अयोध्याकाण्ड, सर्ग 90
भरद्वाजाश्रमं गत्वा क्रोशादेव नरर्षभः । जनं सर्वमवस्थाप्य जगाम सह मन्त्रिभिः ॥ १ ॥ पद्भ्यामेव तु धर्मज्ञो न्यस्तशस्त्रपरिच्छदः । वसानो वाससी क्षौमे पुरोधाय पुरोहितम् ॥ २ ॥
भावार्थ
धर्मके ज्ञाता नरश्रेष्ठ भरतने भरद्वाज-आश्रमके पास पहुँचकर अपने साथके सब लोगोंको आश्रमसे एक कोस इधर ही ठहरा दिया था और अपने भी अस्त्र-शस्त्र तथा राजोचित वस्त्र उतारकर वहीं रख दिये थे । केवल दो रेशमी वस्त्र धारण करके पुरोहितको आगे किये वे मन्त्रियोंके साथ पैदल ही वहाँ गये ॥ १-२ ॥
ततः संदर्शने तस्य भरद्वाजस्य राघवः । मन्त्रिणस्तानवस्थाप्य जगामानुपुरोहितम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
आश्रममें प्रवेश करके जहाँ दूरसे ही मुनिवर भरद्वाजका दर्शन होने लगा । वहीं उन्होंने उन मन्त्रियोंको खड़ा कर दिया और पुरोहित वसिष्ठजीको आगे करके वे पीछे-पीछे ऋषिके पास गये ॥ ३ ॥
वसिष्ठमथ दृष्ट्वैव भरद्वाजो महातपाः । संचचालासनात् तूर्णं शिष्यानर्घ्यमिति ब्रुवन् ॥ ४ ॥
भावार्थ
महर्षि वसिष्ठको देखते ही महातपस्वी भरद्वाज आसनसे उठ खड़े हुए और शिष्योंसे शीघ्रतापूर्वक अर्घ्य ले आनेको कहा ॥ ४ ॥
समागम्य वसिष्ठेन भरतेनाभिवादितः । अबुध्यत महातेजाः सुतं दशरथस्य तम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
फिर वे वसिष्ठसे मिले । तत्पश्चात् भरतने उनके चरणोंमें प्रणाम किया । महातेजस्वी भरद्वाज समझ गये कि ये राजा दशरथके पुत्र हैं ॥ ५ ॥
ताभ्यामर्घ्यं च पाद्यं च दत्त्वा पश्चात् फलानि च । आनुपूर्व्याच्च धर्मज्ञः पप्रच्छ कुशलं कुले ॥ ६ ॥
भावार्थ
धर्मज्ञ ऋषिने क्रमशः वसिष्ठ और भरतको अर्घ्य, पाद्य तथा फल आदि निवेदन करके उन दोनोंके कुलका कुशल-समाचार पूछा ॥ ६ ॥
अयोध्यायां बले कोशे मित्रेष्वपि च मन्त्रिषु । जानन् दशरथं वृत्तं न राजानमुदाहरत् ॥ ७ ॥
भावार्थ
इसके बाद अयोध्या, सेना, खजाना, मित्रवर्ग तथा मन्त्रिमण्डलका हाल पूछा । राजा दशरथकी मृत्युका वृत्तान्त वे जानते थे; इसलिये उनके विषयमें उन्होंने कुछ नहीं पूछा ॥ ७ ॥
वसिष्ठो भरतश्चैनं पप्रच्छतुरनामयम् । शरीरेऽग्निषु शिष्येषु वृक्षेषु मृगपक्षिषु ॥ ८ ॥
भावार्थ
वसिष्ठ और भरतने भी महर्षिके शरीर, अग्निहोत्र, शिष्यवर्ग, पेड़-पत्ते तथा मृग-पक्षी आदिका कुशल समाचार पूछा ॥ ८ ॥
तथेति तु प्रतिज्ञाय भरद्वाजो महायशाः । भरतं प्रत्युवाचेदं राघवस्नेहबन्धनात् ॥ ९ ॥ किमिहागमने कार्यं तव राज्यं प्रशासतः । एतदाचक्ष्व सर्वं मे न हि मे शुध्यते मनः ॥ १० ॥
भावार्थ
महायशस्वी भरद्वाज ‘सब ठीक है’ ऐसा कहकर श्रीरामके प्रति स्नेह होनेके कारण भरतसे इस प्रकार बोले—॥ ‘तुम तो राज्य कर रहे हो न ? तुम्हें यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ गयी ? यह सब मुझे बताओ, क्योंकि मेरा मन तुम्हारी ओरसे शुद्ध नहीं हो रहा है—मेरा विश्वास तुमपर नहीं जमता है ॥ १० ॥
सुषुवे यममित्रघ्नं कौसल्याऽऽनन्दवर्धनम् । भ्रात्रा सह सभार्यो यश्चिरं प्रव्राजितो वनम् ॥ ११ ॥ नियुक्तः स्त्रीनिमित्तेन पित्रा योऽसौ महायशाः । वनवासी भवेतीह समाः किल चतुर्दश ॥ १२ ॥ कच्चिन्न तस्यापापस्य पापं कर्तुमिहेच्छसि । अकण्टकं भोक्तुमना राज्यं तस्यानुजस्य च ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘जो शत्रुओंका नाश करनेवाला है, जिस आनन्दवर्धक पुत्रको कौसल्याने जन्म दिया है तथा तुम्हारे पिताने स्त्रीके कारण जिस महायशस्वी पुत्रको चौदह वर्षोंतक वनमें रहनेकी आज्ञा देकर उसे भाई और पत्नीके साथ दीर्घकालके लिये वनमें भेज दिया है, उस निरपराध श्रीराम और उसके छोटे भाई लक्ष्मणका तुम अकण्टक राज्य भोगनेकी इच्छासे कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहते हो ?’ ॥ ११–१३ ॥
एवमुक्तो भरद्वाजं भरतः प्रत्युवाच ह । पर्यश्रुनयनो दुःखाद् वाचा संसज्जमानया ॥ १४ ॥
भावार्थ
भरद्वाजजीके ऐसा कहनेपर दुःखके कारण भरतकी आँखें डबडबा आयीं । वे लड़खड़ाती हुई वाणीमें उनसे इस प्रकार बोले—॥ १४ ॥
हतोऽस्मि यदि मामेवं भगवानपि मन्यते । मत्तो न दोषमाशङ्के मैवं मामनुशाधि हि ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! यदि आप पूज्यपाद महर्षि भी मुझे ऐसा समझते हैं, तब तो मैं हर तरहसे मारा गया । यह मैं निश्चित रूपसे जानता हूँ कि श्रीरामके वनवासमें मेरी ओरसे कोई अपराध नहीं हुआ है, अतः आप मुझसे ऐसी कठोर बात न कहें ॥ १५ ॥
न चैतदिष्टं माता मे यदवोचन्मदन्तरे । नाहमेतेन तुष्टश्च न तद्वचनमाददे ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘मेरी आड़ लेकर मेरी माताने जो कुछ कहा या किया है, यह मुझे अभीष्ट नहीं है । मैं इससे संतुष्ट नहीं हूँ और न माताकी उस बातको स्वीकार ही करता हूँ ॥ १६ ॥
अहं तु तं नरव्याघ्रमुपयातः प्रसादकः । प्रतिनेतुमयोध्यायां पादौ चास्याभिवन्दितुम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘मैं तो उन पुरुषसिंह श्रीरामको प्रसन्न करके अयोध्यामें लौटा लाने और उनके चरणोंकी वन्दना करनेके लिये जा रहा हूँ ॥ १७ ॥
तं मामेवंगतं मत्वा प्रसादं कर्तुमर्हसि । शंस मे भगवन् रामः क सम्प्रति महीपतिः ॥ १८ ॥ वसिष्ठादिभिर्ऋत्विग्भिर्याचितो भगवांस्ततः । उवाच तं भरद्वाजः प्रसादाद् भरतं वचः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘इसी उद्देश्यसे मैं यहाँ आया हूँ । ऐसा समझकर आपको मुझपर कृपा करनी चाहिये । भगवन् ! आप मुझे बताइये कि इस समय महाराज श्रीराम कहाँ हैं ?’ ॥ इसके बाद वसिष्ठ आदि ऋत्विजोंने भी यह प्रार्थना की कि भरतका कोई अपराध नहीं है । आप इनपर प्रसन्न हों । तब भगवान् भरद्वाजने प्रसन्न होकर भरतसे कहा—॥ १९ ॥
त्वय्येतत् पुरुषव्याघ्र युक्तं राघववंशजे । गुरुवृत्तिर्दमश्चैव साधूनां चानुयायिता ॥ २० ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! तुम रघुकुलमें उत्पन्न हुए हो । तुममें गुरुजनोंकी सेवा, इन्द्रियसंयम तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके अनुसरणका भाव होना उचित ही है ॥ २० ॥
जाने चैतन्मनःस्थं ते दृढीकरणमस्त्विति । अपृच्छं त्वां तवात्यर्थं कीर्तिं समभिवर्धयन् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘तुम्हारे मनमें जो बात है, उसे मैं जानता हूँ; तथापि मैंने इसलिये पूछा है कि तुम्हारा यह भाव और भी दृढ़ हो जाय तथा तुम्हारी कीर्तिका अधिकाधिक विस्तार हो ॥ २१ ॥
जाने च रामं धर्मज्ञं ससीतं सहलक्ष्मणम् । अयं वसति ते भ्राता चित्रकूटे महागिरौ ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘मैं सीता और लक्ष्मणसहित धर्मज्ञ श्रीरामका पता जानता हूँ । ये तुम्हारे भ्राता श्रीरामचन्द्र महापर्वत चित्रकूट-पर निवास करते हैं ॥ २२ ॥
श्वस्तु गन्तासि तं देशं वसाद्य सह मन्त्रिभिः । एतं मे कुरु सुप्राज्ञ कामं कामार्थकोविद ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘अब कल तुम उस स्थानकी यात्रा करना । आज अपने मन्त्रियोंके साथ इस आश्रममें ही रहो । महाबुद्धिमान् भरत ! तुम मेरी इस अभीष्ट वस्तुको देनेमें समर्थ हो, अतः मेरी यह अभिलाषा पूर्ण करो’ ॥ २३ ॥
तत स्तथेत्येवमुदारदर्शनः प्रतीतरूपो भरतोऽब्रवीद् वचः । चकार बुद्धिं च तदाश्रमे तदा निशानिवासाय नराधिपात्मजः ॥ २४ ॥
भावार्थ
तब जिनके स्वरूप एवं स्वभावका परिचय मिल गया था, उन उदार दृष्टिवाले भरतने ‘तथास्तु’ कहकर मुनिकी आज्ञा शिरोधार्य की तथा उन राजकुमारने उस समय रातको उस आश्रममें ही निवास करनेका विचार किया ॥ २४ ॥
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