बालकाण्ड, सर्ग 33
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कुशनाभस्य धीमतः । शिरोभिश्चरणौ स्पृष्ट्वा कन्याशतमभाषत ॥ १ ॥
भावार्थ
बुद्धिमान् महाराज कुशनाभका वह वचन सुनकर उन सौ कन्याओंने पिताके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—॥ १ ॥
वायुः सर्वात्मको राजन् प्रधर्षयितुमिच्छति । अशुभं मार्गमास्थाय न धर्मं प्रत्यवेक्षते ॥ २ ॥
भावार्थ
राजन् ! सर्वत्र संचार करनेवाले वायुदेव अशुभ मार्गका अवलम्बन करके हमपर बलात्कार करना चाहते थे । धर्मपर उनकी दृष्टि नहीं थी ॥ २ ॥
पितृमत्यः स्म भद्रं ते स्वच्छन्दे न वयं स्थिताः । पितरं नो वृणीष्व त्वं यदि नो दास्यते तव ॥ ३ ॥
भावार्थ
हमने उनसे कहा—‘देव ! आपका कल्याण हो, हमारे पिता विद्यमान हैं; हम स्वच्छन्द नहीं हैं । आप पिताजीके पास जाकर हमारा वरण कीजिये । यदि वे हमें आपको सौंप देंगे तो हम आपकी हो जायँगी’ ॥ ३ ॥
तेन पापानुबन्धेन वचनं न प्रतीच्छता । एवं ब्रुवन्त्यः सर्वाः स्म वायुनाभिहता भृशम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
परंतु उनका मन तो पापसे बँधा हुआ था । उन्होंने हमारी बात नहीं मानी । हम सब बहिनें ये ही धर्मसंगत बातें कह रही थीं, तो भी उन्होंने हमें गहरी चोट पहुँचायी— बिना अपराधके ही हमें पीडा दी ॥ ४ ॥
तासां तु वचनं श्रुत्वा राजा परमधार्मिकः । प्रत्युवाच महातेजाः कन्याशतमनुत्तमम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
उनकी बात सुनकर परम धर्मात्मा महातेजस्वी राजाने उन अपनी परम उत्तम सौ कन्याओंको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ५ ॥
क्षान्तं क्षमावतां पुत्र्यः कर्तव्यं सुमहत् कृतम् । ऐकमत्यमुपागम्य कुलं चावेक्षितं मम ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘पुत्रियो ! क्षमाशील महापुरुष ही जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है । यह तुमलोगोंके द्वारा महान् कार्य सम्पन्न हुआ है । तुम सबने एकमत होकर जो मेरे कुलकी मर्यादापर ही दृष्टि रक्खी है—कामभावको अपने मनमें स्थान नहीं दिया है—यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है ॥६॥
अलंकारो हि नारीणां क्षमा तु पुरुषस्य वा । दुष्करं तच्च वै क्षान्तं त्रिदशेषु विशेषतः ॥ ७ ॥ यादृशी वः क्षमा पुत्र्यः सर्वासामविशेषतः ।
भावार्थ
‘स्त्री हो या पुरुष, उसके लिये क्षमा ही आभूषण है । पुत्रियो ! तुम सब लोगोंमें समानरूपसे जैसी क्षमा या सहिष्णुता है, वह विशेषतः देवताओंके लिये भी दुष्कर ही है ॥ ७½ ॥
क्षमा दानं क्षमा सत्यं क्षमा यज्ञाश्च पुत्रिकाः ॥ ८ ॥ क्षमा यशः क्षमा धर्मः क्षमायां विष्ठितं जगत् ।
भावार्थ
‘पुत्रियो ! क्षमा दान है, क्षमा सत्य है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है और क्षमा धर्म है, क्षमापर ही यह सम्पूर्ण जगत् टिका हुआ है’॥ ८½ ॥
विसृज्य कन्याः काकुत्स्थ राजा त्रिदशविक्रमः ॥ ९ ॥ मन्त्रज्ञो मन्त्रयामास प्रदानं सह मन्त्रिभिः । देशे काले च कर्तव्यं सदृशे प्रतिपादनम् ॥ १० ॥
भावार्थ
ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम ! देवतुल्य पराक्रमी राजा कुशनाभने कन्याओंसे ऐसा कहकर उन्हें अन्तःपुरमें जानेकी आज्ञा दे दी और मन्त्रणाके तत्त्वको जाननेवाले उन नरेशने स्वयं मन्त्रियोंके साथ बैठकर कन्याओंके विवाहके विषयमें विचार आरम्भ किया । विचारणीय विषय यह था कि ‘किस देशमें किस समय और किस सुयोग्य वरके साथ उनका विवाह किया जाय ?’ ॥ ९-१० ॥
एतस्मिन्नेव काले तु चूली नाम महाद्युतिः । ऊर्ध्वरेताः शुभाचारो ब्राह्मं तप उपागमत् ॥ ११ ॥
भावार्थ
उन्हीं दिनों चूली नामसे प्रसिद्ध एक महातेजस्वी, सदाचारी एवं ऊर्ध्वरेता ( नैष्ठिक ब्रह्मचारी ) मुनि वेदोक्त तपका अनुष्ठान कर रहे थे ( अथवा ब्रह्मचिन्तनरूप तपस्यामें संलग्न थे ) ॥ ११ ॥
तपस्यन्तमृषिं तत्र गन्धर्वी पर्युपासते । सोमदा नाम भद्रं ते ऊर्मिलातनया तदा ॥ १२ ॥
भावार्थ
श्रीराम ! तुम्हारा भला हो, उस समय एक गन्धर्व-कुमारी वहाँ रहकर उन तपस्वी मुनिकी उपासना ( अनुग्रहकी इच्छासे सेवा ) करती थी । उसका नाम था सोमदा । वह ऊर्मिलाकी पुत्री थी ॥ १२ ॥
सा च तं प्रणता भूत्वा शुश्रूषणपरायणा । उवास काले धर्मिष्ठा तस्यास्तुष्टोऽभवद् गुरुः ॥ १३ ॥
भावार्थ
वह प्रतिदिन मुनिको प्रणाम करके उनकी सेवामें लगी रहती थी तथा धर्ममें स्थित रहकर समय-समयपर सेवाके लिये उपस्थित होती थी; इससे उसके ऊपर वे गौरवशाली मुनि बहुत संतुष्ट हुए ॥ १३ ॥
स च तां कालयोगेन प्रोवाच रघुनन्दन । परितुष्टोऽस्मि भद्रं ते किं करोमि तव प्रियम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
रघुनन्दन ! शुभ समय आनेपर चूलीने उस गन्धर्व-कन्यासे कहा—‘शुभे ! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ । बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य सिद्ध करूँ’ ॥ १४ ॥
परितुष्टं मुनिं ज्ञात्वा गन्धर्वी मधुरस्वरम् । उवाच परमप्रीता वाक्यज्ञा वाक्यकोविदम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
मुनिको संतुष्ट जानकर गन्धर्व-कन्या बहुत प्रसन्न हुई । वह बोलनेकी कला जानती थी; उसने वाणीके मर्मज्ञ मुनिसे मधुर स्वरमें इस प्रकार कहा—॥ १५ ॥
लक्ष्म्या समुदितो ब्राह्म्या ब्रह्मभूतो महातपाः । ब्राह्मेण तपसा युक्तं पुत्रमिच्छामि धार्मिकम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘महर्षे ! आप ब्राह्मी सम्पत्ति ( ब्रह्मतेज ) से सम्पन्न होकर ब्रह्मस्वरूप हो गये हैं, अतएव आप महान् तपस्वी हैं । मैं आपसे ब्राह्म तप ( ब्रह्म-ज्ञान एवं वेदोक्त तप ) से युक्त धर्मात्मा पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ ॥ १६ ॥
अपतिश्चास्मि भद्रं ते भार्या चासि न कस्यचित् । ब्राह्मेणोपगतायाश्च दातुमर्हसि मे सुतम् ॥ १७॥
भावार्थ
‘मुने ! आपका भला हो । मेरे कोई पति नहीं है । मैं न तो किसीकी पत्नी हुई हूँ और न आगे होऊँगी । आपकी सेवामें आयी हूँ; आप अपने ब्राह्मबल ( तपः-शक्ति ) से मुझे पुत्र प्रदान करें’ ॥ १७ ॥
तस्याः प्रसन्नो ब्रह्मर्षिर्ददौ ब्राह्ममनुत्तमम् । ब्रह्मदत्त इति ख्यातं मानसं चूलिनः सुतम् ॥ १८॥
भावार्थ
उस गन्धर्वकन्याकी सेवासे संतुष्ट हुए ब्रह्मर्षि चूलीने उसे परम उत्तम ब्राह्मतपसे सम्पन्न पुत्र प्रदान किया । वह उनके मानसिक संकल्पसे प्रकट हुआ मानस पुत्र था । उसका नाम ‘ब्रह्मदत्त’ हुआ ॥ १८ ॥
स राजा ब्रह्मदत्तस्तु पुरीमध्यवसत् तदा । काम्पिल्यां परया लक्ष्म्या देवराजो यथा दिवम्॥१९॥
भावार्थ
( कुशनाभके यहाँ जब कन्याओंके विवाहका विचार चल रहा था ) उस समय राजा ब्रह्मदत्त उत्तम लक्ष्मीसे सम्पन्न हो ‘काम्पिल्या’ नामक नगरीमें उसी तरह निवास करते थे, जैसे स्वर्गकी अमरावतीपुरीमें देवराज इन्द्र ॥ १९ ॥
स बुद्धिं कृतवान् राजा कुशनाभः सुधार्मिकः । ब्रह्मदत्ताय काकुत्स्थ दातुं कन्याशतं तदा ॥२०॥
भावार्थ
ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम ! तब परम धर्मात्मा राजा कुशनाभने ब्रह्मदत्तके साथ अपनी सौ कन्याओंको ब्याह देनेका निश्चय किया ॥ २० ॥
तमाहूय महातेजा ब्रह्मदत्तं महीपतिः । ददौ कन्याशतं राजा सुप्रीतेनान्तरात्मना ॥ २१ ॥ यथाक्रमं तदा पाणिं जग्राह रघुनन्दन । ब्रह्मदत्तो महीपालस्तासां देवपतिर्यथा ॥ २२ ॥
भावार्थ
महातेजस्वी भूपाल राजा कुशनाभने ब्रह्मदत्तको बुलाकर अत्यन्त प्रसन्न चित्तसे उन्हें अपनी सौ कन्याएँ सौंप दीं ॥ रघुनन्दन ! उस समय देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी पृथ्वीपति ब्रह्मदत्तने क्रमशः उन सभी कन्याओंका पाणिग्रहण किया ॥ २२ ॥
स्पृष्टमात्रे तदा पाणौ विकुब्जा विगतज्वराः । युक्तं परमया लक्ष्म्या बभौ कन्याशतं तदा ॥ २३ ॥
भावार्थ
विवाहकालमें उन कन्याओंके हाथोंका ब्रह्मदत्तके हाथसे स्पर्श होते ही वे सब-की-सब कन्याएँ कुब्जत्वदोषसे रहित, नीरोग तथा उत्तम शोभासे सम्पन्न प्रतीत होने लगीं ॥२३॥
स दृष्ट्वा वायुना मुक्ताः कुशनाभो महीपतिः । बभूव परमप्रीतो हर्षं लेभे पुनः पुनः ॥ २४ ॥
भावार्थ
वातरोगके रूपमें आये हुए वायुदेवने उन कन्याओंको छोड़ दिया—यह देख पृथ्वीपनि राजा कुशनाभ बड़े प्रसन्न हुए और बारंबार हर्षका अनुभव करने लगे ॥ २४ ॥
कृतोद्वाहं तु राजानं ब्रह्मदत्तं महीपतिम् । सदारं प्रेषयामास सोपाध्यायगणं तदा ॥ २५ ॥
भावार्थ
भूपाल राजा ब्रह्मदत्तका विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर महाराज कुशनाभने उन्हें पत्नियों तथा पुरोहितोंसहित आदरपूर्वक विदा किया ॥ २५ ॥
सोमदापि सुतं दृष्ट्वा पुत्रस्य सदृशीं क्रियाम् । यथान्यायं च गन्धर्वी स्नुषास्ताः प्रत्यनन्दत । स्पृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च ताः कन्याः कुशनाभं प्रशस्य चा॥२६॥
भावार्थ
गन्धर्वी सोमदाने अपने पुत्रको तथा उसके योग्य विवाह-सम्बन्धको देखकर अपनी उन पुत्रवधुओंका यथोचितरूपसे अभिनन्दन किया । उसने एक-एक करके उन सभी राजकन्याओंको हृदयसे लगाया और महाराज कुशनाभकी सराहना करके वहाँसे प्रस्थान किया ॥ २६ ॥
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