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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 78

अथ यात्रां समीहन्तं शत्रुघ्नो लक्ष्मणानुजः । भरतं शोकसंतप्तमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

तेरहवें दिनका कार्य पूर्ण करके श्रीरामचन्द्रजीके पास जानेका विचार करते हुए शोकसंतप्त भरतसे लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्नने इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

गतिर्यः सर्वभूतानां दुःखे किं पुनरात्मनः । स रामः सत्त्वसम्पन्नः स्त्रिया प्रव्राजितो वनम् ॥ २ ॥

भावार्थ

‘भैया ! जो दुःखके समय अपने तथा आत्मीयजनोंके लिये तो बात ही क्या है, समस्त प्राणियोंको भी सहारा देनेवाले हैं, वे सत्त्वगुणसम्पन्न श्रीराम एक स्त्रीके द्वारा वनमें भेज दिये गये ( यह कितने खेदकी बात है ) ॥ २ ॥

बलवान् वीर्यसम्पन्नो लक्ष्मणो नाम योऽप्यसौ । किं न मोचयते रामं कृत्वापि पितृनिग्रहम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘तथा वे जो बल और पराक्रमसे सम्पन्न लक्ष्मण नामधारी शूरवीर हैं, उन्होंने भी कुछ नहीं किया । मैं पूछता हूँ कि उन्होंने पिताको कैद करके भी श्रीरामको इस संकटसे क्यों नहीं छुड़ाया ? ॥ ३ ॥

पूर्वमेव तु विग्राह्यः समवेक्ष्य नयानयौ । उत्पथं यः समारूढो नार्या राजा वशं गतः ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘जब राजा एक नारीके वशमें होकर बुरे मार्गपर आरूढ़ हो चुके थे, तब न्याय और अन्यायका विचार करके उन्हें पहले ही कैद कर लेना चाहिये था’ ॥ ४ ॥

इति सम्भाषमाणे तु शत्रुघ्ने लक्ष्मणानुजे । प्राग्द्वारेऽभूत् तदा कुब्जा सर्वाभरणभूषिता ॥ ५ ॥ लिप्ता चन्दनसारेण राजवस्त्राणि बिभ्रती । विविधं विविधैस्तैस्तैर्भूषणैश्च विभूषिता ॥ ६ ॥

भावार्थ

लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न जब इस प्रकार रोषमें भरकर बोल रहे थे, उसी समय कुब्जा समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो उस राजभवनके पूर्वद्वारपर आकर खड़ी हो गयी॥ उसके अङ्गोंमें उत्तमोत्तम चन्दनका लेप लगा हुआ था तथा वह राजरानियोंके पहनने योग्य विविध वस्त्र धारण करके भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे सज-धजकर वहाँ आयी थी ॥ ६ ॥

मेखलादामभिश्चित्रैरन्यैश्च वरभूषणैः । बभासे बहुभिर्बद्धा रज्जुभिरिव वानरी ॥ ७ ॥

भावार्थ

करधनीकी विचित्र लड़ियों तथा अन्य बहुसंख्यक सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत हो वह बहुत-सी रस्सियोंमें बँधी हुई वानरीके समान जान पड़ती थी ॥ ७ ॥

तां समीक्ष्य तदा द्वाःस्थो भृशं पापस्य कारिणीम् । गृहीत्वाकरुणं कुब्जां शत्रुघ्नाय न्यवेदयत् ॥ ८ ॥

भावार्थ

वही सारी बुराइयोंकी जड़ थी । वही श्रीरामके वनवासरूपी पापका मूल कारण थी । उसपर दृष्टि पड़ते ही द्वारपालने उसे पकड़ लिया और बड़ी निर्दयताके साथ घसीट लाकर शत्रुघ्नके हाथमें देते हुए कहा—॥ ८ ॥

यस्याः कृते वने रामो न्यस्तदेहश्च वः पिता । सेयं पापा नृशंसा च तस्याः कुरु यथामति ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘राजकुमार ! जिसके कारण श्रीरामको वनमें निवास करना पड़ा है और आपलोगोंके पिताने शरीरका परित्याग किया है, वह क्रूर कर्म करनेवाली पापिनी यही है । आप इसके साथ जैसा बर्ताव उचित समझें, करें’ ॥ ९ ॥

शत्रुघ्नश्च तदाज्ञाय वचनं भृशदुःखितः । अन्तःपुरचरान् सर्वानित्युवाच धृतव्रतः ॥ १० ॥

भावार्थ

द्वारपालकी बातपर विचार करके शत्रुघ्नका दुःख और बढ़ गया । उन्होंने अपने कर्तव्यका निश्चय किया और अन्तःपुरमें रहनेवाले सब लोगोंको सुनाकर इस प्रकार कहा—॥ १० ॥

तीव्रमुत्पादितं दुःखं भ्रातॄणां मे तथा पितुः । यथा सेयं नृशंसस्य कर्मणः फलमश्नुताम् ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘इस पापिनीने मेरे भाइयों तथा पिताको जैसा दुःसह दुःख पहुँचाया है, अपने उस क्रूर कर्मका वैसा ही फल यह भी भोगे’ ॥ ११ ॥

एवमुक्त्वा च तेनाशु सखीजनसमावृता । गृहीता बलवत् कुब्जा सा तद् गृहमनादयत् ॥ १२ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर शत्रुघ्नने सखियोंसे घिरी हुई कुब्जाको तुरंत ही बलपूर्वक पकड़ लिया । वह डरके मारे ऐसा चीखने-चिल्लाने लगी कि वह सारा महल गूँज उठा ॥ १२ ॥

ततः सुभृशसंतप्तस्तस्याः सर्वः सखीजनः । क्रुद्धमाज्ञाय शत्रुघ्नं व्यपलायत सर्वशः ॥ १३ ॥

भावार्थ

फिर तो उसकी सारी सखियाँ अत्यन्त संतप्त हो उठीं और शत्रुघ्नको कुपित जानकर सब ओर भाग चलीं ॥१३॥

अमन्त्रयत कृत्स्नश्च तस्याः सर्वः सखीजनः । यथायं समुपक्रान्तो निःशेषं नः करिष्यति ॥ १४ ॥

भावार्थ

उसकी सम्पूर्ण सखियोंने एक जगह एकत्र होकर आपसमें सलाह की कि ‘जिस प्रकार इन्होंने बलपूर्वक कुब्जाको पकड़ा है, उससे जान पड़ता है, ये हमलोगोंमेंसे किसीको जीवित नहीं छोड़ेंगे ॥ १४ ॥

सानुक्रोशां वदान्यां च धर्मज्ञां च यशस्विनीम् । कौसल्यां शरणं यामः सा हि नोऽस्ति ध्रुवा गतिः ॥

भावार्थ

‘अतः हमलोग परम दयालु, उदार, धर्मज्ञ और यशस्विनी महारानी कौसल्याकी शरणमें चलें । इस समय वे ही हमारी निश्चल गति हैं’ ॥ १५ ॥

स च रोषेण संवीतः शत्रुघ्नः शत्रुशासनः । विचकर्ष तदा कुब्जां क्रोशन्तीं पृथिवीतले ॥ १६ ॥

भावार्थ

शत्रुओंका दमन करनेवाले शत्रुघ्न रोषमें भरकर कुब्जाको जमीनपर घसीटने लगे । उस समय वह जोर-जोरसे चीत्कार कर रही थी ॥ १६ ॥

तस्यां ह्याकृष्यमाणायां मन्थरायां ततस्ततः । चित्रं बहुविधं भाण्डं पृथिव्यां तद्व्यशीर्यत ॥ १७ ॥

भावार्थ

जब मन्थरा घसीटी जा रही थी, उस समय उसके नाना प्रकारके विचित्र आभूषण टूट-टूटकर पृथ्वीपर इधर-उधर बिखरे जाते थे ॥ १७ ॥

तेन भाण्डेन विस्तीर्णं श्रीमद् राजनिवेशनम् । अशोभत तदा भूयः शारदं गगनं यथा ॥ १८ ॥

भावार्थ

आभूषणोंके उन टुकड़ोंसे वह शोभाशाली विशाल राजभवन नक्षत्रमालाओंसे अलंकृत शरत्कालके आकाशकी भाँति अधिक सुशोभित हो रहा था ॥ १८ ॥

स बली बलवत् क्रोधाद् गृहीत्वा पुरुषर्षभः । कैकेयीमभिनिर्भर्त्स्य बभाषे परुषं वचः ॥ १९ ॥ तैर्वाक्यैः परुषैर्दुःखैः कैकेयी भृशदुःखिता । शत्रुघ्नभयसंत्रस्ता पुत्रं शरणमागता ॥ २० ॥

भावार्थ

बलवान् नरश्रेष्ठ शत्रुघ्न जिस समय रोषपूर्वक मन्थराको जोरसे पकड़कर घसीट रहे थे, उस समय उसे छुड़ानेके लिये कैकेयी उनके पास आयी । तब उन्होंने उसे धिक्कारते हुए उसके प्रति बड़ी कठोर बातें कहीं—उसे रोषपूर्वक फटकारा॥ शत्रुघ्नके वे कठोर वचन बड़े ही दुःखदायी थे । उन्हें सुनकर कैकेयीको बहुत दुःख हुआ । वह शत्रुघ्नके भयसे थर्रा उठी और अपने पुत्रकी शरणमें आयी ॥ २० ॥

तं प्रेक्ष्य भरतः क्रुद्धं शत्रुघ्नमिदमब्रवीत् । अवध्याः सर्वभूतानां प्रमदाः क्षम्यतामिति ॥ २१ ॥

भावार्थ

शत्रुघ्नको क्रोधमें भरा हुआ देख भरतने उनसे कहा— ‘सुमित्राकुमार ! क्षमा करो । स्त्रियाँ सभी प्राणियोंके लिये अवध्य होती हैं ॥ २१ ॥

हन्यामहमिमां पापां कैकेयीं दुष्टचारिणीम् । यदि मां धार्मिको रामो नासूयेन्मातृघातकम् ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘यदि मुझे यह भय न होता कि धर्मात्मा श्रीराम मातृ-घाती समझकर मुझसे घृणा करने लगेंगे तो मैं भी इस दुष्ट आचरण करनेवाली पापिनी कैकेयीको मार डालता ॥ २२ ॥

इमामपि हतां कुब्जां यदि जानाति राघवः । त्वां च मां चैव धर्मात्मा नाभिभाषिष्यते ध्रुवम् ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘धर्मात्मा श्रीरघुनाथजी तो इस कुब्जाके भी मारे जानेका समाचार यदि जान लें तो वे निश्चय ही तुमसे और मुझसे बोलना भी छोड़ देंगे’ ॥ २३ ॥

भरतस्य वचः श्रुत्वा शत्रुघ्नो लक्ष्मणानुजः । न्यवर्तत ततो दोषात् तां मुमोच च मूर्च्छिताम् ॥ २४ ॥

भावार्थ

भरतजीकी यह बात सुनकर लक्ष्मणके छोटे भाई शत्रुघ्न मन्थराके वधरूपी दोषसे निवृत्त हो गये और उसे मूर्च्छित अवस्थामें ही छोड़ दिया ॥ २४ ॥

सा पादमूले कैकेय्या मन्थरा निपपात ह । निःश्वसन्ती सुदुःखार्ता कृपणं विललाप ह ॥ २५ ॥

भावार्थ

मन्थरा कैकेयीके चरणोंमें गिर पड़ी और लंबी साँस खींचती हुई अत्यन्त दुःखसे आर्त हो करुण विलाप करने लगी ॥ २५ ॥

शत्रुघ्नविक्षेपविमूढसंज्ञां समीक्ष्य कुब्जां भरतस्य माता । शनैः समाश्वासयदार्तरूपां क्रौञ्चीं विलग्नामिव वीक्षमाणाम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

शत्रुघ्नके पटकने और घसीटनेसे आर्त एवं अचेत हुई कुब्जाको देखकर भरतकी माता कैकेयी धीरे-धीरे उसे आश्वासन देने—होशमें लानेकी चेष्टा करने लगी । उस समय कुब्जा पिंजड़ेमें बँधी हुई क्रौञ्चीकी भाँति कातर दृष्टिसे उसकी ओर देख रही थी ॥ २६ ॥

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