अयोध्याकाण्ड, सर्ग 68
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा वसिष्ठः प्रत्युवाच ह । मित्रामात्यजनान् सर्वान् ब्राह्मणांस्तानिदं वचः ॥ १ ॥
भावार्थ
मार्कण्डेय आदिके ऐसे वचन सुनकर महर्षि वसिष्ठने मित्रों, मन्त्रियों और उन समस्त ब्राह्मणोंको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १ ॥
यदसौ मातुलकुले दत्तराज्यः परं सुखी । भरतो वसति भ्रात्रा शत्रुघ्नेन मुदान्वितः ॥ २ ॥
भावार्थ
‘राजा दशरथने जिनको राज्य दिया है, वे भरत इस समय अपने भाई शत्रुघ्नके साथ मामाके यहाँ बड़े सुख और प्रसन्नताके साथ निवास करते हैं ॥ २ ॥
तच्छीघ्रं जवना दूता गच्छन्तु त्वरितं हयैः । आनेतुं भ्रातरौ वीरौ किं समीक्षामहे वयम् ॥ ३ ॥
भावार्थ
‘उन दोनों वीर बन्धुओंको बुलानेके लिये शीघ्र ही तेज चलनेवाले दूत घोड़ोंपर सवार होकर यहाँसे जायँ, इसके सिवा हमलोग और क्या विचार कर सकते हैं ?’ ॥ ३ ॥
गच्छन्तिवति ततः सर्वे वसिष्ठं वाक्यमब्रुवन् । तेषां तद् वचनं श्रुत्वा वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ॥ ४ ॥
भावार्थ
इसपर सबने वसिष्ठजीसे कहा—‘हाँ, दूत अवश्य भेजे जायँ ।’ उनका वह कथन सुनकर वसिष्ठजीने दूतोंको सम्बोधित करके कहा—॥ ४ ॥
एहि सिद्धार्थ विजय जयन्ताशोकनन्दन । श्रूयतामितिकर्तव्यं सर्वानेव ब्रवीमि वः ॥ ५ ॥
भावार्थ
‘सिद्धार्थ ! विजय ! जयन्त ! अशोक ! और नन्दन ! तुम सब यहाँ आओ और तुम्हें जो काम करना है, उसे सुनो । मैं तुम सब लोगोंसे ही कहता हूँ ॥ ५ ॥
पुरं राजगृहं गत्वा शीघ्रं शीघ्रजवैर्हयैः । त्यक्तशोकैरिदं वाच्यः शासनाद् भरतो मम ॥ ६ ॥
भावार्थ
‘तुमलोग शीघ्रगामी घोड़ोंपर सवार होकर तुरंत ही राजगृह नगरको जाओ और शोकका भाव न प्रकट करते हुए मेरी आज्ञाके अनुसार भरतसे इस प्रकार कहो ॥ ६ ॥
पुरोहितस्त्वां कुशलं प्राह सर्वे च मन्त्रिणः । त्वरमाणश्च निर्याहि कृत्यमात्ययिकं त्वया ॥ ७ ॥
भावार्थ
‘कुमार ! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियोंने आपसे कुशल-मङ्गल कहा है । अब आप यहाँसे शीघ्र ही चलिये । अयोध्यामें आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है ॥ ७ ॥
मा चास्मै प्रोषितं रामं मा चास्मै पितरं मृतम् । भवन्तः शंसिषुर्गत्वा राघवाणामितः क्षयम् ॥ ८ ॥
भावार्थ
‘भरतको श्रीरामचन्द्रके वनवास और पिताकी मृत्युका हाल मत बतलाना और इन परिस्थितियोंके कारण रघुवंशियोंके यहाँ जो कुहराम मचा हुआ है, इसकी चर्चा भी न करना ॥ ८ ॥
कौशेयानि च वस्त्राणि भूषणानि वराणि च । क्षिप्रमादाय राज्ञश्च भरतस्य च गच्छत ॥ ९ ॥
भावार्थ
‘केकयराज तथा भरतको भेंट देनेके लिये रेशमी वस्त्र और उत्तम आभूषण लेकर तुमलोग यहाँसे शीघ्र चल दो’ ॥ ९ ॥
दत्तपथ्यशना दूता जग्मुः स्वं स्वं निवेशनम् । केकयांस्ते गमिष्यन्तो हयानारुह्य सम्मतान् ॥ १० ॥
भावार्थ
केकय देशको जानेवाले वे दूत रास्तेका खर्च ले अच्छे घोड़ोंपर सवार हो अपने-अपने घरको गये ॥ १० ॥
ततः प्रास्थानिकं कृत्वा कार्यशेषमनन्तरम् । वसिष्ठेनाभ्यनुज्ञाता दूताः संत्वरितं ययुः ॥ ११ ॥
भावार्थ
तदनन्तर यात्रासम्बन्धी शेष तैयारी पूरी करके वसिष्ठजीकी आज्ञा ले सभी दूत तुरंत वहाँसे प्रस्थित हो गये ॥ ११ ॥
न्यन्तेनापरतालस्य प्रलम्बस्योत्तरं प्रति । निषेवमाणास्ते जग्मुर्नदीं मध्येन मालिनीम् ॥ १२ ॥
भावार्थ
अपरताल नामक पर्वतके अन्तिम छोर अर्थात् दक्षिण भाग और प्रलम्बगिरिके उत्तरभागमें दोनों पर्वतों-के बीचसे बहनेवाली मालिनी नदीके तटपर होते हुए वे दूत आगे बढ़े ॥ १२ ॥
ते हास्तिनपुरे गङ्गां तीर्त्वा प्रत्यङ्मुखा ययुः । पाञ्चालदेशमासाद्य मध्येन कुरुजाङ्गलम् ॥ १३ ॥
भावार्थ
हस्तिनापुरमें गङ्गाको पार करके वे पश्चिमकी ओर गये और पाञ्चालदेशमें पहुँचकर कुरुजाङ्गल प्रदेशके बीचसे होते हुए आगे बढ़ गये ॥ १३ ॥
सरांसि च सुफुल्लानि नदीश्च विमलोदकाः । निरीक्षमाणा जग्मुस्ते दूताः कार्यवशाद् द्रुतम् ॥ १४ ॥
भावार्थ
मार्गमें सुन्दर फूलोंसे सुशोभित सरोवरों तथा निर्मल जलवाली नदियोंका दर्शन करते हुए वे दूत कार्यवश तीव्र-गतिसे आगे बढ़ते गये ॥ १४ ॥
ते प्रसन्नोदकां दिव्यां नानाविहगसेविताम् । उपातिजग्मुर्वेगेन शरदण्डां जलाकुलाम् ॥ १५ ॥
भावार्थ
तदनन्तर वे स्वच्छ जलसे सुशोभित, पानीसे भरी हुई और भाँति-भाँतिके पक्षियोंसे सेवित दिव्य नदी शरदण्डाके तटपर पहुँचकर उसे वेगपूर्वक लाँघ गये ॥ १५ ॥
निकूलवृक्षमासाद्य दिव्यं सत्योपयाचनम् । अभिगम्याभिवाद्यं तं कुलिङ्गां प्राविशन् पुरीम् ॥ १६ ॥
भावार्थ
शरदण्डाके पश्चिमतटपर एक दिव्य वृक्ष था, जिसपर किसी देवताका आवास था; इसीलिये वहाँ जो याचना की जाती थी, वह सत्य ( सफल ) होती थी, अतः उसका नाम सत्योपयाचन हो गया था । उस वन्दनीय वृक्षके निकट पहुँचकर दूतोंने उसकी परिक्रमा की और वहाँसे आगे जाकर उन्होंने कुलिङ्गा नामक पुरीमें प्रवेश किया ॥ १६ ॥
अभिकालं ततः प्राप्य तेजोऽभिभवनाच्च्युताः । पितृपैतामहीं पुण्यां तेरुरिक्षुमतीं नदीम् ॥ १७ ॥
भावार्थ
वहाँसे तेजोऽभिभवन नामक गाँवको पार करते हुए वे अभिकाल नामक गाँवमें पहुँचे और वहाँसे आगे बढ़नेपर उन्होंने राजा दशरथके पिता-पितामहोंद्वारा सेवित पुण्यसलिला इक्षुमती नदीको पार किया ॥ १७ ॥
अवेक्ष्याञ्जलिपानांश्च ब्राह्मणान् वेदपारगान् । ययुर्मध्येन बाह्लीकान् सुदामानं च पर्वतम् ॥ १८ ॥
भावार्थ
वहाँ केवल अञ्जलि भर जल पीकर तपस्या करनेवाले वेदोंके पारगामी ब्राह्मणोंका दर्शन करके वे दूत बाह्लीक देशके मध्यभागमें स्थित सुदामा नामक पर्वतके पास जा पहुँचे ॥ १८ ॥
विष्णोः पदं प्रेक्ष्यमाणा विपाशां चापि शाल्मलीम्। नदीर्वापीतटाकानि पल्वलानि सरांसि च ॥ १९ ॥ पश्यन्तो विविधांश्चापि सिंहान् व्याघ्रान् मृगान् द्विपान्। ययुः पथातिमहता शासनं भर्तुरीप्सवः ॥ २० ॥
भावार्थ
उस पर्वतके शिखरपर स्थित भगवान् विष्णुके चरणचिह्नका दर्शन करके वे विपाशा ( व्यास ) नदी और उसके तटवर्ती शाल्मली वृक्षके निकट गये। वहाँसे आगे बढ़नेपर बहुत-सी नदियों, बावड़ियों, पोखरों, छोटे तालाबों, सरोवरों तथा भाँति-भाँतिके वनजन्तुओं— सिंह, व्याघ्र, मृग और हाथियोंका दर्शन करते हुए वे दूत अत्यन्त विशाल मार्गके द्वारा आगे बढ़ने लगे। वे अपने स्वामीकी आज्ञाका शीघ्र पालन करनेकी इच्छा रखते थे ॥ १९-२० ॥
ते श्रान्तवाहना दूता विकृष्टेन सता पथा । गिरिव्रजं पुरवरं शीघ्रमासेदुरञ्जसा ॥ २१ ॥
भावार्थ
उन दूतोंके वाहन ( घोड़े ) चलते-चलते थक गये थे। वह मार्ग बड़ी दूरका होनेपर उपद्रवसे रहित था। उसे तै करके सारे दूत शीघ्र ही बिना किसी कष्टके श्रेष्ठ नगर गिरि-व्रजमें जा पहुँचे ॥ ११ ॥
भर्तुः प्रियार्थं कुलरक्षणार्थं भर्तुश्च वंशस्य परिग्रहार्थम्। अहेडमानास्त्वरया स्म दूता राध्यां तु ते तत्पुरमेव याताः ॥ २२ ॥
भावार्थ
अपने स्वामी ( आज्ञा देनेवाले वसिष्ठजी ) का प्रिय और प्रजावर्गकी रक्षा करने तथा महाराज दशरथके वंशपरम्परागत राज्यको भरतजीसे स्वीकार करानेके लिये सादर तत्पर हुए वे दूत बड़ी उतावलीके साथ चलकर रातमें ही उस नगरमें जा पहुँचे ॥ २२ ॥
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