Ramayana.com

अयोध्याकाण्ड, सर्ग 71

स प्राङ्मुखो राजगृहादभिनिर्याय वीर्यवान् । ततः सुदामां द्युतिमान् संतीर्यावेक्ष्य तां नदीम् ॥ १ ॥ ह्लादिनीं दूरपारां च प्रत्यक्स्रोतस्तरङ्गिणीम् । शतद्रुमतरच्छ्रीमान् नदीमिक्ष्वाकुनन्दनः ॥ २ ॥

भावार्थ

राजगृहसे निकलकर पराक्रमी भरत पूर्वदिशाकी ओर चले ।* उन तेजस्वी राजकुमारने मार्गमें सुदामा नदीका दर्शन करके उसे पार किया। तत्पश्चात् इक्ष्वाकुनन्दन श्रीमान् भरतने, जिसका पाट दूरतक फैला हुआ था, उस ह्लादिनी नदीको लाँघकर पश्चिमाभिमुख बहनेवाली शतद्रु नदी ( सतलज ) को पार किया ॥ १-२ ॥

ऐलधाने नदीं तीर्त्वा प्राप्य चापरपर्वतान् । शिलामाकुर्वतीं तीर्त्वा आग्नेयं शल्यकर्षणम् ॥ ३ ॥

भावार्थ

वहाँसे ऐलधान नामक गाँवमें जाकर वहाँ बहनेवाली नदीको पार किया । तत्पश्चात् वे अपरपर्वत नामक जनपदमें गये । वहाँ शिला नामकी नदी बहती थी, जो अपने भीतर पड़ी हुई वस्तुको शिलास्वरूप बना देती थी । उसे पार करके भरत वहाँसे आग्नेय कोणमें स्थित शल्यकर्षण नामक देशमें गये, जहाँ शरीरसे काँटेको निकालनेमें सहायता करनेवाली ओषधि उपलब्ध होती थी ॥ ३ ॥

सत्यसंधः शुचिर्भूत्वा प्रेक्षमाणः शिलावहाम् । अभ्यगात् स महाशैलान् वनं चैत्ररथं प्रति ॥ ४ ॥

भावार्थ

तदनन्तर सत्यप्रतिज्ञ भरतने पवित्र होकर शिलावहा नामक नदीका दर्शन किया ( जो अपनी प्रखर धारासे शिलाखण्डों—बड़ी-बड़ी चट्टानोंको भी बहा ले जानेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध थी ) । उस नदीका दर्शन करके वे आगे बढ़ गये और बड़े-बड़े पर्वतोंको लाँघते हुए चैत्ररथ नामक वनमें जा पहुँचे ॥ ४ ॥

सरस्वतीं च गङ्गां च युग्मेन प्रतिपद्य च । उत्तरान् वीरमत्स्यानां भारुण्डं प्राविशद् वनम् ॥ ५ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् पश्चिमवाहिनी सरस्वती तथा गङ्गाकी धारा-विशेषके सङ्गमसे होते हुए उन्होंने वीरमत्स्य देशके उत्तरवर्ती देशोंमें पदार्पण किया और वहाँसे आगे बढ़कर वे भारुण्डवनके भीतर गये ॥ ५ ॥

वेगिनीं च कुलिङ्गाख्यां ह्लादिनीं पर्वतावृताम् । यमुनां प्राप्य संतीर्णो बलमाश्वासयत् तदा ॥ ६ ॥

भावार्थ

फिर अत्यन्त वेगसे बहनेवाली तथा पर्वतोंसे घिरी होनेके कारण अपने प्रखर प्रवाहके द्वारा कलकल नाद करनेवाली कुलिङ्गा नदीको पार करके यमुनाके तटपर पहुँचकर उन्होंने सेनाको विश्राम कराया ॥ ६ ॥

शीतीकृत्य तु गात्राणि क्लान्तानाश्वास्य वाजिनः । तत्र स्नात्वा च पीत्वा च प्रायादादाय चोदकम् ॥ ७ ॥ राजपुत्रो महारण्यमनभीक्ष्णोपसेवितम् । भद्रो भद्रेण यानेन मारुतः खमिवात्यगात् ॥ ८ ॥

भावार्थ

थके हुए घोड़ोंको नहलाकर उनके अङ्गोंको शीतलता प्रदान करके उन्हें छायामें घास आदि देकर आराम करनेका अवसर दे राजकुमार भरत स्वयं भी स्नान और जलपान करके रास्तेके लिये जल साथ ले आगे बढ़े । मङ्गलाचारसे युक्त हो माङ्गलिक रथके द्वारा उन्होंने, जिसमें मनुष्योंका बहुधा आना-जाना या रहना नहीं होता था, उस विशाल वनको उसी प्रकार वेगपूर्वक पार किया, जैसे वायु आकाशको लाँघ जाती है ॥ ७-८ ॥

भागीरथीं दुष्प्रतरां सोंऽशुधाने महानदीम् । उपायाद् राघवस्तूर्णं प्राग्वटे विश्रुते पुरे ॥ ९ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् अंशुधान नामक ग्रामके पास महानदी भागीरथी गङ्गाको दुस्तर जानकर रघुनन्दन भरत तुरंत ही प्राग्वट नामसे विख्यात नगरमें आ गये ॥ ९ ॥

स गङ्गां प्राग्वटे तीर्त्वा समायात् कुटिकोष्ठिकाम् । सबलस्तां स तीर्त्वाथ समगाद् धर्मवर्धनम् ॥ १० ॥

भावार्थ

प्राग्वट नगरमें गङ्गाको पार करके वे कुटिकोष्ठिका नामवाली नदीके तटपर आये और सेनासहित उसको भी पार करके धर्मवर्धन नामक ग्राममें जा पहुँचे ॥ १० ॥

तोरणं दक्षिणार्धेन जम्बूप्रस्थं समागमत् । वरूथं च ययौ रम्यं ग्रामं दशरथात्मजः ॥ ११ ॥

भावार्थ

वहाँसे तोरण ग्रामके दक्षिणार्ध भागमें होते हुए जम्बूप्रस्थमें गये । तदनन्तर दशरथकुमार भरत एक रमणीय ग्राममें गये, जो वरूथके नामसे विख्यात था ॥ ११ ॥

तत्र रम्ये वने वासं कृत्वासौ प्राङ्मुखो ययौ । उद्यानमुज्जिहानायाः प्रियका यत्र पादपाः ॥ १२ ॥

भावार्थ

वहाँ एक रमणीय वनमें निवास करके वे प्रातःकाल पूर्व दिशाकी ओर गये । जाते-जाते उज्जिहाना नगरीके उद्यानमें पहुँच गये, जहाँ कदम्ब नामवाले वृक्षोंकी बहुतायत थी ॥ १२ ॥

स तांस्तु प्रियकान् प्राप्य शीघ्रानास्थाय वाजिनः । अनुज्ञाप्याथ भरतो वाहिनीं त्वरितो ययौ ॥ १३ ॥

भावार्थ

उन कदम्बोंके उद्यानमें पहुँचकर अपने रथमें शीघ्रगामी घोड़ोंको जोतकर सेनाको धीरे-धीरे आनेकी आज्ञा दे भरत तीव्रगतिसे चल दिये ॥ १३ ॥

वासं कृत्वा सर्वतीर्थे तीर्त्वा चोत्तानिकां नदीम् । अन्या नदीश्च विविधैः पार्वतीयैस्तुरङ्गमैः ॥ १४ ॥ हस्तिपृष्ठकमासाद्य कुटिकामप्यवर्तत । ततार च नरव्याघ्रो लोहित्ये च कपीवतीम् ॥ १५ ॥

भावार्थ

तत्पश्चात् सर्वतीर्थ नामक ग्राममें एक रात रहकर उत्तानिका नदी तथा अन्य नदियोंको भी नाना प्रकारके पर्वतीय घोड़ोंद्वारा जुते हुए रथसे पार करके नरश्रेष्ठ भरतजी हस्तिपृष्ठक नामक ग्राममें जा पहुँचे । वहाँसे आगे जानेपर उन्होंने कुटिका नदी पार की । फिर लोहित्य नामक ग्राममें पहुँचकर कपीवती नामक नदीको पार किया ॥ १४-१५ ॥

एकसाले स्थाणुमतीं विनते गोमतीं नदीम् । कलिङ्गनगरे चापि प्राप्य सालवनं तदा ॥ १६ ॥

भावार्थ

फिर एकसाल नगरके पास स्थाणुमती और विनत-ग्रामके निकट गोमती नदीको पार करके वे तुरंत ही कलिङ्गनगरके पास सालवनमें जा पहुँचे ॥ १६ ॥

भरतः क्षिप्रमागच्छत् सुपरिश्रान्तवाहनः । वनं च समतीत्याशु शर्वर्यामरुणोदये ॥ १७ ॥ अयोध्यां मनुना राज्ञा निर्मितां स ददर्श ह । तां पुरीं पुरुषव्याघ्रः सप्तरात्रोषितः पथि ॥ १८ ॥

भावार्थ

वहाँ जाते-जाते भरतके घोड़े थक गये । तब उन्हें विश्राम देकर वे रातों-रात शीघ्र ही सालवनको लाँघ गये और अरुणोदयकालमें राजा मनुकी बसायी हुई अयोध्यापुरीका उन्होंने दर्शन किया । पुरुषसिंह भरत मार्गमें सात रातें व्यतीत करके आठवें दिन अयोध्यापुरीका दर्शन कर सके थे ॥ १७-१८ ॥

अयोध्यामग्रतो दृष्ट्वा सारथिं चेदमब्रवीत् । एषा नातिप्रतीता मे पुण्योद्याना यशस्विनी ॥ १९ ॥ अयोध्या दृश्यते दूरात् सारथे पाण्डुमृत्तिका । यज्विभिर्गुणसम्पन्नैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥ २० ॥ भूयिष्ठमृद्धैराकीर्णा राजर्षिवरपालिता ।

भावार्थ

सामने अयोध्यापुरीको देखकर वे अपने सारथिसे इस प्रकार बोले—‘सूत ! पवित्र उद्यानोंसे सुशोभित यह यशस्विनी नगरी आज मुझे अधिक प्रसन्न नहीं दिखायी देती है । यह वही नगरी है, जहाँ निरन्तर यज्ञ-याग करनेवाले गुणवान् और वेदोंके पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मण निवास करते हैं, जहाँ बहुत-से धनियोंकी भी बस्ती है तथा राजर्षियोंमें श्रेष्ठ महाराज दशरथ जिसका पालन करते हैं, वही अयोध्या इस समय दूरसे सफेद मिट्टीके ढूहकी भाँति दीख रही है ॥ १९-२०½ ॥

अयोध्यायां पुरा शब्दः श्रूयते तुमुलो महान् ॥ २१ ॥ समन्तान्नरनारीणां तमद्य न शृणोम्यहम् ।

भावार्थ

‘पहले अयोध्यामें चारों ओर नर-नारियोंका महान् तुमुलनाद सुनायी पड़ता था; परंतु आज मैं उसे नहीं सुन रहा हूँ ॥ २१½ ॥

उद्यानानि हि सायाह्ने क्रीडित्वोपरतैर्नरैः ॥ २२ ॥ समन्ताद् विप्रधावद्भिः प्रकाशन्ते ममान्यथा । तान्यद्यानुरुदन्तीव परित्यक्तानि कामिभिः ॥ २३ ॥

भावार्थ

‘सायंकालके समय लोग उद्यानोंमें प्रवेश करके वहाँ क्रीड़ा करते और उस क्रीड़ासे निवृत्त होकर सब ओरसे अपने घरोंकी ओर दौड़ते थे, अतः उस समय इन उद्यानोंकी अपूर्व शोभा होती थी, परंतु आज ये मुझे कुछ और ही प्रकारके दिखायी देते हैं । वे ही उद्यान आज कामी जनोंसे परित्यक्त होकर रोते हुए-से प्रतीत होते हैं ॥ २२-२३ ॥

अरण्यभूतेव पुरी सारथे प्रतिभाति माम् । नह्यत्र यानैर्दृश्यन्ते न गजैर्न च वाजिभिः । निर्यान्तो वाभियान्तो वा नरमुख्या यथा पुरा ॥ २४ ॥

भावार्थ

‘सारथे ! यह पुरी मुझे जंगल-सी जान पड़ती है । अब यहाँ पहलेकी भाँति घोड़ों, हाथियों तथा दूसरी-दूसरी सवारियोंसे आते-जाते हुए श्रेष्ठ मनुष्य नहीं दिखायी दे रहे हैं ॥ २४ ॥

उद्यानानि पुरा भान्ति मत्तप्रमुदितानि च । जनानां रतिसंयोगेष्वत्यन्तगुणवन्ति च ॥ २५ ॥ तान्येतान्यद्य पश्यामि निरानन्दानि सर्वशः । स्रस्तपर्णैरनुपथं विक्रोशद्भिरिव द्रुमैः ॥ २६ ॥

भावार्थ

‘जो उद्यान पहले मदमत्त एवं आनन्दमग्न भ्रमरों, कोकिलों और नर-नारियोंसे भरे प्रतीत होते थे तथा लोगोंके प्रेम-मिलनके लिये अत्यन्त गुणकारी ( अनुकूल सुविधाओंसे सम्पन्न ) थे, उन्हींको आज मैं सर्वथा आनन्दशून्य देख रहा हूँ । वहाँ मार्गपर वृक्षोंके जो पत्ते गिर रहे हैं, उनके द्वारा मानो वे वृक्ष करुण क्रन्दन कर रहे हैं ( और उनसे उपलक्षित होनेके कारण वे उद्यान आनन्दहीन प्रतीत होते हैं ) ॥ २५-२६ ॥

नाद्यापि श्रूयते शब्दो मत्तानां मृगपक्षिणाम् । सरक्तां मधुरां वाणीं कलं व्याहरतां बहु ॥ २७ ॥

भावार्थ

‘रागयुक्त मधुर कलरव करनेवाले मतवाले मृगों और पक्षियोंका तुमुल शब्द अभीतक सुनायी नहीं पड़ रहा है ॥ २७ ॥

चन्दनागुरुसम्पृक्तो धूपसम्मूर्च्छितोऽमलः । प्रवाति पवनः श्रीमान् किं नु नाद्य यथा पुरा ॥ २८ ॥

भावार्थ

‘चन्दन और अगुरुकी सुगन्धसे मिश्रित तथा धूपकी मनोहर गन्धसे व्याप्त निर्मल मनोरम समीर आज पहलेकी भाँति क्यों नहीं प्रवाहित हो रहा है ? ॥ २८ ॥

भेरीमृदङ्गवीणानां कोणसंघट्टितः पुनः । किमद्य शब्दो विरतः सदादीनगतिः पुरा ॥ २९ ॥

भावार्थ

‘वादनदण्डद्वारा बजायी जानेवाली भेरी, मृदङ्ग और वीणाका जो आघातजनित शब्द होता है, वह पहले अयोध्यामें सदा होता रहता था, कभी उसकी गति अवरुद्ध नहीं होती थी; परंतु आज वह शब्द न जाने क्यों बंद हो गया है ? ॥ २९ ॥

अनिष्टानि च पापानि पश्यामि विविधानि च । निमित्तान्यमनोज्ञानि तेन सीदति मे मनः ॥ ३० ॥

भावार्थ

‘मुझे अनेक प्रकारके अनिष्टकारी, क्रूर और अशुभसूचक अपशकुन दिखायी दे रहे हैं, जिससे मेरा मन खिन्न हो रहा है ॥ ३० ॥

सर्वथा कुशलं सूत दुर्लभं मम बन्धुषु । तथा ह्यसति सम्मोहे हृदयं सीदतीव मे ॥ ३१ ॥

भावार्थ

‘सारथे ! इससे प्रतीत होता है कि इस समय मेरे बान्धवोंको कुशल-मङ्गल सर्वथा दुर्लभ है, तभी तो मोहका कोई कारण न होनेपर भी मेरा हृदय बैठा जा रहा है’ ॥ ३१ ॥

विषण्णः श्रान्तहृदयस्त्रस्तः संलुलितेन्द्रियः । भरतः प्रविवेशाशु पुरीमिक्ष्वाकुपालिताम् ॥ ३२ ॥

भावार्थ

भरत मन-ही-मन बहुत खिन्न थे । उनका हृदय शिथिल हो रहा था । वे डरे हुए थे और उनकी सारी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो उठी थीं, इसी अवस्थामें उन्होंने शीघ्रतापूर्वक इक्ष्वाकुवंशी राजाओंद्वारा पालित अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया ॥ ३२ ॥

द्वारेण वैजयन्तेन प्राविशच्छ्रान्तवाहनः । द्वाःस्थैरुत्थाय विजयमुक्तस्तैः सहितो ययौ ॥ ३३ ॥

भावार्थ

पुरीके द्वारपर सदा वैजयन्ती पताका फहरानेके कारण उस द्वारका नाम वैजयन्त रखा गया था । ( यह पुरीके पश्चिम भागमें था । ) उस वैजयन्तद्वारसे भरत पुरीके भीतर प्रविष्ट हुए । उस समय उनके रथके घोड़े बहुत थके हुए थे । द्वारपालोंने उठकर कहा—‘महाराजकी जय हो !’ फिर वे उनके साथ आगे बढ़े ॥ ३३ ॥

स त्वनेकाग्रहृदयो द्वाःस्थं प्रत्यर्च्य तं जनम् । सूतमश्वपतेः क्लान्तमब्रवीत् तत्र राघवः ॥ ३४ ॥

भावार्थ

भरतका हृदय एकाग्र नहीं था—वे घबराये हुए थे । अतः उन रघुकुलनन्दन भरतने साथ आये हुए द्वारपालोंको सत्कारपूर्वक लौटा दिया और केकयराज अश्वपतिके थके-माँदे सारथिसे वहाँ इस प्रकार कहा—॥ ३४ ॥

किमहं त्वरयाऽऽनीतः कारणेन विनानघ । अशुभाशङ्कि हृदयं शीलं च पततीव मे ॥ ३५ ॥

भावार्थ

‘निष्पाप सूत ! मैं बिना कारण ही इतनी उतावलीके साथ क्यों बुलाया गया ? इस बातका विचार करके मेरे हृदयमें अशुभकी आशङ्का होती है । मेरा दीनतारहित स्वभाव भी अपनी स्थितिसे भ्रष्ट-सा हो रहा है ॥ ३५ ॥

श्रुता नु यादृशाः पूर्वं नृपतीनां विनाशने । आकारांस्तानहं सर्वानिह पश्यामि सारथे ॥ ३६ ॥

भावार्थ

‘सारथे ! अबसे पहले मैंने राजाओंके विनाशके जैसे-जैसे लक्षण सुन रखे हैं, उन सभी लक्षणोंको आज मैं यहाँ देख रहा हूँ ॥ ३६ ॥

सम्मार्जनविहीनानि परुषाण्युपलक्षये । असंयतकवाटानि श्रीविहीनानि सर्वशः ॥ ३७ ॥ बलिकर्मविहीनानि धूपसम्मोदनेन च । अनाशितकुटुम्बानि प्रभाहीनजनानि च ॥ ३८ ॥ अलक्ष्मीकानि पश्यामि कुटुम्बिभवनान्यहम् ।

भावार्थ

‘मैं देखता हूँ—गृहस्थोंके घरोंमें झाड़ू नहीं लगी है । वे रूखे और श्रीहीन दिखायी देते हैं । इनकी किवाड़ें खुली हैं । इन घरोंमें बलिवैश्वदेवकर्म नहीं हो रहे हैं । ये धूपकी सुगन्धसे वञ्चित हैं । इनमें रहनेवाले कुटुम्बीजनोंको भोजन नहीं प्राप्त हुआ है तथा ये सारे गृह प्रभाहीन ( उदास ) दिखायी देते हैं । जान पड़ता है—इनमें लक्ष्मीका निवास नहीं है ॥ ३७-३८½ ॥

अपेतमाल्यशोभानि असम्मृष्टाजिराणि च ॥ ३९ ॥ देवागाराणि शून्यानि न भान्तीह यथा पुरा ।

भावार्थ

‘देवमन्दिर फूलोंसे सजे हुए नहीं दिखायी देते। इनके आँगन झाड़े-बुहारे नहीं गये हैं। ये मनुष्योंसे सूने हो रहे हैं, अतएव इनकी पहले-जैसी शोभा नहीं हो रही है ॥ ३९½ ॥

देवतार्चाः प्रविद्धाश्च यज्ञगोष्ठास्तथैव च ॥ ४० ॥ माल्यापणेषु राजन्ते नाद्य पण्यानि वा तथा । दृश्यन्ते वणिजोऽप्यद्य न यथापूर्वमत्र वै ॥ ४१ ॥ ध्यानसंविग्नहृदया नष्टव्यापारयन्त्रिताः ।

भावार्थ

‘देवप्रतिमाओंकी पूजा बंद हो गयी है । यज्ञ-शालाओंमें यज्ञ नहीं हो रहे हैं। फूलों और मालाओंके बाजारमें आज बिकनेकी कोई वस्तुएँ नहीं शोभित हो रही हैं । यहाँ पहलेके समान बनिये भी आज नहीं दिखायी देते हैं। चिन्तासे उनका हृदय उद्विग्न जान पड़ता है । और अपना व्यापार नष्ट हो जानेके कारण वे संकुचित हो रहे हैं ॥ ४०-४१½ ॥

देवायतनचैत्येषु दीनाः पक्षिमृगास्तथा ॥ ४२ ॥ मलिनं चाश्रुपूर्णाक्षं दीनं ध्यानपरं कृशम् । सस्त्रीपुंसं च पश्यामि जनमुत्कण्ठितं पुरे ॥ ४३ ॥

भावार्थ

‘देवालयों तथा चैत्य ( देव ) वृक्षोंपर जिनका निवास है, वे पशु-पक्षी दीन दिखायी दे रहे हैं। मैं देखता हूँ, नगरके सभी स्त्री-पुरुषोंका मुख मलिन है, उनकी आँखोंमें आँसू भरे हैं और वे सब-के-सब दीन, चिन्तित, दुर्बल तथा उत्कण्ठित हैं’ ॥ ४२-४३ ॥

इत्येवमुक्त्वा भरतः सूतं तं दीनमानसः। तान्यनिष्टान्ययोध्यायां प्रेक्ष्य राजगृहं ययौ ॥ ४४ ॥

भावार्थ

सारथिसे ऐसा कहकर अयोध्यामें होनेवाले उन अनिष्ट-सूचक चिह्नोंको देखते हुए भरत मन-ही-मन दुखी हो राजमहलमें गये ॥ ४४ ॥

तां शून्यशृङ्गाटकवेश्मरथ्यां रजोरुणद्वारकवाटयन्त्राम् । दृष्ट्वा पुरीमिन्द्रपुरीप्रकाशां दुःखेन सम्पूर्णतरो बभूव ॥ ४५ ॥

भावार्थ

जो अयोध्यापुरी कभी देवराज इन्द्रकी नगरीके समान शोभा पाती थी, उसीके चौराहे, घर और सड़कें आज सूनी दिखायी देती थीं तथा दरवाजोंकी किवाड़ें धूलि-धूसर हो रही थीं, उसकी ऐसी दुर्दशा देख भरत पूर्णतः दुःखमें निमग्न हो गये ॥ ४५ ॥

बभूव पश्यन् मनसोऽप्रियाणि यान्यन्यदा नास्य पुरे बभूवुः । अवाक्शिरा दीनमना न दृष्टः पितुर्महात्मा प्रविवेश वेश्म ॥ ४६ ॥

भावार्थ

उस नगरमें जो पहले कभी नहीं हुई थीं, ऐसी अप्रिय बातोंको देखकर महात्मा भरतने अपना मस्तक नीचेको झुका लिया, उनका हर्ष छिन गया और उन्होंने दीन-हृदयसे पिताके भवनमें प्रवेश किया ॥

Ramayan appFree. No ads. Works offline.Install

गीताप्रेस, गोरखपुर का संस्करण। पुस्तक खरीदें