Ramayana.com

अयोध्याकाण्ड, सर्ग 75

दीर्घकालात् समुत्थाय संज्ञां लब्ध्वा स वीर्यवान् । नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां दीनामुद्वीक्ष्य मातरम् ॥ १ ॥ सोऽमात्यमध्ये भरतो जननीमभ्यकुत्सयत् । राज्यं न कामये जातु मन्त्रये नापि मातरम् ॥ २ ॥ अभिषेकं न जानामि योऽभूद् राज्ञा समीक्षितः । विप्रकृष्टे ह्यहं देशे शत्रुघ्नसहितोऽभवम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

बहुत देरके बाद होशमें आनेपर जब पराक्रमी भरत उठे, तब आँसू भरे नेत्रोंसे दीन बनी बैठी हुई माताकी ओर देखकर मन्त्रियोंके बीचमें उसकी निन्दा करते हुए बोले—॥ ‘मन्त्रिवरो ! मैं राज्य नहीं चाहता और न मैंने कभी मातासे इसके लिये बातचीत ही की है । महाराजने जिस अभिषेकका निश्चय किया था, उसका भी मुझे पता नहीं था; क्योंकि उस समय मैं शत्रुघ्नके साथ दूर देशमें था ॥ २-३ ॥

वनवासं न जानामि रामस्याहं महात्मनः । विवासनं च सौमित्रेः सीतायाश्च यथाभवत् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘महात्मा श्रीरामके वनवास और सीता तथा लक्ष्मणके निर्वासनका भी मुझे ज्ञान नहीं है कि वह कब और कैसे हुआ ?’ ॥ ४ ॥

तथैव क्रोशतस्तस्य भरतस्य महात्मनः । कौसल्या शब्दमाज्ञाय सुमित्रां चेदमब्रवीत् ॥ ५ ॥

भावार्थ

महात्मा भरत जब इस प्रकार अपनी माताको कोस रहे थे, उस समय उनकी आवाजको पहचानकर कौसल्याने सुमित्रासे इस प्रकार कहा—॥ ५ ॥

आगतः क्रूरकार्यायाः कैकेय्या भरतः सुतः । तमहं द्रष्टुमिच्छामि भरतं दीर्घदर्शिनम् ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘क्रूर कर्म करनेवाली कैकेयीके पुत्र भरत आ गये हैं । वे बड़े दूरदर्शी हैं, अतः मैं उन्हें देखना चाहती हूँ’ ॥ ६ ॥

एवमुक्त्वा सुमित्रां तां विवर्णवदना कृशा । प्रतस्थे भरतो यत्र वेपमाना विचेतना ॥ ७ ॥

भावार्थ

सुमित्रासे ऐसा कहकर उदास मुखवाली, दुर्बल और अचेत-सी हुई कौसल्या जहाँ भरत थे, उस स्थानपर जानेके लिये काँपती हुई चलीं ॥ ७ ॥

स तु राजात्मजश्चापि शत्रुघ्नसहितस्तदा । प्रतस्थे भरतो येन कौसल्याया निवेशनम् ॥ ८ ॥

भावार्थ

उसी समय उधरसे राजकुमार भरत भी शत्रुघ्नको साथ लिये उसी मार्गसे चले आ रहे थे, जिससे कौसल्याके भवनमें आना-जाना होता था ॥ ८ ॥

ततः शत्रुघ्नभरतौ कौसल्यां प्रेक्ष्य दुःखितौ । पर्यष्वजेतां दुःखार्तां पतितां नष्टचेतनाम् ॥ ९ ॥ रुदन्तौ रुदती दुःखात् समेत्यार्या मनस्विनी । भरतं प्रत्युवाचेदं कौसल्या भृशदुःखिता ॥ १० ॥ इदं ते राज्यकामस्य राज्यं प्राप्तमकण्टकम् । सम्प्राप्तं बत कैकेय्या शीघ्रं क्रूरेण कर्मणा ॥ ११ ॥

भावार्थ

तदनन्तर शत्रुघ्न और भरतने दूरसे ही देखा कि माता कौसल्या दुःखसे व्याकुल और अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी हैं । यह देखकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे दौड़कर उनकी गोदीसे लग गये तथा फूट-फूटकर रोने लगे । आर्या मनस्विनी कौसल्या भी दुःखसे रो पड़ीं और उन्हें छातीसे लगाकर अत्यन्त दुःखित हो भरतसे इस प्रकार बोलीं—॥ ‘बेटा ! तुम राज्य चाहते थे न ? सो यह निष्कण्टक राज्य तुम्हें प्राप्त हो गया; किंतु खेद यही है कि कैकेयीने जल्दीके कारण बड़े क्रूर कर्मके द्वारा इसे पाया है ॥ ११ ॥

प्रस्थाप्य चीरवसनं पुत्रं मे वनवासिनम् । कैकेयी कं गुणं तत्र पश्यति क्रूरदर्शिनी ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘क्रूरतापूर्ण दृष्टि रखनेवाली कैकेयी न जाने इसमें कौन-सा लाभ देखती थी कि उसने मेरे बेटेको चीर-वस्त्र पहनाकर वनमें भेज दिया और उसे वनवासी बना दिया ॥ १२ ॥

क्षिप्रं मामपि कैकेयी प्रस्थापयितुमर्हति । हिरण्यनाभो यत्रास्ते सुतो मे सुमहायशाः ॥ १३ ॥

भावार्थ

‘अब कैकेयीको चाहिये कि मुझे भी शीघ्र ही उसी स्थानपर भेज दे, जहाँ इस समय सुवर्णमयी नाभिसे सुशोभित मेरे महायशस्वी पुत्र श्रीराम हैं ॥ १३ ॥

अथवा स्वयमेवाहं सुमित्रानुचरा सुखम् । अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य प्रस्थास्ये यत्र राघवः ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘अथवा सुमित्राको साथ लेकर और अग्निहोत्रको आगे करके मैं स्वयं ही सुखपूर्वक उस स्थानको प्रस्थान करूँगी, जहाँ श्रीराम निवास करते हैं ॥ १४ ॥

कामं वा स्वयमेवाद्य तत्र मां नेतुमर्हसि । यत्रासौ पुरुषव्याघ्रस्तप्यते मे सुतस्तपः ॥ १५ ॥ इदं हि तव विस्तीर्णं धनधान्यसमाचितम् । हस्त्यश्वरथसम्पूर्णं राज्यं निर्यातितं तया ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘अथवा तुम स्वयं ही अपनी इच्छाके अनुसार अब मुझे वहीं पहुँचा दो, जहाँ मेरे पुत्र पुरुषसिंह श्रीराम तप करते हैं॥ ‘यह धन-धान्यसे सम्पन्न तथा हाथी, घोड़े एवं रथोंसे भरा-पूरा विस्तृत राज्य कैकेयीने ( श्रीरामसे छीनकर ) तुम्हें दिलाया है’ ॥ १६ ॥

इत्यादिबहुभिर्वाक्यैः क्रूरैः सम्भर्त्सितोऽनघः । विव्यथे भरतोऽतीव व्रणे तुद्येव सूचिना ॥१७॥

भावार्थ

इस तरहकी बहुत-सी कठोर बातें कहकर जब कौसल्याने निरपराध भरतकी भर्त्सना की, तब उनको बड़ी पीड़ा हुई; मानो किसीने घावमें सूई चुभो दी हो ॥ १७ ॥

पपात चरणौ तस्यास्तदा सम्भ्रान्तचेतनः । विलप्य बहुधासंज्ञो लब्धसंज्ञस्तदाभवत् ॥ १८ ॥

भावार्थ

वे कौसल्याके चरणोंमें गिर पड़े; उस समय उनके चित्तमें बड़ी घबराहट थी। वे बारंबार विलाप करके अचेत हो गये । थोड़ी देर बाद उन्हें फिर चेत हुआ ॥ १८ ॥

एवं विलपमानां तां प्राञ्जलिर्भरतस्तदा । कौसल्यां प्रत्युवाचेदं शोकैर्बहुभिरावृताम् ॥ १९ ॥

भावार्थ

तब भरत अनेक प्रकारके शोकोंसे घिरी हुई और पूर्वोक्त रूपसे विलाप करती हुई माता कौसल्यासे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले—॥ १९ ॥

आर्ये कस्मादजानन्तं गर्हसे मामकल्मषम् । विपुलां च मम प्रीतिं स्थितां जानासि राघवे ॥ २०॥

भावार्थ

‘आर्ये ! यहाँ जो कुछ हुआ है, इसकी मुझे बिल्कुल जानकारी नहीं थी । मैं सर्वथा निरपराध हूँ, तो भी आप क्यों मुझे दोष दे रही हैं ? आप तो जानती हैं कि श्रीरघुनाथजीमें मेरा कितना प्रगाढ़ प्रेम है ॥ २० ॥

कृतशास्त्रानुगा बुद्धिर्मा भूत् तस्य कदाचन । सत्यसंधः सतां श्रेष्ठो यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ २१॥ प्रेष्यं पापीयसां यातु सूर्यं च प्रति मेहतु । हन्तु पादेन गाः सुप्ता यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘जिसकी अनुमतिसे सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ, आर्य श्रीरामजी वनमें गये हों, उस पापीकी बुद्धि कभी गुरुसे सीखे हुए शास्त्रोंमें बताये गये मार्गका अनुसरण करनेवाली न हो॥ ‘जिसकी सलाहसे बड़े भाई श्रीरामको वनमें जाना पड़ा हो, वह अत्यन्त पापियों—हीन जातियोंका सेवक हो । सूर्यकी ओर मुँह करके मलमूत्रका त्याग करे और सोयी हुई गौओंको लातसे मारे ( अर्थात् वह इन पापकर्मोंके दुष्परिणामका भागी हो ) ॥ २२ ॥

कारयित्वा महत् कर्म भर्ता भृत्यमनर्थकम् । अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्यार्योऽनुमते गतः॥२३॥

भावार्थ

‘जिसकी सम्मतिसे भैया श्रीरामने वनको प्रस्थान किया हो, उसको वही पाप लगे, जो सेवकसे भारी काम कराकर उसे समुचित वेतन न देनेवाले स्वामीको लगता है ॥ २३ ॥

परिपालयमानस्य राज्ञो भूतानि पुत्रवत् । ततस्तु द्रुह्यतां पापं यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ २४ ॥ बलिषड्भागमुद्धृत्य नृपस्यारक्षितुः प्रजाः । अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्यार्योऽनुमते गतः ॥

भावार्थ

‘जिसके कहनेसे आर्य श्रीरामको वनमें भेजा गया हो, उसको वही पाप लगे, जो समस्त प्राणियोंका पुत्रकी भाँति पालन करनेवाले राजासे द्रोह करनेवाले लोगोंको लगता है ॥ ‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह उसी अधर्मका भागी हो, जो प्रजासे उसकी आयका छठा भाग लेकर भी प्रजावर्गकी रक्षा न करनेवाले राजाको प्राप्त होता है ॥२५॥

संश्रुत्य च तपस्विभ्यः सत्रे वै यज्ञदक्षिणाम् । तां चापलतां पापं यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘जिसकी सलाहसे भैया श्रीरामको वनमें जाना पड़ा हो, उसे वही पाप लगे, जो यज्ञमें कष्ट सहनेवाले ऋत्विजोंको दक्षिणा देनेकी प्रतिज्ञा करके पीछे इनकार कर देनेवाले लोगोंको लगता है ॥ २६ ॥

हस्त्यश्वरथसम्बाधे युद्धे शस्त्रसमाकुले । मा स्म कार्षीत्सतां धर्मं यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ २७ ॥ उपदिष्टं सुसूक्ष्मार्थं शास्त्रं यत्नेन धीमता । स नाशयतु दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘हाथी, घोड़े और रथोंसे भरे एवं अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षासे व्याप्त संग्राममें सत्पुरुषोंके धर्मका पालन न करनेवाले योद्धाओंको जो पाप लगता है, वही उस मनुष्यको भी प्राप्त हो, जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीरामजीको वनमें भेजा गया हो॥ ‘जिसकी सलाहसे आर्य श्रीरामको वनमें प्रस्थान करना पड़ा है, वह दुरात्मा बुद्धिमान् गुरुके द्वारा यत्नपूर्वक प्राप्त हुआ शास्त्रके सूक्ष्म विषयका उपदेश भुला दे ॥ २८ ॥

मा च तं व्यूढबाहुसं चन्द्रभास्करतेजसम् । द्राक्षीद् राज्यस्थमासीनं यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘जिसकी सलाहसे बड़े भैया श्रीरामको वनमें भेजा गया हो, वह चन्द्रमा और सूर्यके समान तेजस्वी तथा विशाल भुजाओं और कंधोंसे सुशोभित श्रीरामचन्द्रजीको राज्यसिंहासनपर विराजमान न देख सके—वह राजा श्रीरामके दर्शनसे वञ्चित रह जाय ॥ २९ ॥

पायसं कृसरं छागं वृथा सोऽश्नातु निर्घृणः । गुरूंश्चाप्यवजानातु यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘जिसकी सलाहसे आर्य श्रीरामचन्द्रजी वनमें गये हों, वह निर्दय मनुष्य खीर, खिचड़ी और बकरीके दूधको देवताओं, पितरों एवं भगवान्को निवेदन किये बिना व्यर्थ करके खाय ॥ ३० ॥

गाश्च स्पृशतु पादेन गुरून् परिवदेत च । मित्रे द्रुह्येत सोऽत्यर्थं यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘जिसकी सम्मतिसे श्रीरामचन्द्रजीको वनमें जाना पड़ा हो, वह पापी मनुष्य गौओंके शरीरका पैरसे स्पर्श, गुरुजनोंकी निन्दा तथा मित्रके प्रति अत्यन्त द्रोह करे ॥ ३१ ॥

विश्वासात् कथितं किंचित् परिवादं मिथः कचित्। विवृणोतु स दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ३२ ॥

भावार्थ

‘जिसके कहनेसे बड़े भैया श्रीराम वनमें गये हों, वह दुष्टात्मा गुप्त रखनेके विश्वासपर एकान्तमें कहे हुए किसीके दोषको दूसरोंपर प्रकट कर दे ( अर्थात् उसे विश्वासघात करनेका पाप लगे ) ॥ ३२ ॥

अकर्ता चाकृतज्ञश्च त्यक्तात्मा निरपत्रपः। लोके भवतु विद्विष्टो यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ३३ ॥

भावार्थ

‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह मनुष्य उपकार न करनेवाला, कृतघ्न, सत्पुरुषोंद्वारा परित्यक्त, निर्लज्ज और जगत्में सबके द्वेषका पात्र हो ॥ ३३ ॥

पुत्रैर्दासैश्च भृत्यैश्च स्वगृहे परिवारितः। स एको मृष्टमश्नातु यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

‘जिसकी सलाहसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह अपने घरमें पुत्रों, दासों और भृत्योंसे घिरा रहकर भी अकेले ही मिष्टान्न भोजन करनेके पापका भागी हो ॥ ३४ ॥

अप्राप्य सदृशान् दाराननपत्यः प्रमीयताम्। अनवाप्य क्रियां धर्म्यां यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीरामका वनगमन हुआ हो, वह अपने अनुरूप पत्नीको न पाकर अग्निहोत्र आदि धार्मिक कर्मोंका अनुष्ठान किये बिना संतानहीन अवस्थामें ही मर जाय ॥ ३५ ॥

माऽऽत्मनः संततिं द्राक्षीत् स्वेषु दारेषु दुःखितः। आयुःसमग्रमप्राप्य यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘जिसकी सम्मतिसे मेरे बड़े भाई श्रीराम वनमें गये हों, वह सदा दुखी रहकर अपनी धर्मपत्नीसे होनेवाली संतानका मुँह न देखे तथा सम्पूर्ण आयुका उपभोग किये बिना ही मर जाय ॥ ३६ ॥

राजस्त्रीबालवृद्धानां वधे यत् पापमुच्यते। भृत्यत्यागे च यत् पापं तत् पापं प्रतिपद्यताम् ॥ ३७ ॥ लाक्षया मधुमांसेन लोहेन च विषेण च। सदैव बिभृयाद् भृत्यान् यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ३८ ॥

भावार्थ

‘राजा, स्त्री, बालक और वृद्धोंका वध करने तथा भृत्योंको त्याग देनेमें जो पाप होता है, वही पाप उसे भी लगे ॥ ‘जिसकी सम्मतिसे श्रीरामका वनगमन हुआ हो, वह सदैव लाह, मधु, मांस, लोहा और विष आदि निषिद्ध वस्तुओंको बेचकर कमाये हुए धनसे अपने भरण-पोषणके योग्य कुटुम्बीजनोंका पालन करे ॥ ३८ ॥

संग्रामे समुपोढे च शत्रुपक्षभयंकरे। पलायमानो वध्येत यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ३९ ॥

भावार्थ

‘जिसकी रायसे श्रीराम वनमें जानेको विवश हुए हों, वह शत्रुपक्षको भय देनेवाले युद्धके प्राप्त होनेपर उसमें पीठ दिखाकर भागता हुआ मारा जाय ॥ ३९ ॥

कपालपाणिः पृथिवीमटतां चीरसंवृतः। भिक्षमाणो यथोन्मत्तो यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ४० ॥

भावार्थ

‘जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह फटे-पुराने, मैले-कुचैले वस्त्रसे अपने शरीरको ढककर हाथमें खप्पर ले भीख माँगता हुआ उन्मत्तकी भाँति पृथ्वीपर घूमता फिरे ॥ ४० ॥

मद्यप्रसक्तो भवतु स्त्रीष्वक्षेषु च नित्यशः। कामक्रोधाभिभूतश्च यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ४१ ॥

भावार्थ

‘जिसकी सलाहसे श्रीरामचन्द्रजीको वनमें जाना पड़ा हो, वह काम क्रोधके वशीभूत होकर सदा ही मद्यपान, स्त्री-समागम और द्यूतक्रीड़ामें आसक्त रहे ॥ ४१ ॥

मास्य धर्मे मनो भूयादधर्मं स निषेवताम्। अपात्रवर्षी भवतु यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ४२ ॥

भावार्थ

‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, उसका मन कभी धर्ममें न लगे, वह अधर्मका ही सेवन करे और अपात्रको धन दान करे ॥ ४२ ॥

संचितान्यस्य वित्तानि विविधानि सहस्रशः। दस्युभिर्विप्रलुप्यन्तां यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘जिसकी सलाहसे आर्य श्रीरामका वन-गमन हुआ हो, उसके द्वारा सहस्रोंकी संख्यामें संचित किये गये नाना प्रकारके धन-वैभवोंको लुटेरे लूट ले जायँ ॥ ४३ ॥

उभे संध्ये शयानस्य यत् पापं परिकल्प्यते। तच्च पापं भवेत् तस्य यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ४४ ॥ यदग्निदायके पापं यत् पापं गुरुतल्पगे। मित्रद्रोहे च यत् पापं तत् पापं प्रतिपद्यताम् ॥ ४५ ॥

भावार्थ

‘जिसके कहनेसे भैया श्रीरामको वनमें भेजा गया हो, उसे वही पाप लगे, जो दोनों संध्याओंके समय सोये हुए पुरुषको प्राप्त होता है। आग लगानेवाले मनुष्यको जो पाप लगता है, गुरुपत्नीगामीको जिस पापकी प्राप्ति होती है तथा मित्रद्रोह करनेसे जो पाप प्राप्त होता है, वही पाप उसे भी लगे ॥ ४४-४५ ॥

देवतानां पितॄणां च मातापित्रोस्तथैव च। मा स्म कार्षीत् स शुश्रूषां यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ४६ ॥

भावार्थ

‘जिसकी सम्मतिसे आर्य श्रीरामको वनमें जाना पड़ा है, वह देवताओं, पितरों और माता-पिताकी सेवा कभी न करे ( अर्थात् उनकी सेवाके पुण्यसे वञ्चित रह जाय ) ॥ ४६ ॥

सर्वां लोकान् सतां कीर्त्याः सञ्जुह्वात् कर्मणस्तथा। [UNCLEAR]

भावार्थ

‘जिसकी अनुमतिसे विवश होकर भैया श्रीरामने वनमें पदार्पण किया है, वह पापी आज ही सत्पुरुषोंके लोकसे, सत्पुरुषोंकी कीर्तिसे तथा सत्पुरुषोंद्वारा सेवित कर्मसे शीघ्र भ्रष्ट हो जाय ॥ ४७ ॥

अपास्य मातृशुश्रूषामनर्थे सोऽवतिष्ठताम् । दीर्घबाहुर्महावक्षा यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ४८ ॥

भावार्थ

‘जिसकी सम्मतिसे बड़ी-बड़ी बाँह और विशाल वक्षवाले आर्य श्रीरामको वनमें जाना पड़ा है, वह माताकी सेवा छोड़कर अनर्थके पथमें स्थित रहे ॥ ४८ ॥

बहुभृत्यो दरिद्रश्च ज्वररोगसमन्वितः । समायात् सततं क्लेशं यस्यार्योऽनुमते गतः ॥४९॥

भावार्थ

‘जिसकी सलाहसे श्रीरामका वनगमन हुआ हो, वह दरिद्र हो, उसके यहाँ भरण-पोषण पानेके योग्य पुत्र आदिकी संख्या बहुत अधिक हो तथा वह ज्वर रोगसे पीड़ित होकर सदा क्लेश भोगता रहे ॥ ४९ ॥

आशामाशंसमानानां दीनानामूर्ध्वचक्षुषाम् । अर्थिनां वितथां कुर्याद् यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ५० ॥

भावार्थ

‘जिसकी अनुमति पाकर आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह आशा लगाये ऊपरकी ओर आँख उठाकर दाताके मुँहकी ओर देखनेवाले दीन याचकोंकी आशाको निष्फल कर दे ॥ ५० ॥

मायया रमतां नित्यं पुरुषः पिशुनोऽशुचिः । राज्ञो भीतस्त्वधर्मात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ५१ ॥

भावार्थ

‘जिसके कहनेसे भैया श्रीरामने वनको प्रस्थान किया हो, वह पापात्मा पुरुष चुगला, अपवित्र तथा राजासे भयभीत रहकर सदा छल-कपटमें ही रचा-पचा रहे ॥ ५१ ॥

ऋतुस्नातां सतीं भार्यामृतुकालानुरोधिनीम् । अतिवर्तेत दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ५२ ॥

भावार्थ

‘जिसके परामर्शसे आर्यका वनगमन हुआ हो, वह दुष्टात्मा ऋतु-स्नानकाल प्राप्त होनेके कारण अपने पास आयी हुई सती-साध्वी ऋतुस्नाता पत्नीको ठुकरा दे ( उसकी इच्छा न पूर्ण करनेके पापका भागी हो ) ॥ ५२ ॥

विप्रलुप्तप्रजातस्य दुष्कृतं ब्राह्मणस्य यत् । तदेतत् प्रतिपद्येत यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ५३ ॥

भावार्थ

‘जिसकी सलाहसे मेरे बड़े भाईको वनमें जाना पड़ा हो, उसको वही पाप लगे, जो ( अन्न आदिका दान न करने अथवा स्त्रीसे द्वेष रखनेके कारण ) नष्ट हुई संतानवाले ब्राह्मणको प्राप्त होता है ॥ ॥ ५३ ॥

ब्राह्मणायोद्यतां पूजां विहन्तु कलुषेन्द्रियः । बालवत्सां च गां दोग्धु यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ५४ ॥

भावार्थ

‘जिसकी रायसे आर्यने वनमें पदार्पण किया हो, वह मलिन इन्द्रियवाला पुरुष ब्राह्मणके लिये की जाती हुई पूजामें विघ्न डाल दे और छोटे बछड़ेवाली ( दस दिनके भीतरकी ब्यायी हुई ) गायका दूध दुहे ॥ ५४ ॥

धर्मदारान् परित्यज्य परदारान् निषेवताम् । त्यक्तधर्मरतिर्मूढो यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ५५ ॥

भावार्थ

‘जिसने आर्य श्रीरामके वनगमनकी अनुमति दी हो, वह मूढ़ धर्मपत्नीको छोड़कर परस्त्रीका सेवन करे तथा धर्मविषयक अनुरागको त्याग दे ॥ ५५ ॥

पानीयदूषके पापं तथैव विषदायके । यत्त्वदेकः स लभतां यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ५६ ॥

भावार्थ

‘पानीको गन्दा करनेवाले तथा दूसरोंको जहर देनेवाले मनुष्यको जो पाप लगता है, वह सारा पाप अकेला वही प्राप्त करे, जिसकी अनुमतिसे विवश होकर आर्य श्रीरामको वनमें जाना पड़ा है ॥ ५६ ॥

तृषार्ते सति पानीये विप्रलम्भेन योजयन् । यत् पापं लभते तत् स्याद् यस्यार्योऽनुमते गतः ॥५७॥

भावार्थ

‘जिसकी सम्मतिसे आर्यका वनगमन हुआ हो, उसे वही पाप प्राप्त हो, जो पानी होते हुए भी प्यासेको उससे वञ्चित कर देनेवाले मनुष्यको लगता है ॥ ५७ ॥

भक्त्या विवदमानेषु मार्गमाश्रित्य पश्यतः । तेन पापेन युज्येत यस्यार्योऽनुमते गतः ॥ ५८ ॥

भावार्थ

‘जिसकी अनुमतिसे आर्य श्रीराम वनमें गये हों, वह उस पापका भागी हो, जो परस्पर झगड़ते हुए मनुष्योंमेंसे किसी एकके प्रति पक्षपात रखकर मार्गमें खड़ा हो उनका झगड़ा देखनेवाले कलहप्रिय मनुष्यको प्राप्त होता है’ ॥ ५८ ॥

एवमाश्वासयन्नेव दुःखार्तोऽनुपपात ह । विहीनां पतिपुत्राभ्यां कौसल्यां पार्थिवात्मजः ॥ ५९ ॥

भावार्थ

इस प्रकार पति और पुत्रसे बिछुड़ी हुई कौसल्याको शपथके द्वारा आश्वासन देते हुए ही राजकुमार भरत दुःखसे व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ५९ ॥

तदा तं शपथैः कष्टैः शपमानमचेतनम् । भरतं शोकसंतप्तं कौसल्या वाक्यमब्रवीत् ॥ ६० ॥

भावार्थ

उस समय दुष्कर शपथोंद्वारा अपनी सफाई देते हुए शोकसंतप्त एवं अचेत भरतसे कौसल्याने इस प्रकार कहा—॥ ६० ॥

मम दुःखमिदं पुत्र भूयः समुपजायते । शपथैः शपमानो हि प्राणानुपरुणत्सि मे ॥ ६१ ॥

भावार्थ

‘बेटा ! तुम अनेकानेक शपथ खाकर जो मेरे प्राणोंको पीड़ा दे रहे हो, इससे मेरा यह दुःख और भी बढ़ता जा रहा है ॥ ६१ ॥

दिष्ट्या न चलितो धर्मादात्मा ते सहलक्षणः । वत्स सत्यप्रतिज्ञो हि सतां लोकानवाप्स्यसि ॥ ६२ ॥

भावार्थ

‘वत्स ! सौभाग्यकी बात है कि शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तुम्हारा चित्त धर्मसे विचलित नहीं हुआ है । तुम सत्यप्रतिज्ञ हो, इसलिये तुम्हें सत्पुरुषोंके लोक प्राप्त होंगे’ ॥ ६२ ॥

इत्युक्त्वा चाङ्कमानीय भरतं भ्रातृवत्सलम् । परिष्वज्य महाबाहुं रुरोद भृशदुःखिता ॥ ६३ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर कौसल्याने भ्रातृभक्त महाबाहु भरतको गोदमें खींच लिया और अत्यन्त दुखी हो उन्हें गलेसे लगाकर वे फूट-फूटकर रोने लगीं ॥ ६३ ॥

एवं विलपमानस्य दुःखार्तस्य महात्मनः । मोहाच्च शोकसंरम्भाद् बभूव लुलितं मनः ॥ ६४ ॥

भावार्थ

महात्मा भरत भी दुःखसे आर्त होकर विलाप कर रहे थे । उनका मन मोह और शोकके वेगसे व्याकुल हो गया था ॥ ६४ ॥

लालप्यमानस्य विचेतनस्य प्रणष्टबुद्धेः पतितस्य भूमौ । मुहुर्मुहुर्निःश्वसतश्च दीर्घं सा तस्य शोकेन जगाम रात्रिः ॥ ६५ ॥

भावार्थ

पृथ्वीपर पड़े हुए भरतकी बुद्धि ( विवेकशक्ति ) नष्ट हो गयी थी । वे अचेत-से होकर विलाप करते और बारंबार लंबी साँस खींचते थे । इस तरह शोकमें ही उनकी वह रात बीत गयी ॥ ६५ ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें