बालकाण्ड, सर्ग 32
ब्रह्मयोनिर्महानासीत् कुशो नाम महातपाः । अक्लिष्टव्रतधर्मज्ञः सज्जनप्रतिपूजकः ॥ १ ॥
भावार्थ
( विश्वामित्रजी कहते हैं— ) श्रीराम ! पूर्वकालमें कुश नामसे प्रसिद्ध एक महातपस्वी राजा हो गये हैं । वे साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र थे । उनका प्रत्येक व्रत एवं संकल्प बिना किसी क्लेश या कठिनाईके ही पूर्ण होता था । वे धर्मके ज्ञाता, सत्पुरुषोंका आदर करनेवाले और महान् थे ॥ १ ॥
स महात्मा कुलीनायां युक्तायां सुमहाबलान् । वैदर्भ्यां जनयामास चतुरः सदृशान् सुतान् ॥ २ ॥
भावार्थ
उत्तम कुलमें उत्पन्न विदर्भदेशकी राजकुमारी उनकी पत्नी थी । उसके गर्भसे उन महात्मा नरेशने चार पुत्र उत्पन्न किये, जो उन्हींके समान थे ॥ २ ॥
कुशाम्बं कुशनाभं च असूर्तरजसं वसुम् । दीप्तियुक्तान् महोत्साहान् क्षत्रधर्मचिकीर्षया ॥ ३ ॥ तानुवाच कुशः पुत्रान् धर्मिष्ठान् सत्यवादिनः । क्रियतां पालनं पुत्रा धर्मं प्राप्स्यथ पुष्कलम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
उनके नाम इस प्रकार हैं—कुशाम्ब, कुशनाभ, असूर्त-रजस* तथा वसु । ये सब-के-सब तेजस्वी तथा महान् उत्साही थे । राजा कुशने ‘प्रजारक्षणरूप’ क्षत्रिय-धर्मके पालनकी इच्छासे अपने उन धर्मिष्ठ तथा सत्यवादी पुत्रोंसे कहा—‘पुत्रो ! प्रजाका पालन करो, इससे तुम्हें धर्मका पूरा-पूरा फल प्राप्त होगा’ ॥ ३-४ ॥
कुशस्य वचनं श्रुत्वा चत्वारो लोकसत्तमाः । निवेशं चक्रिरे सर्वे पुराणां नृवरास्तदा ॥ ५ ॥
भावार्थ
अपने पिता महाराज कुशकी यह बात सुनकर उन चारों लोकशिरोमणि नरश्रेष्ठ राजकुमारोंने उस समय अपने-अपने लिये पृथक् पृथक् नगर निर्माण कराया ॥ ५ ॥
कुशाम्बस्तु महातेजाः कौशाम्बीमकरोत् पुरीम् । कुशनाभस्तु धर्मात्मा पुरं चक्रे महोदयम् ॥ ६ ॥
भावार्थ
महातेजस्वी कुशाम्बने ‘कौशाम्बी’ पुरी बसायी (जिसे आजकल ‘कोसम’ कहते हैं )। धर्मात्मा कुशनाभने ‘महोदय’ नामक नगरका निर्माण कराया ॥ ६ ॥
असूर्तरजसो नाम धर्मारण्यं महामतिः । चक्रे पुरवरं राजा वसुनाम गिरिव्रजम् ॥ ७ ॥ एषा वसुमती नाम वसोस्तस्य महात्मनः । एते शैलवराः पञ्च प्रकाशन्ते समन्ततः ॥ ८ ॥
भावार्थ
परम बुद्धिमान् असूर्तरजसने ‘धर्मारण्य’ नामक एक श्रेष्ठ नगर बसाया तथा राजा वसुने ‘गिरिव्रज’ नगरकी स्थापना की ॥ महात्मा वसुकी यह ‘गिरिव्रज’ नामक राजधानी वसुमतीके नामसे प्रसिद्ध हुई । इसके चारों ओर ये पाँच श्रेष्ठ पर्वत सुशोभित होते हैं† ॥ ८ ॥
सुमागधी नदी रम्या मागधान् विश्रुताऽऽययौ । पञ्चानां शैलमुख्यानां मध्ये मालेव शोभते ॥ ९ ॥
भावार्थ
यह रमणीय ( सोन ) नदी दक्षिण-पश्चिमकी ओरसे बहती हुई मगध देशमें आयी है, इसलिये यहाँ ‘सुमागधी’ नामसे विख्यात हुई है । यह इन पाँच श्रेष्ठ पर्वतोंके बीचमें मालाकी भाँति सुशोभित हो रही है ॥ ९ ॥
सैषा हि मागधी राम वसोस्तस्य महात्मनः । पूर्वाभिचरिता राम सुक्षेत्रा सस्यमालिनी ॥ १० ॥
भावार्थ
श्रीराम ! इस प्रकार ‘मागधी’ नामसे प्रसिद्ध हुई यह सोन नदी पूर्वोक्त महात्मा वसुसे सम्बन्ध रखती है । रघुनन्दन ! यह दक्षिण-पश्चिमसे आकर पूर्वोत्तर दिशाकी ओर प्रवाहित हुई है । इसके दोनों तटोंपर सुन्दर क्षेत्र ( उपजाऊ खेत ) हैं, अतः यह सदा सस्य-मालाओंसे अलंकृत ( हरी-भरी खेतीसे सुशोभित ) रहती है ॥ १० ॥
कुशनाभस्तु राजर्षिः कन्याशतमनुत्तमम् । जनयामास धर्मात्मा घृताच्यां रघुनन्दन ॥ ११ ॥
भावार्थ
रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम ! धर्मात्मा राजर्षि कुशनाभने घृताची अप्सराके गर्भसे परम उत्तम सौ कन्याओंको जन्म दिया ॥ ११ ॥
तास्तु यौवनशालिन्यो रूपवत्यः स्वलंकृताः । उद्यानभूमिमागम्य प्रावृषीव शतह्रदाः ॥ १२ ॥ गायन्त्यो नृत्यमानाश्च वादयन्त्यस्तु राघव । आमोदं परमं जग्मुर्वराभरणभूषिताः ॥ १३ ॥ अथ ताश्चारुसर्वाङ्ग्यो रूपेणाप्रतिमा भुवि । उद्यानभूमिमागम्य तारा इव घनान्तरे ॥ १४ ॥
भावार्थ
वे सब-की-सब सुन्दर रूप-लावण्यसे सुशोभित थीं । धीरे-धीरे युवावस्थाने आकर उनके सौन्दर्यको और भी बढ़ा दिया । रघुवीर ! एक दिन वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो वे सभी राजकन्याएँ उद्यान-भूमिमें आकर वर्षाऋतुमें प्रकाशित होनेवाली विद्युन्मालाओंकी भाँति शोभा पाने लगीं । सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत हुई वे अङ्गनाएँ गाती, बजाती और नृत्य करती हुई वहाँ परम आमोद-प्रमोदमें मग्न हो गयीं ॥ उनके सभी अङ्ग बड़े मनोहर थे । इस भूतलपर उनके रूप-सौन्दर्यकी कहीं भी तुलना नहीं थी । उस उद्यानमें आकर वे बादलोंके ओटमें कुछ-कुछ छिपी हुई तारिकाओंके समान शोभा पा रही थीं ॥ १४ ॥
ताः सर्वा गुणसम्पन्ना रूपयौवनसंयुताः । दृष्ट्वा सर्वात्मको वायुरिदं वचनमब्रवीत् ॥ १५ ॥
भावार्थ
उस समय उत्तम गुणोंसे सम्पन्न तथा रूप और यौवनसे सुशोभित उन सब राजकन्याओंको देखकर सर्वस्वरूप वायु देवताने उनसे इस प्रकार कहा—॥ १५ ॥
अहं वः कामये सर्वा भार्या मम भविष्यथ । मानुषस्त्यज्यतां भावो दीर्घमायुरवाप्स्यथ ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘सुन्दरियो ! मैं तुम सबको अपनी प्रेयसीके रूपमें प्राप्त करना चाहता हूँ। तुम सब मेरी भार्याएँ बनोगी । अब मनुष्य-भावका त्याग करो और मुझे अङ्गीकार करके देवाङ्गनाओंकी भाँति दीर्घ आयु प्राप्त कर लो ॥ १६ ॥
चलं हि यौवनं नित्यं मानुषेषु विशेषतः । अक्षयं यौवनं प्राप्ता अमर्यश्च भविष्यथ ॥ १७ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा वायोरक्लिष्टकर्मणः । अपहास्य ततो वाक्यं कन्याशतमथाब्रवीत् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘विशेषतः मानव-शरीरमें जवानी कभी स्थिर नहीं रहती—प्रतिक्षण क्षीण होती जाती है । मेरे साथ सम्बन्ध हो जानेपर तुमलोग अक्षय यौवन प्राप्त करके अमर हो जाओगी’ ॥ अनायास ही महान् कर्म करनेवाले वायुदेवका यह कथन सुनकर वे सौ कन्याएँ अवहेलनापूर्वक हँसकर बोलीं—॥ १८ ॥
अन्तश्चरसि भूतानां सर्वेषां सुरसत्तम । प्रभावज्ञाश्च ते सर्वाः किमर्थमवमन्यसे ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘सुरश्रेष्ठ ! आप प्राणवायुके रूपमें समस्त प्राणियोंके भीतर विचरते हैं (अतः सबके मनकी बातें जानते हैं; आपको यह मालूम होगा कि हमारे मनमें आपके प्रति कोई आकर्षण नहीं है ) । हम सब बहिनें आपके अनुपम प्रभावको भी जानती हैं ( तो भी हमारा आपके प्रति अनुराग नहीं है ); ऐसी दशामें यह अनुचित प्रस्ताव करके आप हमारा अपमान किसलिये कर रहे हैं ? ॥ १९ ॥
कुशनाभसुता देव समस्ताः सुरसत्तम । स्थानाच्च्यावयितुं देवं रक्षामस्तु तपो वयम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘देव ! देवशिरोमणे ! हम सब-की-सब राजर्षि कुशनाभकी कन्याएँ हैं । देवता होनेपर भी आपको शाप देकर वायु-पदसे भ्रष्ट कर सकती हैं, किंतु ऐसा करना नहीं चाहतीं; क्योंकि हम अपने तपको सुरक्षित रखती हैं ॥ २० ॥
मा भूत् स कालो दुर्मेधः पितरं सत्यवादिनम् । अवमन्य स्वधर्मेण स्वयं वरमुपास्महे ॥२१॥
भावार्थ
‘दुर्मते ! वह समय कभी न आवे, जब कि हम अपने सत्यवादी पिताकी अवहेलना करके कामवश या अत्यन्त अधर्मपूर्वक स्वयं ही वर ढूँढ़ने लगें ॥ २१ ॥
पिता हि प्रभुरस्माकं दैवतं परमं च सः । यस्य नो दास्यति पिता स नो भर्ता भविष्यति ॥२२॥
भावार्थ
‘हमलोगोंपर हमारे पिताजीका प्रभुत्व है, वे हमारे लिये सर्वश्रेष्ठ देवता हैं । पिताजी हमें जिसके हाथमें दे देंगे, वही हमारा पति होगा’ ॥ २२ ॥
तासां तु वचनं श्रुत्वा हरिः परमकोपनः । प्रविश्य सर्वगात्राणि बभञ्ज भगवान् प्रभुः ॥ २३ ॥ अरत्निमात्राकृतयो भग्नगात्रा भयार्दिताः ।
भावार्थ
उनकी यह बात सुनकर वायुदेव अत्यन्त कुपित हो उठे । उन ऐश्वर्यशाली प्रभुने उनके भीतर प्रविष्ट हो सब अङ्गोंको मोड़कर टेढ़ा कर दिया । शरीर मुड़ जानेके कारण वे कुबड़ी हो गयीं । उनकी आकृति मुट्ठी बँधे हुए एक हाथके बराबर हो गयी । वे भयसे व्याकुल हो उठीं ॥२३॥
ताः कन्या वायुना भग्ना विविशुर्नृपतेर्गृहम् । प्रविश्य च सुसम्भ्रान्ताः सलज्जाः साम्रलोचनाः॥२४॥
भावार्थ
वायुदेवके द्वारा कुबड़ी की हुई उन कन्याओंने राजभवनमें प्रवेश किया । प्रवेश करके वे लज्जित और उद्विग्न हो गयीं । उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धाराएँ बहने लगीं ॥ २४ ॥
स च ता दयिता भग्नाः कन्याः परमशोभनाः । दृष्ट्वा दीनास्तदा राजा सम्भ्रान्त इदमब्रवीत् ॥ २५ ॥
भावार्थ
अपनी परम सुन्दरी प्यारी पुत्रियोंको कुब्जताके कारण अत्यन्त दयनीय दशामें पड़ी देख राजा कुशनाभ घबरा गये और इस प्रकार बोले—॥ २५ ॥
किमिदं कथ्यतां पुत्र्यः को धर्ममवमन्यते । कुब्जाः केन कृताः सर्वाश्चेष्टन्त्यो नाभिभाषथ । एवं राजा विनिःश्वस्य समाधिं संदधे ततः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘पुत्रियो ! यह क्या हुआ ? बताओ । कौन प्राणी धर्मकी अवहेलना करता है ? किसने तुम्हें कुबड़ी बना दिया, जिससे तुम तड़प रही हो, किंतु कुछ बताती नहीं हो ।’ यों कहकर राजाने लंबी साँस खींची और उनका उत्तर सुननेके लिये वे सावधान होकर बैठ गये ॥ २६ ॥
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