अयोध्याकाण्ड, सर्ग 89
व्युष्य रात्रिं तु तत्रैव गङ्गाकूले स राघवः । काल्यमुत्थाय शत्रुघ्नमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
भावार्थ
शृङ्गवेरपुरमें ही गङ्गाके तटपर रात्रि बिताकर रघुकुलनन्दन भरत प्रातःकाल उठे और शत्रुघ्नसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥
शत्रुघ्नोत्तिष्ठ किं शेषे निषादाधिपतिं गुहम् । शीघ्रमानय भद्रं ते तारयिष्यति वाहिनीम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘शत्रुघ्न ! उठो, क्या सो रहे हो । तुम्हारा कल्याण हो, तुम निषादराज गुहको शीघ्र बुला लाओ, वही हमें गङ्गाके पार उतारेगा’ ॥ २ ॥
जागर्मि नाहं स्वपिमि तथैवार्यं विचिन्तयन् । इत्येवमब्रवीद् भ्राता शत्रुघ्नो विप्रचोदितः ॥ ३ ॥
भावार्थ
उनसे इस प्रकार प्रेरित होनेपर शत्रुघ्नने कहा—‘भैया ! मैं भी आपकी ही भाँति आर्य श्रीरामका चिन्तन करता हुआ जाग रहा हूँ, सोता नहीं हूँ’ ॥ ३ ॥
इति संवदतोरेवमन्योन्यं नरसिंहयोः । आगम्य प्राञ्जलिः काले गुहो वचनमब्रवीत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
वे दोनों पुरुषसिंह जब इस प्रकार परस्पर बातचीत कर रहे थे, उसी समय गुह उपयुक्त वेलामें आ पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला—॥ ४ ॥
कच्चित् सुखं नदीतीरेऽवात्सीः काकुत्स्थ शर्वरीम् । कच्चिच्च सहसैन्यस्य तव नित्यमनामयम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘ककुत्स्थकुलभूषण भरतजी ! इस नदीके तटपर आप रातमें सुखसे रहे हैं न ? सेनासहित आपको यहाँ कोई कष्ट तो नहीं हुआ है ? आप सर्वथा नीरोग हैं न ?’ ॥ ५ ॥
गुहस्य तत् तु वचनं श्रुत्वा स्नेहादुदीरितम् । रामस्यानुवशो वाक्यं भरतोऽपीदमब्रवीत् ॥ ६ ॥
भावार्थ
गुहके स्नेहपूर्वक कहे गये इस वचनको सुनकर श्रीरामके अधीन रहनेवाले भरतने यों कहा—॥ ६ ॥
सुखा नः शर्वरी धीमन् पूजिताश्चापि ते वयम् । गङ्गां तु नौभिर्बह्वीभिर्दाशाः संतारयन्तु नः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘बुद्धिमान् निषादराज ! हम सब लोगोंकी रात बड़े सुखसे बीती है । तुमने हमारा बड़ा सत्कार किया । अब ऐसी व्यवस्था करो, जिससे तुम्हारे मल्लाह बहुत-सी नौकाओं-द्वारा हमें गङ्गाके पार उतार दें’ ॥ ७ ॥
ततो गुहः संत्वरितः श्रुत्वा भरतशासनम् । प्रतिप्रविश्य नगरं तं ज्ञातिजनमब्रवीत् ॥ ८ ॥
भावार्थ
भरतका यह आदेश सुनकर गुह तुरंत अपने नगरमें गया और भाई-बन्धुओंसे बोला—॥ ८ ॥
उत्तिष्ठत प्रबुध्यध्वं भद्रमस्तु हि वः सदा । नावः समुपकर्षध्वं तारयिष्यामि वाहिनीम् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘उठो, जागो, सदा तुम्हारा कल्याण हो । नौकाओंको खींचकर घाटपर ले आओ । भरतकी सेनाको गङ्गाजीके पार उतारूँगा’ ॥ ९ ॥
ते तथोक्ताः समुत्थाय त्वरिता राजशासनात् । पञ्च नावां शतान्येव समानिन्युः समन्ततः ॥ १० ॥
भावार्थ
गुहके इस प्रकार कहनेपर अपने राजाकी आज्ञासे सभी मल्लाह शीघ्र ही उठ खड़े हुए और चारों ओरसे पाँच सौ नौकाएँ एकत्र कर लाये ॥ १० ॥
अन्याः स्वस्तिकविज्ञेया महाघण्टाधरावराः । शोभमानाः पताकिन्यो युक्तवाहाः सुसंहताः ॥ ११ ॥
भावार्थ
इन सबके अतिरिक्त कुछ स्वस्तिक नामसे प्रसिद्ध नौकाएँ थीं, जो स्वस्तिकके चिह्नोंसे अलंकृत होनेके कारण उन्हीं चिह्नोंसे पहचानी जाती थीं । उनपर ऐसी पताकाएँ फहरा रही थीं, जिनमें बड़ी-बड़ी घण्टियाँ लटक रही थीं । स्वर्ण आदिके बने हुए चित्रोंसे उन नौकाओंकी विशेष शोभा हो रही थी । उनमें नौका खेनेके लिये बहुत-से डाँड़ लगे हुए थे तथा चतुर नाविक उन्हें चलानेके लिये तैयार बैठे थे । वे सभी नौकाएँ बड़ी मजबूत बनी थीं ॥ ११ ॥
ततः स्वस्तिकविज्ञेयां पाण्डुकम्बलसंवृताम् । सनन्दिघोषां कल्याणीं गुहो नावमुपाहरत् ॥ १२ ॥
भावार्थ
उन्हींमेंसे एक कल्याणमयी नाव गुह स्वयं लेकर आया, जिसमें श्वेत कालीन बिछे हुए थे तथा उस स्वस्तिक नामवाली नावपर माङ्गलिक शब्द हो रहा था ॥ १२ ॥
तामारुरोह भरतः शत्रुघ्नश्च महाबलः । कौसल्या च सुमित्रा च याश्चान्या राजयोषितः ॥ १३ ॥ पुरोहितश्च तत् पूर्वं गुरवो ब्राह्मणाश्च ये । अनन्तरं राजदारास्तथैव शकटापणाः ॥ १४ ॥
भावार्थ
उसपर सबसे पहले पुरोहित, गुरु और ब्राह्मण बैठे । तत्पश्चात् उसपर भरत, महाबली शत्रुघ्न, कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी तथा राजा दशरथकी जो अन्य रानियाँ थीं, वे सब सवार हुईं । तदनन्तर राजपरिवारकी दूसरी स्त्रियाँ बैठीं । गाड़ियाँ तथा क्रय-विक्रयकी सामग्रियाँ दूसरी-दूसरी नावोंपर लादी गयीं ॥ १३-१४ ॥
आवासमादीपयतां तीर्थं चाप्यवगाहताम् । भाण्डानि चाददानानां घोषस्तु दिवमस्पृशत् ॥ १५ ॥
भावार्थ
कुछ सैनिक बड़ी-बड़ी मशालें जलाकर* अपने खेमोंमें छूटी हुई वस्तुओंको सम्हालने लगे । कुछ लोग शीघ्रतापूर्वक घाटपर उतरने लगे तथा बहुत-से सैनिक अपने-अपने सामानको ‘यह मेरा है, यह मेरा है’ इस तरह पहचानकर उठाने लगे । उस समय जो महान् कोलाहल मचा, वह आकाशमें गूँज उठा ॥ १५ ॥
पताकिन्यस्तु ता नावः स्वयं दाशैरधिष्ठिताः । वहन्त्यो जनमारूढं तदा सम्पेतुराशुगाः ॥ १६ ॥
भावार्थ
उन सभी नावोंपर पताकाएँ फहरा रही थीं । सबके ऊपर खेनेवाले कई मल्लाह बैठे थे । वे सब नौकाएँ उस समय चढ़े हुए मनुष्योंको तीव्रगतिसे पार ले जाने लगीं ॥ १६ ॥
नारीणामभिपूर्णास्तु काश्चित् काश्चित्तु वाजिनाम् । काश्चित् तत्र वहन्ति स्म यानयुग्यं महाधनम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
कितनी ही नौकाएँ केवल स्त्रियोंसे भरी थीं, कुछ नावोंपर घोड़े थे तथा कुछ नौकाएँ गाड़ियों, उनमें जोते जानेवाले घोड़े, खच्चर, बैल आदि वाहनों तथा बहुमूल्य रत्न आदिको ढो रही थीं ॥ १७ ॥
तास्तु गत्वा परं तीरमवरोप्य च तं जनम् । निवृत्ता काण्डचित्राणि क्रियन्ते दाशबन्धुभिः ॥ १८ ॥
भावार्थ
वे दूसरे तटपर पहुँचकर वहाँ लोगोंको उतारकर जब लौटीं, उस समय मल्लाहबन्धु जलमें उनकी विचित्र गतियों-का प्रदर्शन करने लगे ॥ १८ ॥
सवैजयन्तास्तु गजा गजारोहैः प्रचोदिताः । तरन्तः स्म प्रकाशन्ते सपक्षा इव पर्वताः ॥ १९ ॥
भावार्थ
वैजयन्ती पताकाओंसे सुशोभित होनेवाले हाथी महावतों-से प्रेरित होकर स्वयं ही नदी पार करने लगे । उस समय वे पंखधारी पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे ॥ १९ ॥
नावश्चारुरुहुस्त्वन्ये प्लवैस्तेरुस्तथापरे । अन्ये कुम्भघटैस्तेरुरन्ये तेरुश्च बाहुभिः ॥ २० ॥
भावार्थ
कितने ही मनुष्य नावोंपर बैठे थे और कितने ही बाँस तथा तिनकोंसे बने हुए बेड़ोंपर सवार थे । कुछ लोग बड़े-बड़े कलशों, कुछ छोटे घड़ों और कुछ अपनी बाहुओंसे ही तैरकर पार हो रहे थे ॥ २० ॥
सा पुण्या ध्वजिनी गङ्गां दाशैः संतारिता स्वयम् । मैत्रे मुहूर्ते प्रययौ प्रयागवनमुत्तमम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
इस प्रकार मल्लाहोंकी सहायतासे वह सारी पवित्र सेना गङ्गाके पार उतारी गयी । फिर वह स्वयं मैत्रे नामक मुहूर्तमें उत्तम प्रयागवनकी ओर प्रस्थित हो गयी ॥ २१ ॥
आश्वासयित्वा च चमूं महात्मा निवेशयित्वा च यथोपजोषम् । द्रष्टुं भरद्वाजमृषिप्रवर्य- मृत्विक्सदस्यैर्भरतः प्रतस्थे ॥ २२ ॥
भावार्थ
वहाँ पहुँचकर महात्मा भरत सेनाको सुखपूर्वक विश्रामकी आज्ञा दे उसे प्रयागवनमें ठहराकर स्वयं ऋत्विजों तथा राजसभाके सदस्योंके साथ ऋषिश्रेष्ठ भरद्वाजका दर्शन करनेके लिये गये ॥ २२ ॥
स ब्राह्मणस्याश्रममभ्युपेत्य महात्मनो देवपुरोहितस्य । ददर्श रम्योटजवृक्षषण्डं महद्वनं विप्रवरस्य रम्यम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
देवपुरोहित महात्मा ब्राह्मण भरद्वाज मुनिके आश्रमपर पहुँचकर भरतने उन विप्रशिरोमणिके रमणीय एवं विशाल वनको देखा, जो मनोहर पर्णशालाओं तथा वृक्षावलियोंसे सुशोभित था ॥ २३ ॥
गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें