अयोध्याकाण्ड, सर्ग 79
ततः प्रभातसमये दिवसेऽथ चतुर्दशे । समेत्य राजकर्तारो भरतं वाक्यमब्रुवन् ॥ १ ॥
भावार्थ
तदनन्तर चौदहवें दिन प्रातःकाल समस्त राजकर्मचारी मिलकर भरतसे इस प्रकार बोले—॥ १ ॥
गतो दशरथः स्वर्गं यो नो गुरुतरो गुरुः । रामं प्रव्राज्य वै ज्येष्ठं लक्ष्मणं च महाबलम् ॥ २ ॥ त्वमद्य भव नो राजा राजपुत्र महायशः । संगत्या नापराध्नोति राज्यमेतदनायकम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘महायशस्वी राजकुमार ! जो हमारे सर्वश्रेष्ठ गुरु थे, वे महाराज दशरथ तो अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीराम तथा महाबली लक्ष्मणको वनमें भेजकर स्वयं स्वर्गलोकको चले गये, अब इस राज्यका कोई स्वामी नहीं है; इसलिये अब आप ही हमारे राजा हों । आपके बड़े भाईको स्वयं महाराजने बनवासकी आज्ञा दी और आपको यह राज्य प्रदान किया ! अतः आपका राजा होना न्यायसङ्गत है। इस सङ्गतिके कारण ही आप राज्यको अपने अधिकारमें लेकर किसीके प्रति कोई अपराध नहीं कर रहे हैं ॥ २-३ ॥
आभिषेचनिकं सर्वमिदमादाय राघव । प्रतीक्षते त्वां स्वजनः श्रेणयश्च नृपात्मज ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘राजकुमार रघुनन्दन ! ये मन्त्री आदि स्वजन, पुरवासी तथा सेठलोग अभिषेककी सब सामग्री लेकर आपकी राह देखते हैं ॥ ४ ॥
राज्यं गृहाण भरत पितृपैतामहं ध्रुवम् । अभिषेचय चात्मानं पाहि चास्मान् नरर्षभ ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘भरतजी ! आप अपने पिता-पितामहोंके इस राज्यको अवश्य ग्रहण कीजिये । नरश्रेष्ठ! राजाके पदपर अपना अभिषेक कराइये और हमलोगोंकी रक्षा कीजिये’ ॥ ५ ॥
आभिषेचनिकं भाण्डं कृत्वा सर्वे प्रदक्षिणम् । भरतस्तं जनं सर्वे प्रत्युवाच धृतव्रतः ॥ ६ ॥
भावार्थ
यह सुनकर उत्तम व्रतको धारण करनेवाले भरतने अभिषेकके लिये रखी हुई कलश आदि सब सामग्रीकी प्रदक्षिणा की और वहाँ उपस्थित हुए सब लोगोंको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ ६ ॥
ज्येष्ठस्य राजता नित्यमुचिता हि कुलस्य नः । नैवं भवन्तो मां वक्तुमर्हन्ति कुशला जनाः ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘सज्जनो ! आपलोग बुद्धिमान् हैं, आपको मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये । हमारे कुलमें सदा ज्येष्ठ पुत्र ही राज्यका अधिकारी होता आया है और यही उचित भी है ॥ ७ ॥
रामः पूर्वो हि नो भ्राता भविष्यति महीपतिः । अहं त्वरण्ये वत्स्यामि वर्षाणि नव पञ्च च ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामचन्द्रजी हमलोगोंके बड़े भाई हैं, अतः वे ही राजा होंगे । उनके बदले मैं ही चौदह वर्षोंतक वनमें निवास करूँगा ॥ ८ ॥
युज्यतां महती सेना चतुरङ्गमहाबला । आनयिष्याम्यहं ज्येष्ठं भ्रातरं राघवं वनात् ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘आपलोग विशाल चतुरङ्गिणी सेना, जो सब प्रकारसे सबल हो, तैयार कीजिये । मैं अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामचन्द्रजीको वनसे लौटा लाऊँगा ॥ ९ ॥
आभिषेचनिकं चैव सर्वमेतदुपस्कृतम् । पुरस्कृत्य गमिष्यामि रामहेतोर्वनं प्रति ॥ १० ॥ तत्रैव तं नरव्याघ्रमभिषिच्य पुरस्कृतम् । आनयिष्यामि वै रामं हव्यवाहमिवाध्वरात् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘अभिषेकके लिये संचित हुई इस सारी सामग्रीको आगे करके मैं श्रीरामसे मिलनेके लिये वनमें चलूँगा और उन नरश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीका वहीं अभिषेक करके यज्ञसे लायी जानेवाली अग्निके समान उन्हें आगे करके अयोध्यामें ले आऊँगा ॥ १०-११ ॥
न सकामां करिष्यामि स्वामिमां मातृगन्धिनीम् । वने वत्स्याम्यहं दुर्गे रामो राजा भविष्यति ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘परंतु जिसमें लेशमात्र मातृभाव शेष है, अपनी माता कहलानेवाली इस कैकेयीको मैं कदापि सफलमनोरथ नहीं होने दूँगा । श्रीराम यहाँके राजा होंगे और मैं दुर्गम वनमें निवास करूँगा ॥ १२ ॥
क्रियतां शिल्पिभिः पन्थाः समानि विषमाणि च । रक्षिणश्चानुसंयान्तु पथि दुर्गविचारकाः ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘कारीगर आगे जाकर रास्ता बनायें, ऊँची-नीची भूमिको बराबर करें तथा मार्गमें दुर्गम स्थानोंकी जानकारी रखनेवाले रक्षक भी साथ-साथ चलें’ ॥ १३ ॥
एवं सम्भाषमाणं तं रामहेतोर्नृपात्मजम् । प्रत्युवाच जनः सर्वः श्रीमद् वाक्यमनुत्तमम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
श्रीरामचन्द्रजीके लिये ऐसी बातें कहते हुए राजकुमार भरतसे वहाँ आये हुए सब लोगोंने इस प्रकार सुन्दर एवं परम उत्तम बात कही—॥ १४ ॥
एवं ते भाषमाणस्य पद्मा श्रीरुपतिष्ठताम् । यस्त्वं ज्येष्ठे नृपसुते पृथिवीं दातुमिच्छसि ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘भरतजी ! ऐसे उत्तम वचन कहनेवाले आपके पास कमलवनमें निवास करनेवाली लक्ष्मी अवस्थित हों; क्योंकि आप राजाके ज्येष्ठ पुत्र श्रीरामको स्वयं ही इस पृथिवीका राज्य लौटा देना चाहते हैं’ ॥ १५ ॥
अनुत्तमं तद्वचनं नृपात्मजः प्रभाषितं संश्रवणे निशम्य च । प्रहर्षजास्तं प्रति बाष्पबिन्दवो निपेतुरार्याननेनेत्रसम्भवाः ॥ १६ ॥
भावार्थ
उन लोगोंका कहा हुआ वह परम उत्तम आशीर्वचन जब कानमें पड़ा, तब उसे सुनकर राजकुमार भरतको बड़ी प्रसन्नता हुई । उन सबकी ओर देखकर भरतके मुखमण्डलमें सुशोभित होनेवाले नेत्रोंसे हर्षजनित आँसुओंकी बूँदें गिरने लगीं ॥ १६ ॥
ऊचुस्ते वचनमिदं निशम्य हृष्टाः सामात्याः सपरिषदो वियातशोकाः । पन्थानं नरवरभक्तिमान् जनश्च व्यादिष्टस्तव वचनाच्च शिल्पिवर्गः ॥ १७ ॥
भावार्थ
भरतके मुखसे श्रीरामको ले आनेकी बात सुनकर उस सभाके सभी सदस्यों और मन्त्रियोंसहित समस्त राजकर्मचारी हर्षसे खिल उठे । उनका सारा शोक दूर हो गया और वे भरतसे बोले—‘नरश्रेष्ठ ! आपकी आज्ञाके अनुसार राजपरिवारके प्रति भक्तिभाव रखनेवाले कारीगरों और रक्षकोंको मार्ग ठीक करनेके लिये भेज दिया गया है’ ॥ १७ ॥
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