अयोध्याकाण्ड, सर्ग 91
कृतबुद्धि निवासाय तत्रैव स मुनिस्तदा । भरतं कैकयीपुत्रमातिथ्येन न्यमन्त्रयत् ॥ १ ॥
भावार्थ
जब भरतने उस आश्रममें ही निवासका दृढ़ निश्चय कर लिया, तब मुनिने कैकेयीकुमार भरतको अपना आतिथ्य ग्रहण करनेके लिये न्यौता दिया ॥ १ ॥
अब्रवीद् भरतस्त्वेनं नन्विदं भवता कृतम् । पाद्यमर्घ्यमथातिथ्यं वने यदुपपद्यते ॥ २ ॥
भावार्थ
यह सुनकर भरतने उनसे कहा—‘मुने ! वनमें जैसा आतिथ्य-सत्कार सम्भव है, वह तो आप पाद्य, अर्घ्य और फल-मूल आदि देकर कर ही चुके’ ॥ २ ॥
अथोवाच भरद्वाजो भरतं प्रहसन्निव । जाने त्वां प्रीतिसंयुक्तं तुष्येस्त्वं येन केनचित् ॥ ३ ॥
भावार्थ
उनके ऐसा कहनेपर भरद्वाजजी भरतसे हँसते हुए-से बोले—‘भरत ! मैं जानता हूँ, मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम है; अतः मैं तुम्हें जो कुछ दूँगा, उसीसे तुम संतुष्ट हो जाओगे ॥३॥
सेनायास्तु तवैवास्याः कर्तुमिच्छामि भोजनम् । मम प्रीतिर्यथारूपा त्वमर्हो मनुजर्षभ ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘किंतु इस समय मैं तुम्हारी सेनाको भोजन कराना चाहता हूँ । नरश्रेष्ठ ! इससे मुझे प्रसन्नता होगी और जिस तरह मुझे प्रसन्नता हो, वैसा कार्य तुम्हें अवश्य करना चाहिये ॥ ४ ॥
किमर्थं चापि निक्षिप्य दूरे बलमिहागतः । कस्मान्नेहोपयातोऽसि सबलः पुरुषर्षभ ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘पुरुषप्रवर ! तुम अपनी सेनाको किसलिये इतनी दूर छोड़कर यहाँ आये हो, सेनासहित यहाँ क्यों नहीं आये ?’ ॥५॥
भरतः प्रत्युवाचेदं प्राञ्जलिस्तं तपोधनम् । न सैन्येनोपयातोऽस्मि भगवन् भगवद्भयात् ॥ ६ ॥
भावार्थ
तब भरतने हाथ जोड़कर उन तपोधन मुनिको उत्तर दिया—‘भगवन् ! मैं आपके ही भयसे सेनाके साथ यहाँ नहीं आया ॥ ६ ॥
राज्ञा हि भगवन् नित्यं राजपुत्रेण वा तथा । यत्नतः परिहर्तव्या विषयेषु तपस्विनः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘प्रभो ! राजा और राजपुत्रको चाहिये कि वे सभी देशोंमें प्रयत्नपूर्वक तपस्वीजनोंको दूर छोड़कर रहें ( क्योंकि उनके द्वारा उन्हें कष्ट पहुँचनेकी सम्भावना रहती है ) ॥ ७ ॥
वाजिमुख्या मनुष्याश्च मत्ताश्च वरवारणाः । प्रच्छाद्य भगवन् भूमिं महतीमनुयान्ति माम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘भगवन् ! मेरे साथ बहुत-से अच्छे-अच्छे घोड़े, मनुष्य और मतवाले गजराज हैं, जो बहुत बड़े भूभागको ढककर मेरे पीछे-पीछे चलते हैं ॥ ८ ॥
ते वृक्षानुदकं भूमिमाश्रमेषूटजांस्तथा । न हिंस्युरिति तेनाहमेक एवागतस्ततः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘वे आश्रमके वृक्ष, जल, भूमि और पर्णशालाओंको हानि न पहुँचायें, इसलिये मैं यहाँ अकेला ही आया हूँ’॥ ९॥
आनीयतामितः सेनेत्याज्ञप्तः परमर्षिणा । तथानुचक्रे भरतः सेनायाः समुपागमम् ॥ १० ॥
भावार्थ
तदनन्तर उन महर्षिने आज्ञा दी कि ‘सेनाको यहीं ले आओ।’ तब भरतने सेनाको वहीं बुलवा लिया ॥१०॥
अग्निशालां प्रविश्याथ पीत्वापः परिमृज्य च । आतिथ्यस्य क्रियाहेतोर्विश्वकर्माणमाह्वयत् ॥ ११ ॥
भावार्थ
इसके बाद मुनिवर भरद्वाजने अग्निशालामें प्रवेश करके जलका आचमन किया और ओठ पोंछकर भरतके आतिथ्यसत्कारके लिये विश्वकर्मा आदिका आवाहन किया ॥ ११ ॥
आह्वये विश्वकर्माणमहं त्वष्टारमेव च । आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि तत्र मे संविधीयताम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
वे बोले—‘मैं विश्वकर्मा त्वष्टा देवताका आवाहन करता हूँ। मेरे मनमें सेनासहित भरतका आतिथ्य-सत्कार करनेकी इच्छा हुई है । इसमें मेरे लिये वे आवश्यक प्रबन्ध करें ॥ १२ ॥
आह्वये लोकपालांस्त्रीन् देवाञ् शक्रपुरोगमान् । आतिथ्यं कर्तुमिच्छामि तत्र मे संविधीयताम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘जिनके अगुआ इन्द्र हैं, उन तीन लोकपालोंका (अर्थात् इन्द्रसहित यम, वरुण और कुबेर नामक देवताओंका ) मैं आवाहन करता हूँ । इस समय भरतका आतिथ्य-सत्कार करना चाहता हूँ, इसमें मेरे लिये वे लोग आवश्यक प्रबन्ध करें ॥ १३ ॥
प्राक्स्रोतसश्च या नद्यस्तिर्यक्स्रोतस एव च । पृथिव्यामन्तरिक्षे च समायान्त्वद्य सर्वशः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘पृथिवी और आकाशमें जो पूर्व एवं पश्चिमकी ओर प्रवाहित होनेवाली नदियाँ हैं, उनका भी मैं आवाहन करता हूँ; वे सब आज यहाँ पधारें ॥ १४ ॥
अन्याः स्रवन्तु मैरेयं सुरामन्याः सुनिष्ठिताम् । अपराश्चोदकं शीतमिक्षुकाण्डरसोपमम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘कुछ नदियाँ मैरेय प्रस्तुत करें । दूसरी अच्छी तरह तैयार की हुई सुरा ले आवें तथा अन्य नदियाँ ईखके पोरुओं-में होनेवाले रसकी भाँति मधुर एवं शीतल जल तैयार करके रखें ॥ १५ ॥
आह्वये देवगन्धर्वान् विश्वावसुहहाहुहून् । तथैवाप्सरसो देवगन्धर्वैश्चापि सर्वशः ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘मैं विश्वावसु, हाहा और हूहू आदि देव-गन्धर्वोंका तथा उनके साथ समस्त अप्सराओंका भी आवाहन करता हूँ ॥१६॥
घृताचीमथ विश्वाचीं मिश्रकेशीमलम्बुषाम् । नागदत्तां च हेमां च सोमामद्रिकृतस्थलीम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘घृताची विश्वाची, मिश्रकेशी, अलम्बुषा नागदत्ता, हेमा, सोमा तथा अद्रिकृतस्थली ( अथवा पर्वतपर निवास करनेवाली सोमा ) का भी मैं आवाहन करता हूँ ॥ १७ ॥
शक्रं याश्चोपतिष्ठन्ति ब्रह्माणं याश्च भामिनीः । सर्वास्तुम्बुरुणा सार्धमाह्वये सपरिच्छदाः ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘जो अप्सराएँ इन्द्रकी सभामें उपस्थित होती हैं तथा जो देवाङ्गनाएँ ब्रह्माजीकी सेवामें जाया करती हैं, उन सबका मैं तुम्बुरुके साथ आवाहन करता हूँ । वे अलङ्कारों तथा नृत्य-गीतके लिये अपेक्षित अन्यान्य उपकरणोंके साथ यहाँ पधारें ॥ १८ ॥
वनं कुरुषु यद् दिव्यं वासोभूषणपत्रवत् । दिव्यनारीफलं शश्वत् तत्कौबेरमिहैव तु ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘उत्तर कुरुवर्षमें जो दिव्य चैत्ररथ नामक वन है, जिसमें दिव्य वस्त्र और आभूषण ही वृक्षोंके पत्ते हैं और दिव्य नारियाँ ही फल हैं, कुबेरका वह सनातन दिव्य वन यहीं आ जाय ॥ १९ ॥
इह मे भगवान् सोमो विधत्तामन्नमुत्तमम् । भक्ष्यं भोज्यं च चोष्यं च लेह्यं च विविधं बहु ॥ २० ॥
भावार्थ
‘यहाँ भगवान् सोम मेरे अतिथियोंके लिये उत्तम अन्न, नाना प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्यकी प्रचुर मात्रामें व्यवस्था करें ॥ २० ॥
विचित्राणि च माल्यानि पादपप्रच्युतानि च । सुरादीनि च पेयानि मांसानि विविधानि च ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘वृक्षोंसे तुरंत चुने गये नाना प्रकारके पुष्प, मधु आदि पेय पदार्थ तथा नाना प्रकारके फलोंके गूदे भी भगवान् सोम यहाँ प्रस्तुत करें’ ॥ २१ ॥
एवं समाधिना युक्तस्तेजसाप्रतिमेन च । शिक्षास्वरसमायुक्तं सुव्रतश्चाब्रवीन्मुनिः ॥ २२ ॥
भावार्थ
इस प्रकार उत्तम व्रतका पालन करनेवाले भरद्वाज मुनिने एकाग्रचित्त और अनुपम तेजसे सम्पन्न हो शिक्षा ( शिक्षाशास्त्रमें बतायी गयी उच्चारणविधि ) और ( व्याकरण-शास्त्रोक्त प्रकृति-प्रत्ययसम्बन्धी ) स्वरसे युक्त वाणीमें उन सबका आवाहन किया ॥ २२ ॥
मनसा ध्यायतस्तस्य प्राङ्मुखस्य कृताञ्जलेः । आजग्मुस्तानि सर्वाणि दैवतानि पृथक् पृथक् ॥ २३ ॥
भावार्थ
इस तरह आवाहन करके मुनि पूर्वाभिमुख हो हाथ जोड़े मन ही-मन ध्यान करने लगे । उनके स्मरण करते ही वे सभी देवता एक-एक करके वहाँ आ पहुँचे ॥ २३ ॥
मलयं दर्दुरं चैव ततः स्वेदनुदोऽनिलः । उपस्पृश्य ववौ युक्त्या सुप्रियात्मा सुखं शिवः ॥ २४ ॥
भावार्थ
फिर तो वहाँ मलय और दर्दुर नामक पर्वतोंका स्पर्श करके वहनेवाली अत्यन्त प्रिय और सुखदायिनी हवा धीरे-धीरे चलने लगी, जो स्पर्शमात्रसे शरीरके पसीनेको सुखा देनेवाली थी ॥ २४ ॥
ततोऽभ्यवर्षन्त घना दिव्याः कुसुमवृष्टयः । देवदुन्दुभिघोषश्च दिक्षु सर्वासु शुश्रुवे ॥ २५ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् मेघगण दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करने लगे।सम्पूर्ण दिशाओंमें देवताओंकी दुन्दुभियोंका मधुर शब्द सुनायी देने लगा ॥ २५ ॥
प्रववुश्चोत्तमा वाता ननृतुश्चाप्सरोगणाः । प्रजगुर्देवगन्धर्वा वीणाः प्रमुमुचुः स्वरान् ॥ २६ ॥
भावार्थ
उत्तम वायु चलने लगी। अप्सराओंके समुदायोंका नृत्य होने लगा । देवगन्धर्व गाने लगे और सब ओर वीणाओंकी स्वरलहरियाँ फैल गयीं ॥ २६ ॥
स शब्दो द्यां च भूमिं च प्राणिनां श्रवणानि च । विवेशोच्चावचः श्लक्ष्णः समो लयगुणान्वितः ॥ २७ ॥
भावार्थ
सङ्गीतका वह शब्द पृथ्वी, आकाश तथा प्राणियोंके कर्णकुहरोंमें प्रविष्ट होकर गूँजने लगा । आरोह-अवरोहसे युक्त वह शब्द कोमल एवं मधुर था, समतालसे विशिष्ट और लयगुणसे सम्पन्न था ॥ २७ ॥
तस्मिन्नेवंगते शब्दे दिव्ये श्रोत्रसुखे नृणाम् । ददर्श भारतं सैन्यं विधानं विश्वकर्मणः ॥ २८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार मनुष्योंके कानोंको सुख देनेवाला वह दिव्य शब्द हो ही रहा था कि भरतकी सेनाको विश्वकर्माका निर्माणकौशल दिखायी पड़ा ॥ २८ ॥
बभूव हि समा भूमिः समन्तात् पञ्चयोजनम् । शाद्वलैर्बहुभिश्छन्ना नीलवैदूर्यसंनिभैः ॥ २९ ॥
भावार्थ
चारों ओर पाँच योजनतककी भूमि समतल हो गयी । उसपर नीलम और वैदूर्य मणिके समान नाना प्रकारकी घनी घास छा रही थी ॥ २९ ॥
तस्मिन् बिल्वाः कपित्थाश्च पनसा बीजपूरकाः । आमलक्यो बभूवुश्च चूताश्च फलभूषिताः ॥ ३० ॥
भावार्थ
स्थान-स्थानपर बेल, कैथ, कटहल, आँवला, बिजौरा तथा आमके वृक्ष लगे थे, जो फलोंसे सुशोभित हो रहे थे ॥ ३० ॥
उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्च वनं दिव्योपभोगवत् । आजगाम नदी सौम्या तीरजैर्बहुभिर्वृता ॥ ३१ ॥
भावार्थ
उत्तर कुरुवर्षसे दिव्य भोगसामग्रियोंसे सम्पन्न चैत्ररथ नामक वन वहाँ आ गया । साथ ही वहाँकी रमणीय नदियाँ भी आ पहुँचीं, जो बहुसंख्यक तटवर्ती वृक्षोंसे घिरी हुई थीं ॥ ३१ ॥
चतुःशालानि शुभ्राणि शालाश्च गजवाजिनाम् । हर्म्यप्रासादसंयुक्ततोरणानि शुभानि च ॥ ३२ ॥
भावार्थ
उज्ज्वल, चार-चार कमरोंसे युक्त गृह ( अथवा गृहयुक्त चबूतरे ) तैयार हो गये । हाथी और घोड़ोंके रहनेके लिये शालाएँ बन गयीं । अट्टालिकाओं तथा सतमंजिले महलोंसे युक्त सुन्दर नगरद्वार भी निर्मित हो गये ॥ ३२ ॥
सितमेघनिभं चापि राजवेश्म सुतोरणम् । शुक्लमाल्यकृताकारं दिव्यगन्धसमुक्षितम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
राजपरिवारके लिये बना हुआ सुन्दर द्वारसे युक्त दिव्य भवन श्वेत बादलोंके समान शोभा पा रहा था । उसे सफेद फूलोंकी मालाओंसे सजाया और दिव्य सुगन्धित जलसे सींचा गया था ॥ ३३ ॥
चतुरस्रमसम्बाधं शयनासनयानवत् । दिव्यैः सर्वरसैर्युक्तं दिव्यभोजनवस्त्रवत् ॥ ३४ ॥
भावार्थ
वह महल चौकोना तथा बहुत बड़ा था—उसमें संकीर्णता-का अनुभव नहीं होता था । उसमें सोने, बैठने और सवारियोंके रहनेके लिये अलग-अलग स्थान थे । वहाँ सब प्रकारके दिव्य रस, दिव्य भोजन और दिव्य वस्त्र प्रस्तुत थे ॥ ३४ ॥
उपकल्पितसर्वान्नं धौतनिर्मलभाजनम् । क्लृप्तसर्वासनं श्रीमत्स्वास्तीर्णशयनोत्तमम् ॥ ३५ ॥
भावार्थ
सब तरहके अन्न और धुले हुए स्वच्छ पात्र रखे गये थे । उस सुन्दर भवनमें कहीं बैठनेके लिये सब प्रकारके आसन उपस्थित थे और कहीं सोनेके लिये सुन्दर शय्याएँ बिछी थीं ॥ ३५ ॥
प्रविवेश महाबाहुरनुज्ञातो महर्षिणा । वेश्म तद् रत्नसम्पूर्णं भरतः कैकयीसुतः ॥ ३६ ॥ अनुजग्मुश्च ते सर्वे मन्त्रिणः सपुरोहिताः । बभूवुश्च मुदा युक्तास्तं दृष्ट्वा वेश्मसंविधिम् ॥ ३७ ॥
भावार्थ
महर्षि भरद्वाजकी आज्ञासे कैकेयीपुत्र महाबाहु भरतने नाना प्रकारके रत्नोंसे भरे हुए उस महलमें प्रवेश किया । उनके साथ-साथ पुरोहित और मन्त्री भी उसमें गये । उस भवनका निर्माणकौशल देखकर उन सब लोगोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३६–३७ ॥
तत्र राजासनं दिव्यं व्यजनं छत्रमेव च । भरतो मन्त्रिभिः सार्धमभ्यवर्तत राजवत् ॥ ३८ ॥
भावार्थ
उस भवनमें भरतने दिव्य राजसिंहासन, चँवर और छत्र भी देखे तथा वहाँ राजा श्रीरामकी भावना करके मन्त्रियोंके साथ उन समस्त राजभोग्य वस्तुओंकी प्रदक्षिणा की ॥ ३८ ॥
आसनं पूजयामास रामायाभिप्रणम्य च । वालव्यजनमादाय न्यषीदत् सचिवासने ॥ ३९ ॥
भावार्थ
सिंहासनपर श्रीरामचन्द्रजी महाराज विराजमान हैं, ऐसी धारणा बनाकर उन्होंने श्रीरामको प्रणाम किया और उस सिंहासनकी भी पूजा की । फिर अपने हाथमें चँवर ले, वे मन्त्रीके आसनपर जा बैठे ॥ ३९ ॥
आनुपूर्ब्यान्निषेदुश्च सर्वे मन्त्रिपुरोहिताः । ततः सेनापतिः पश्चात् प्रशास्ता च न्यषीदत ॥ ४० ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् पुरोहित और मन्त्री भी क्रमशः अपने योग्य आसनोंपर बैठे; फिर सेनापति और प्रशास्ता ( छावनीकी रक्षा करनेवाले ) भी बैठ गये ॥ ४० ॥
ततस्तत्र मुहूर्तेन नद्यः पायसकर्दमाः । उपातिष्ठन्त भरतं भरद्वाजस्य शासनात् ॥ ४१ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वहाँ दो ही घड़ीमें भरद्वाज मुनिकी आज्ञासे भरतकी सेवामें नदियाँ उपस्थित हुईं, जिनमें कीचके स्थानमें खीर भरी थी ॥ ४१ ॥
आसामुभयतःकूलं पाण्डुमृत्तिकलेपनाः । रम्याश्चावसथा दिव्या ब्राह्मणस्य प्रसादजाः ॥ ४२ ॥
भावार्थ
उन नदियोंके दोनों तटोंपर ब्रह्मर्षि भरद्वाजकी कृपासे दिव्य एवं रमणीय भवन प्रकट हो गये थे, जो चूनेसे पुते हुए थे ॥ ४२ ॥
तेनैव च मुहूर्तेन दिव्याभरणभूषिताः । आगुर्विंशतिसाहस्रा ब्रह्मणा प्रहिताः स्त्रियः ॥ ४३ ॥
भावार्थ
उसी मुहूर्तमें ब्रह्माजीकी भेजी हुई दिव्य आभूषणोंसे विभूषित बीस हजार दिव्याङ्गनाएँ वहाँ आयीं ॥ ४३ ॥
सुवर्णमणिमुक्तेन प्रवालेन च शोभिताः । आगुर्विंशतिसाहस्राः कुबेरप्रहिताः स्त्रियः ॥ ४४ ॥ याभिर्गृहीतः पुरुषः सोन्माद इव लक्ष्यते ।
भावार्थ
इसी तरह सुवर्ण, मणि, मुक्ता और मूँगोंके आभूषणोंसे सुशोभित, कुबेरकी भेजी हुई बीस हजार दिव्य महिलाएँ भी वहाँ उपस्थित हुईं, जिनका स्पर्श पाकर पुरुष उन्माद-ग्रस्त-सा दिखायी देता है ॥ ४४½ ॥
आगुर्विंशतिसाहस्रा नन्दनादप्सरोगणाः ॥ ४५ ॥ नारदस्तुम्बुरुर्गोपः प्रभया सूर्यवर्चसः । एते गन्धर्वराजानो भरतस्याग्रतो जगुः ॥ ४६ ॥
भावार्थ
इनके सिवा नन्दनवनसे बीस हजार अप्सराएँ भी आयीं । नारद, तुम्बुरु और गोप अपनी कान्तिसे सूर्यके समान प्रकाशित होते थे । ये तीनों गन्धर्वराज भरतके सामने गीत गाने लगे ॥ ४५-४६ ॥
अलम्बुषा मिश्रकेशी पुण्डरीकाथ वामना । उपानृत्यन्त भरतं भरद्वाजस्य शासनात् ॥ ४७ ॥
भावार्थ
अलम्बुषा, मिश्रकेशी, पुण्डरीका और वामना—ये चार अप्सराएँ भरद्वाज मुनिकी आज्ञासे भरतके समीप नृत्य करने लगीं ॥ ४७ ॥
यानि माल्यानि देवेषु यानि चैत्ररथे वने । प्रयागे तान्यदृश्यन्त भरद्वाजस्य तेजसा ॥ ४८ ॥
भावार्थ
जो फूल देवताओंके उद्यानोंमें और जो चैत्ररथ वनमें हुआ करते हैं, वे महर्षि भरद्वाजके प्रतापसे प्रयागमें दिखायी देने लगे ॥ ४८ ॥
बिल्वा मार्दङ्गिका आसन् शम्याग्राहा विभीतकाः । अश्वत्था नर्तकाश्चासन् भरद्वाजस्य तेजसा ॥ ४९ ॥
भावार्थ
भरद्वाज मुनिके तेजसे बेलके वृक्ष मृदङ्ग बजाते, बहेड़ेके पेड़ शम्या नामक ताल देते और पीपलके वृक्ष वहाँ नृत्य करते थे ॥ ४९ ॥
ततः सरलतालाश्च तिलकाः सतमालकाः । प्रहृष्टास्तत्र सम्पेतुः कुब्जा भूत्वाथ वामनाः ॥ ५० ॥
भावार्थ
तदनन्तर देवदारु, ताल, तिलक और तमाल नामक वृक्ष कुबड़े और बौने बनकर बड़े हर्षके साथ भरतकी सेवामें उपस्थित हुए ॥ ५० ॥
शिंशपाऽऽमलकी जम्ब्वूर्याश्चान्याः कानने लताः । मालती मल्लिका जातिर्याश्चान्याः कानने लताः । प्रमदाविग्रहं कृत्वा भरद्वाजाश्रमेऽवसन् ॥ ५१ ॥
भावार्थ
शिंशपा, आमलकी और जम्बू आदि स्त्रीलिङ्ग वृक्ष तथा मालती, मल्लिका और जाति आदि वनकी लताएँ नारीका रूप धारण करके भरद्वाज मुनिके आश्रममें आ बसीं ॥५१॥
सुरां सुरापाः पिबत पायसं च बुभुक्षिताः । मांसानि च सुमेध्यानि भक्ष्यन्तां यो यदिच्छति ॥
भावार्थ
( वे भरतके सैनिकोंको पुकार-पुकारकर कहती थीं—) ‘मधुका पान करनेवाले लोगो ! लो, यह मधु पान कर लो । तुममेंसे जिन्हें भूख लगी हो, वे सब लोग यह खीर खाओ और परम पवित्र फलोंके गूदे भी प्रस्तुत हैं, इनका आस्वादन करो । जिसकी जो इच्छा हो, वही भोजन करो’॥ ५२ ॥
उच्छोद्य स्नापयन्ति स्म नदीतीरेषु वल्गुषु । अप्येकमेकं पुरुषं प्रमदाः सप्त चाष्ट च ॥ ५३ ॥
भावार्थ
सात-आठ तरुणी स्त्रियाँ मिलकर एक-एक पुरुषको नदीके मनोहर तटोंपर उबटन लगा-लगाकर नहलाती थीं ॥५३॥
संवाहन्त्यः समापेतुर्नार्यो विपुललोचनाः । परिमृज्य तदान्योन्यं पाययन्ति वराङ्गनाः ॥ ५४ ॥
भावार्थ
बड़े-बड़े नेत्रोंवाली सुन्दरी रमणियाँ अतिथियोंका पैर दबानेके लिये आयी थीं । वे उनके भीगे हुए अङ्गोंको वस्त्रोंसे पोंछकर शुद्ध वस्त्र धारण कराकर उन्हें स्वादिष्ट पेय ( दूध आदि ) पिलाती थीं ॥ ५४ ॥
हयान् गजान् खरानुष्ट्रांस्तथैव सुरभेः सुतान् । अभोजयन् वाहनपास्तेषां भोज्यं यथाविधि ॥ ५५ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् भिन्न-भिन्न वाहनोंकी रक्षामें नियुक्त मनुष्योंने हाथी, घोड़े, गधे, ऊँट और बैलोंको भलीभाँति दाना-घास आदिका भोजन कराया ॥ ५५ ॥
इक्षूंश्च मधुलाजांश्च भोजयन्ति स्म वाहनान् । इक्ष्वाकुवरयोधानां चोदयन्तो महाबलाः ॥ ५६ ॥
भावार्थ
इक्ष्वाकुकुलके श्रेष्ठ योद्धाओंकी सवारीमें आनेवाले वाहनोंको वे महाबली वाहन-रक्षक ( जिन्हें महर्षिने सेवाके लिये नियुक्त किया था ) प्रेरणा दे-देकर गन्नेके टुकड़े और मधुमिश्रित लावे खिलाते थे ॥ ५६ ॥
नाश्वबन्धोऽश्वमाजानान्न गजं कुञ्जरग्रहः । मत्तप्रमत्तमुदिता सा चमूस्तत्र सम्बभौ ॥ ५७ ॥
भावार्थ
घोड़े बाँधनेवाले सईसको अपने घोड़ेका और हाथीवान-को अपने हाथीका कुछ पता नहीं था । सारी सेना वहाँ मत्त-प्रमत्त और आनन्दमग्न प्रतीत होती थी ॥ ५७ ॥
तर्पिताः सर्वकामैश्च रक्तचन्दनरूषिताः । अप्सरोगणसंयुक्ताः सैन्या वाचमुदीरयन् ॥ ५८ ॥
भावार्थ
सम्पूर्ण मनोवाञ्छित पदार्थोंसे तृप्त होकर लाल चन्दनसे चर्चित हुए सैनिक अप्सराओंका संयोग पाकर निम्नाङ्कित बातें कहने लगे—॥ ५८ ॥
नैवायोध्यां गमिष्यामो न गमिष्याम दण्डकान् । कुशलं भरतस्यास्तु रामस्यास्तु तथा सुखम् ॥ ५९ ॥
भावार्थ
‘अब हम अयोध्या नहीं जायँगे, दण्डकारण्यमें भी नहीं जायँगे । भरत सकुशल रहें ( जिनके कारण हमें इस भूतलपर स्वर्गका सुख मिला ) तथा श्रीरामचन्द्रजी भी सुखी रहें ( जिनके दर्शनके लिये आनेपर हमें इस दिव्य सुखकी प्राप्ति हुई )’ ॥ ५९ ॥
इति पादातयोधाश्च हस्त्यश्वारोहबन्धकाः । अनाथास्तं विधिं लब्ध्वा वाचमेतामुदीरयन् ॥ ६० ॥
भावार्थ
इस प्रकार पैदल सैनिक तथा हाथीसवार, घुड़सवार, सईस और महावत आदि उस सत्कारको पाकर स्वच्छन्द हो उपर्युक्त बातें कहने लगे ॥ ६० ॥
सम्प्रहृष्टा विनेदुस्ते नरास्तत्र सहस्रशः । भरतस्यानुयातारः स्वर्गोऽयमिति चाब्रुवन् ॥ ६१ ॥
भावार्थ
भरतके साथ आये हुए हजारों मनुष्य वहाँका वैभव देखकर हर्षके मारे फूले नहीं समाते थे और जोर-जोरसे कहते थे—यह स्थान स्वर्ग है ॥ ६१ ॥
नृत्यन्तश्च हसन्तश्च गायन्तश्चैव सैनिकाः । समन्तात् परिधावन्तो माल्योपेताः सहस्रशः ॥ ६२ ॥
भावार्थ
सहस्रों सैनिक फूलोंके हार पहनकर नाचते, हँसते और गाते हुए सब ओर दौड़ते फिरते थे ॥ ६२ ॥
ततो भुक्तवतां तेषां तदन्नममृतोपमम् । दिव्यानुद्वीक्ष्य भक्ष्यांस्तानभवद् भक्षणे मतिः ॥ ६३ ॥
भावार्थ
उस अमृतके समान स्वादिष्ट अन्नका भोजन कर चुकनेपर भी उन दिव्य भक्ष्य पदार्थोंको देखकर उन्हें पुनः भोजन करनेकी इच्छा हो जाती थी ॥ ६३ ॥
प्रेष्याश्चेट्यश्च वध्वश्च बलस्थाश्चापि सर्वशः । बभूवुस्ते भृशं प्रीताः सर्वे चाहतवाससः ॥ ६४ ॥
भावार्थ
दास दासियाँ, सैनिकोंकी स्त्रियाँ और सैनिक सब-के-सब नूतन वस्त्र धारण करके सब प्रकारसे अत्यन्त प्रसन्न हो गये थे ॥ ६४ ॥
कुञ्जराश्च खरोष्ट्राश्च गोऽश्वाश्च मृगपक्षिणः । बभूवुः सुभृतास्तत्र नातो ह्यन्यमकल्पयत् ॥ ६५ ॥
भावार्थ
हाथी, घोड़े, गदहे, ऊँट, बैल, मृग तथा पक्षी भी वहाँ पूर्ण तृप्त हो गये थे; अतः कोई दूसरी किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करता था ॥ ६५ ॥
नाशुक्लवासास्तत्रासीत् क्षुधितो मलिनोऽपि वा । रजसा ध्वस्तकेशो वा नरः कश्चिददृश्यत ॥ ६६ ॥
भावार्थ
उस समय वहाँ कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं दिखायी देता था, जिसके कपड़े सफेद न हों, जो भूखा या मलिन रह गया हो, अथवा जिसके केश धूलसे धूसरित हो गये हों ॥ ६६ ॥
आजैश्चापि च वाराहैर्निष्ठानवरसंचयैः । फलनिर्यूहसंसिक्तैः सूपैर्गन्धरसान्वितैः ॥ ६७ ॥ पुष्पध्वजवतीः पूर्णाः शुक्लस्यान्नस्य चाभितः । ददृशुर्विस्मितास्तत्र नरा लौहीः सहस्रशः ॥ ६८ ॥
भावार्थ
अजवाइन मिलाकर बनाये गये, वराही कन्दसे तैयार किये गये तथा आम आदि फलोंके गरम किये हुए रसमें पकाये गये उत्तमोत्तम व्यञ्जनोंके संग्रह हों, सुगन्धयुक्त रसवाली दालों तथा श्वेत रंगके भातोंसे भरे हुए सहस्रों सुवर्ण आदिके पात्र वहाँ सब ओर रखे हुए थे, जिन्हें फूलोंकी ध्वजाओंसे सजाया गया था । भरतके साथ आये हुए सब लोगोंने उन पात्रोंको आश्चर्यचकित होकर देखा ॥ ६७-६८ ॥
बभूवुर्वनपार्श्वेषु कूपाः पायसकर्दमाः । ताश्च कामदुघा गावो द्रुमाश्चासन् मधुच्युतः ॥ ६९ ॥
भावार्थ
वनके आस-पास जितने कुएँ थे, उन सबमें गाढ़ी स्वादिष्ट खीर भरी हुई थी । वहाँकी गौएँ कामधेनु ( सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली ) हो गयी थीं और उस दिव्य वनके वृक्ष मधुकी वर्षा करते थे ॥ ६९ ॥
वाप्यो मैरेयपूर्णाश्च मृष्टमांसचयैर्वृताः । प्रतप्तपिठरैश्चापि मार्गमायूरकौक्कुटैः ॥ ७० ॥
भावार्थ
भरतकी सेनामें आये हुए निषाद आदि निम्नवर्गके लोगोंकी तृप्तिके लिये वहाँ मधुसे भरी हुई बावड़ियाँ प्रकट हो गयी थीं तथा उनके तटोंपर तपे हुए पिठर ( कुण्ड ) में पकाये गये मृग, मोर और मुर्गोंके स्वच्छ मांस भी ढेर-के-ढेर रख दिये गये थे ॥ ७० ॥
पात्रीणां च सहस्राणि स्थालीनां नियुतानि च । न्यर्बुदानि च पात्राणि शातकुम्भमयानि च ॥ ७१ ॥
भावार्थ
वहाँ सहस्रों सोनेके अन्नपात्र, लाखों व्यञ्जनपात्र और लगभग एक अरब थालियाँ संगृहीत थीं ॥ ७१ ॥
स्थाल्यः कुम्भ्यः करम्भ्यश्च दधिपूर्णाः सुसंस्कृताः । यौवनस्थस्य गौरस्य कपित्थस्य सुगन्धिनः ॥ ७२ ॥ ह्रदाः पूर्णा रसालस्य दध्नः श्वेतस्य चापरे। बभूवुः पायसस्यान्ये शर्कराणां च संचयाः ॥ ७३॥
भावार्थ
पिठर, छोटे-छोटे घड़े तथा मटके दहीसे भरे हुए थे और उनमें दहीको सुस्वादु बनानेवाले सोंठ आदि मसाले पड़े हुए थे। एक पहर पहलेके तैयार किये हुए केसरमिश्रित पीतवर्णवाले सुगन्धित तक्रके कई तालाव भरे हुए थे। जीरा आदि मिलाये हुए तक्र ( रसाल ), सफेद दही तथा दूधके भी कई कुण्ड पृथक्-पृथक् भरे हुए थे। शकरोंके कई ढेर लगे थे ॥ ७२-७३ ॥
कल्कांश्चूर्णकषायांश्च स्नानानि विविधानि च। ददृशुर्भाजनस्थानि तीर्थेषु सरितां नराः ॥ ७४ ॥
भावार्थ
स्नान करनेवाले मनुष्योंको नदीके घाटोंपर भिन्न-भिन्न पात्रोंमें पीसे हुए आँवले, सुगन्धित चूर्ण तथा और भी नाना प्रकारके स्नानोपयोगी पदार्थ दिखायी देते थे ॥ ७४ ॥
शुक्लानंशुमतश्चापि दन्तधावनसंचयान्। शुक्लांश्चन्दनकल्कांश्च समुद्गेष्ववस्थितः ॥ ७५ ॥
भावार्थ
साथ ही ढेर-के-ढेर दाँतन, जो सफेद कूँचेवाले थे, वहाँ रखे हुए थे। सम्पुटोंमें घिसे हुए सफेद चन्दन विद्यमान थे। इन सब वस्तुओंको लोगोंने देखा ॥ ७५ ॥
दर्पणान् परिमृष्टांश्च वाससां चापि संचयान्। पादुकोपानहं चैव युग्मान्यत्र सहस्रशः ॥ ७६ ॥ आञ्जनीः कङ्कतान् कूर्चांश्छत्राणि च धनूंषि च। मर्मत्राणानि चित्राणि शयनान्यासनानि च ॥ ७७ ॥ प्रतिपानह्रदान् पूर्णान् खरोष्ट्रगजवाजिनाम्। अवगाह्यसुतीर्थांश्च ह्रदान् सोत्पलपुष्करान्। आकाशवर्णप्रतिमान् स्वच्छतोयान् सुखाप्लवान् ॥ ७८॥
भावार्थ
इतना ही नहीं, वहाँ बहुत-से स्वच्छ दर्पण, ढेर-के-ढेर वस्त्र और हजारों जोड़े खड़ाऊँ और जूते भी दिखायी देते थे॥ काजलौंसहित कजरौटे, कंघे, कूर्च ( थकरी या ब्रश ), छत्र, धनुष, मर्मस्थानोंकी रक्षा करनेवाले कवच आदि तथा विचित्र शय्या और आसन भी वहाँ दृष्टिगोचर होते थे ॥ गधे, ऊँट, हाथी और घोड़ोंके पानी पीनेके लिये कई जलाशय भरे थे; जिनके घाट बड़े सुन्दर और सुखपूर्वक उतरनेयोग्य थे। उन जलाशयोंमें कमल और उत्पल शोभा पा रहे थे। उनका जल आकाशके समान स्वच्छ था तथा उनमें सुखपूर्वक तैरा जा सकता था ॥ ७८ ॥
नीलवैदूर्यवर्णांश्च मृदून् यवससंचयान्। निर्वापार्थं पशूनां ते ददृशुस्तत्र सर्वशः ॥ ७९ ॥
भावार्थ
पशुओंके खानेके लिये वहाँ सब ओर नील वैदूर्यमणिके समान रंगवाली हरी एवं कोमल घासकी ढेरियाँ लगी थीं। उन सब लोगोंने वे सारी वस्तुएँ देखीं ॥ ७९ ॥
व्यस्मयन्त मनुष्यास्ते स्वप्नकल्पं तदद्भुतम्। दृष्ट्वाऽऽतिथ्यं कृतं तादृग् भरतस्य महर्षिणा ॥ ८०॥ इत्येवं रममाणानां देवानामिव नन्दने। भरद्वाजाश्रमे रम्ये सा रात्रिर्व्यत्यवर्तत ॥ ८१॥
भावार्थ
महर्षि भरद्वाजके द्वारा सेनासहित भरतका किया हुआ वह अनिर्वचनीय आतिथ्य-सत्कार अद्भुत और स्वप्नके समान था। उसे देखकर वे सब मनुष्य आश्चर्यचकित हो उठे॥ जैसे देवता नन्दनवनमें विहार करते हैं, उसी प्रकार भरद्वाज मुनिके रमणीय आश्रममें यथेष्ट क्रीड़ा-विहार करते हुए उन लोगोंकी वह रात्रि बड़े सुखसे बीती ॥ ८१ ॥
प्रतिजग्मुश्च ता नद्यो गन्धर्वाश्च यथागतम्। भरद्वाजमनुज्ञाप्य ताश्च सर्वा वराङ्गनाः ॥ ८२ ॥
भावार्थ
तत्पश्चात् वे नदियाँ, गन्धर्व और समस्त सुन्दरी अप्सराएँ भरद्वाजजीकी आज्ञा ले जैसे आयी थीं, उसी प्रकार लौट गयीं ॥ ८२ ॥
तथैव मत्ता मदिरोत्कटा नरा- स्तथैव दिव्यागुरुचन्दनोक्षिताः। तथैव दिव्या विविधाः स्रगुत्तमाः पृथग्विकीर्णा मनुजैः प्रमर्दिताः ॥ ८३॥
भावार्थ
सबेरा हो जानेपर भी लोग उसी प्रकार मधुपानसे मत्त एवं उन्मत्त दिखायी देते थे। उनके अङ्गोंपर दिव्य अगुरु-युक्त चन्दनका लेप ज्यों-का-त्यों दृष्टिगोचर हो रहा था। मनुष्योंके उपभोगमें लाये गये नाना प्रकारके दिव्य उत्तम पुष्पहार भी उसी अवस्थामें पृथक्-पृथक् बिखरे पड़े थे ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें