अयोध्याकाण्ड, सर्ग 69
यामेव रात्रिं ते दूताः प्रविशन्ति स्म तां पुरीम्। भरतेनापि तां रात्रि स्वप्नो दृष्टोऽयमप्रियः ॥ १ ॥ व्युष्टामेव तु तां रात्रि दृष्ट्वा तं स्वप्नमप्रियम्। पुत्रो राजाधिराजस्य सुभृशं पर्यतप्यत ॥ २ ॥
भावार्थ
जिस रातमें दूतोंने उस नगरमें प्रवेश किया था, उससे पहली रातमें भरतने भी एक अप्रिय स्वप्न देखा था ॥ रात बीतकर प्रायः सबेरा हो चला था तभी उस अप्रिय स्वप्नको देखकर राजाधिराज दशरथके पुत्र भरत मन-ही-मन बहुत संतप्त हुए ॥ २ ॥
तप्यमानं तमाज्ञाय वयस्याः प्रियवादिनः। आयासं विनयिष्यन्तः सभायां चक्रिरे कथाः ॥ ३ ॥
भावार्थ
उन्हें चिन्तित जान उनके अनेक प्रियवादी मित्रोंने उनका मानसिक क्लेश दूर करनेकी इच्छासे एक गोष्ठी की और उसमें अनेक प्रकारकी बातें करने लगे ॥ ३ ॥
वादयन्ति तदा शान्ति लासयन्त्यपि चापरे। नाटकान्यपरे स्माहुर्हास्यानि विविधानि च ॥ ४ ॥
भावार्थ
कुछ लोग वीणा आदि बजाने लगे। दूसरे लोग उनके खेदकी शान्तिके लिये नृत्य कराने लगे। दूसरे मित्रोंने नाना प्रकारके नाटकोंका आयोजन किया, जिनमें हास्यरसकी प्रधानता थी ॥ ४ ॥
स तैर्महात्मा भरतः सखिभिः प्रियवादिभिः। गोष्ठीहास्यानि कुर्वद्भिर्न प्राहृष्यत राघवः ॥ ५ ॥
भावार्थ
किंतु रघुकुलभूषण महात्मा भरत उन प्रियवादी मित्रोंकी गोष्ठीमें हास्यविनोद करनेपर भी प्रसन्न नहीं हुए ॥ ५ ॥
तमब्रवीत् प्रियसखो भरतं सखिभिर्वृतम्। सुहृद्भिः पर्युपासीनः किं सखे नानुमोदसे ॥ ६ ॥
भावार्थ
तब सुहृदोंसे घिरकर बैठे हुए एक प्रिय मित्रने मित्रोंके बीचमें विराजमान भरतसे पूछा—‘सखे ! तुम आज प्रसन्न क्यों नहीं होते हो ?’ ॥ ६ ॥
एवं ब्रुवाणं सुहृदं भरतः प्रत्युवाच ह। शृणु त्वं यन्निमित्तं मे दैन्यमेतदुपागतम् ॥ ७ ॥ स्वप्ने पितरमद्राक्षं मलिनं मुक्तमूर्धजम्। पतन्तमद्रिशिखरात् कलुषे गोमये ह्रदे ॥ ८ ॥
भावार्थ
इस प्रकार पूछते हुए सुहृद्को भरतने इस प्रकार उत्तर दिया—‘मित्र ! जिस कारणसे मेरे मनमें यह दैन्य आया है, वह बताता हूँ, सुनो। मैंने आज स्वप्नमें अपने पिताजीको देखा है। उनका मुख मलिन था, बाल खुले हुए थे और वे पर्वतकी चोटीसे एक ऐसे गंदे गढ़ेमें गिर पड़े थे, जिसमें गोबर भरा हुआ था ॥ ७-८ ॥
प्लवमानश्च मे दृष्टः स तस्मिन् गोमये ह्रदे । पिबन्नञ्जलिना तैलं हसन्निव मुहुर्मुहुः ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘मैंने उस गोबरके कुण्डमें उन्हें तैरते देखा था। वे अञ्जलिमें तेल लेकर पी रहे थे और बारंबार हँसते हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ९ ॥
ततस्तिलोदनं भुक्त्वा पुनः पुनरधःशिराः । तैलेनाभ्यक्तसर्वाङ्गस्तैलमेवान्वगाहत ॥ १० ॥
भावार्थ
‘फिर उन्होंने तिल और भात खाया । इसके बाद उनके सारे शरीरमें तेल लगाया गया और फिर वे सिर नीचे किये तैलमें ही गोते लगाने लगे ॥ १० ॥
स्वप्नेऽपि सागरं शुष्कं चन्द्रं च पतितं भुवि । उपरुद्धां च जगतीं तमसेव समावृताम् ॥ ११ ॥
भावार्थ
‘स्वप्नमें ही मैंने यह भी देखा है कि समुद्र सूख गया, चन्द्रमा पृथ्वीपर गिर पड़े हैं, सारी पृथ्वी उपद्रवसे ग्रस्त और अन्धकारसे आच्छादित-सी हो गयी है ॥ ११ ॥
औपवाह्यस्य नागस्य विषाणं शकलीकृतम् । सहसा चापि संशान्ता ज्वलिता जातवेदसः ॥ १२ ॥
भावार्थ
‘महाराजकी सवारीके काममें आनेवाले हाथीका दाँत टूक-टूक हो गया है और पहलेसे प्रज्वलित होती हुई आग सहसा बुझ गयी है ॥ १२ ॥
अवदीर्णां च पृथिवीं शुष्कांश्च विविधान् द्रुमान् । अहं पश्यामि विध्वस्तान् सधूमांश्चैव पर्वतान् ॥ १३ ॥
भावार्थ
‘मैंने यह भी देखा है कि पृथ्वी फट गयी है, नाना प्रकारके वृक्ष सूख गये हैं तथा पर्वत ढह गये हैं और उनसे धुआँ निकल रहा है ॥ १३ ॥
पीठे कार्ष्णायसे चैव निषण्णं कृष्णवाससम् । प्रहरन्ति स्म राजानं प्रमदाः कृष्णपिङ्गलाः ॥ १४ ॥
भावार्थ
‘काले लोहेकी चौकीपर महाराज दशरथ बैठे हैं । उन्होंने काला ही वस्त्र पहन रखा है और काले एवं पिङ्गलवर्णकी स्त्रियाँ उनके ऊपर प्रहार करती हैं ॥ १४ ॥
त्वरमाणश्च धर्मात्मा रक्तमाल्यानुलेपनः । रथेन खरयुक्तेन प्रयातो दक्षिणामुखः ॥ १५ ॥
भावार्थ
‘धर्मात्मा राजा दशरथ लाल रंगके फूलोंकी माला पहने और लाल चन्दन लगाये गधे जुते हुए रथपर बैठकर बड़ी तेजीके साथ दक्षिण दिशाकी ओर गये हैं ॥१५॥
प्रहसन्तीव राजानं प्रमदा रक्तवासिनी । प्रकर्षन्ती मया दृष्टा राक्षसी विकृतानना ॥ १६ ॥
भावार्थ
‘लाल वस्त्र धारण करनेवाली एक स्त्री, जो विकराल मुखवाली राक्षसी प्रतीत होती थी, महाराजको हँसती हुई-सी खींचकर लिये जा रही थी । यह दृश्य भी मेरे देखनेमें आया ॥ १६ ॥
एवमेतन्मया दृष्टमिमां रात्रिं भयावहाम् । अहं रामोऽथवा राजा लक्ष्मणो वा मरिष्यति ॥ १७ ॥
भावार्थ
‘इस प्रकार इस भयंकर रात्रिके समय मैंने यह स्वप्न देखा है । इसका फल यह होगा कि मैं, श्रीराम, राजा दशरथ अथवा लक्ष्मण—इनमेंसे किसी एककी अवश्य मृत्यु होगी ॥ १७ ॥
नरो यानेन यः स्वप्ने खरयुक्तेन याति हि । अचिरात्तस्य धूम्राग्रं चितायां सम्प्रदृश्यते ॥ १८ ॥ एतन्निमित्तं दीनोऽहं न वचः प्रतिपूजये । शुष्यतीव च मे कण्ठो न स्वस्थमिव मे मनः ॥ १९ ॥
भावार्थ
‘जो मनुष्य स्वप्नमें गधे जुते हुए रथसे यात्रा करता दिखायी देता है, उसकी चिताका धुआँ शीघ्र ही देखनेमें आता है । यही कारण है कि मैं दुखी हो रहा हूँ और आपलोगोंकी बातोंका आदर नहीं करता हूँ । मेरा गला सूखा-सा जा रहा है और मन अस्वस्थ-सा हो चला है ॥ १८–१९ ॥
न पश्यामि भयस्थानं भयं चैवोपधारये । भ्रष्टश्च स्वरयोगो मे छाया चापगता मम । जुगुप्स इव चात्मानं न च पश्यामि कारणम् ॥ २० ॥
भावार्थ
‘मैं भयका कोई कारण नहीं देखता तो भी भयको प्राप्त हो रहा हूँ । मेरा स्वर बदल गया है तथा मेरी कान्ति भी फीकी पड़ गयी है । मैं अपने-आपसे घृणा-सी करने लगा हूँ, परंतु इसका कारण क्या है, यह मेरी समझमें नहीं आता ॥ २० ॥
इमां च दुःस्वप्नगतिं निशाम्य हि त्वनेकरूपामवितर्कितां पुरा । भयं महत्तद्धृदयान्न याति मे विचिन्त्य राजानमचिन्त्यदर्शनम् ॥ २१ ॥
भावार्थ
‘जिनके विषयमें मैंने पहले कभी सोचातक नहीं था, ऐसे अनेक प्रकारके दुःस्वप्नोंको देखकर तथा महाराजका दर्शन इस रूपमें क्यों हुआ, जिसकी मेरे मनमें कोई कल्पना नहीं थी—यह सोचकर मेरे हृदयसे महान् भय दूर नहीं हो रहा है’ ॥ २१ ॥
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