अयोध्याकाण्ड, सर्ग 70
भरते ब्रुवति स्वप्नं दूतास्ते क्लान्तवाहनाः । प्रविश्यासह्यपरिखं रम्यं राजगृहं पुरम् ॥ १ ॥
भावार्थ
इस प्रकार भरत जब अपने मित्रोंको स्वप्नका वृत्तान्त बता रहे थे, उसी समय थके हुए वाहनोंवाले वे दूत उस रमणीय राजगृहपुरमें प्रविष्ट हुए, जिसकी खाईको लाँघनेका कष्ट शत्रुओंके लिये असह्य था ॥ १ ॥
समागम्य च राज्ञा ते राजपुत्रेण चार्चिताः । राज्ञः पादौ गृहीत्वा च तमूचुर्भरतं वचः ॥ २ ॥
भावार्थ
नगरमें आकर वे दूत केकयदेशके राजा और राजकुमारसे मिले तथा उन दोनोंने भी उनका सत्कार किया । फिर वे भावी राजा भरतके चरणोंका स्पर्श करके उनसे इस प्रकार बोले—॥ २ ॥
पुरोहितस्त्वां कुशलं प्राह सर्वे च मन्त्रिणः । त्वरमाणश्च निर्याहि कृत्यमात्ययिकं त्वया ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘कुमार ! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियोंने आपसे कुशल-मङ्गल कहा है । अब आप यहाँसे शीघ्र चलिये । अयोध्यामें आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है ॥ ३ ॥
इमानि च महार्हाणि वस्त्राण्याभरणानि च । प्रतिगृह्य विशालाक्ष मातुलस्य च दापय ॥ ४ ॥
भावार्थ
‘विशाल नेत्रोंवाले राजकुमार ! ये बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण आप स्वयं भी ग्रहण कीजिये और अपने मामाको भी दीजिये ॥ ४ ॥
अत्र विंशतिकोट्यस्तु नृपतेर्मातुलस्य ते । दशकोट्यस्तु सम्पूर्णास्तथैव च नृपात्मज ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘राजकुमार ! यहाँ जो बहुमूल्य सामग्री लायी गयी है, इसमें बीस करोड़की लागतका सामान आपके नाना केकय-नरेशके लिये है और पूरे दस करोड़की लागतका सामान आपके मामाके लिये है’ ॥ ५ ॥
प्रतिगृह्य तु तत् सर्वं स्वनुरक्तः सुहृज्जने । दूतानुवाच भरतः कामैः सम्प्रतिपूज्य तान् ॥ ६ ॥
भावार्थ
वे सारी वस्तुएँ लेकर मामा आदि सुहृदोंमें अनुराग रखनेवाले भरतने उन्हें भेंट कर दीं। तत्पश्चात् इच्छानुसार वस्तुएँ देकर दूतोंका सत्कार करनेके अनन्तर उनसे इस प्रकार कहा—॥ ६ ॥
कच्चित् स कुशली राजा पिता दशरथो मम । कच्चिदारोग्यता रामे लक्ष्मणे च महात्मनि ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘मेरे पिता महाराज दशरथ सकुशल तो हैं न ? महात्मा श्रीराम और लक्ष्मण नीरोग तो हैं न ? ॥ ७ ॥
आर्या च धर्मनिरता धर्मज्ञा धर्मवादिनी । अरोगा चापि कौसल्या माता रामस्य धीमतः ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘धर्मको जानने और धर्मकी ही चर्चा करनेवाली बुद्धिमान् श्रीरामकी माता धर्मपरायणा आर्या कौसल्याको तो कोई रोग या कष्ट नहीं है ? ॥ ८ ॥
कच्चित् सुमित्रा धर्मज्ञा जननी लक्ष्मणस्य या । शत्रुघ्नस्य च वीरस्य अरोगा चापि मध्यमा ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘क्या वीर लक्ष्मण और शत्रुघ्नकी जननी मेरी मझली माता धर्मज्ञा सुमित्रा स्वस्थ और सुखी हैं ? ॥ ९ ॥
आत्मकामा सदा चण्डी क्रोधना प्राज्ञमानिनी । अरोगा चापि मे माता कैकेयी किमुवाच ह ॥ १० ॥
भावार्थ
‘जो सदा अपना ही स्वार्थ सिद्ध करना चाहती और अपनेको बड़ी बुद्धिमती समझती है, उस उग्र स्वभाववाली कोपशीला मेरी माता कैकेयीको तो कोई कष्ट नहीं है ? उसने क्या कहा है ?’ ॥ १० ॥
एवमुक्तास्तु ते दूता भरतेन महात्मना । ऊचुः सम्प्रश्रितं वाक्यमिदं तं भरतं तदा ॥ ११ ॥
भावार्थ
महात्मा भरतके इस प्रकार पूछनेपर उस समय दूतोंने विनयपूर्वक उनसे यह बात कही—॥ ११ ॥
कुशलास्ते नरव्याघ्र येषां कुशलमिच्छसि । श्रीश्च त्वां वृणुते पद्मा युज्यतां चापि ते रथः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘पुरुषसिंह ! आपको जिनका कुशल-मङ्गल अभिप्रेत है, वे सकुशल हैं । हाथमें कमल लिये रहनेवाली लक्ष्मी (शोभा) आपका वरण कर रही है । अब यात्राके लिये शीघ्र ही आपका रथ जुतकर तैयार हो जाना चाहिये’ ॥ १२ ॥
भरतश्चापि तान् दूतानेवमुक्तोऽभ्यभाषत । आपृच्छेऽहं महाराजं दूताः संत्वरयन्ति माम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
उन दूतोंके ऐसा कहनेपर भरतने उनसे कहा—‘अच्छा मैं महाराजसे पूछता हूँ कि दूत मुझसे शीघ्र अयोध्या चलनेके लिये कह रहे हैं । आपकी क्या आज्ञा है ?’ ॥ १३ ॥
एवमुक्त्वा तु तान् दूतान् भरतः पार्थिवात्मजः । दूतैः संचोदितो वाक्यं मातामहमुवाच ह ॥ १४ ॥
भावार्थ
दूतोंसे ऐसा कहकर राजकुमार भरत उनसे प्रेरित हो नानाके पास जाकर बोले—॥ १४ ॥
राजन् पितुर्गमिष्यामि सकाशं दूतचोदितः । पुनरप्यहमेष्यामि यदा मे त्वं स्मरिष्यसि ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘राजन् ! मैं दूतोंके कहनेसे इस समय पिताजीके पास जा रहा हूँ । पुनः जब आप मुझे याद करेंगे, यहाँ आ जाऊँगा’ ॥ १५ ॥
भरतेनैवमुक्तस्तु नृपो मातामहस्तदा । तमुवाच शुभं वाक्यं शिरस्याघ्राय राघवम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
भरतके ऐसा कहनेपर नाना केकयनरेशने उस समय उन रघुकुलभूषण भरतका मस्तक सूँघकर यह शुभ वचन कहा—॥ १६ ॥
गच्छ तातानुजाने त्वां कैकेयी सुप्रजास्त्वया । मातरं कुशलं ब्रूयाः पितरं च परंतप ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘तात ! जाओ, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ । तुम्हें पाकर कैकेयी उत्तम संतानवाली हो गयी । शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर ! तुम अपनी माता और पितासे यहाँका कुशल-समाचार कहना ॥ १७ ॥
पुरोहितं च कुशलं ये चान्ये द्विजसत्तमाः । तौ च तात महेष्वासौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥ १८ ॥
भावार्थ
‘तात ! अपने पुरोहितजीसे तथा अन्य जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हों, उनसे भी मेरा कुशल-मङ्गल कहना । उन महाधनुर्धर दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणसे भी यहाँका कुशल-समाचार सुना देना’ ॥ १८ ॥
तस्मै हस्त्युत्तमांश्चित्रान् कम्बलानजिनानि च । सत्कृत्य केकयो राजा भरताय ददौ धनम् ॥ १९ ॥
भावार्थ
ऐसा कहकर केकयनरेशने भरतका सत्कार करके उन्हें बहुत-से उत्तम हाथी, विचित्र कालीन, मृगचर्म और बहुत-सा धन दिये ॥ १९ ॥
अन्तःपुरेऽतिसंवृद्धान् व्याघ्रवीर्यबलोपमान् । दंष्ट्रायुक्तान् महाकायाञ्शुनश्चोपायनं ददौ ॥ २० ॥
भावार्थ
जो अन्तःपुरमें पाल-पोसकर बड़े किये गये थे, बल और पराक्रममें बाघोंके समान थे, जिनकी दाढ़ें बड़ी-बड़ी और काया विशाल थी, ऐसे बहुत-से कुत्ते भी केकयनरेशने भरतको भेंटमें दिये ॥ २० ॥
रुक्मनिष्कसहस्रे द्वे षोडशाश्वशतानि च । सत्कृत्य केकयीपुत्रं केकयो धनमादिशत् ॥ २१ ॥
भावार्थ
दो हजार सोनेकी मोहरें और सोलह सौ घोड़े भी दिये । इस प्रकार केकयनरेशने केकयीकुमार भरतको सत्कारपूर्वक बहुत-सा धन दिया ॥ २१ ॥
तदामात्यानभिप्रेतान् विश्वास्यांश्च गुणान्वितान् । ददावश्वपतिः शीघ्रं भरतायानुयायिनः ॥ २२ ॥
भावार्थ
उस समय केकयनरेश अश्वपतिने अपने अभीष्ट, विश्वासपात्र और गुणवान् मन्त्रियोंको भरतके साथ जानेके लिये शीघ्र आज्ञा दी ॥ २२ ॥
ऐरावतानैन्द्रशिरान् नागान् वै प्रियदर्शनान् । खराञ्शीघ्रान् सुसंयुक्तान् मातुलोऽस्मै धनं ददौ ॥ २३ ॥
भावार्थ
भरतके मामाने उन्हें उपहारमें दिये जानेवाले फलके रूपमें इरावान् पर्वत और इन्द्रशिर नामक स्थानके आस-पास उत्पन्न होनेवाले बहुत-से सुन्दर-सुन्दर हाथी तथा तेज चलनेवाले सुशिक्षित खच्चर दिये ॥ २३ ॥
स दत्तं केकयेन्द्रेण धनं तन्नाभ्यनन्दत । भरतः केकयीपुत्रो गमनत्वरया तदा ॥ २४ ॥ बभूव ह्यस्य हृदये चिन्ता सुमहती तदा । त्वरया चापि दूतानां स्वप्नस्यापि च दर्शनात् ॥ २५ ॥ स स्ववेश्माभ्यतिक्रम्य नरनागाश्वसंकुलम् । प्रपेदे सुमहच्छ्रीमान् राजमार्गमनुत्तमम् ॥ २६ ॥
भावार्थ
उस समय जानेकी जल्दी होनेके कारण केकयीपुत्र भरतने केकयराजके दिये हुए उस धनका अभिनन्दन नहीं किया ॥ उस अवसरपर उनके हृदयमें बड़ी भारी चिन्ता हो रही थी । इसके दो कारण थे, एक तो दूत वहाँसे चलनेकी जल्दी मचा रहे थे, दूसरे उन्हें दुःस्वप्नका दर्शन भी हुआ था ॥ वे यात्राकी तैयारीके लिये पहले अपने आवासस्थानपर गये । फिर वहाँसे निकलकर मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंसे भरे हुए परम उत्तम राजमार्गपर गये । उस समय भरतजीके पास बहुत बड़ी सम्पत्ति जुट गयी-थी ॥ २६ ॥
अभ्यतीत्य ततोऽपश्यदन्तःपुरमनुत्तमम् । ततस्तद् भरतः श्रीमानाविवेशानिवारितः ॥ २७ ॥
भावार्थ
सड़कको पार करके श्रीमान् भरतने राजभवनके परम उत्तम अन्तःपुरका दर्शन किया और उसमें वे बेरोक-टोक घुस गये ॥ २७ ॥
स मातामहमापृच्छ्य मातुलं च युधाजितम् । रथमारुह्य भरतः शत्रुघ्नसहितो ययौ ॥ २८ ॥ रथान् मण्डलचक्रांश्च योजयित्वा परः शतम् । उष्ट्रगोऽश्वखरैर्भृत्या भरतं यान्तमन्वयुः ॥ २९ ॥
भावार्थ
वहाँ नाना, नानी, मामा युधाजित् और मामीसे विदा ले शत्रुघ्नसहित रथपर सवार हो भरतने यात्रा आरम्भ की ॥ गोलाकार पहियेवाले सौसे भी अधिक रथोंमें ऊँट, बैल, घोड़े और खच्चर जोतकर सेवकोंने जाते हुए भरतका अनुसरण किया ॥ २९ ॥
बलेन गुप्तो भरतो महात्मा सहार्यकस्यात्मसमैरमात्यैः । आदाय शत्रुघ्नमपेतशत्रु- र्गृहाद् ययौ सिद्ध इवेन्द्रलोकात् ॥ ३० ॥
भावार्थ
शत्रुहीन महामना भरत अपनी और मामाकी सेनासे सुरक्षित हो शत्रुघ्नको अपने साथ रथपर लेकर नानाके अपने ही समान माननीय मन्त्रियोंके साथ मामाके घरसे चले; मानो कोई सिद्ध पुरुष इन्द्रलोकसे किसी अन्य स्थानके लिये प्रस्थित हुआ हो ॥ ३० ॥
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