ी धर्मात्मा और सत्यवादिनी थी ॥ ३ ॥
अरिष्टनेमेर्दुहिता सुपर्णभगिनी तु सा । द्वितीया सगरस्यासीत् पत्नी सुमतिसंज्ञिता ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘सगरकी दूसरी पत्नीका नाम सुमति था । वह अरिष्टनेमि कश्यपकी पुत्री तथा गरुडकी बहिन थी ॥ ४ ॥
ताभ्यां सह महाराजः पत्नीभ्यां तप्तवांस्तपः । हिमवन्तं समासाद्य भृगुप्रस्रवणे गिरौ ॥ ५ ॥ अथ वर्षशते पूर्णे तपसाऽऽराधितो मुनिः । सगराय वरं प्रादाद् भृगुः सत्यवतां वरः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘महाराज सगर अपनी उन दोनों पत्नियोंके साथ हिमालय पर्वतपर जाकर भृगुप्रस्रवण नामक शिखरपर तपस्या करने लगे ॥ ‘सौ वर्ष पूर्ण होनेपर उनकी तपस्याद्वारा प्रसन्न हुए सत्यवादियोंमें श्रेष्ठ महर्षि भृगुने राजा सगरको वर दिया ॥६॥
अपत्यलाभः सुमहान् भविष्यति तवानघ । कीर्तिं चाप्रतिमां लोके प्राप्स्यसे पुरुषर्षभ ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘निष्पाप नरेश ! तुम्हें बहुत-से पुत्रोंकी प्राप्ति होगी । पुरुषप्रवर ! तुम इस संसारमें अनुपम कीर्ति प्राप्त करोगे ॥७॥
एका जनयिता तात पुत्रं वंशकरं तव । षष्टिं पुत्रसहस्राणि अपरा जनयिष्यति ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘तात ! तुम्हारी एक पत्नी तो एक ही पुत्रको जन्म देगी, जो अपनी वंशपरम्पराका विस्तार करनेवाला होगा तथा दूसरी पत्नी साठ हजार पुत्रोंकी जननी होगी ॥ ८ ॥
भाषमाणं महात्मानं राजपुत्र्यौ प्रसाद्य तम् । ऊचतुः परमप्रीते कृताञ्जलिपुटे तदा ॥ ९ ॥ एकः कस्याः सुतो ब्रह्मन् का बहूञ्जनयिष्यति । श्रोतुमिच्छावहे ब्रह्मन् सत्यमस्तु वचस्तव ॥ १० ॥
भावार्थ
‘महात्मा भृगु जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय उन दोनों राजकुमारियों ( रानियों ) ने उन्हें प्रसन्न करके स्वयं भी अत्यन्त आनन्दित हो दोनों हाथ जोड़कर पूछा—॥ ‘ब्रह्मन् ! किस रानीके एक पुत्र होगा और कौन बहुत-से पुत्रोंकी जननी होगी ? हम दोनों यह सुनना चाहती हैं । आपकी वाणी सत्य हो’ ॥ १० ॥
तयोस्तद् वचनं श्रुत्वा भृगुः परमधार्मिकः । उवाच परमां वाणीं स्वच्छन्दोऽत्र विधीयताम् ॥ ११ ॥ एको वंशकरो वास्तु बहवो वा महाबलाः । कीर्तिमन्तो महोत्साहाः का वा कं वरमिच्छति ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘उन दोनोंकी यह बात सुनकर परम धर्मात्मा भृगुने उत्तम वाणीमें कहा—‘देवियो ! तुमलोग यहाँ अपनी इच्छा प्रकट करो । तुम्हें वंश चलानेवाला एक ही पुत्र प्राप्त हो अथवा महान् बलवान्, यशस्वी एवं अत्यन्त उत्साही बहुत-से पुत्र ? इन दो वरोंमेंसे किस वरको कौन-सी रानी ग्रहण करना चाहती है ?’ ॥ ११-१२ ॥
मुनेस्तु वचनं श्रुत्वा केशिनी रघुनन्दन । पुत्रं वंशकरं राम जग्राह नृपसंनिधौ ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘रघुकुलनन्दन श्रीराम ! मुनिका यह वचन सुनकर केशिनीने राजा सगरके समीप वंश चलानेवाले एक ही पुत्रका वर ग्रहण किया ॥ १३ ॥
षष्टिं पुत्रसहस्राणि सुपर्णभगिनी तदा । महोत्साहान् कीर्तिमतो जग्राह सुमतिः सुतान् ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘तब गरुड़की बहिन सुमतिने महान् उत्साही और यशस्वी साठ हजार पुत्रोंको जन्म देनेका वर प्राप्त किया ॥१४॥
प्रदक्षिणमृषिं कृत्वा शिरसाभिप्रणम्य तम् । जगाम स्वपुरं राजा सभार्यो रघुनन्दन ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘रघुनन्दन ! तदनन्तर रानियोंसहित राजा सगरने महर्षिकी परिक्रमा करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और अपने नगरको प्रस्थान किया ॥ १५ ॥
अथ काले गते तस्य ज्येष्ठा पुत्रं व्यजायत । असमञ्ज इति ख्यातं केशिनी सगरात्मजम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘कुछ काल व्यतीत होनेपर बड़ी रानी केशिनीने सगरके औरस पुत्र ‘असमञ्ज’ को जन्म दिया ॥ १६ ॥
सुमतिस्तु नरव्याघ्र गर्भतुम्बं व्यजायत । षष्टिः पुत्रसहस्राणि तुम्बभेदाद् विनिःसृताः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! ( छोटी रानी ) सुमतिने तूँबीके आकारका एक गर्भपिण्ड उत्पन्न किया । उसको फोड़नेसे साठ हजार बालक निकले ॥ १७ ॥
घृतपूर्णेषु कुम्भेषु धात्र्यस्तान् समवर्धयन् । कालेन महता सर्वे यौवनं प्रतिपेदिरे ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘उन्हें घीसे भरे हुए घड़ोंमें रखकर धाइयाँ उनका पालन-पोषण करने लगीं । धीरे-धीरे जब बहुत दिन बीत गये, तब वे सभी बालक युवावस्थाको प्राप्त हुए ॥ १८ ॥
अथ दीर्घेण कालेन रूपयौवनशालिनः । षष्टिः पुत्रसहस्राणि सगरस्याभवंस्तदा ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘इस तरह दीर्घकालके पश्चात् राजा सगरके रूप और युवावस्थासे सुशोभित होनेवाले साठ हजार पुत्र तैयार हो गये ॥ १९ ॥
स च ज्येष्ठो नरश्रेष्ठ सगरस्यात्मसम्भवः । बालान् गृहीत्वा तु जले सरय्वा रघुनन्दन ॥ २० ॥ प्रक्षिप्य प्राहसन्नित्यं मज्जतस्तान् निरीक्ष्य वै ।
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन ! सगरका ज्येष्ठ पुत्र असमञ्ज नगरके बालकोंको पकड़कर सरयूके जलमें फेंक देता और जब वे डूबने लगते, तब उनकी ओर देखकर हँसा करता ॥ २०½ ॥
एवं पापसमाचारः सज्जनप्रतिबाधकः ॥ २१ ॥ पौराणामहिते युक्तः पित्रा निर्वासितः पुरात् ।
भावार्थ
‘इस प्रकार पापाचारमें प्रवृत्त होकर जब वह सत्पुरुषोंको पीडा देने और नगर-निवासियोंका अहित करने लगा; तब पिताने उसे नगरसे बाहर निकाल दिया ॥ २१½ ॥
तस्य पुत्रोऽशुमान् नाम असमञ्जस्य वीर्यवान् ॥ २२ ॥ सम्मतः सर्वलोकस्य सर्वस्यापि प्रियंवदः ।
भावार्थ
‘असमञ्जके पुत्रका नाम था अंशुमान् । वह बड़ा ही पराक्रमी, सबसे मधुर वचन बोलनेवाला तथा सब लोगोंको प्रिय था ॥ २२½ ॥
ततः कालेन महता मतिः समभिजायत ॥ २३ ॥ सगरस्य नरश्रेष्ठ यजेयमिति निश्चिता ।
भावार्थ
‘नरश्रेष्ठ ! कुछ कालके अनन्तर महाराज सगरके मनमें यह निश्चित विचार हुआ कि ‘मैं यज्ञ करूँ’ ॥ २३½ ॥
स कृत्वा निश्चयं राजा सोपाध्यायगणस्तदा । यज्ञकर्मणि वेदज्ञो यष्टुं समुपचक्रमे ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘यह दृढ़ निश्चय करके वे वेदवेत्ता नरेश अपने उपा-ध्यायोंके साथ यज्ञ करनेकी तैयारीमें लग गये’ ॥ २४ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें