अयोध्याकाण्ड, सर्ग 86
आचचक्षेऽथ सद्भावं लक्ष्मणस्य महात्मनः। भरतायाप्रमेयाय गुहो गहनगोचरः ॥ १ ॥
भावार्थ
वनचारी गुहने अप्रमेय शक्तिशाली भरतसे महात्मा लक्ष्मणके सद्भावका इस प्रकार वर्णन किया—॥ १ ॥
तं जाग्रतं गुणैर्युक्तं वरचापेषुधारिणम्। भ्रातृगुप्त्यर्थमत्यन्तमहं लक्ष्मणमब्रुवम् ॥ २ ॥
भावार्थ
‘‘लक्ष्मण अपने भाईकी रक्षाके लिये श्रेष्ठ धनुष और बाण धारण किये अधिक कालतक जागते रहे। उस समय उन सद्गुणशाली लक्ष्मणसे मैंने इस प्रकार कहा—॥ २ ॥
इयं तात सुखा शय्या त्वदर्थमुपकल्पिता। प्रत्याश्वसिहि शेष्वास्यां सुखं राघवनन्दन ॥ ३ ॥ उचितोऽयं जनः सर्वो दुःखानां त्वं सुखोचितः। धर्मात्मंस्तस्य गुप्त्यर्थं जागरिष्यामहे वयम् ॥ ४ ॥ नहि रामात् प्रियतरो мमास्ति भुवि कश्चन। मोत्सुको भूर्ब्रवीम्येतदथ सत्यं तवाग्रतः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘‘तात रघुकुलनन्दन! मैंने तुम्हारे लिये यह सुखदायिनी शय्या तैयार की है। तुम इसपर सुखपूर्वक सोओ और भलीभाँति विश्राम करो। यह (मैं) सेवक तथा इसके साथके सब लोग वनवासी होनेके कारण दुःख सहन करनेके योग्य हैं (क्योंकि हम सबको कष्ट सहनेका अभ्यास है); परंतु तुम सुखमें ही पले होनेके कारण उसीके योग्य हो। धर्मात्मन्! हमलोग श्रीरामचन्द्रजीकी रक्षाके लिये रातभर जागते रहेंगे ॥ “मैं तुम्हारे सामने सत्य कहता हूँ कि इस भूमण्डलमें मुझे श्रीरामसे बढ़कर प्रिय दूसरा कोई नहीं है; अतः तुम इनकी रक्षाके लिये उत्सुक न होओ ॥ ५ ॥
अस्य प्रसादादाशंसे लोकेऽस्मिन् सुमहद् यशः। धर्मावाप्तिं च विपुलामर्थकामौ च केवलौ ॥ ६ ॥
भावार्थ
“इन श्रीरघुनाथजीके प्रसादसे ही मैं इस लोकमें महान् यश, प्रचुर धर्मलाभ तथा विशुद्ध अर्थ एवं भोग्य-वस्तु पानेकी आशा करता हूँ ॥ ६ ॥
सोऽहं प्रियसखं रामं शयानं सह सीतया। रक्षिष्यामि धनुष्पाणिः सर्वैः स्वैर्ज्ञातिभिः सह ॥ ७ ॥
भावार्थ
“अतः मैं अपने समस्त बन्धु-बान्धवोंके साथ हाथमें धनुष लेकर सीताके साथ सोये प्रिय सखा श्रीरामकी (सब प्रकारसे) रक्षा करूँगा ॥ ७ ॥
नहि मेऽविदितं किंचिद् वनेऽस्मिंश्चरतः सदा। चतुरङ्गं ह्यपि बलं प्रसहेम वयं युधि ॥ ८ ॥ एवमस्माभिरुक्तेन लक्ष्मणेन महात्मना। अनुनीता वयं सर्वे धर्ममेवानुपश्यता ॥ ९ ॥
भावार्थ
“इस वनमें सदा विचरते रहनेके कारण मुझसे यहाँकी कोई बात छिपी नहीं है। हमलोग यहाँ युद्धमें शत्रुकी चतुरङ्गिणी सेनाका भी अच्छी तरह सामना कर सकते हैं’ ॥ “हमारे इस प्रकार कहनेपर धर्मपर ही दृष्टि रखनेवाले महात्मा लक्ष्मणने हम सब लोगोंसे अनुनयपूर्वक कहा—॥९॥
कथं दाशरथौ भूमौ शयाने सह सीतया। शक्या निद्रा मया लब्धुं जीवितानि सुखानि वा ॥ १० ॥ यो न देवासुरैः सर्वैः शक्यः प्रसहितुं युधि। तं पश्य गुह संविष्टं तृणेषु सह सीतया ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘‘निषादराज! जब दशरथनन्दन श्रीराम देवी सीताके साथ भूमिपर शयन कर रहे हैं, तब मेरे लिये उत्तम शय्यापर सोकर नींद लेना, जीवन-धारणके लिये स्वादिष्ट अन्न खाना अथवा दूसरे-दूसरे सुखोंको भोगना कैसे सम्भव हो सकता है?॥ ‘‘गुह! देखो, सम्पूर्ण देवता और असुर मिलकर भी युद्धमें जिनके वेगको नहीं सह सकते, वे ही श्रीराम इस समय सीताके साथ तिनकोंपर सो रहे हैं ॥ ११ ॥
महता तपसा लब्धो विविधैश्च परिश्रमैः। एको दशरथस्यैष पुत्रः सदृशलक्षणः ॥ १२ ॥ अस्मिन् प्रव्राजिते राजा न चिरं वर्तयिष्यति। विधवा मेदिनी नूनं क्षिप्रमेव भविष्यति ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘‘महान् तप और नाना प्रकारके परिश्रमसाध्य उपायों-द्वारा जो यह महाराज दशरथको अपने समान उत्तम लक्षणोंसे युक्त ज्येष्ठ पुत्रके रूपमें प्राप्त हुए हैं, उन्हीं इन श्रीरामके वनमें आ जानेसे राजा दशरथ अधिक कालतक जीवित नहीं रह सकेंगे। जान पड़ता है निश्चय ही यह पृथ्वी अब शीघ्र विधवा हो जायगी ॥ १२-१३ ॥
विनद्य सुमहानादं श्रमेणोपरताः स्त्रियः। निर्घोषो विरतो नूनमद्य राजनिवेशने ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘अवश्य ही अब रनवासकी स्त्रियाँ बड़े जोरसे आर्तनाद करके अधिक श्रमके कारण अब चुप हो गयी होंगी और राजमहलका वह हाहाकार इस समय शान्त हो गया होगा॥१४॥
कौसल्या चैव राजा च तथैव जननी मम । नाशंसे यदि ते सर्वे जीवेयुः शर्वरीमिमाम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘‘महारानी कौसल्या, राजा दशरथ तथा मेरी माता सुमित्रा—ये सब लोग आजकी इस राततक जीवित रह सकेंगे या नहीं; यह मैं नहीं कह सकता ॥ १५ ॥
जीवेदपि च मे माता शत्रुघ्नस्यान्ववेक्षया । दुःखिता या हि कौसल्या वीरसूर्विनशिष्यति॥१६ ॥
भावार्थ
‘‘शत्रुघ्नकी बाट देखनेके कारण सम्भव है, मेरी माता सुमित्रा जीवित रह जायँ; परंतु पुत्रके विरहसे दुःखमें डूबी हुई वीर-जननी कौसल्या अवश्य नष्ट हो जायँगी ॥ १६ ॥
अतिक्रान्तमतिक्रान्तमनवाप्य मनोरथम् । राज्ये राममनिक्षिप्य पिता मे विनशिष्यति ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘‘( महाराजकी इच्छा थी कि श्रीरामको राज्यपर अभिषिक्त करूँ ) अपने उस मनोरथको न पाकर श्रीरामको राज्यपर स्थापित किये विना ही ‘हाय ! मेरा सब कुछ नष्ट हो गया ! नष्ट हो गया !!’ ऐसा कहते हुए मेरे पिताजी अपने प्राणोंका परित्याग कर देंगे ॥ १७ ॥
सिद्धार्थाः पितरं वृत्तं तस्मिन् काले ह्युपस्थिते । प्रेतकार्येषु सर्वेषु संस्करिष्यन्ति भूमिपम् ॥१८ ॥
भावार्थ
‘‘उनकी उस मृत्युका समय उपस्थित होनेपर जो लोग वहाँ रहेंगे और मेरे मरे हुए पिता महाराज दशरथका सभी प्रेतकार्योंमें संस्कार करेंगे, वे ही सफलमनोरथ और भाग्यशाली हैं ॥ १८ ॥
रम्यचत्वरसंस्थानां सुविभक्तमहापथाम् । हर्म्यप्रासादसम्पन्नां सर्वरत्नविभूषिताम् ॥ १९ ॥ गजाश्वरथसम्बाधां तूर्यनादविनादिताम् । सर्वकल्याणसम्पूर्णां हृष्टपुष्टजनाकुलाम् ॥ २० ॥ आरामोद्यानसम्पूर्णां समाजोत्सवशालिनीम् । सुखिता विचरिष्यन्ति राजधानीं पितुर्मम ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘‘( यदि पिताजी जीवित रहे तो ) रमणीय चबूतरों और चौराहोंके सुन्दर स्थानोंसे युक्त, पृथक्-पृथक् बने हुए विशाल राजमार्गोंसे अलंकृत, धनिकोंकी अट्टालिकाओं और देवमन्दिरों एवं राजभवनोंसे सम्पन्न, सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, हाथियों, घोड़ों और रथोंके आवागमनसे भरी हुई, विविध वाद्योंकी ध्वनियोंसे निनादित, समस्त कल्याणकारी वस्तुओंसे भरपूर, हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे व्याप्त, पुष्पवाटिकाओं और उद्यानोंसे परिपूर्ण तथा सामाजिक उत्सवोंसे सुशोभित हुई मेरे पिताकी राजधानी अयोध्यापुरीमें जो लोग विचरेंगे, वास्तवमें वे ही सुखी हैं ॥ १९–२१ ॥
अपि सत्यप्रतिज्ञेन सार्धं कुशलिना वयम् । निवृत्ते समये ह्यस्मिन् सुखिताः प्रविशेमहि ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘‘क्या वनवासकी इस अवधिके समाप्त होनेपर सकुशल लौटे हुए सत्यप्रतिज्ञ श्रीरामके साथ हमलोग अयोध्यापुरीमें प्रवेश कर सकेंगे’ ॥ २२ ॥
परिदेवयमानस्य तस्यैवं हि महात्मनः । तिष्ठतो राजपुत्रस्य शर्वरी सात्यवर्तत ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘‘इस प्रकार विलाप करते हुए महामनस्वी राजकुमार लक्ष्मणकी वह सारी रात जागते ही बीती ॥ २३ ॥
प्रभाते विमले सूर्ये कारयित्वा जटा उभौ । अस्मिन् भागीरथीतीरे सुखं संतारितौ मया ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘‘प्रातःकाल निर्मल सूर्योदय होनेपर मैंने भागीरथीके तटपर ( वटके दूधसे ) उन दोनोंके केशोंको जटाका रूप दिलवाया और उन्हें सुखपूर्वक पार उतारा ॥ २४ ॥
जटाधरौ तौ द्रुमचीरवाससौ महाबलौ कुञ्जरयूथपोपमौ । वरेषुधीचापधरौ परंतपौ व्यपेक्षमाणौ सह सीतया गतौ ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘‘सिरपर जटा धारण करके वल्कल एवं चीर-वस्त्र पहने हुए, महाबली, शत्रुसंतापी श्रीराम और लक्ष्मण दो गज-यूथपतियोंके समान शोभा पाते थे । वे सुन्दर तरकस और धनुष धारण किये इधर-उधर देखते हुए सीताके साथ चले गये’ ॥ २५ ॥
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