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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 80

अथ भूमिप्रदेशज्ञाः सूत्रकर्मविशारदाः । स्वकर्माभिरताः शूराः खनका यन्त्रकास्तथा ॥ १ ॥ कर्मान्तिकाः स्थपतयः पुरुषा यन्त्रकोविदाः । तथा वर्धकयश्चैव मार्गिणो वृक्षतक्षकाः ॥ २ ॥ सूपकाराः सुधाकारा वंशचर्मकृतस्तथा । समर्था ये च द्रष्टारः पुरतश्च प्रतस्थिरे ॥ ३ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् ऊँची-नीची एवं सजल-निर्जल भूमिका ज्ञान रखनेवाले, सूत्रकर्म ( छावनी आदि बनानेके लिये सूत धारण करने ) में कुशल, मार्गकी रक्षा आदि अपने कर्ममें सदा सावधान रहनेवाले शूर-वीर, भूमि खोदने या सुरङ्ग आदि बनानेवाले, नदी आदि पार करनेके लिये तुरंत साधन उपस्थित करनेवाले अथवा जलके प्रवाहको रोकनेवाले वेतनभोगी कारीगर, थवई, रथ और यन्त्र आदि बनानेवाले पुरुष, बढ़ई, मार्गरक्षक, पेड़ काटनेवाले, रसोइये, चूनेसे पोतने आदिका काम करनेवाले, बाँसकी चटाई और सूप आदि बनानेवाले, चमड़ेका चारजामा आदि बनानेवाले तथा रास्तेकी विशेष जानकारी रखनेवाले सामर्थ्यशाली पुरुषोंने पहले प्रस्थान किया ॥ १–३ ॥

स तु हर्षात् तमुद्देशं जनौघो विपुलः प्रयान् । अशोभत महावेगः सागरस्येव पर्वणि ॥ ४ ॥

भावार्थ

उस समय मार्ग ठीक करनेके लिये एक विशाल जनसमुदाय बड़े हर्षके साथ वनप्रदेशकी ओर अग्रसर हुआ, जो पूर्णिमाके दिन उमड़े हुए समुद्रके महान् वेगकी भाँति शोभा पा रहा था ॥ ४ ॥

ते स्ववारं समास्थाय वर्त्मकर्मणि कोविदाः । करणैर्विविधोपेतैः पुरस्तात् सम्प्रतस्थिरे ॥ ५ ॥

भावार्थ

वे मार्ग-निर्माणमें निपुण कारीगर अपना-अपना दल साथ लेकर अनेक प्रकारके औजारोंके साथ आगे चल दिये ॥ ५ ॥

लता वल्लीश्च गुल्मांश्च स्थाणूनश्मन एव च । जनास्ते चक्रिरे मार्गं छिन्दन्तो विविधान् द्रुमान् ॥ ६ ॥

भावार्थ

वे लोग लताएँ, बेलें, झाड़ियाँ, ठूँठे वृक्ष तथा पत्थरोंको हटाते और नाना प्रकारके वृक्षोंको काटते हुए मार्ग तैयार करने लगे ॥ ६ ॥

अवृक्षेषु च देशेषु केचिद् वृक्षानरोपयन् । केचित् कुठारैष्टङ्कैश्च दात्रैश्छिन्दन् क्वचित् क्वचित् ॥ ७ ॥

भावार्थ

जिन स्थानोंमें वृक्ष नहीं थे, वहाँ कुछ लोगोंने वृक्ष भी लगाये । कुछ कारीगरोंने कुल्हाड़ों, टंकों ( पत्थर तोड़नेके औजारों ) तथा हँसियोंसे कहीं-कहीं वृक्षों और घासोंको काट-काटकर रास्ता साफ किया ॥ ७ ॥

अपरे वीरणस्तम्बान् बलिनो बलवत्तराः । विधमन्ति स्म दुर्गाणि स्थलानि च ततस्ततः ॥ ८ ॥ अपरेऽपूरयन् कूपान् पांसुभिः श्वभ्रमायतम् । निम्नभागांस्तथैवाशु समांश्चक्रुः समन्ततः ॥ ९ ॥

भावार्थ

अन्य प्रबल मनुष्योंने जिनकी जड़ें नीचेतक जमी हुई थीं, उन कुश, कास आदिके झुरमुटोंको हाथोंसे ही उखाड़ फेंका । वे जहाँ-तहाँ ऊँचे-नीचे दुर्गम स्थानोंको खोद-खोदकर बराबर कर देते थे । दूसरे लोग कुओं और लंबे-चौड़े गड्ढोंको धूलोंसे ही पाट देते थे । जो स्थान नीचे होते, वहाँ सब ओरसे मिट्टी डालकर वे उन्हें शीघ्र ही बराबर कर देते थे ॥ ८-९ ॥

बबन्धुर्बन्धनीयांश्च क्षोद्यान् संचुक्षुदुस्तथा । बिभिदुर्भेदनीयांश्च तांस्तान् देशान् नरास्तदा ॥ १० ॥

भावार्थ

उन्होंने जहाँ पुल बाँधनेके योग्य पानी देखा, वहाँ पुल बाँध दिये । जहाँ कँकरीली जमीन दिखायी दी, वहाँ उसे ठोक-पीटकर मुलायम कर दिया और जहाँ पानी बहनेके लिये मार्ग बनाना आवश्यक समझा, वहाँ बाँध काट दिया । इस प्रकार विभिन्न देशोंमें वहाँकी आवश्यकताके अनुसार कार्य किया ॥ १० ॥

अचिरेण तु कालेन परिवाहान् बहूदकान् । चक्रुर्बहुविधाकारान् सागरप्रतिमान् बहून् ॥ ११ ॥

भावार्थ

छोटे-छोटे स्रोतोंको, जिनका पानी सब ओर बह जाया करता था, चारों ओरसे बाँधकर शीघ्र ही अधिक जलवाला बना दिया । इस तरह थोड़े ही समयमें उन्होंने भिन्न-भिन्न आकार-प्रकारके बहुत-से सरोवर तैयार कर दिये, जो अगाध जलसे भरे होनेके कारण समुद्रके समान जान पड़ते थे ॥ ११ ॥

निर्जलेषु च देशेषु खानयामासुरुत्तमान् । उदपानान् बहुविधान् वेदिकापरिमण्डितान् ॥ १२ ॥

भावार्थ

निर्जल स्थानोंमें नाना प्रकारके अच्छे-अच्छे कुएँ और बावड़ी आदि बनवा दिये, जो आस-पास बनी हुई वेदिकाओंसे अलंकृत थे ॥ १२ ॥

ससुधाकुट्टिमतलः प्रपुष्पितमहीरुहः । मत्तोद्घुष्टद्विजगणः पताकाभिरलंकृतः ॥ १३ ॥ चन्दनोदकसंसिक्तो नानाकुसुमभूषितः । बहुशोभत सेनायाः पन्थाः सुरपथोपमः ॥१४॥

भावार्थ

इस प्रकार सेनाका वह मार्ग देवताओंके मार्गकी भाँति अधिक शोभा पाने लगा । उसकी भूमिपर चूना-सुर्खी और कंकरीट बिछाकर उसे कूट-पीटकर पक्का कर दिया गया था । उसके किनारे-किनारे फूलोंसे सुशोभित वृक्ष लगाये गये थे। वहाँके वृक्षोंपर मतवाले पक्षी चहक रहे थे । सारे मार्गको पताकाओंसे सजा दिया गया था, उसपर चन्दनमिश्रित जलका छिड़काव किया गया था तथा अनेक प्रकारके फूलोंसे वह सड़क सजायी गयी थी ॥ १३-१४ ॥

आज्ञाप्याथ यथाज्ञप्ति युक्तास्तेऽधिकृता नराः । रमणीयेषु देशेषु बहुस्वादुफलेषु च ॥१५॥ यो निवेशस्त्वभिप्रेतो भरतस्य महात्मनः । भूयस्तं शोभयामासुर्भूषाभिर्भूषणोपमम् ॥१६॥

भावार्थ

मार्ग बन जानेपर जहाँ-तहाँ छावनी आदि बनानेके लिये जिन्हें अधिकार दिया गया था, कार्यमें दत्त-चित्त रहनेवाले उन लोगोंने भरतकी आज्ञाके अनुसार सेवकोंको काम करनेका आदेश देकर जहाँ स्वादिष्ट फलोंकी अधिकता थी उन सुन्दर प्रदेशोंमें छावनियाँ बनवायीं और जो भरतको अभीष्ट था, मार्गके भूषणरूप उस शिविरको नाना प्रकारके अलंकारोंसे और भी सजा दिया ॥ १५-१६ ॥

नक्षत्रेषु प्रशस्तेषु मुहूर्तेषु च तद्विदः । निवेशान् स्थापयामासुर्भरतस्य महात्मनः ॥ १७ ॥

भावार्थ

वास्तु-कर्मके ज्ञाता विद्वानोंने उत्तम नक्षत्रों और मुहूर्तोंमें महात्मा भरतके ठहरनेके लिये जो-जो स्थान बने थे, उनकी प्रतिष्ठा करवायी ॥ १७ ॥

बहुपांसुचयाश्चापि परिखाः परिवारिताः । तत्रेन्द्रनीलप्रतिमाः प्रतोलीवरशोभिताः ॥ १८ ॥ प्रासादमालासंयुक्ताः सौधप्राकारसंवृताः । पताकाशोभिताः सर्वे सुनिर्मितमहापथाः ॥ १९ ॥ विसर्पद्भिरिवाकाशे विटङ्काग्रविमानकैः । समुच्छ्रितैर्निवेशास्ते बभुः शक्रपुरोपमाः ॥ २० ॥

भावार्थ

मार्गमें बने हुए वे निवेश ( विश्राम-स्थान ) इन्द्रपुरीके समान शोभा पाते थे । उनके चारों ओर खाइयाँ खोदी गयी थीं; धूल-मिट्टीके ऊँचे ढेर लगाये गये थे । खेमोंके भीतर इन्द्रनीलमणिकी बनी हुई प्रतिमाएँ सजायी गयी थीं । गलियों और सड़कोंसे उनकी विशेष शोभा होती थी । राजकीय गृहों और देवस्थानोंसे युक्त वे शिविर चूने पुते हुए प्राकारों ( चहारदीवारियों ) से घिरे थे । सभी विश्रामस्थान पताकाओंसे सुशोभित थे । सर्वत्र बड़ी-बड़ी सड़कोंका सुन्दर ढंगसे निर्माण किया गया था । विटङ्कों ( कबूतरोंके रहनेके स्थानों—कावकों ) और ऊँचे-ऊँचे श्रेष्ठ विमानोंके कारण उन सभी शिविरोंकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १८–२० ॥

जाह्नवीं तु समासाद्य विविधद्रुमकाननाम् । शीतलामलपानीयां महामीनसमाकुलाम् ॥ २१ ॥ सचन्द्रतारागणमण्डितं यथा नभः क्षपायाममलं विराजते । नरेन्द्रमार्गः स तदा व्यराजत क्रमेण रम्यः शुभशिल्पिनिर्मितः॥ २२ ॥

भावार्थ

नाना प्रकारके वृक्षों और वनोंसे सुशोभित, शीतल-निर्मल जलसे भरी हुई और बड़े-बड़े मत्स्योंसे व्याप्त गङ्गाके किनारेतक बना हुआ वह रमणीय राजमार्ग उस समय बड़ी शोभा पा रहा था । अच्छे कारीगरोंने उसका निर्माण किया था । रात्रिके समय वह चन्द्रमा और तारागणोंसे मण्डित निर्मल आकाशके समान सुशोभित होता था ॥ २१-२२॥

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