बालकाण्ड, सर्ग 26
मुनेर्वचनमक्लीबं श्रुत्वा नरवरात्मजः । राघवः प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रत्युवाच दृढव्रतः ॥ १ ॥
भावार्थ
‘मुनिके ये उत्साहभरे वचन सुनकर दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजकुमार श्रीरामने हाथ जोड़कर उत्तर दिया—॥ १ ॥
पितुर्वचननिर्देशात् पितुर्वचनगौरवात् । वचनं कौशिकस्येति कर्तव्यमविशङ्कया ॥ २ ॥ अनुशिष्टोऽस्म्ययोध्यायां गुरुमध्ये महात्मना । पित्रा दशरथेनाहं नावज्ञेयं हि तद्वचः ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! अयोध्यामें मेरे पिता महामना महाराज दशरथने अन्य गुरुजनोंके बीच मुझे यह उपदेश दिया था कि ‘बेटा ! तुम पिताके कहनेसे पिताके वचनोंका गौरव रखनेके लिये कुशिकनन्दन विश्वामित्रकी आज्ञाका निःशङ्क होकर पालन करना । कभी भी उनकी बातकी अवहेलना न करना’ ॥ २-३ ॥
सोऽहं पितुर्वचः श्रुत्वा शासनाद् ब्रह्मवादिनः । करिष्यामि न संदेहस्ताटकावधमुत्तमम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘अतः मैं पिताजीके उस उपदेशको सुनकर आप ब्रह्मवादी महात्माकी आज्ञासे ताटकावधसम्बन्धी कार्यको उत्तम मानकर करूँगा—इसमें संदेह नहीं है ॥ ४ ॥
गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय च । तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यतः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘गौ, ब्राह्मण तथा समूचे देशका हित करनेके लिये मैं आप-जैसे अनुपम प्रभावशाली महात्माके आदेशका पालन करनेको सब प्रकारसे तैयार हूँ’ ॥ ५ ॥
एवमुक्त्वा धनुर्मध्ये बद्ध्वा मुष्टिमरिंदमः । ज्याघोषमकरोत् तीव्रं दिशः शब्देन नादयन् ॥ ६ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर शत्रुदमन श्रीरामने धनुषके मध्यभागमें मुट्ठी बाँधकर उसे जोरसे पकड़ा और उसकी प्रत्यञ्चापर तीव्र टङ्कार दी । उसकी आवाजसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठीं ॥ ६ ॥
तेन शब्देन वित्रस्तास्ताटकावनवासिनः । ताटका च सुसंक्रुद्धा तेन शब्देन मोहिता ॥ ७ ॥ तं शब्दमभिनिध्याय राक्षसी क्रोधमूर्च्छिता । श्रुत्वा चाभ्यद्रवत् क्रुद्धा यत्र शब्दो विनिःसृतः ॥ ८ ॥
भावार्थ
उस शब्दसे ताटकावनमें रहनेवाले समस्त प्राणी थर्रा उठे । ताटका भी उस टङ्कार-घोषसे पहले तो किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठी; परंतु फिर कुछ सोचकर अत्यन्त क्रोधमें भर गयी ॥ उस शब्दको सुनकर वह राक्षसी क्रोधसे अचेत-सी हो गयी थी । उसे सुनते ही वह जहाँसे आवाज आयी थी, उसी दिशाकी ओर रोषपूर्वक दौड़ी ॥ ८ ॥
तां दृष्ट्वा राघवः क्रुद्धां विकृतां विकृताननाम् । प्रमाणेनातिवृद्धां च लक्ष्मणं सोऽभ्यभाषत ॥ ९ ॥
भावार्थ
उसके शरीरकी ऊँचाई बहुत अधिक थी । उसकी मुखाकृति विकृत दिखायी देती थी । क्रोधमें भरी हुई उस विकराल राक्षसीकी ओर दृष्टिपात करके श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—॥ ९ ॥
पश्य लक्ष्मण यक्षिण्या भैरवं दारुणं वपुः । भिद्येरन् दर्शनादस्या भीरूणां हृदयानि च ॥ १० ॥
भावार्थ
‘लक्ष्मण ! देखो तो सही, इस यक्षिणीका शरीर कैसा दारुण एवं भयङ्कर है ! इसके दर्शनमात्रसे भीरु पुरुषोंके हृदय विदीर्ण हो सकते हैं ॥ १० ॥
एतां पश्य दुराधर्षां मायाबलसमन्विताम् । विनिवृत्तां करोम्यद्य हृतकर्णाग्रनासिकाम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘मायाबलसे सम्पन्न होनेके कारण यह अत्यन्त दुर्जय हो रही है । देखो, मैं अभी इसके कान और नाक काटकर इसे पीछे लौटनेको विवश किये देता हूँ ॥ ११ ॥
न ह्येनामुत्सहे हन्तुं स्त्रीस्वभावेन रक्षिताम् । वीर्यं चास्या गतिं चैव हन्यामिति हि मे मतिः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘यह अपने स्त्रीस्वभावके कारण रक्षित है; अतः मुझे इसे मारनेमें उत्साह नहीं है । मेरा विचार यह है कि मैं इसके बल-पराक्रम तथा गमनशक्तिको नष्ट कर दूँ ( अर्थात् इसके हाथ-पैर काट डालूँ )’ ॥ १२ ॥
एवं ब्रुवाणे रामे तु ताटका क्रोधमूर्च्छिता । उद्यम्य बाहुं गर्जन्ती राममेवाभ्यधावत ॥ १३ ॥
भावार्थ
श्रीराम इस प्रकार कह ही रहे थे कि क्रोधसे अचेत हुई ताटका वहाँ आ पहुँची और एक बाँह उठाकर गर्जना करती हुई उन्हींकी ओर झपटी ॥ १३ ॥
विश्वामित्रस्तु ब्रह्मर्षिर्हुंकारेणाभिभर्त्स्य ताम् । स्वस्ति राघवयोरस्तु जयं चैवाभ्यभाषत ॥ १४ ॥
भावार्थ
यह देख ब्रह्मर्षि विश्वामित्रने अपने हुंकारके द्वारा उसे डाँटकर कहा—‘रघुकुलके इन दोनों राजकुमारोंका कल्याण हो । इनकी विजय हो’ ॥ १४ ॥
उद्धुन्वाना रजो घोरं ताटका राघवावुभौ । रजोमेघेन महता मुहूर्तं सा व्यमोहयत् ॥ १५ ॥
भावार्थ
तब ताटकाने उन दोनों रघुवंशी वीरोंपर भयङ्कर धूल उड़ाना आरम्भ किया । वहाँ धूलका विशाल बादल-सा छा गया । उसके द्वारा उसने श्रीराम और लक्ष्मणको दो घड़ीतक मोहमें डाल दिया ॥ १५ ॥
ततो मायां समास्थाय शिलावर्षेण राघवौ । अवाकिरत् सुमहता ततश्चुक्रोध राघवः ॥ १६ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् मायाका आश्रय लेकर वह उन दोनों भाइयोंपर पत्थरोंकी बड़ी भारी वर्षा करने लगी । यह देख रघुनाथजी उसपर कुपित हो उठे ॥ १६ ॥
शिलावर्षं महत् तस्याः शरवर्षेण राघवः । प्रतिवार्योपधावन्त्याः करौ चिच्छेद पत्रिभिः ॥ १७ ॥
भावार्थ
रघुवीरने अपनी बाणवर्षाके द्वारा उसकी बड़ी भारी शिलावृष्टिको रोककर अपनी ओर आती हुई उस निशाचरीके दोनों हाथ तीखे सायकोंसे काट डाले ॥ १७ ॥
ततश्छिन्नभुजां श्रान्तामभ्याशे परिगर्जतीम् । सौमित्रिरकरोत् क्रोधाद्धृतकर्णाग्रनासिकाम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
दोनों भुजाएँ कट जानेसे थकी हुई ताटका उनके निकट खड़ी होकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगी । यह देख सुमित्राकुमार लक्ष्मणने क्रोधमें भरकर उसके नाक-कान काट लिये ॥ १८ ॥
कामरूपधरा सा तु कृत्वा रूपाण्यनेकशः । अन्तर्धानं गता यक्षी मोहयन्ती स्वमायया ॥ १९ ॥
भावार्थ
परंतु वह तो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली यक्षिणी थी; अतः अनेक प्रकारके रूप बनाकर अपनी मायासे श्रीराम और लक्ष्मणको मोहमें डालती हुई अदृश्य हो गयी ॥ १९ ॥
अश्मवर्षं विमुञ्चन्ती भैरवं विचचार सा । ततस्तावश्मवर्षेण कीर्यमाणौ समन्ततः ॥ २० ॥ दृष्ट्वा गाधिसुतः श्रीमानिदं वचनमब्रवीत् । अलं ते घृणया राम पापैषा दुष्टचारिणी ॥ २१ ॥ यज्ञविघ्नकरी यक्षी पुरा वर्धेत मायया । वध्यतां तावदेवैषा पुरा संध्या प्रवर्तते ॥ २२ ॥ रक्षांसि संध्याकाले तु दुर्धर्षाणि भवन्ति हि ।
भावार्थ
अब वह पत्थरोंकी भयङ्कर वर्षा करती हुई आकाशमें विचरने लगी । श्रीराम और लक्ष्मणपर चारों ओरसे प्रस्तरोंकी वृष्टि होती देख तेजस्वी गाधिनन्दन विश्वामित्रने इस प्रकार कहा—‘श्रीराम ! इसके ऊपर तुम्हारा दया करना व्यर्थ है । यह बड़ी पापिनी और दुराचारिणी है । सदा यज्ञोंमें विघ्न डाला करती है । यह अपनी मायासे पुनः प्रबल हो उठे, इसके पहले ही इसे मार डालो । अभी संध्याकाल आना चाहता है, इसके पहले ही यह कार्य हो जाना चाहिये; क्योंकि संध्याके समय राक्षस दुर्जय हो जाते हैं’ ॥ २०—२२½ ॥
इत्युक्तः स तु तां यक्षीमश्मवृष्ट्याभिवर्षिणीम् ॥ २३ ॥ दर्शयञ्शब्दवेधित्वं तां रुरोध स सायकैः ।
भावार्थ
विश्वामित्रजीके ऐसा कहनेपर श्रीरामने शब्दवेधी बाण चलानेकी शक्तिका परिचय देते हुए बाण मारकर प्रस्तरोंकी वर्षा करनेवाली उस यक्षिणीको सब ओरसे अवरुद्ध कर दिया ॥ २३½ ॥
सा रुद्धा बाणजालेन मायाबलसमन्विता ॥ २४ ॥ अभिदुद्राव काकुत्स्थं लक्ष्मणं च विनेदुषी । तामापतन्तीं वेगेन विक्रान्तामशनीमिव ॥ २५ ॥ शरेणोरसि विव्याध सा पपात ममार च ।
भावार्थ
उनके बाण-समूहसे घिर जानेपर मायाबलसे युक्त वह यक्षिणी जोर-जोरसे गर्जना करती हुई श्रीराम और लक्ष्मणके ऊपर टूट पड़ी । उसे चलाये हुए इन्द्रके वज्रकी भाँति वेगसे आती देख श्रीरामने एक बाण मारकर उसकी छाती चीर डाली । तब ताटका पृथ्वीपर गिरी और मर गयी ॥२४–२५½॥
तां हतां भीमसंकाशां दृष्ट्वा सुरपतिस्तदा ॥ २६ ॥ साधु साध्विति काकुत्स्थं सुराश्चाप्यभिपूजयन् ।
भावार्थ
उस भयङ्कर राक्षसीको मारी गयी देख देवराज इन्द्र तथा देवताओंने श्रीरामको साधुवाद देते हुए उनकी सराहना की ॥ २६½ ॥
उवाच परमप्रीतः सहस्राक्षः पुरन्दरः ॥ २७ ॥ सुराश्च सर्वे संहृष्टा विश्वामित्रमथाब्रुवन् ।
भावार्थ
उस समय सहस्रलोचन इन्द्र तथा समस्त देवताओंने अत्यन्त प्रसन्न एवं हर्षोत्फुल्ल होकर विश्वामित्रजीसे कहा—॥ २७½ ॥
मुने कौशिक भद्रं ते सेन्द्राः सर्वे मरुद्गणाः ॥ २८ ॥ तोषिताः कर्मणानेन स्नेहं दर्शय राघवे ।
भावार्थ
‘मुने ! कुशिकनन्दन ! आपका कल्याण हो । आपने इस कार्यसे इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंको संतुष्ट किया है । अब रघुकुलतिलक श्रीरामपर आप अपना स्नेह प्रकट कीजिये ॥ २८½ ॥
प्रजापतेः कृशाश्वस्य पुत्रान् सत्यपराक्रमान् ॥ २९ ॥ तपोबलभृतो ब्रह्मन् राघवाय निवेदय ।
भावार्थ
‘ब्रह्मन् ! प्रजापति कृशाश्वके अस्त्र-रूपधारी पुत्रोंको, जो सत्यपराक्रमी तथा तपोबलसे सम्पन्न हैं, श्रीरामको समर्पित कीजिये ॥ २९½ ॥
पात्रभूतश्च ते ब्रह्मंस्तवानुगमने रतः ॥ ३० ॥ कर्तव्यं सुमहत् कर्म सुराणां राजसूनुना ।
भावार्थ
‘विप्रवर ! ये आपके अस्त्रदानके सुयोग्य पात्र हैं तथा आपके अनुसरण ( सेवा-शुश्रूषा ) में तत्पर रहते हैं । राजकुमार श्रीरामके द्वारा देवताओंका महान् कार्य सम्पन्न होनेवाला है’ ॥ ३०½ ॥
एवमुक्त्वा सुराः सर्वे जग्मुर्हृष्टा विहायसम् ॥ ३१ ॥ विश्वामित्रं पूजयन्तस्ततः संध्या प्रवर्तते ।
भावार्थ
ऐसा कहकर सभी देवता विश्वामित्रजीकी प्रशंसा करते हुए प्रसन्नतापूर्वक आकाशमार्गसे चले गये । तत्पश्चात् संध्या हो गयी ॥ ३१½ ॥
ततो मुनिवरः प्रीतस्ताटकावधतोषितः ॥ ३२ ॥ मूर्ध्नि राममुपाघ्राय इदं वचनमब्रवीत् ।
भावार्थ
तदनन्तर ताटकावधसे संतुष्ट हुए मुनिवर विश्वामित्रने श्रीरामचन्द्रजीका मस्तक सूँघकर उनसे यह बात कही—॥३२½॥
इहाद्य रजनीं राम वसाम शुभदर्शन ॥ ३३ ॥ श्वः प्रभाते गमिष्यामस्तदाश्रमपदं मम ।
भावार्थ
‘शुभदर्शन राम ! आजकी रातमें हमलोग यहीं निवास करें । कल सबेरे अपने आश्रमपर चलेंगे’ ॥ ३३½ ॥
विश्वामित्रवचः श्रुत्वा हृष्टो दशरथात्मजः ॥ ३४ ॥ उवास रजनीं तत्र ताटकाया वने सुखम् ।
भावार्थ
विश्वामित्रजीकी यह बात सुनकर दशरथकुमार श्रीराम बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने ताटकावनमें रहकर वह रात्रि बड़े सुखसे व्यतीत की ॥ ३४½ ॥
मुक्तशापं वनं तच्च तस्मिन्नेव तदाहनि । रमणीयं विबभ्राज यथा चैत्ररथं वनम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
उसी दिन वह वन शापमुक्त होकर रमणीय शोभासे सम्पन्न हो गया और चैत्ररथवनकी भाँति अपनी मनोहर छटा दिखाने लगा ॥ ३५ ॥
निहत्य तां यक्षसुतां स रामः प्रशस्यमानः सुरसिद्धसंघैः । उवास तस्मिन् मुनिना सहैव प्रभातवेलां प्रतिबोध्यमानः ॥ ३६ ॥
भावार्थ
यक्षकन्या ताटकाका वध करके श्रीरामचन्द्रजी देवताओंतथा सिद्धसमूहोंकी प्रशंसाके पात्र बन गये । उन्होंने प्रातःकालकी प्रतीक्षा करते हुए विश्वामित्रजीके साथ ताटकावनमें निवास किया ॥ ३६ ॥
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