अयोध्याकाण्ड, सर्ग 88
तच्छ्रुत्वा निपुणं सर्वं भरतः सह मन्त्रिभिः। इङ्गुदीमूलमागम्य रामशय्यामवैक्षत ॥ १ ॥
भावार्थ
निषादराजकी सारी बातें ध्यानसे सुनकर मन्त्रियोंसहित भरतने इङ्गुदी वृक्षकी जड़के पास आकर श्रीरामचन्द्रजीकी शय्याका निरीक्षण किया ॥ १ ॥
अब्रवीज्जननीः सर्वा इह तस्य महात्मनः। शर्वरी शयिता भूमाविदमस्य विमर्दितम् ॥ २ ॥
भावार्थ
फिर उन्होंने समस्त माताओंसे कहा—‘यहीं महात्मा श्रीरामने भूमिपर शयन करके रात्रि व्यतीत की थी। यही वह कुशसमूह है, जो उनके अङ्गोंसे विमर्दित हुआ था ॥२॥
महाराजकुलीनेन महाभागेन धीमता। जातो दशरथेनोर्व्यां न रामः स्वप्तुमर्हति ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘महाराजोंके कुलमें उत्पन्न हुए परम बुद्धिमान् महाभाग राजा दशरथने जिन्हें जन्म दिया है, वे श्रीराम इस तरह भूमिपर शयन करनेके योग्य नहीं हैं ॥ ३ ॥
अजिनोत्तरसंस्तीर्णे वरास्तरणसंचये। शयित्वा पुरुषव्याघ्रः कथं शेते महीतले ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘जो पुरुषसिंह श्रीराम मुलायम मृगचर्मकी विशेष चादरसे ढके हुए तथा अच्छे-अच्छे बिछौनोंके समूहसे सजे हुए पलंगपर सदा सोते आये हैं, वे इस समय पृथ्वीपर कैसे शयन करते होंगे ? ॥ ४ ॥
प्रासादाग्रविमानेषु वलभीषु च सर्वदा। हैमराजतभौमेषु वरास्तरणशालिषु ॥ ५ ॥ पुष्पसंचयचित्रेषु चन्दनागुरुगन्धिषु । पाण्डुराभ्रप्रकाशेषु शुकसंघरुतेषु च ॥ ६ ॥ प्रासादवरवर्येषु शीतवत्सु सुगन्धिषु । उषित्वा मेरुकल्पेषु कृतकाञ्चनभित्तिषु ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘जो सदा विमानाकार प्रासादोंके श्रेष्ठ भवनों और अट्टालि-काओंमें सोते आये हैं तथा जिनकी फर्श सोने और चाँदीकी बनी हुई है, जो अच्छे बिछौनोंसे सुशोभित हैं, पुष्पराशिसे विभूषित होनेके कारण जिनकी विचित्र शोभा होती है, जिनमें चन्दन और अगुरुकी सुगन्ध फैली रहती है, जो श्वेत बादलोंके समान उज्ज्वल कान्ति धारण करते हैं, जिनमें शुकसमूहों-का कलरव होता रहता है, जो शीतल है एवं कपूर आदिकी सुगन्धसे व्याप्त होते हैं, जिनकी दीवारोंपर सुवर्णका काम किया गया है तथा जो ऊँचाईमें मेरु पर्वतके समान जान पड़ते हैं, ऐसे सर्वोत्तम राजमहलोंमें जो निवास कर चुके हैं, वे श्रीराम वनमें पृथ्वीपर कैसे सोते होंगे ? ॥ ५—७ ॥
गीतवादित्रनिर्घोषैर्वराभरणनिःस्वनैः । मृदङ्गवरशब्दैश्च सततं प्रतिबोधितः ॥ ८ ॥ बन्दिभिर्वन्दितः काले बहुभिः सूतमागधैः । गाथाभिरनुरूपाभिः स्तुतिभिश्च परंतपः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘जो गीतों और वाद्योंकी ध्वनियोंसे, श्रेष्ठ आभूषणोंकी झनकारोंसे तथा मृदङ्गोंके उत्तम शब्दोंसे सदा जगाये जाते थे, बहुत-से वन्दीगण समय-समयपर जिनकी वन्दना करते थे, सूत और मागध अनुरूप गाथाओं और स्तुतियोंसे जिनको जगाते थे, वे शत्रुसंतापी श्रीराम अब भूमिपर कैसे शयन करते होंगे ? ॥ ८-९ ॥
अश्रद्धेयमिदं लोके न सत्यं प्रतिभाति मा । मुह्यते खलु मे भावः स्वप्नोऽयमिति मे मतिः ॥ १० ॥
भावार्थ
‘यह बात जगत्में विश्वासके योग्य नहीं है । मुझे यह सत्य नहीं प्रतीत होती । मेरा अन्तःकरण अवश्य ही मोहित हो रहा है । मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि यह कोई स्वप्न है ॥१०॥
न नूनं दैवतं किंचित् कालेन बलवत्तरम् । यत्र दाशरथी रामो भूमावेवमशेत सः ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘निश्चय ही कालके समान प्रबल कोई दूसरा देवता नहीं है, जिसके प्रभावसे दशरथनन्दन श्रीरामको भी इस प्रकार भूमिपर सोना पड़ा ॥ ११ ॥
यस्मिन् विदेहराजस्य सुता च प्रियदर्शना । दयिता शयिता भूमौ स्नुषा दशरथस्य च ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘उस कालके ही प्रभावसे विदेहराजकी परम सुन्दरी पुत्री और महाराज दशरथकी प्यारी पुत्रवधू सीता भी पृथ्वीपर शयन करती हैं ॥ १२ ॥
इयं शय्या मम भ्रातुरिदमावर्तितं शुभम् । स्थण्डिले कठिने सर्वं गात्रैर्विमृदितं तृणम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘यही मेरे बड़े भाईकी शय्या है । यहीं उन्होंने करवटें बदली थीं । इस कठोर वेदीपर उनका शुभ शयन हुआ था, जहाँ उनके अङ्गोंसे कुचला गया सारा तृण अभीतक पड़ा है ॥ १३ ॥
मन्ये साभरणा सुप्ता सीताऽस्मिञ्शयने शुभा । तत्र तत्र हि दृश्यन्ते सक्ताः कनकबिन्दवः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘जान पड़ता है, शुभलक्षणा सीता शय्यापर आभूषण पहने ही सोयी थीं; क्योंकि यहाँ यत्र-तत्र सुवर्णके कण सटे दिखायी देते हैं ॥ १४ ॥
उत्तरीयमिहासक्तं सुव्यक्तं सीतया तदा । तथा ह्येते प्रकाशन्ते सक्ताः कौशेयतन्तवः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘यहाँ उस समय सीताकी चादर उलझ गयी थी, यह साफ दिखायी दे रहा है; क्योंकि यहाँ सटे हुए ये रेशमके तागे चमक रहे हैं ॥ १५ ॥
मन्ये भर्तुः सुखा शय्या येन बाला तपस्विनी । सुकुमारी सती दुःखं न विजानाति मैथिली ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘मैं समझता हूँ कि पतिकी शय्या कोमल हो या कठोर, साध्वी स्त्रियोंके लिये वही सुखदायिनी होती है, तभी तो वह तपस्विनी एवं सुकुमारी बाला सती-साध्वी मिथिलेशकुमारी सीता यहाँ दुःखका अनुभव नहीं कर रही हैं ॥ १६ ॥
हा हतोऽस्मि नृशंसोऽस्मि यत् सभार्यः कृते मम । ईदृशीं राघवः शय्यामधिशेते ह्यनाथवत् ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘हाय ! मैं मर गया—मेरा जीवन व्यर्थ है । मैं बड़ा क्रूर हूँ, जिसके कारण सीतासहित श्रीरामको अनाथकी भाँति ऐसी शय्यापर सोना पड़ता है ॥ १७ ॥
सार्वभौमकुले जातः सर्वलोकसुखावहः । सर्वप्रियकरस्त्यक्त्वा राज्यं प्रियमनुत्तमम् ॥ १८ ॥ कथमिन्दीवरश्यामो रक्ताक्षः प्रियदर्शनः । सुखभागी न दुःखार्हः शयितो भुवि राघवः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘जो चक्रवर्त्ती सम्राट्के कुलमें उत्पन्न हुए हैं, समस्त लोकोंको सुख देनेवाले हैं तथा सबका प्रिय करनेमें तत्पर रहते हैं, जिनका शरीर नीले कमलके समान श्याम, आँखें लाल और दर्शन सबको प्रिय लगनेवाला है तथा जो सुख भोगनेके ही योग्य हैं, दुःख भोगनेके कदापि योग्य नहीं हैं, वे ही श्रीरघुनाथजी परम उत्तम प्रिय राज्यका परित्याग करके इस समय पृथ्वीपर शयन करते हैं ॥ १८-१९ ॥
धन्यः खलु महाभागो लक्ष्मणः शुभलक्षणः । भ्रातरं विषमे काले यो राममनुवर्तते ॥ २० ॥
भावार्थ
‘उत्तम लक्षणोंवाले लक्ष्मण ही धन्य एवं बड़भागी हैं, जो संकटके समय बड़े भाई श्रीरामके साथ रहकर उनकी सेवा करते हैं ॥ २० ॥
सिद्धार्था खल्वु वैदेही पतिं यानुगता वनम् । वयं संशयिताः सर्वे हीनास्तेन महात्मना ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘निश्चय ही विदेहनन्दिनी सीता भी कृतार्थ हो गयीं, जिन्होंने पतिके साथ वनका अनुसरण किया है । हम सब लोग उन महात्मा श्रीरामसे बिछुड़कर संशयमें पड़ गये हैं ( हमें यह संदेह होने लगा है कि श्रीराम हमारी सेवा स्वीकार करेंगे या नहीं ) ॥ २१ ॥
अकर्णधारा पृथिवी शून्येव प्रतिभाति मे । गते दशरथे स्वर्गं रामे चारण्यमाश्रिते ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘महाराज दशरथ स्वर्गलोकको गये और श्रीराम वनवासी हो गये, ऐसी दशामें यह पृथ्वी बिना नाविककी नौकाके समान मुझे सूनी-सी प्रतीत हो रही है ॥ २२ ॥
न च प्रार्थयते कश्चिन्मनसापि वसुंधराम् । वने निवसतस्तस्य बाहुवीर्याभिरक्षिताम् ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘वनमें निवास करनेपर भी उन्हीं श्रीरामके बाहुबलसे सुरक्षित हुई इस वसुन्धराको कोई शत्रु मनसे भी नहीं लेना चाहता है ॥ २३ ॥
शून्यसंवरणारक्षामयन्त्रितहयद्विपाम् । अनावृतपुरद्वारां राजधानीमरक्षिताम् ॥ २४ ॥ अप्रहृष्टबलां शून्यां विषमस्थामनावृताम् । शत्रवो नाभिमन्यन्ते भक्ष्यान् विषकृतानिव ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘इस समय अयोध्याकी चहारदीवारीकी सब ओरसे रक्षाका कोई प्रबन्ध नहीं है, हाथी और घोड़े बँधे नहीं रहते हैं— खुले विचरते हैं, नगरद्वारका फाटक खुला ही रहता है, सारी राजधानी अरक्षित है, सेनामें हर्ष और उत्साहका अभाव है, समस्त नगरी रक्षकोंसे सूनी-सी जान पड़ती है, सङ्कटमें पड़ी हुई है, रक्षकोंके अभावसे आवरणरहित हो गयी है, तो भी शत्रु विषमिश्रित भोजनकी भाँति इसे ग्रहण करनेकी इच्छा नहीं करते हैं । श्रीरामके बाहुबलसे ही इसकी रक्षा हो रही है ॥ २४-२५ ॥
अद्यप्रभृति भूमौ तु शयिष्येऽहं तृणेषु वा । फलमूलाशनो नित्यं जटाचीराणि धारयन् ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘आजसे मैं भी पृथ्वीपर अथवा तिनकोंपर ही सोऊँगा, फल-मूलका ही भोजन करूँगा और सदा वल्कल वस्त्र तथा जटा धारण किये रहूँगा ॥ २६ ॥
तस्याहमुत्तरं कालं निवत्स्यामि सुखं वने । तत् प्रतिश्रुतमार्यस्य नैव मिथ्या भविष्यति ॥ २७ ॥
भावार्थ
‘वनवासके जितने दिन बाकी हैं, उतने दिनोंतक मैं ही वहाँ सुखपूर्वक निवास करूँगा, ऐसा होनेसे आर्य श्रीरामकी की हुई प्रतिज्ञा झूठी नहीं होगी ॥ २७ ॥
वसन्तं भ्रातुरर्थाय शत्रुघ्नो मानुवत्स्यति । लक्ष्मणेन सहायोध्यामार्यों मे पालयिष्यति ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘भाईके लिये वनमें निवास करते समय शत्रुघ्न मेरे साथ रहेंगे और मेरे बड़े भाई श्रीराम लक्ष्मणको साथ लेकर अयोध्याका पालन करेंगे ॥ २८ ॥
अभिषेक्ष्यन्ति काकुत्स्थमयोध्यायां द्विजातयः । अपि मे देवताः कुर्युरिमं सत्यं मनोरथम् ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘अयोध्यामें ब्राह्मणलोग ककुत्स्थकुलभूषण श्रीरामका अभिषेक करेंगे। क्या देवता मेरे इस मनोरथको सत्य (सफल) करेंगे ? ॥ २९ ॥
प्रसाद्यमानः शिरसा मया स्वयं बहुप्रकारं यदि न प्रपत्स्यते । ततोऽनुवत्स्यामि चिराय राघवं वनेचरं नार्हति मामुपेक्षितुम् ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘मैं उनके चरणोंपर मस्तक रखकर उन्हें मनानेकी चेष्टा करूँगा । यदि मेरे बहुत कहनेपर भी वे लौटनेको राजी न होंगे तो उन वनवासी श्रीरामके साथ मैं भी दीर्घकालतक वहीं निवास करूँगा। वे मेरी उपेक्षा नहीं करेंगे’ ॥ ३० ॥
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