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बालकाण्ड, सर्ग 25

अथ तस्याप्रमेयस्य मुनेर्वचनमुत्तमम् । श्रुत्वा पुरुषशार्दूलः प्रत्युवाच शुभां गिरम् ॥ १ ॥

भावार्थ

अपरिमित प्रभावशाली विश्वामित्र मुनिका यह उत्तम वचन सुनकर पुरुषसिंह श्रीरामने यह शुभ बात कही—॥ १ ॥

अल्पवीर्या यदा यक्षी श्रूयते मुनिपुङ्गव । कथं नागसहस्रस्य धारयत्यबला बलम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘मुनिश्रेष्ठ ! जब वह यक्षिणी एक अबला सुनी जाती है, तब तो उसकी शक्ति थोड़ी ही होनी चाहिये; फिर वह एक हजार हाथियोंका बल कैसे धारण करती है ?’ ॥ २ ॥

इत्युक्तं वचनं श्रुत्वा राघवस्यामितौजसः । हर्षयञ्श्लक्ष्णया वाचा सलक्ष्मणमरिंदमम् ॥ ३ ॥ विश्वामित्रोऽब्रवीद् वाक्यं श्रूणु येन बलोत्कटा । वरदानकृतं वीर्यं धारयत्यबला बलम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

अमित तेजस्वी श्रीरघुनाथके कहे हुए इस वचनको सुनकर विश्वामित्रजी अपनी मधुर वाणीद्वारा लक्ष्मणसहित शत्रुदमन श्रीरामको हर्ष प्रदान करते हुए बोले—‘रघुनन्दन ! जिस कारणसे ताटका अधिक बलशालिनी हो गयी है, वह बताता हूँ, सुनो । उसमें वरदानजनित बलका उदय हुआ है; अतः वह अबला होकर भी बल धारण करती है ( सबला हो गयी है ) ॥ ३-४ ॥

पूर्वमासीन्महायक्षः सुकेतुर्नाम वीर्यवान् । अनपत्यः शुभाचारः स च तेपे महत्तपः ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘पूर्वकालकी बात है, सुकेतु नामसे प्रसिद्ध एक महान् यक्ष थे । वे बड़े पराक्रमी और सदाचारी थे; परंतु उन्हें कोई संतान नहीं थी; इसलिये उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की ॥५॥

पितामहस्तु सुप्रीतस्तस्य यक्षपतेस्तदा । कन्यारत्नं ददौ राम ताटकां नाम नामतः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! यक्षराज सुकेतुकी उस तपस्यासे ब्रह्माजीको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने सुकेतुको एक कन्यारत्न प्रदान किया, जिसका नाम ताटका था ॥ ६ ॥

ददौ नागसहस्रस्य बलं चास्याः पितामहः । न त्वेव पुत्रं यक्षाय ददौ चासौ महायशाः ॥ ७ ॥

भावार्थ

ब्रह्माजीने ही उस कन्याको एक हजार हाथियोंके समान बल दे दिया; परंतु उन महायशस्वी पितामहने उस यक्षको पुत्र नहीं ही दिया ( उसके संकल्पके अनुसार पुत्र प्राप्त हो जानेपर उसके द्वारा जनताका अत्यधिक उत्पीड़न होता, यही सोचकर ब्रह्माजीने पुत्र नहीं दिया ) ॥ ७ ॥

तां तु बालां विवर्धन्तीं रूपयौवनशालिनीम् । जम्भपुत्राय सुन्दाय ददौ भार्यां यशस्विनीम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘धीरे-धीरे वह यक्ष-बालिका बढ़ने लगी और बढ़कर रूप-यौवनसे सुशोभित होने लगी । उस अवस्थामें सुकेतुने अपनी उस यशस्विनी कन्याको जम्भपुत्र सुन्दके हाथमें उसकी पत्नीके रूपमें दे दिया ॥ ८ ॥

कस्यचित्त्वथ कालस्य यक्षी पुत्रं व्यजायत । मारीचं नाम दुर्धर्षं यः शापाद् राक्षसोऽभवत् ॥९॥

भावार्थ

‘कुछ कालके बाद उस यक्षी ताटकाने मारीच नामसे प्रसिद्ध एक दुर्जय पुत्रको जन्म दिया, जो अगस्त्य मुनिके शापसे राक्षस हो गया ॥ ९ ॥

सुन्दे तु निहते राम अगस्त्यमृषिसत्तमम् । ताटका सहपुत्रेण प्रधर्षयितुमिच्छति ॥ १० ॥ भक्षार्थं जातसंरम्भा गर्जन्ती साभ्यधावत । आपतन्तीं तु तां दृष्ट्वा अगस्त्यो भगवानृषिः ॥ ११ ॥ राक्षसत्वं भजस्वेति मारीचं व्याजहार सः ।

भावार्थ

‘श्रीराम ! अगस्त्यने ही शाप देकर ताटकापति सुन्दको भी मार डाला । उसके मारे जानेपर ताटका पुत्रसहित जाकर मुनिवर अगस्त्यको भी मौतके घाट उतार देनेकी इच्छा करने लगी ॥ ‘वह कुपित हो मुनिको खा जानेके लिये गर्जना करती हुई दौड़ी । उसे आती देख भगवान् अगस्त्य मुनिने मारीचसे कहा—‘तू देवयोनि-रूपका परित्याग करके राक्षसभावको प्राप्त हो जा’ ॥ ११३ ॥

अगस्त्यः परमामर्षस्ताटकामपि शप्तवान् ॥ १२ ॥ पुरुषादी महायक्षी विकृता विकृतानना । इदं रूपं विहायाशु दारुणं रूपमस्तु ते ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘फिर अत्यन्त अमर्षमें भरे हुए ऋषिने ताटकाको भी शाप दे दिया—‘तू विकराल मुखवाली नरभक्षिणी राक्षसी हो जा । तू है तो महायक्षी; परंतु अब शीघ्र ही इस रूपको त्यागकर तेरा भयङ्कर रूप हो जाय’ ॥ १२-१३ ॥

सैषा शापकृतामर्षा ताटका क्रोधमूर्च्छिता । देशमुत्सादयत्येनमगस्त्याचरितं शुभम् ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘इस प्रकार शाप मिलनेके कारण ताटकाका अमर्ष और भी बढ़ गया । वह क्रोधसे मूर्च्छित हो उठी और उन दिनों अगस्त्यजी जहाँ रहते थे, उस सुन्दर देशको उजाड़ने लगी ॥ १४ ॥

एनां राघव दुर्वृत्तां यक्षीं परमदारुणाम् । गोब्राह्मणहितार्थाय जहि दुष्टपराक्रमाम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘रघुनन्दन ! तुम गौओं और ब्राह्मणोंका हित करनेके लिये दुष्ट पराक्रमवाली इस परम भयङ्कर दुराचारिणी यक्षीका वध कर डालो ॥ १५ ॥

नह्येनां शापसंसृष्टां कश्चिदुत्सहते पुमान् । निहन्तुं त्रिषु लोकेषु त्वामृते रघुनन्दन ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘रघुकुलको आनन्दित करनेवाले वीर ! इस शापग्रस्त ताटकाको मारनेके लिये तीनों लोकोंमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष समर्थ नहीं है ॥ १६ ॥

नहि ते स्त्रीवधकृते घृणा कार्या नरोत्तम । चातुर्वर्ण्यहितार्थं हि कर्तव्यं राजसूनुना ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘नरश्रेष्ठ ! तुम स्त्री-हत्याका विचार करके इसके प्रति दया न दिखाना । एक राजपुत्रको चारों वर्णोंके हितके लिये स्त्री-हत्या भी करनी पड़े तो उससे मुँह नहीं मोड़ना चाहिये ॥१७॥

नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात् । पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा ॥१८॥

भावार्थ

‘प्रजापालक नरेशको प्रजाजनोंकी रक्षाके लिये क्रूरतापूर्ण या क्रूरतारहित, पातकयुक्त अथवा सदोष कर्म भी करना पड़े तो कर लेना चाहिये । यह बात उसे सदा ही ध्यानमें रखनी चाहिये ॥ १८ ॥

राज्यभारनियुक्तानामेष धर्मः सनातनः । अधर्म्या जहि काकुत्स्थ धर्मो ह्यस्यां न विद्यते ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘जिनके ऊपर राज्यके पालनका भार है, उनका तो यह सनातन धर्म है । ककुत्स्थकुलनन्दन ! ताटका महापापिनी है । उसमें धर्मका लेशमात्र भी नहीं है; अतः उसे मार डालो ॥ १९ ॥

श्रूयते हि पुरा शक्रो विरोचनसुतां नृप । पृथिवीं हन्तुमिच्छन्तीं मन्थरामभ्यसूदयत् ॥ २० ॥

भावार्थ

‘नरेश्वर ! सुना जाता है कि पूर्वकालमें विरोचनकी पुत्री मन्थरा सारी पृथ्वीका नाश कर डालना चाहती थी । उसके इस विचारको जानकर इन्द्रने उसका वध कर डाला ॥ २० ॥

विष्णुना च पुरा राम भृगुपत्नी पतिव्रता । अनिन्द्रं लोकमिच्छन्ती काव्यमाता निषूदिता ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम ! प्राचीन कालमें शुक्राचार्यकी माता तथा भृगुकी पतिव्रता पत्नी त्रिभुवनको इन्द्रसे शून्य कर देना चाहती थीं । यह जानकर भगवान् विष्णुने उनको मार डाला ॥ २१ ॥

एतैश्चान्यैश्च बहुभी राजपुत्रैर्महात्मभिः । अधर्मसहिता नार्यो हताः पुरुषसत्तमैः । तस्मादेनां घृणां त्यक्त्वा जहि मच्छासनान्नृप ॥२२॥

भावार्थ

‘इन्होंने तथा अन्य बहुत-से महामनस्वी पुरुषप्रवर राजकुमारोंने पापचारिणी स्त्रियोंका वध किया है । नरेश्वर ! अतः तुम भी मेरी आज्ञासे दया अथवा घृणाको त्यागकर इस राक्षसीको मार डालो’ ॥ २२ ॥

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