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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 84

ततो निविष्टां ध्वजिनीं गङ्गामन्वाश्रितां नदीम् । निषादराजो दृष्ट्वैव ज्ञातीन् स परितोऽब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

उधर निषादराज गुहने गङ्गा नदीके तटपर ठहरी हुई भरतकी सेनाको देखकर सब ओर बैठे हुए अपने भाई-बन्धुओंसे कहा—॥ १ ॥

महतीयमितः सेना सागराभा प्रदृश्यते । नास्यान्तमवगच्छामि मनसापि विचिन्तयन् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘भाइयो ! इस ओर जो यह विशाल सेना ठहरी हुई है समुद्रके समान अपार दिखायी देती है; मैं मनसे बहुत सोचनेपर भी इसका पार नहीं पाता हूँ ॥ २ ॥

यदा नु खलु दुर्बुद्धिर्भरतः स्वयमागतः । स एष हि महाकायः कोविदारध्वजो रथे ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘निश्चय ही इसमें स्वयं दुर्बुद्धि भरत भी आया हुआ है; यह कोविदारके चिह्नवाली विशाल ध्वजा उसीके रथपर फहरा रही है ॥ ३ ॥

बन्धयिष्यति वा पाशैरथ वास्मान् वधिष्यति । अनु दाशरथिं रामं पित्रा राज्याद् विवासितम् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘मैं समझता हूँ कि यह अपने मन्त्रियोंद्वारा पहले हम लोगोंको पाशोंसे बँधवायगा अथवा हमारा वध कर डालेगा; तत्पश्चात् जिन्हें पिताने राज्यसे निकाल दिया है, उन दशरथनन्दन श्रीरामको भी मार डालेगा ॥ ४ ॥

सम्पन्नां श्रियमन्विच्छंस्तस्य राज्ञः सुदुर्लभाम् । भरतः कैकयीपुत्रो हन्तुं समधिगच्छति ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘कैकेयीका पुत्र भरत राजा दशरथकी सम्पन्न एवं सुदुर्लभ राजलक्ष्मीको अकेला ही हड़प लेना चाहता है, इसीलिये वह श्रीरामचन्द्रजीको वनमें मार डालनेके लिये जा रहा है ॥५॥

भर्ता चैव सखा चैव रामो दाशरथिर्मम । तस्यार्थकामाः संनद्धा गङ्गानूपेऽत्र तिष्ठत ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘परंतु दशरथकुमार श्रीराम मेरे स्वामी और सखा हैं, इसलिये उनके हितकी कामना रखकर तुमलोग अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो यहाँ गङ्गाके तटपर मौजूद रहो ॥ ६ ॥

तिष्ठन्तु सर्वदाशाश्च गङ्गामन्वाश्रिता नदीम् । बलयुक्ता नदीरक्षा मांसमूलफलाशनाः ॥ ७ ॥

भावार्थ

‘सभी मल्लाह सेनाके साथ नदीकी रक्षा करते हुए गङ्गाके तटपर ही खड़े रहें और नावपर रखे हुए फल-मूल आदिका आहार करके ही आजकी रात बितावें ॥ ७ ॥

नावां शतानां पञ्चानां कैवर्तानां शतं शतम् । संनद्धानां तथा यूनां तिष्ठन्त्वित्यभ्यचोदयत् ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘हमारे पास पाँच सौ नावें हैं, उनमेंसे एक-एक नावपर मल्लाहोंके सौ-सौ जवान युद्ध-सामग्रीसे लैस होकर बैठे रहें।’ इस प्रकार गुहने उन सबको आदेश दिया ॥ ८ ॥

यदि तुष्टस्तु भरतो रामस्येह भविष्यति । इयं स्वस्तिमती सेना गङ्गामद्य तरिष्यति ॥ ९ ॥

भावार्थ

उसने फिर कहा कि ‘यदि यहाँ भरतका भाव श्रीरामके प्रति संतोषजनक होगा, तभी उनकी यह सेना आज कुशलपूर्वक गङ्गाके पार जा सकेगी’ ॥ ९ ॥

इत्युक्त्वोपायनं गृह्य मत्स्यमांसमधूनि च । अभिचक्राम भरतं निषादाधिपतिर्गुहः ॥ १० ॥

भावार्थ

यों कहकर निषादराज गुह मत्स्यण्डी ( मिश्री ), फलके गूदे और मधु आदि भेंटकी सामग्री लेकर भरतके पास गया ॥ १० ॥

तमायान्तं तु सम्प्रेक्ष्य सूतपुत्रः प्रतापवान् । भरतायाचचक्षेऽथ समयज्ञो विनीतवत् ॥ ११ ॥

भावार्थ

उसे आते देख समयोचित कर्तव्यको समझनेवाले प्रतापी सूतपुत्र सुमन्त्रने विनीतकी भाँति भरतसे कहा—॥ ११ ॥

एष ज्ञातिसहस्रेण स्थपतिः परिवारितः । कुशलो दण्डकारण्ये वृद्धो भ्रातुश्च ते सखा ॥ १२ ॥ तस्मात् पश्यतु काकुत्स्थ त्वां निषादाधिपो गुहः । असंशयं विजानीते यत्र तौ रामलक्ष्मणौ ॥ १३ ॥ एतत् तु वचनं श्रुत्वा सुमन्त्राद् भरतः शुभम् । उवाच वचनं शीघ्रं गुहः पश्यतु मामिति ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘ककुत्स्थकुलभूषण ! यह बूढ़ा निषादराज गुह अपने सहस्रों भाई-बन्धुओंके साथ यहाँ निवास करता है । यह तुम्हारे बड़े भाई श्रीरामका सखा है । इसे दण्डकारण्यके मार्गकी विशेष जानकारी है । निश्चय ही इसे पता होगा कि दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मण कहाँ हैं, अतः निषादराज गुह यहाँ आकर तुमसे मिलें, इसके लिये ‘अवसर दो’ ॥ सुमन्त्रके मुखसे यह शुभ वचन सुनकर भरतने कहा—‘निषादराज गुह मुझसे शीघ्र मिलें—इसकी व्यवस्था की जाय’ ॥ १४ ॥

लब्ध्वानुज्ञां सम्प्रहृष्टो ज्ञातिभिः परिवारितः । आगम्य भरतं प्रह्वो गुहो वचनमब्रवीत् ॥ १५ ॥

भावार्थ

मिलनेकी अनुमति पाकर गुह अपने भाई-बन्धुओंके साथ वहाँ प्रसन्नतापूर्वक आया और भरतसे मिलकर बड़ी नम्रताके साथ बोला—॥ १५ ॥

निष्कुटश्चैव देशोऽयंवञ्चिताश्चापि ते वयम् । निवेदयाम ते सर्वं स्वके दाशगृहे वस ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘यह वन-प्रदेश आपके लिये घरमें लगे हुए बगीचेके समान है। आपने अपने आगमनकी सूचना न देकर हमें धोखेमें रख दिया—हम आपके स्वागतकी कोई तैयारी न कर सके। हमारे पास जो कुछ है, वह सब आपकी सेवामें अर्पित है। यह निषादोंका घर आपका ही है, आप यहाँ सुखपूर्वक निवास करें ॥ १६ ॥

अस्ति मूलफलं चैतन्निषादैः स्वयमर्जितम् । आर्द्रं शुष्कं तथा मांसं वन्यं चोच्चावचं तथा ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘यह फल-मूल आपकी सेवामें प्रस्तुत है। इसे निषाद लोग स्वयं तोड़कर लाये हैं। इनमेंसे कुछ फल तो अभी हरे ताजे हैं और कुछ सूख गये हैं। इनके साथ तैयार किया हुआ फलका गूदा भी है। इन सबके सिवा नाना प्रकारके दूसरे-दूसरे वन्य पदार्थ भी हैं। इन सबको ग्रहण करें ॥ १७ ॥

आशंसे स्वाशिता सेना वत्स्यत्येनां विभावरीम् । अर्चितो विविधैः कामैः श्वः ससैन्यो गमिष्यसि ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘हम आशा करते हैं कि यह सेना आजकी रात यहीं ठहरेगी और हमारा दिया हुआ भोजन स्वीकार करेगी। नाना प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुओंसे आज हम सेनासहित आपका सत्कार करेंगे, फिर कल सबेरे आप अपने सैनिकोंके साथ यहाँसे अन्यत्र जाइयेगा’ ॥ १८ ॥

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