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अयोध्याकाण्ड, सर्ग 73

श्रुत्वा च स पितुर्वृत्तं भ्रातरौ च विवासितौ । भरतो दुःखसंतप्त इदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥

भावार्थ

पिताके परलोकवास और दोनों भाइयोंके वनवासका समाचार सुनकर भरत दुःखसे संतप्त हो उठे और इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

किं नु कार्यं हतस्येह मम राज्येन शोचतः । विहीनस्याथ पित्रा च भ्रात्रा पितृसमेन च ॥ २ ॥

भावार्थ

‘हाय ! तूने मुझे मार डाला। मैं पितासे सदाके लिये बिछुड़ गया और पितृतुल्य बड़े भाईसे भी विलग हो गया। अब तो मैं शोकमें डूब रहा हूँ; मुझे यहाँ राज्य लेकर क्या करना है ? ॥ २ ॥

दुःखे मे दुःखमकरोर्व्रणे क्षारमिवाददाः । राजानं प्रेतभावस्थं कृत्वा रामं च तापसम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

‘तूने राजाको परलोकवासी तथा श्रीरामको तपस्वी बनाकर मुझे दुःख-पर-दुःख दिया है, घावपर नमक-सा छिड़क दिया है ॥ ३ ॥

कुलस्य त्वमभावाय कालरात्रिरिवागता । अङ्गारमुपगूह्य स्म पिता मे नावबुद्धवान् ॥ ४ ॥

भावार्थ

‘तू इस कुलका विनाश करनेके लिये कालरात्रि बनकर आयी थी। मेरे पिताने तुझे अपनी पत्नी क्या बनाया, दहकते हुए अङ्गारको हृदयसे लगा लिया था; किंतु उस समय यह बात उनकी समझमें नहीं आयी थी ॥ ४ ॥

मृत्युमापादितो राजा त्वया मे पापदर्शिनि । सुखं परिहृतं मोहात् कुलेऽस्मिन् कुलपांसनि ॥ ५ ॥

भावार्थ

‘पापपर ही दृष्टि रखनेवाली ! कुलकलङ्किनी ! तूने मेरे महाराजको कालके गालमें डाल दिया और मोहवश इस कुलका सुख सदाके लिये छीन लिया ॥ ५ ॥

त्वां प्राप्य हि पिता मेऽद्य सत्यसंधो महायशाः । तीव्रदुःखाभिसंतप्तो वृत्तो दशरथो नृपः ॥ ६ ॥

भावार्थ

‘तुझे पाकर मेरे सत्यप्रतिज्ञ महायशस्वी पिता महाराज दशरथ इन दिनों दुःसह दुःखसे संतप्त होकर प्राण त्यागनेको विवश हुए हैं ॥ ६ ॥

विनाशितो महाराजः पिता मे धर्मवत्सलः । कस्मात् प्रव्राजितो रामः कस्मादेव वनं गतः ॥ ७ ॥ कौसल्या च सुमित्रा च पुत्रशोकाभिपीडिते । दुष्करं यदि जीवेतां प्राप्य त्वां जननीं मम ॥ ८ ॥

भावार्थ

‘बता, तूने मेरे धर्मवत्सल पिता महाराज दशरथका विनाश क्यों किया ? मेरे बड़े भाई श्रीरामको क्यों घरसे निकाला और वे भी क्यों (तेरे ही कहनेसे) वनको चले गये?॥ ‘कौसल्या और सुमित्रा भी मेरी माता कहलानेवाली तुझ कैकेयीको पाकर पुत्रशोकसे पीड़ित हो गयीं। अब उनका जीवित रहना अत्यन्त कठिन है ॥ ८ ॥

नन्वार्योऽपि च धर्मात्मा त्वयि वृत्तिमनुत्तमाम् । वर्तते गुरुवृत्तिज्ञो यथा मातरि वर्तते ॥ ९ ॥

भावार्थ

‘बड़े भैया श्रीराम धर्मात्मा हैं; गुरुजनोंके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये—इसे वे अच्छी तरह जानते हैं, इसलिये उनका अपनी माताके प्रति जैसा बर्ताव था, वैसा ही उत्तम व्यवहार वे तेरे साथ भी करते थे ॥ ९ ॥

तथा ज्येष्ठा हि मे माता कौसल्या दीर्घदर्शिनी। त्वयि धर्मं समास्थाय भगिन्यामिव वर्तते ॥ १० ॥ तस्याः पुत्रं महात्मानं चीरवल्कलवाससम् । प्रस्थाप्य वनवासाय कथं पापे न शोचसे ॥ ११ ॥

भावार्थ

‘मेरी बड़ी माता कौसल्या भी बड़ी दूरदर्शिनी हैं। वे धर्मका ही आश्रय लेकर तेरे साथ बहिनका-सा बर्ताव करती हैं ॥ ‘पापिनि ! उनके महात्मा पुत्रको चीर और वल्कल पहनाकर तूने वनमें रहनेके लिये भेज दिया । फिर भी तुझे शोक क्यों नहीं हो रहा है ? ॥ ११ ॥

अपापदर्शिनं शूरं कृतात्मानं यशस्विनम् । प्रव्राज्य चीरवसनं किं नु पश्यसि कारणम् ॥ १२ ॥

भावार्थ

‘श्रीराम किसीकी बुराई नहीं देखते। वे शूरवीर, पवित्रात्मा और यशस्वी हैं । उन्हें चीर पहनाकर वनवास दे देनेमें तू कौन-सा लाभ देख रही है ? ॥ १२ ॥

लुब्धाया विदितो मन्ये न तेऽहं राघवं यथा । तथा ह्यनर्थो राज्यार्थं त्वयाऽऽनीतो महानयम्॥ १३ ॥

भावार्थ

‘तू लोभिन है । मैं समझता हूँ, इसीलिये तुझे यह पता नहीं है कि मेरा श्रीरामचन्द्रजीके प्रति कैसा भाव है, तभी तूने राज्यके लिये यह महान् अनर्थ कर डाला है ॥ १३ ॥

अहं हि पुरुषव्याघ्रावपश्यन् रामलक्ष्मणौ । केन शक्तिप्रभावेण राज्यं रक्षितुमुत्सहे ॥ १४ ॥

भावार्थ

‘मैं पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मणको न देखकर किस शक्तिके प्रभावसे इस राज्यकी रक्षा कर सकता हूँ ? ( मेरे बल तो मेरे भाई ही हैं ) ॥ १४ ॥

तं हि नित्यं महाराजो बलवन्तं महौजसम् । उपाश्रितोऽभूद् धर्मात्मा मेरुर्मेरुवनं यथा ॥ १५ ॥

भावार्थ

‘मेरे धर्मात्मा पिता महाराज दशरथ भी सदा उन महातेजस्वी बलवान् श्रीरामका ही आश्रय लेते थे ( उन्हींसे अपने लोक-परलोककी सिद्धिकी आशा रखते थे ), ठीक उसी तरह जैसे मेरुपर्वत अपनी रक्षाके लिये अपने ऊपर उत्पन्न हुए गहन वनका ही आश्रय लेता है ( यदि वह दुर्गम वनसे घिरा हुआ न हो तो दूसरे लोग निश्चय ही उसपर आक्रमण कर सकते हैं ) ॥ १५ ॥

सोऽहं कथमिमं भारं महाधुर्यसमुद्यतम् । दम्यो धुरमिवासाद्य सहेयं केन चौजसा ॥ १६ ॥

भावार्थ

‘यह राज्यका भार, जिसे किसी महाधुरंधरने धारण किया था, मैं कैसे, किस बलसे धारण कर सकता हूँ ? जैसे कोई छोटा-सा बछड़ा बड़े-बड़े बैलोंद्वारा ढोये जाने योग्य महान् भारको नहीं खींच सकता, उसी प्रकार यह राज्यका महान् भार मेरे लिये असह्य है ॥ १६ ॥

अथवा मे भवेच्छक्तिर्योगैर्बुद्धिबलेन वा । सकामां न करिष्यामि त्वामहं पुत्रगर्द्धिनीम् ॥ १७ ॥

भावार्थ

‘अथवा नाना प्रकारके उपायों तथा बुद्धिबलसे मुझमें राज्यके भरण-पोषणकी शक्ति हो तो भी केवल अपने बेटेके लिये राज्य चाहनेवाली तुझ कैकेयीकी मनःकामना पूरी नहीं होने दूँगा ॥ १७ ॥

न मे विकाङ्क्षा जायेत त्यक्तुं त्वां पापनिश्चयाम् । यदि रामस्य नावेक्षा त्वयि स्यान्मातृवत् सदा ॥ १८ ॥

भावार्थ

‘यदि श्रीराम तुझे सदा अपनी माताके समान नहीं देखते होते तो तेरी-जैसी पापपूर्ण विचारवाली माताका त्याग करनेमें मुझे तनिक भी हिचक नहीं होती ॥ १८ ॥

उत्पन्ना तु कथं बुद्धिस्तवेयं पापदर्शिनी । साधुचारित्रविभ्रष्टे पूर्वेषां नो विगर्हिता ॥ १९ ॥

भावार्थ

‘उत्तम चरित्रसे गिरी हुई पापिनि ! मेरे पूर्वजोंने जिसकी सदा निन्दा की है, वह पापपर ही दृष्टि रखनेवाली बुद्धि तुझमें कैसे उत्पन्न हो गयी ? ॥ १९ ॥

अस्मिन् कुले हि सर्वेषां ज्येष्ठो राज्येऽभिषिच्यते । अपरे भ्रातरस्तस्मिन् प्रवर्तन्ते समाहिताः ॥ २० ॥

भावार्थ

‘इस कुलमें जो सबसे बड़ा होता है, उसीका राज्याभिषेक होता है; दूसरे भाई सावधानीके साथ बड़ेकी आज्ञाके अधीन रहकर कार्य करते हैं ॥ २० ॥

न हि मन्ये नृशंसे त्वं राजधर्ममवेक्षसे । गतिं वा न विजानासि राजवृत्तस्य शाश्वतीम् ॥ २१ ॥

भावार्थ

‘क्रूर स्वभाववाली कैकेयि ! मेरी समझमें तू राजधर्मपर दृष्टि नहीं रखती है अथवा उसे बिल्कुल नहीं जानती। राजाओंके बर्तावका जो सनातन स्वरूप है, उसका भी तुझे ज्ञान नहीं है ॥ २१ ॥

सततं राजपुत्रेषु ज्येष्ठो राजाभिषिच्यते । राज्ञामेतत् समं तत् स्यादिक्ष्वाकूणां विशेषतः ॥ २२ ॥

भावार्थ

‘राजकुमारोंमें जो ज्येष्ठ होता है, सदा उसीका राजाके पदपर अभिषेक किया जाता है । सभी राजाओंके यहाँ समान रूपसे इस नियमका पालन होता है । इक्ष्वाकुवंशी नरेशोंके कुलमें इसका विशेष आदर है ॥ २२ ॥

तेषां धर्मैकरक्षाणां कुलचारित्रशोभिनाम् । अद्य चारित्रशौटीर्यं त्वां प्राप्य विनिवर्तितम् ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘जिनकी एकमात्र धर्मसे ही रक्षा होती आयी है तथा जो कुलोचित सदाचारके पालनसे ही सुशोभित हुए हैं, उनका यह चरित्रविषयक अभिमान आज तुझे पाकर—तेरे सम्बन्धके कारण दूर हो गया ॥ २३ ॥

तवापि सुमहाभागे जनेन्द्रकुलपूर्वके । बुद्धिमोहः कथमयं सम्भूतस्त्वयि गर्हितः ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘महाभागे ! तेरा जन्म भी तो महाराज केकयके कुलमें हुआ है, फिर तेरे हृदयमें यह निन्दित बुद्धिमोह कैसे उत्पन्न हो गया ? ॥ २४ ॥

न तु कामं करिष्यामि तवाहं पापनिश्चये । यया व्यसनमारब्धं जीवितान्तकरं मम ॥ २५ ॥

भावार्थ

‘अरी ! तेरा विचार बड़ा ही पापपूर्ण है । मैं तेरी इच्छा कदापि नहीं पूर्ण करूँगा । तूने मेरे लिये उस विपत्तिकी नींव डाल दी है, जो मेरे प्राणतक ले सकती है ॥ २५ ॥

एष त्विदानीमेवाहमप्रियार्थं तवानघम् । निवर्तयिष्यामि वनाद् भ्रातरं स्वजनप्रियम् ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘यह ले, मैं अभी तेरा अप्रिय करनेके लिये तुल गया हूँ । मैं वनसे निष्पाप भ्राता श्रीरामको, जो स्वजनोंके प्रिय हैं, लौटा लाऊँगा ॥ २६ ॥

निवर्तयित्वा रामं च तस्याहं दीप्ततेजसः । दासभूतो भविष्यामि सुस्थितेनान्तरात्मना ॥ २७ ॥

भावार्थ

श्रीरामको लौटा लाकर उद्दीप्त तेजवाले उन्हीं महापुरुषका दास बनकर स्वस्थचित्तसे जीवन व्यतीत करूँगा’ ॥ २७ ॥

इत्येवमुक्त्वा भरतो महात्मा प्रियेतरैर्वाक्यगणैस्तुदंस्ताम् । शोकार्दितश्चापि ननाद भूयः सिंहो यथा मन्दरकन्दरस्थः ॥ २८ ॥

भावार्थ

ऐसा कहकर महात्मा भरत शोकसे पीड़ित हो पुनः जली-कटी बातोंसे कैकेयीको व्यथित करते हुए उसे जोर-जोरसे फटकारने लगे, मानो मन्दराचलकी गुहामें बैठा हुआ सिंह गरज रहा हो ॥ २८ ॥

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