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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 85

पवमुक्तस्तु भरतो निषादाधिपतिं गुहम् । प्रत्युवाच महाप्राज्ञो वाक्यं हेत्वर्थसंहितम् ॥ १ ॥

भावार्थ

निषादराज गुहके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान् भरतने युक्ति और प्रयोजनयुक्त वचनोंमें उसे इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १ ॥

ऊर्जितः खलु ते कामः कृतो मम गुरोः सखे । यो मे त्वमीदृशीं सेनामभ्यर्चयितुमिच्छसि ॥ २ ॥

भावार्थ

‘भैया! तुम मेरे बड़े भाई श्रीरामके सखा हो। मेरी इतनी बड़ी सेनाका सत्कार करना चाहते हो, यह तुम्हारा मनोरथ बहुत ही ऊँचा है। तुम उसे पूर्ण ही समझो--तुम्हारी श्रद्धासे ही हम सब लोगोंका सत्कार हो गया’ ॥ २ ॥

इत्युक्त्वा स महातेजा गुहं वचनमुत्तमम् । अब्रवीद् भरतः श्रीमान् पन्थानं दर्शयन् पुनः ॥ ३ ॥

भावार्थ

यह कहकर महातेजस्वी श्रीमान् भरतने गन्तव्य मार्गको हाथके संकेतसे दिखाते हुए पुनः गुहसे उत्तम वाणीमें पूछा—॥ ३ ॥

कतरेण गमिष्यामि भरद्वाजाश्रमं यथा । गहनोऽयं भृशं देशो गङ्गानूपो दुरत्ययः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘निषादराज! इन दो मार्गोंमेंसे किसके द्वारा मुझे भरद्वाज मुनिके आश्रमपर जाना होगा? गङ्गाके किनारेका यह प्रदेश तो बड़ा गहन मालूम होता है। इसे लाँघकर आगे बढ़ना कठिन है’ ॥ ४ ॥

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राजपुत्रस्य धीमतः । अब्रवीत् प्राञ्जलिर्भूत्वा गुहो गहनगोचरः ॥ ५ ॥

भावार्थ

बुद्धिमान् राजकुमार भरतका यह वचन सुनकर वनमें विचरनेवाले गुहने हाथ जोड़कर कहा—॥ ५ ॥

दाशास्त्वनुगमिष्यन्ति देशज्ञाः सुसमाहिताः । अहं चानुगमिष्यामि राजपुत्र महाबल ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘महाबली राजकुमार! आपके साथ बहुत-से मल्लाह जायँगे, जो इस प्रदेशसे पूर्ण परिचित तथा भलीभाँति सावधान रहनेवाले हैं। इनके सिवा मैं भी आपके साथ चलूँगा ॥ ६ ॥

कच्चिन्न दुष्टो व्रजसि रामस्याक्लिष्टकर्मणः । इयं ते महती सेना शङ्कां जनयतीव मे ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘परंतु एक बात बताइये, अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके प्रति आप कोई दुर्भावना लेकर तो नहीं जा रहे हैं? आपकी यह विशाल सेना मेरे मनमें शङ्का-सी उत्पन्न कर रही है’ ॥ ७ ॥

तमेवमभिभाषन्तमाकाश इव निर्मलः । भरतः श्लक्ष्णया वाचा गुहं वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥

भावार्थ

ऐसी बात कहते हुए गुहसे आकाशके समान निर्मल भरतने मधुर वाणीमें कहा—॥ ८ ॥

मा भूत् स कालो यत् कष्टं न मां शङ्कितुमर्हसि । राघवः स हि मे भ्राता ज्येष्ठः पितृसमो मतः ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘निषादराज ! ऐसा समय कभी न आये । तुम्हारी बात सुनकर मुझे बड़ा कष्ट हुआ । तुम्हें मुझपर संदेह नहीं करना चाहिये । श्रीरघुनाथजी मेरे बड़े भाई हैं । मैं उन्हें पिताके समान मानता हूँ ॥ ९ ॥

तं निवर्तयितुं यामि काकुत्स्थं वनवासिनम् । बुद्धिरन्या न मे कार्या गुह सत्यं ब्रवीमि ते ॥ १० ॥

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम वनमें निवास करते हैं, अतः उन्हें लौटा लानेके लिये जा रहा हूँ । गुह ! मैं तुमसे सच कहता हूँ । तुम्हें मेरे विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’ ॥ १० ॥

स तु संहृष्टवदनः श्रुत्वा भरतभाषितम् । पुनरेवाब्रवीद् वाक्यं भरतं प्रति हर्षितः ॥ ११ ॥

भावार्थ

भरतकी बात सुनकर निषादराजका मुँह प्रसन्नतासे खिल उठा । वह हर्षसे भरकर पुनः भरतसे बोला—॥ ११ ॥

धन्यस्त्वं न त्वया तुल्यं पश्यामि जगतीतले । अयत्नादागतं राज्यं यस्त्वं त्यक्तुमिहेच्छसि ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘आप धन्य हैं, जो बिना प्रयत्नके हाथमें आये हुए राज्यको त्याग देना चाहते हैं। आपके समान धर्मात्मा मुझे इस भूमण्डलमें कोई नहीं दिखायी देता ॥ १२ ॥

शाश्वती खलु ते कीर्तिर्लोकाननु चरिष्यति । यस्त्वं कृच्छ्रगतं रामं प्रत्यानयितुमिच्छसि ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘कष्टप्रद वनमें निवास करनेवाले श्रीरामको जो आप लौटा लाना चाहते हैं, इसमे समस्त लोकोंमें आपकी अक्षय कीर्तिका प्रसार होगा’ ॥ १३ ॥

एवं सम्भाषमाणस्य गुहस्य भरतं तदा । बभौ नष्टप्रभः सूर्यो रजनी चाभ्यवर्तत ॥ १४ ॥

भावार्थ

जब गुह भरतसे इस प्रकारकी बातें कह रहा था, उसी समय सूर्यदेवकी प्रभा अदृश्य हो गयी और रातका अन्धकार सब ओर फैल गया ॥ १४ ॥

संनिवेश्य स तां सेनां गुहेन परितोषितः । शत्रुघ्नेन समं श्रीमाञ्छयनं पुनरागमत् ॥ १५ ॥

भावार्थ

गुहके वर्तावसे श्रीमान् भरतको बड़ा संतोष हुआ और वे सेनाको विश्राम करनेकी आज्ञा दे शत्रुघ्नके साथ शयन करनेके लिये गये ॥ १५ ॥

रामचिन्तामयः शोको भरतस्य महात्मनः । उपस्थितो ह्यनर्हस्य धर्मप्रेक्षस्य तादृशः ॥ १६ ॥

भावार्थ

धर्मपर दृष्टि रखनेवाले महात्मा भरत शोकके योग्य नहीं थे तथापि उनके मनमें श्रीरामचन्द्रजीके लिये चिन्ताके कारण ऐसा शोक उत्पन्न हुआ, जिसका वर्णन नहीं हो सकता ॥ १६ ॥

अन्तर्दाहेन दहनः संतापयति राघवम् । वनदाहाग्निसंतप्तं गूढोऽग्निरिव पादपम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

जैसे वनमें फैले हुए दावानलसे संतप्त हुए वृक्षको उसके खोखलेमें छिपी हुई आग और भी अधिक जलाती है, उसी प्रकार दशरथ-मरणजन्य चिन्ताकी आगसे संतप्त हुए रघुकुलनन्दन भरतको वह राम-वियोगसे उत्पन्न हुई शोकाग्नि और भी जलाने लगी ॥ १७ ॥

प्रस्रुतः सर्वगात्रेभ्यः स्वेदः शोकाग्निसम्भवम् । यथा सूर्यांशुसंतप्तो हिमवान् प्रसृतो हिमम् ॥ १८ ॥

भावार्थ

जैसे सूर्यकी किरणोंसे तपा हुआ हिमालय अपनी पिघली हुई बर्फको बहाने लगता है, उसी प्रकार भरत शोकाग्निसे संतप्त होनेके कारण अपने सम्पूर्ण अङ्गोंसे पसीना बहाने लगे ॥ १८ ॥

ध्याननिर्दरशैलेन विनिःश्वसितधातुना । दैन्यपादपसंघेन शोकायासाधिशृङ्गिणा ॥ १९ ॥ प्रमोहानन्तसत्त्वेन संतापौषधिवेणुना । आक्रान्तो दुःखशैलेन महता कैकयीसुतः ॥ २० ॥

भावार्थ

उस समय कैकेयीकुमार भरत दुःखके विशाल पर्वतसे आक्रान्त हो गये थे । श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान ही उसमें छिद्ररहित शिलाओंका समूह था । दुःखपूर्ण उच्छ्वास ही गैरिक आदि धातुका स्थान ले रहा था । दीनता ( इन्द्रियोंकी अपने विषयोंसे विमुखता ) ही वृक्षसमूहोंके रूपमें प्रतीत होती थी । शोकजनित आयास ही उस दुःखरूपी पर्वतके ऊँचे शिखर थे । अतिशय मोह ही उसमें अनन्त प्राणी थे । बाहर-भीतरकी इन्द्रियोंमें होनेवाले संताप ही उस पर्वतकी ओषधियाँ तथा बाँसके वृक्ष थे ॥ १९-२० ॥

विनिःश्वसन् वै भृशदुर्मनास्ततः प्रमूढसंज्ञः परमापदं गतः । शमं न लेभे हृदयज्वरार्दितो नरर्षभो यूथहतो यथर्षभः ॥ २१ ॥

भावार्थ

उनका मन बहुत दुखी था । वे लंबी साँस खींचते हुए सहसा अपनी सुध-बुध खोकर बड़ी भारी आपत्तिमें पड़ गये । मानसिक चिन्तासे पीड़ित होनेके कारण नरश्रेष्ठ भरतको शान्ति नहीं मिलती थी । उनकी दशा अपने झुंडसे बिछुड़े हुए वृषभकी-सी हो रही थी ॥ २१ ॥

गुहेन सार्धं भरतः समागतो महानुभावः सजनः समाहितः । सुदुर्मनास्तं भरतं तदा पुन- र्गुहः समाश्वासयदग्रजं प्रति ॥ २२ ॥

भावार्थ

परिवारसहित एकाग्रचित्त महानुभाव भरत जब गुहसे मिले, उस समय उनके मनमें बड़ा दुःख था। वे अपने बड़े भाईके लिये चिन्तित थे, अतः गुहने उन्हें पुनः आश्वासन दिया ॥ २२ ॥

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