अयोध्याकाण्ड, सर्ग 74
तां तथा गर्हयित्वा तु मातरं भरतस्तदा । रोषेण महताविष्टः पुनरेवाब्रवीद् वचः ॥ १ ॥
भावार्थ
इस प्रकार माताकी निन्दा करके भरत उस समय महान् रोषावेशसे भर गये और फिर कठोर वाणीमें कहने लगे—॥ १ ॥
राज्याद् भ्रंशस्व कैकेयि नृशंसे दुष्टचारिणि । परित्यक्तासि धर्मेण मा मृतं रुदती भव ॥ २ ॥
भावार्थ
‘दुष्टतापूर्ण बर्ताव करनेवाली क्रूरहृदया कैकेयि ! तू राज्यसे भ्रष्ट हो जा । धर्मने तेरा परित्याग कर दिया है, अतः अब तू मरे हुए महाराजके लिये रोना मत, ( क्योंकि तू पत्नी-धर्मसे गिर चुकी है ) अथवा मुझे मरा हुआ समझकर तू जन्मभर पुत्रके लिये रोया कर ॥ २ ॥
किं नु तेऽदूषयद् रामो राजा वा भृशधार्मिकः । ययोर्मृत्युर्विवासश्च त्वत्कृते तुल्यमागतौ ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘श्रीरामने अथवा अत्यन्त धर्मात्मा महाराज ( पिताजी ) ने तेरा क्या बिगाड़ा था, जिससे एक साथ ही उन्हें तुम्हारे कारण वनवास और मृत्युका कष्ट भोगना पड़ा ? ॥ ३ ॥
भ्रूणहत्यामसि प्राप्ता कुलस्यास्य विनाशनात् । कैकेयि नरकं गच्छ मा च तातसलोकताम् ॥ ४ ॥
भावार्थ
कैकेयि ! तूने इस कुलका विनाश करनेके कारण भ्रूण-हत्याका पाप अपने सिरपर लिया है, इसलिये तू नरकमें जा और पिताजीका लोक तुझे न मिले ॥ ४ ॥
यत्त्वया हीदृशं पापं कृतं घोरेण कर्मणा । सर्वलोकप्रियं हित्वा ममाप्यापादितं भयम् ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘तूने इस घोर कर्मके द्वारा समस्त लोकोंके प्रिय श्रीरामको देशनिकाला देकर जो ऐसा बड़ा पाप किया है, उसने मेरे लिये भी भय उपस्थित कर दिया है ॥ ५ ॥
त्वत्कृते मे पिता वृत्तो रामश्चारण्यमाश्रितः । अयशो जीवलोके च त्वयाहं प्रतिपादितः ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘तेरे कारण मेरे पिताकी मृत्यु हुई, श्रीरामको वनका आश्रय लेना पड़ा और मुझे भी तूने इस जीवजगत्में अपयशका भागी बना दिया ॥ ६ ॥
मातृरूपे ममामित्रे नृशंसे राज्यकामुके । न तेऽहमभिभाष्योऽस्मि दुर्वृत्ते पतिघातिनि ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘राज्यके लोभमें पड़कर क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाली दुराचारिणी पतिघातिनि ! तू माताके रूपमें मेरी शत्रु है । तुझे मुझसे बात नहीं करनी चाहिये ॥ ७ ॥
कौसल्या च सुमित्रा च याश्चान्या मम मातरः । दुःखेन महताविष्टास्त्वां प्राप्य कुलदूषिणीम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘कौसल्या, सुमित्रा तथा जो अन्य मेरी माताएँ हैं, वे सब तुझ कुलकलङ्किनीके कारण महान् दुःखमें पड़ गयी हैं ॥ ८ ॥
न त्वमश्वपतेः कन्या धर्मराजस्य धीमतः । राक्षसी तत्र जातासि कुलप्रध्वंसिनी पितुः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘तू बुद्धिमान् धर्मराज अश्वपतिकी कन्या नहीं है । तू उनके कुलमें कोई राक्षसी पैदा हो गयी है, जो पिताके वंशका विध्वंस करनेवाली है ॥ ९ ॥
यत् त्वया धार्मिको रामो नित्यं सत्यपरायणः । वनं प्रस्थापितो वीरः पितापि त्रिदिवं गतः ॥ १० ॥ यत् प्रधानासि तत् पापं मयि पित्रा विना कृते । भ्रातृभ्यां च परित्यक्ते सर्वलोकस्य चाप्रिये ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘तूने सदा सत्यमें तत्पर रहनेवाले धर्मात्मा वीर श्रीरामको जो वनमें भेज दिया और तेरे कारण जो मेरे पिता स्वर्गवासी हो गये, इन सब कुकृत्योंद्वारा तूने प्रधान रूपसे जिस पापका अर्जन किया है, वह पाप मुझमें आकर अपना फल दिखा रहा है; इसलिये मैं पितृहीन हो गया, अपने दो भाइयोंसे बिछुड़ गया और समस्त जगत्के लोगोंके लिये अप्रिय बन गया ॥ १०-११ ॥
कौसल्यां धर्मसंयुक्तां वियुक्तां पापनिश्चये । कृत्वा कं प्राप्स्यसे ह्यद्य लोकं निरयगामिनि ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘पापपूर्ण विचार रखनेवाली नरकगामिनी कैकेयि ! धर्मपरायणा माता कौसल्याको पति और पुत्रसे वञ्चित करके अब तू किस लोकमें जायगी ? ॥ १२ ॥
किं नावबुध्यसे क्रूरे नियतं बन्धुसंश्रयम् । ज्येष्ठं पितृसमं रामं कौसल्यायात्मसम्भवम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘क्रूरहृदये ! कौसल्यापुत्र श्रीराम मेरे बड़े भाई और पिताके तुल्य हैं। वे जितेन्द्रिय और बन्धुओंके आश्रयदाता हैं । क्या तू उन्हें इस रूपमें नहीं जानती है ? ॥ १३ ॥
अङ्गप्रत्यङ्गजः पुत्रो हृदयाच्चाभिजायते । तस्मात् प्रियतरो मातुः प्रिया एव तु बान्धवाः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘पुत्र माताके अङ्ग-प्रत्यङ्ग और हृदयसे उत्पन्न होता है, इसलिये वह माताको अधिक प्रिय होता है । अन्य भाई-बन्धु केवल प्रिय ही होते हैं ( किंतु पुत्र प्रियतर होता है ) ॥ १४ ॥
अन्यदा किल धर्मज्ञा सुरभिः सुरसम्मता । वहमानौ ददर्शोर्व्यां पुत्रौ विगतचेतसौ ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘एक समयकी बात है कि धर्मको जाननेवाली देव-सम्मानित सुरभि ( कामधेनु ) ने पृथ्वीपर अपने दो पुत्रोंको देखा, जो हल जोतते-जोतते अचेत हो गये थे ॥ १५ ॥
तावर्धदिवसं श्रान्तौ दृष्ट्वा पुत्रौ महीतले । रुरोद पुत्रशोकेन बाष्पपर्याकुलेक्षणम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘मध्याह्नका समय होनेतक लगातार हल जोतनेसे वे बहुत थक गये थे । पृथ्वीपर अपने उन दोनों पुत्रोंको ऐसी दुर्दशामें पड़ा देख सुरभि पुत्रशोकसे रोने लगी । उसके नेत्रोंमें आँसू उमड़ आये ॥ १६ ॥
अधस्ताद् व्रजतस्तस्याः सुरराज्ञो महात्मनः । बिन्दवः पतिता गात्रे सूक्ष्माः सुरभिगन्धिनः ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘उसी समय महात्मा देवराज इन्द्र सुरभिके नीचेसे होकर कहीं जा रहे थे । उनके शरीरपर कामधेनुके दो बूँद सुगन्धित आँसू गिर पड़े ॥ १७ ॥
निरीक्षमाणस्तां शक्रो ददर्श सुरभिं स्थिताम् । आकाशे विष्ठितां दीनां रुदतीं भृशदुःखिताम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘जब इन्द्रने ऊपर दृष्टि डाली, तब देखा—आकाशमें सुरभि खड़ी हैं और अत्यन्त दुखी हो दीनभावसे रो रही हैं ॥ १८ ॥
तां दृष्ट्वा शोकसंतप्तां वज्रपाणिर्यशस्विनीम् । इन्द्रः प्राञ्जलिरुद्विग्नः सुराजोऽब्रवीद् वचः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘यशस्विनी सुरभिको शोकसे संतप्त हुई देख वज्रधारी देवराज इन्द्र उद्विग्न हो उठे और हाथ जोड़कर बोले—॥ १९ ॥
भयं कच्चिन्न चास्मासु कुतश्चिद् विद्यते महत् । कुतोनिमित्तः शोकस्ते ब्रूहि सर्वहितैषिणि ॥ २० ॥
भावार्थ
‘सबका हित चाहनेवाली देवि ! हमलोगोंपर कहींसे कोई महान् भय तो नहीं उपस्थित हुआ है ? बताओ, किस कारणसे तुम्हें यह शोक प्राप्त हुआ है ?’ ॥ २० ॥
एवमुक्ता तु सुरभिः सुराजेन धीमता । प्रत्युवाच ततो धीरा वाक्यं वाक्यविशारदा ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘बुद्धिमान् देवराज इन्द्रके इस प्रकार पूछनेपर बोलनेमें चतुर और धीरस्वभाववाली सुरभिने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया—॥ २१ ॥
शान्तं पापं न वः किंचित् कुतश्चिदमराधिप । अहं तु मग्नौ शोचामि स्वपुत्रौ विषमे स्थितौ ॥ २२ ॥
भावार्थ
‘देवेश्वर ! पाप शान्त हो । तुमलोगोंपर कहींसे कोई भय नहीं है । मैं तो अपने इन दोनों पुत्रोंको विषम अवस्था ( घोर सङ्कट ) में मग्न हुआ देख शोक कर रही हूँ ॥ २२ ॥
एतौ दृष्ट्वा कृशौ दीनौ सूर्यरश्मिप्रतापितौ । वध्यमानौ बलीवर्दौ कर्षकेण दुरात्मना ॥ २३ ॥
भावार्थ
‘ये दोनों बैल अत्यन्त दुर्बल और दुखी हैं, सूर्यकी किरणोंसे बहुत तप गये हैं और ऊपरसे वह दुष्ट किसान इन्हें पीट रहा है ॥ २३ ॥
मम कायात् प्रसूतौ हि दुःखितौ भारपीडितौ । यौ दृष्ट्वा परितप्येऽहं नास्ति पुत्रसमः प्रियः ॥ २४ ॥
भावार्थ
‘मेरे शरीरसे इनकी उत्पत्ति हुई है । ये दोनों भारसे पीड़ित और दुखी हैं, इसीलिये इन्हें देखकर मैं शोकसे संतप्त हो रही हूँ; क्योंकि पुत्रके समान प्रिय दूसरा कोई नहीं है’ ॥ २४ ॥
यस्याः पुत्रसहस्रैस्तु कृत्स्नं व्याप्तमिदं जगत् । तां दृष्ट्वा रुदतीं शक्रो न सुतान् मन्यते परम् ॥ २५ ॥
भावार्थ
‘जिनके सहस्रों पुत्रोंसे यह सारा जगत् भरा हुआ है, उन्हीं कामधेनुको इस तरह रोती देख इन्द्रने यह माना कि पुत्रसे बढ़कर और कोई नहीं है ॥ २५ ॥
इन्द्रो ह्यश्रुनिपातं तं स्वगात्रे पुण्यगन्धिनम् । सुरभिं मन्यते दृष्ट्वा भूयसीं तामिहेश्वरः ॥ २६ ॥
भावार्थ
‘देवेश्वर इन्द्रने अपने शरीरपर उस पवित्र गन्धवाले अश्रुपातको देखकर देवी सुरभिको इस जगत्में सबसे श्रेष्ठ माना ॥ २६ ॥
समाप्रतिमवृत्ताया लोकधारणकाम्यया । श्रीमत्या गुणमुख्यायाः स्वभावपरिचेष्टया ॥ २७ ॥ यस्याः पुत्रसहस्राणि सापि शोचति कामधुक् । किं पुनर्या विना रामं कौसल्या वर्तयिष्यति ॥ २८ ॥
भावार्थ
‘जिनका चरित्र समस्त प्राणियोंके लिये समान रूपसे हितकर और अनुपम है, जो अभीष्ट दानरूप ऐश्वर्यशक्तिसे सम्पन्न, सत्यरूप प्रधान गुणसे युक्त तथा लोकरक्षाकी कामनासे कार्यमें प्रवृत्त होनेवाली हैं और जिनके सहस्रों पुत्र हैं, वे कामधेनु भी जब अपने दो पुत्रोंके लिये उनके स्वाभाविक चेष्टामें रत होनेपर भी कष्ट पानेके कारण शोक करती हैं, तब जिनके एक ही पुत्र है, वे माता कौसल्या श्रीरामके बिना कैसे जीवित रहेंगी ? ॥ २७-२८ ॥
एकपुत्रा च साध्वी च विवत्सेयं त्वया कृता । तस्मात् त्वं सततं दुःखं प्रेत्य चेह च लप्स्यसे ॥ २९ ॥
भावार्थ
‘इकलौते बेटेवाली इन सती-साध्वी कौसल्याका तूने उनके पुत्रसे बिछोह करा दिया है, इसलिये तू सदा ही इस लोक और परलोकमें भी दुःख ही पायेगी ॥ २९ ॥
अहं त्वपचितिं भ्रातुः पितुश्च सकलामिमाम् । वर्धनं यशसश्चापि करिष्यामि न संशयः ॥ ३० ॥
भावार्थ
‘मैं तो यह राज्य लौटाकर भाईकी पूजा करूँगा और यह सारा अन्त्येष्टिसंस्कार आदि करके पिताका भी पूर्णरूपसे पूजन करूँगा तथा निःसंदेह मैं वही कर्म करूँगा, जो ( तेरे दिये हुए कलङ्कको मिटानेवाला और ) मेरे यशको बढ़ानेवाला हो ॥ ३० ॥
आनाय्य च महाबाहुं कोसलेन्द्रं महाबलम् । स्वयमेव प्रवेक्ष्यामि वनं मुनिनिषेवितम् ॥ ३१ ॥
भावार्थ
‘महाबली महाबाहु कोसलनरेश श्रीरामको यहाँ लौटा लाकर मैं स्वयं ही मुनिजनसेवित वनमें प्रवेश करूँगा ॥ ३१ ॥
नाहं पापसंकल्पे पापे पापं त्वया कृतम् । शक्तो धारयितुं पौरैरश्रुकण्ठैर्निरीक्षितः ॥ ३२ ॥
भावार्थ
‘पापपूर्ण संकल्प करनेवाली पापिनि ! पुरवासी मनुष्य आँसू बहाते हुए अवरुद्धकण्ठ हो मुझे देखें और मैं तेरे किये हुए इस पापका बोझ ढोता रहूँ—यह मुझसे नहीं हो सकता ॥ ३२ ॥
सा त्वमग्निं प्रविश वा स्वयं वा विश दण्डकान् । रज्जुं बद्ध्वाथवा कण्ठे नहि तेऽन्यत् परायणम् ॥ ३३ ॥
भावार्थ
‘अब तू जलती आगमें प्रवेश कर जा, या स्वयं दण्डकारण्यमें चली जा अथवा गलेमें रस्सी बाँधकर प्राण दे दे, इसके सिवा तेरे लिये दूसरी कोई गति नहीं है ॥ ३३ ॥
अहमप्यवर्नी प्राप्ते रामे सत्यपराक्रमे । कृतकृत्यो भविष्यामि विप्रवासितकल्मषः ॥ ३४ ॥
भावार्थ
‘सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी जब अयोध्याकी भूमिपर पदार्पण करेंगे, तभी मेरा कलङ्क दूर होगा और तभी मैं कृतकृत्य होऊँगा’ ॥ ३४ ॥
इति नाग इवारण्ये तोमराङ्कुशतोदितः । पपात भुवि संक्रुद्धो निःश्वसन्निव पन्नगः ॥ ३५ ॥
भावार्थ
यह कहकर भरत वनमें तोमर और अङ्कुशद्वारा पीड़ित किये गये हाथीकी भाँति मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और क्रोधमें भरकर फुफकारते हुए साँपकी भाँति लंबी साँस खींचने लगे ॥ ३५ ॥
संरक्तनेत्रः शिथिलाम्बरस्तथा विधूतसर्वाभरणः परंतपः । बभूव भूमौ पतितो नृपात्मजः शचीपतेः केतुरिवोत्सवक्षये ॥ ३६ ॥
भावार्थ
शत्रुओंको तपानेवाले राजकुमार भरत उत्सव समाप्त होनेपर नीचे गिराये गये शचीपति इन्द्रके ध्वजकी भाँति उस समय पृथ्वीपर पड़े थे, उनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये थे, वस्त्र ढीले पड़ गये थे और सारे आभूषण टूटकर बिखर गये थे ॥ ३६ ॥
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