बालकाण्ड, सर्ग 34
कृतोद्वाहे गते तस्मिन् ब्रह्मदत्ते च राघव । अपुत्रः पुत्रलाभाय पौत्रीमिष्टिमकल्पयत् ॥ १ ॥
भावार्थ
रघुनन्दन ! विवाह करके जब राजा ब्रह्मदत्त चले गये, तब पुत्रहीन महाराज कुशनाभने श्रेष्ठ पुत्रकी प्राप्तिके लिये पुत्रेष्टि यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ १ ॥
इष्ट्यां तु वर्तमानायां कुशनाभं महीपतिम् । उवाच परमोदारः कुशो ब्रह्मसुतस्तदा ॥ २ ॥
भावार्थ
उस यज्ञके होते समय परम उदार ब्रह्मकुमार महाराज कुशने भूपाल कुशनाभसे कहा—॥ २ ॥
पुत्रस्ते सदृशः पुत्र भविष्यति सुधार्मिकः । गाधिं प्राप्स्यसि तेन त्वं कीर्तिं लोके च शाश्वतीम् ॥३॥
भावार्थ
‘बेटा ! तुम्हें अपने समान ही परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त होगा । तुम ‘गाधि‘ नामक पुत्र प्राप्त करोगे और उसके द्वारा तुम्हें संसारमें अक्षय कीर्ति उपलब्ध होगी‘ ॥ ३ ॥
एवमुक्त्वा कुशो राम कुशनाभं महीपतिम् । जगामाकाशमाविश्य ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
श्रीराम ! पृथ्वीपति कुशनाभसे ऐसा कहकर राजर्षि कुश आकाशमें प्रविष्ट हो सनातन ब्रह्मलोकको चले गये ॥४॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य कुशनाभस्य धीमतः । जज्ञे परमधर्मिष्ठो गाधिरित्येव नामतः ॥ ५ ॥
भावार्थ
कुछ कालके पश्चात् बुद्धिमान् राजा कुशनाभके यहाँ परम धर्मात्मा ‘गाधि‘ नामक पुत्रका जन्म हुआ ॥ ५ ॥
स पिता मम काकुत्स्थ गाधिः परमधार्मिकः । कुशवंशप्रसूतोऽस्मि कौशिको रघुनन्दन ॥ ६ ॥
भावार्थ
ककुत्स्थकुलभूषण रघुनन्दन ! वे परम धर्मात्मा राजा गाधि मेरे पिता थे । मैं कुशके कुलमें उत्पन्न होनेके कारण ‘कौशिक‘ कहलाता हूँ ॥ ६ ॥
पूर्वजा भगिनी चापि मम राघव सुव्रता । नाम्ना सत्यवती नाम ऋचीके प्रतिपादिता ॥ ७ ॥
भावार्थ
राघव ! मेरे एक ज्येष्ठ बहिन भी थी, जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी । उसका नाम सत्यवती था । वह ऋचीक मुनिको ब्याही गयी थी ॥ ७ ॥
सशरीरा गता स्वर्गं भर्तारमनुवर्तिनी । कौशिकी परमोदारा प्रवृत्ता च महानदी ॥ ८ ॥
भावार्थ
अपने पतिका अनुसरण करनेवाली सत्यवती शरीरसहित स्वर्गलोकको चली गयी थी। वही परम उदार महानदी कौशिकीके रूपमें भी प्रकट होकर इस भूतलपर प्रवाहित होती है ॥ ८ ॥
दिव्या पुण्योदका रम्या हिमवन्तमुपाश्रिता । लोकस्य हितकार्यार्थे प्रवृत्ता भगिनी मम ॥ ९ ॥
भावार्थ
मेरी वह बहिन जगत्के हितके लिये हिमालयका आश्रय लेकर नदीरूपमें प्रवाहित हुई । वह पुण्यसलिला दिव्य नदी बड़ी रमणीय है ॥ ९ ॥
ततोऽहं हिमवत्पार्श्वे वसामि नियतः सुखम् । भगिन्यां स्नेहसंयुक्तः कौशिक्यां रघुनन्दन ॥ १० ॥
भावार्थ
रघुनन्दन ! मेरा अपनी बहिन कौशिकीके प्रति बहुत स्नेह है; अतः मैं हिमालयके निकट उसीके तटपर नियमपूर्वक बड़े सुखसे निवास करता हूँ ॥ १० ॥
सा तु सत्यवती पुण्या सत्ये धर्मे प्रतिष्ठिता । पतिव्रता महाभागा कौशिकी सरितां वरा ॥ ११ ॥
भावार्थ
पुण्यमयी सत्यवती सत्य धर्मेंमें प्रतिष्ठित है । वह परम सौभाग्यशालिनी पतिव्रता देवी यहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ कौशिकीके रूपमें विद्यमान है ॥ ११ ॥
अहं हि नियमाद् राम हित्वा तां समुपागतः । सिद्धाश्रममनुप्राप्तः सिद्धोऽस्मि तव तेजसा ॥ १२ ॥ एषा राम ममोत्पत्तिः स्वस्य वंशस्य कीर्तिता । देशस्य हि महाबाहो यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ १३ ॥
भावार्थ
श्रीराम ! मैं यज्ञसम्बन्धी नियमकी सिद्धिके लिये ही अपनी बहिनका सांनिध्य छोड़कर सिद्धाश्रम ( बक्सर ) में आया था । अब तुम्हारे तेजसे मुझे वह सिद्धि प्राप्त हो गयी है ॥ महाबाहु श्रीराम ! तुमने मुझसे जो पूछा था, उसके उत्तरमें मैंने तुम्हें शोणभद्रतटवर्ती देशका परिचय देते हुए यह अपनी तथा अपने कुलकी उत्पत्ति बतायी है ॥ १३ ॥
गतोऽर्धरात्रः काकुत्स्थ कथाः कथयतो मम । निद्रामभ्येहि भद्रं ते मा भूद् विघ्नोऽध्वनीह नः ॥ १४ ॥ निष्पन्दास्तरवः सर्वे निलीना मृगपक्षिणः । नैशेन तमसा व्याप्ता दिशश्च रघुनन्दन ॥ १५ ॥
भावार्थ
काकुत्स्थ ! मेरे कथा कहते-कहते आधी रात बीत गयी । अब थोड़ी देर नींद ले लो । तुम्हारा कल्याण हो । मैं चाहता हूँ कि अधिक जागरणके कारण हमारी यात्रामें विघ्न न पड़े ॥ सारे वृक्ष निष्कम्प जान पड़ते हैं—इनका एक पत्ता भी नहीं हिलता है । पशु-पक्षी अपने-अपने वासस्थानमें छिपकर बसेरे लेते हैं । रघुनन्दन ! रात्रिके अन्धकारसे सम्पूर्ण दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं ॥ १५ ॥
शनैर्विसृज्यते सन्ध्या नभो नेत्रैरिवावृतम् । नक्षत्रतारागहनं ज्योतिर्भिरवभासते ॥ १६ ॥
भावार्थ
धीरे-धीरे संध्या दूर चली गयी । नक्षत्रों तथा ताराओंसे भरा हुआ आकाश ( सहस्राक्ष इन्द्रकी भाँति ) सहस्रों ज्योतिर्मय नेत्रोंसे व्याप्त-सा होकर प्रकाशित हो रहा है ॥ १६ ॥
उत्तिष्ठते च शीतांशुः शशी लोकतमोनुदः । ह्लादयन् प्राणिनां लोके मनांसि प्रभया स्वया ॥ १७ ॥
भावार्थ
सम्पूर्ण लोकका अन्धकार दूर करनेवाले शीतरश्मि चन्द्रमा अपनी प्रभासे जगत्के प्राणियोंके मनको आह्लाद प्रदान करते हुए उदित हो रहे हैं* ॥ १७ ॥
नैशानि सर्वभूतानि प्रचरन्ति ततस्ततः । यक्षराक्षससङ्घाश्च रौद्राश्च पिशिताशनाः ॥ १८ ॥
भावार्थ
रातमें विचरनेवाले समस्त प्राणी—यक्ष-राक्षसोंके समुदाय तथा भयंकर पिशाच इधर-उधर विचर रहे हैं ॥ १८ ॥
एवमुक्त्वा महातेजा विरराम महामुनिः । साधुसाध्विति ते सर्वे मुनयो ह्यभ्यपूजयन् ॥ १९ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये । उस समय सभी मुनियोंने साधुवाद देकर विश्वामित्रजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की— ॥ १९ ॥
कुशिकानामयं वंशो महान् धर्मपरः सदा । ब्रह्मोपमा महात्मानः कुशवंश्या नरोत्तमाः ॥ २० ॥
भावार्थ
‘कुशपुत्रोंका यह वंश सदा ही महान् धर्मपरायण रहा है । कुशवंशी महात्मा श्रेष्ठ मानव ब्रह्माजीके समान तेजस्वी हुए हैं ॥ २० ॥
विशेषेण भवानेव विश्वामित्र महायशः । कौशिकी सरितां श्रेष्ठा कुलोद्योतकरी तव ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘महायशस्वी विश्वामित्रजी ! अपने वंशमें सबसे बड़े महात्मा आप ही हैं तथा सरिताओंमें श्रेष्ठ कौशिकी भी आपके कुलकी कीर्तिको प्रकाशित करनेवाली है’ ॥ २१ ॥
मुदितैर्मुनिशार्दूलैः प्रशस्तः कुशिकात्मजः । निद्रामुपागमच्छ्रीमानस्तंगत इवांशुमान् ॥ २२ ॥
भावार्थ
इस प्रकार आनन्दमग्न हुए उन मुनिवरोंद्वारा प्रशंसित श्रीमान् कौशिकमुनि अस्त हुए सूर्यकी भाँति नींद लेने लगे ॥ २२ ॥
रामोऽपि सहसौमित्रिः किंचिदागतविस्मयः । प्रशस्य मुनिशार्दूलं निद्रां समुपसेवते ॥ २३ ॥
भावार्थ
वह कथा सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामको भी कुछ विस्मय हो आया । वे भी मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रकी सराहना करके नींद लेने लगे ॥ २३ ॥
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